Monday, July 27, 2009

दुबिया कहे हम जमबे करब


झारखंड के लोक में दूर्वा(हरीघास) का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। लोक कथाओं में इसे अमरत्व का वरदान प्राप्त है, तो लोकगीतों के माध्यम से भी इसकी महानता दर्शायी जाती रही है। ऐसी मान्यता है कि जिस जगह ये उपस्थित है वहाँ समृद्धि और सुख हमेशा रहेगा। इसलिए हर पारम्परिक उत्सव,पर्व-त्योहार तथा शुभ कार्यों में तुलसी की तरह ही दुर्वादलों का भी उपयोग किया जाता है।

दुबिया कहे हम जमबे करब।
आहो दुबिया कहे हम जमबे करब।।
कबो लतो तर परब, कबो जूतो तर परब।
श्री गणेश जी के सिर पर चढ़बे करब।।
दुबिया .........................................।
कतो खुरपी चले, कतो कुदाली चले।
दुई धार के हँसुआ से कटबे करब।
दुई यौवन के पेटवा हम भरवे करब।।
दुबिया.......................................।
नई दुल्हनिया के खोइचा हम भरबे करब।
हर सुहागिन के आशिष हम दियबे करब।।

दुबिया.......................................।




इस गीत के माध्यम से हरी-हरी घास जिसे हम दुर्वा भी कहते है, उसकी महत्ता को दर्शाया गया है।
दुर्वा कहती है, हम तो हर हाल में उगेंगे (जन्म लेंगे)। कभी पैर के नीचे पड़ती हूँ, कभी जूतों से कुचली जाती हूँ।
पर श्री गणेश जी के सिर पर तो चढ़ती ही हूँ।
कभी खुरपी से उखाड़ी जाती हूँ तो कभी कुदाली से।
कभी हँसुए (दराँती) से काटी जाती हूँ।
पर पशुओं का पेट मैं हमेशा भरती हूँ।
नई दुल्हिन का खोइचा मेरे द्वारा हमेशा भरा जाता है।
सुहागिनों को मैं हमेशा आशिर्वाद देती हूं।
दुर्वा कहती है, मैं हमेशा उगती (जन्म लेती ) रहूंगी।

-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, July 22, 2009

मनोरंजक राई गीत


गीत-1
फागुन महीने रंगीले घर आ जइयो राजा।
हाय-हाय रे घर आ जइयो राजा,
चार महीना जड़कारे के लागे,
थर-थर काँपे बिछौना में,
घर आ जइयो राजा।
चार महीन गरमी के लागे,
चोली भींजे पसीना में,
घर आ जइयो राजा।
चार महीना बरसा के लागे,
पानी जूंवे बिछौना में,
घर आ जइयो राजा।

गीत-2

श्याम मेरी गगरी उठाय जइयो,
फेर जा बैठ रइयो।
बड़े वजन की गागर हमारी,
गागर पे घेला धरांय जइये,
फेर जा बैठे रइयो।
संग की सहेली दूर निकर गई,
तनकई इशारो लगाये जइयो।
फेर जा बैठे रइयो।
जोड़ा मड़ोरी की लेज बनाई,
हाथों में लेज गहाय दइयो।
फेर जा बैठे रइयो।

गीत-3

तनक हँस बोल ल ये जलती बेरा।
कहाँ लगी बेरी, कहाँ लग मुनगा,
कहाँ लगे यार के हरियर केरा,
आंगन लगी बेरी, पछीत लगे मुनगा,
बागों लगे यार के जे हरियर केरा,
तनक हँस बोल ले ये चलती बेरा।

गीत-4

बेला के नये गोने आ गये रे, पलका लटका ले।
हाय-हाय रे पलका लटका ले।
कौना सा महीना में व्याव में हैं,
कौना में जौक करा ले रे।
हाय हाय रे पलका लटका ले।
मांओ के महीना में व्याव में है,
फागुन में चोक करा ले रे।
हाय हाय रे पलका लटका ले।।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, July 21, 2009

वाद्ययंत्र झारखंड के


नृत्य,गीत और संगीत झारखंड वासियों के प्राण हैं। यह जनजातीय जीवन की सामूहिक यात्रा के अभिन्न अंग हैं उनसे ही लोक जीवन को अभिव्यक्ति मिलती है। पर्व-त्योहार जातीय संस्कृति के अंग हैं। इन त्योहारों में देर रात तक झारखंड के गांवों में सामूहिक नृत्य, गीत और संगीत की धूम मची रहती है। इन समारोहों में मांदर, नगाड़ा, ढोलकी, बांसुरी और झांझ जैसे वाद्य यंत्रों के सुर-ताल की लहर आनंद को दोगुना कर देती है। कुछ वाद्य यंत्रों के बारे में मैं यहां बताने की कोशिश कर रही हूँ।

केंदरी- संथालों का यह प्रिय वाद्य है। इसे झारखंडी वायलिन भी कहा जाता है। कछुए की खाल या नारियल के खोल से इसका तुम्बा बनाया जाता है। तुम्बा से बांस या लकड़ी का दंड जुड़ा रहता है। उस पर तीन तार लगे रहते हैं। घोड़े की पूछ के बाल से गज बनाया जाता है। गज और दंड के तारों की रगड़ से स्वर निकलते हैं।
एकतारा- एकतारा को गुपिजंत्र भी कहा जाता है। इसमें एक ही तार होता है। झारखंड क्षेत्र में अक्सर फकीर या साधु लोग इस वाद्य का प्रयोग करते हैं। भजन, भक्तिगीत गाने वाले साधु-संन्यासियों की पहचान एकतारा और उसकी आवाज से ही होती है। इसके नीचे का हिस्सा खोखली लौकी या लकड़ी का बना होता है और उसका मुंह चमड़ा से मढ़ा रहता है। गायक को एकतारा से आधार स्वर मिलता है।
भुआंग- भुआंग संथालों का प्रिय वाद्य है। दशहरा के समय दासांई नाच में वे भुआंग बजाते हुए नृत्य करते हैं। यह तार वाद्य है। इसके बावजूद इसमें ऐसे अधिक स्वर निकलने की गुंजाइश नहीं रहती है। इसमें धनुष और तुम्बा होता है। इसमें तार को ऊपर खींचकर छोड़ देने से धनुष-टंकार जैसी आवाज निकलती है।
बांसुरी- सुषिर वाद्यों में बांसुरी या आड़बांसी झारखंड में काफी लोकप्रिय हैं। डोंगी बांस से सबसे अच्छी बासुरी बनायी जाती है। यह बांस पतला और मजबूत होता है। बांसुरी में कुल सात छेद होते हैं सबसे ऊपर वाले छेद में फूंक भरी जाती है।
सानाई- बांसुरी की तरह ही सानाई (शहनाई) भी झारखंड में लोकप्रिय है। यह यहां का मंगल वाद्य भी है। पूजा, विवाह आदि मौकों पर इसे बजाया जाता है। साथ ही छऊ,नटुआ, पइका आदि नृत्यों में भी सानाई बजायी जाती है। दस इंच का सानाई में लकड़ी का नली होती है। उसमें छह छेद होते हैं। इसके एक सिरे पर ताड़ के पत्ते की पेंपती होती है और दूसरे सिरे पर कांसे की धातु का गोलाकार मुंह होता है। पेंपती से फूंक मारी जाती है। लकड़ी के छेदों पर उंगलियां थिरकती हैं तो अलग-अलग स्वर निकलते हैं कांसे के मुंह की वजह से आवाज तेज और तीखी होती है, जिसे दूर-दूर तक सुनी जा सकती है।
सिंगा- भैंस की सींग से सिंगा बनाया जाता है। इसके नुकीले सिरे से फूंक मारी जाती है। दूसरा सिरा चौड़े मुंह का होता है और वह आगे की ओर मुड़ा रहता है छऊ नाच में इसका उपयोग किया जाता है। शिकार के वक्त पशुओं को खदेड़ने के लिए इसे बजाया जाता है। पशुओं पर नियंत्रण के लिए चरवाहे लोग भी सिंगा बजाते हैं।
मदनभेरी- यह एक सहायक वाद्य है। इसे ढोल,सानाई,बांसुरी आदि के साथ बजाया जाता है। छऊ नृत्य,विवाह समारोह आदि में भी इसे बजाया जाता है। इसमें लकड़ी की सीधी नली होती है, जिसके आगे पीतल का मुंह रहता है। करीब चार फीट लम्बे इस वाद्य में कोई छेद नहीं होता । इसलिए फूंक मारने पर इससे एक ही स्वर निकलता है।
इसके अतिरिक्त निशान, शंख आदि भी झारखंड में बजते हैं। शंख मंगल वाद्य हैं। पहले उसका उपयोग संदेश देने के लिए भी होता है।


मांदर- मांदर झारखंड का प्राचीन और अत्यंत लोकप्रिय वाद्य है। इसे यहां लगभग सभी समुदाय के लोग बजाते हैं। यह पाश्वमुखी वाद्य है। लाल मिट्टी के बने मांदर का गोलाकार ढांचा अंदर से खोखला होता है। इसके देने तरफ के खुले मुंह बकरे की खाल से ढंके रहते हैं। मांदर की आवाज गूंजदार होती है। नाच के वक्त उसे बजाने वाला भी घूमता-थिरकता है। इसके लिए वह रस्सी के सहारे मांदर को कंधे से लटका लेता है।
ढोल- मांदर के साथ झारखंड में ढोल भी अवश्य ही बजाया जाता है। यह आम,कटहल या गमहर की लकड़ी से बनता है। इसमें भी अंदर से खोखला करीब दो फीट लम्बा ढांचा होता है। इसके भी दोनों किनारे गोलाकार होते हैं। दोनों किनारों की तुलना में बीच का हिस्सा कुछ उभरा हुआ होता है। इसके भी मुंह बकरे का खाल से ढंके रहते हैं। इसे हाथ तथा लकड़ी दोनों तरह से बजाया जाता है।
धमसा- यह विशालकाय वाद्य है। इसका मांदर, ढोल आदि मुख्य वाद्यों के सहायक वाद्य के रूप में इस्तोमाल किया जाता है। इसकी आकृति कड़ाही जैसी होती है। इसका ढांचा लोहे की चद्दर से तैयार किया जाता है। इसे लकड़ियों के सहारे बजाया जाता है। इसकी आवाज गंभीर और वजनदार होती है। छऊ नृत्य में धमसा की आवाज से युद्ध और सैनिक प्रयाण जैसे दृश्यों को साकार किया जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, July 16, 2009

अंबुवासी का मेला


कामाख्या मंदिर के अंबुवासी मेले के बारे में संडे नईदुनिया के मैग्जीन में पढ़ा तो अपने बचपन के बीते दिन की याद ताजा हो गई। नीलाचल पर्वत की वो सुन्दरता मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। रंग बिरंगे जंगली फूलों से भरा वह पहाड़ और पहाड़ों के बीच चक्कर खाती हुई घूम-घूमकर उपर चढती बस। गहरे हरे रंग का वह सरोवर जो मानों ऐसा लगता था जैसे पत्थर के बड़े से कटोरे में हरे रंग का पानी रखा हो। गर्भगृह का वह मोटा-मोटा पत्थर का खंभा, जिसमें बड़ी मुश्किल से एक-एक आदमी पार होते हैं। मंदिर के अंदर का माहौल ऐसा था मानों सभी माता की भक्ति में लीन हो जाना चाहते हों। मन्नत पूरा होने पर लोग वहाँ तरह-तरह की घंटियाँ भी चढ़ावे में चढ़ाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि साल में एक बार माँ कामाख्या रजस्वला होती है। इसी तिथि को वहाँ के लोग अंबुवासी के मेले के रूप में मनाते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीया चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनी नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाखया महापीठ को सर्वश्रेष्ठ और जाग्रत माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में मां की योनी की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।


एक मान्यता यह भी है कि रतिपति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं भस्म हुए थे। कामदेव ने अपना पूर्वरूप भी यहीं प्राप्त किया इसलिए इस क्षेत्र का नाम कामरूप पड़ा। इस बात का उल्लेख कल्कि पुराण में है। इस संदर्भ में कुमारसंभवम् का यह श्लोक वर्णित हैः

पिनाकिना भग्नमनोरथाः सती,
निनिन्द रूपं हृदयेन् पार्वती,
प्रियेषु सौभाग्यफलाहि चारुता।।

अर्थः- अपनी नजरो के सामने शिव के कोप से भस्म होते कामदेव को देखकर पार्वती जी ने अपने रूप की हृदय से निन्दा की।
क्योंकि सुन्दरता वही सार्थक होती है, जो अपने पति को आकर्षित कर सकती हो।

साधु और तांत्रिक मंदिर के आसपास की वीरान जगहों और कंदराओं में साधना में लीन रहते हैं। उस दौरान चार दिनों के लिए मंदिर का पट बंद रहता है और चार दिन बाद पट खुलने पर पूजा-अर्चना के बाद ही श्रद्धालु लौटते हैं।
हिन्दु समाज में रजोवृति के जौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान असम में भी कोई शुभ कार्य नहीं होता है। विधवाएं, साधुसंत आदि अग्नि को नहीं छूते हैं और आग में पका भोजन नहीं करते हैं। पट खुलने के बाद श्रद्धालु मां पर चढ़ाए गए लाल कपड़े के टुकड़े का अंश मात्र भी मिल से अपने आप को धन्य मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये कपड़े का टुकड़ा मिल जाने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।
वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है और साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह पहाड़ ब्रह्मपुत्र नही से बिल्कुल सटा है। सामने ब्रह्मपुत्र के बीच में स्थित छोटी सी पहाड़ी पर शिव का उमानंद मंदिर है। यह माना जाता है कि वहां विराजमान शिव ही कामाख्या माता के भैरव हैं, इसलिए कामाख्या आने वाले भक्त उमानंद मंदिर भी जरूर जाते हैं। पूरा मंदिर बड़े-बड़े पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने के कारण मंदिर का गर्भगृह बाहरी सतह से करीव दस फुट नीच चला गया है, जहां तक जाने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं।
कामाख्या मंदिर में लगने वाला यह मेला वहाँ की कृषि से भी जुड़ा हुआ है। माता के ऋतुवती होने के बाद ही वहां के लोग कृषिकार्य का प्रारंभ करते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, June 30, 2009

गुड़ी में गोन्चा


आषाढ़ का महीना आते ही बस्तर के लोगों की चहल-पहल देखते ही बनती है। सीरासार के सामने जगन्नाथ गुड़ी (मंदिर) में भगवान जगन्नाथ -बलराम-सुभद्रा की पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है। यह लोक की विशेषता ही है कि हर काम के पीछे कुछ कथाएँ कुछ किंवदन्तियाँ होती हैं. जो मनोरंजक होने के साथ-साथ शिझाप्रद भी होती हैं।
इस पूजा के पीछे एक बहुत ही प्रचलित लोककथा है-बस्तर के महाराजापुरुषोत्तम देव को एक बार भगवान जगन्नाथ ने सपने में दर्शन देकर जगन्नाथपुरी(ओडीसा) जाने को कहा। राजा पुरुषोत्तम देव अपने कुछ लोगों के साथ पैदल ही जगन्नाथपुरी के लिए चल पड़े। उधर जगन्नाथपुरी में, आषाढ़ शुक्ल पझ द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ का रथ खींचा ही जा रहा था कि रथ रुक गयाघ सभी अचरज से भर गये। तब पुरी-मुखिया गजपति राजा ने कहा कि जरुर अभी भगवान जगन्नाथ का कोई भक्त यहाँ नहीं पहुँचा है। तभी बस्तर- महाराजा पुरुषोत्तम देव वहाँ पहुँचे और रथ खींचने लगे तो रथ चल पड़ा। इससे लोगों ने भगवान और भक्त राजा पुरुषोत्तम देव की जय-जयकार की। उसी समय राजा गजपति ने पुरुषोत्तम देव को रथपति कहा और बस्तर में भी बारह चक्कों का रथ चलाने की सलाह दी। वहाँ से लौटने के बाद बस्तर - महाराजा ने जगदलपुर में गोन्चा और दशहरा के समय रथ चलाने की रस्म शुरु की। <
आषाढ़ के महीने में मनाये जाने वाले रथयात्रा पर्व को गोन्चा कहने के पीछे भी एक लोक कथा है। पौराणिक काल में राजा इन्द्रद्युम्न थे, उनकी रानी का नाम था गुंडिचा। यह उत्सव उन्हीं गुंडिचा रानी के नाम पर मनाया जाता है। गुंडिचा ही आगे चलकर गोन्चा हो गया।
विष्णु भगवान के भक्त इन्द्रद्युम्न और उनकी रानी गुंडिचा भगवान का दर्शन पाना चाहते थे। एक दिन भगवान ने उन्हें सपने में आकर कहा कि वे उनका दर्शन नीलगिरि की गुफा में कर सकते हैं। राजा और रानी यह जानते थे कि शबर राजा विश्वावसु नीलगिरि की गुफामें भगवान नीलमाधव की पूजा किया करते हैं। उन्होंने अपने राजपुरोहित विद्यापति को भगवान नीलमाधव की मूर्ति के लिए भेजा। राजपुरोहित छल करके वह मुर्ति जगन्नाथपुरी ले आये। किन्तु भगवान जगन्नाथ ने एक रात सपने में राजा इन्द्रद्युम्न को दर्शन दिया और कहा कि महासागर के तट पर लकड़ी का एक टुकड़ा मिलेगा, जिससे श्रीकृष्ण,बलराम, और सुभद्रा की मूर्तियाँ बनवा लेना। दूसरे दिन राजा को महासागर के किनारे व ऐसी ही लकड़ी मिली। उन्होंने उसे उठा लिया और राजमहल ले आये। मूर्तियाँ बनाने के लिए विश्वकर्मा जी स्वयं एक कलाकर के वेश में वहाँ आए। उन्होने शर्त रखी कि वे एक बन्द कमरे में मूर्तियाँ बनाएँगे। उन्हें कोई तंग न करें। वे कमरे में बन्द होकर मूर्तियाँ बनाने लगे। कई दिनों के बाद जब कमरे से छेनी-हथौड़ी की कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ी तो रानी गुंडिचा को डर लगा कि कहीं कलाकर, जो काफी बूढ़ भी था, मर न गया हो। उन्होंने दरवाजा तुड़वाया तो देखा कि कलाकार वहाँ नहीं था। मूर्तियाँ अधूरी बनी थीं। इसी से इस पर्व का नाम गुंडिचा हुआ। यहीं गुंडिचा आगे चलकर गोन्चा हो गया।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, June 16, 2009

बंगाली लोक गीत


आमि स्वप्ने देखि मधुमालार मुख रे
स्वप्न जोदि मिथ्या रे होइतो
गलार हार की बोदोल होइतो रे लोकजन।
स्वप्न जोदि मिथ्या रे होइतो
अंगुरी की बोदोल होइतो रे लोकजन।
मदनकुमार जात्रा कोरे,
मस्तुल भांग्या पानित पोड़े रे, लोकजन।।
आमि स्वप्न देखि मधुमालार मुख रे।।



मैं स्वप्न में मधुमाला का मुख देखता हूँ
यदि यह स्वप्न झूठा है, ओ लोगो,
तो फिर मेरे हार की उसके हार से अदला-बदली कैसे हो गई।
मदनकुमार जात्रा आरंभ करता है (मधुमाला की खोज में)
बजरे का मस्तूल टूटकर पानी में गिर जाता है।

आमि धेरज धारिते पारिना हाय,
आमि धेरज धारिते पारिना......
देखा दियो हे मोर बंधु श्याम राय,
तोमार ना दिखिया जाप दिखा, राय,
देखा दियो हे मोर बोधु श्याम राय
धेरज धारिते नारी नारिर प्रानेते
उपाय बाला गा बृंदे, ओ कृष्ण प्रेयेते
उपाय बाला गो बृंदे।
आमि धेरज धारिते पारिना.......।


अब मुझसे और अधिक धैर्य नहीं रखा जा रहा।
ओ मेरे प्रिय कृष्ण, कृपा करके दर्शन दो।
तुम्हारे बिना मैं बेसुध पड़ी हूँ।
धीरज शायद नारी की नियति है लेकिन
मेरा नारी-हृदय आकुल-व्याकुल हो उठा है
मुझे मेरे प्रियतम की राह बता दो, ओ बृंदा।
अब मुझसे और धैर्य नहीं रखा जा रहा।।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, June 12, 2009

बांग्ला लोकोक्तियाँ

बांग्ला लोकजीवन में लोकोक्तियों को बड़े ही मनोरंजक अंदाज में प्रयोग किया जाता है। कुछ लोकोक्तियां मैंने यहां पर संकलित करने का प्रयास किया है। शायद आप पाठकों को भी पसंद आएगा-

दशजन राजी जेखाने खोदा राजी सेखाने।
दस आदमियों का सहमती जहाँ होती है वहाँ भगवान भी राजी हो जाते हैं।

माछ आर अतिथि दुइ दिन पोरे विष।
मछली और अतिथि - ये दो दिन बाद अप्रिय हो जाते हैं।

अल्पविद्या भयंकारी।
थोड़ी विद्या भयंकर परिणाम देती है।

एक गाछेर छाल की आर गाछे लागे?
एक पेड़ की छाल क्या दूसरे पेड़ पर लगती है?

पर्बतेर मूषिक प्रसव।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

आटुरे बोऊ नेंगटा होये नाचे।
अधिक प्यार से बहू नंगी नाचने लगती है।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, May 7, 2009

आज भी गाये जाते हैं प्रभाती


सुबह के समय गाये जानेवाले गीतों को प्रभाती कहा जाता है। इन लोकगीतों में अधिकांशतः प्रभू स्मरण ही किया जाता है। अंग जनपद में खासकर गंगा नदी के किनारे के इलाके में जो प्रभाती गाये जाते हैं उनमें गंगा ही प्रायः अराध्य होती हैं। कवि विद्यापति के जीवनी को पढ़ने से पता चलता है कि उनके जीवन में भी प्रभाती गीतों का विशेष महत्व था। उनके गाये कुछ गीत प्रभाती गीत ही प्रतीत होते हैं। आज भी कभी-कभी सुनने को मिल ही जाते हैं प्रभाती गीत।

1.
कथी केरो कंघई हे गंगा मइया,
कथी केरो काम।
कथी बैठली गंगा मइया
चिरै लम्बी हे केश।
सोना केरो कंघई मइया हे रूपे केरो काम
मचिया बैठली हे गंगा मइया चिरै लम्बी केश



2.
बहे पुरबैया हे मइया, है डोले हे सेमार
झट दाये हे मलहा, पार देहो हे उतार
टूटली नैया हे मइया,टूटली पतवार
कैसे काए उतरब मैया सातो नदी है पार
सोने देबो नैया रे मलहा रूपे पतियाल
झिंझरी खेलतैं मलहा, पार देहो हे उतार
बहे पुरबैया हे मइया, है डोले हे सेमार
नैया खेबू नैया खेबू रे झिमला मलाहा
हमू जे कुमारी झिमला पारो देहो हे उतार
कहाँ तोरो घर हे गंगा माय, किय तोरो नाम
बतिया बिचारो गंगा मइया
समुन्दर होयबो हे पार



3.
ऐसन खिड़की कटैहियो हे गंगा मइया
वै खिड़की सचवा उतरत पार।।
नैहरा के प्यारी दुलारी हे गंगा मैया
ससुरा में कईस काटती दिन,
ऐसन बोलिया बोलियोह हे गंगा माय
वै बोलिया होइतो सलख के मान।।
किरपा करिहों भगता पर हे गंगा मैया
हमें होइब निहाल।
ऐसन खिड़की कटैहियो हे गंगा मइया
वै खिड़की सचवा उतरत हे पार।।
-प्रीतिमा वत्स

Saturday, April 18, 2009

बासी भात

चैत पूर्णिमा की रात और बैशाख की सुबह झारखंड और बिहार के अधिकांश इलाकों में बासी भात के नाम से प्रसिद्ध है। यह पर्व मुख्यतः गोड्डा,भागलपुर,बांका,दुमका ,देवघर,दरभंगा आदि जिले के गांवों में आज भी बड़े उत्सव के साथ मनाया जाता है।
चैत पूर्णिमा की रात को घर की महिलाएँ अपने रसोई घर की अच्छी तरह से सफाई करके सोती हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि कोई जूठा या बचा हुआ खाना न रह जाए। रात के दो से तीन बजे के बीच औरतें उठकर अपना चौका चूल्हा संभाल लेती हैं। दूसरे दिन खाया जानेवाला पूरा खाना उसी समय बना लिया जाता है। इस खाने में तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। सुबह होने से पहले ही औरतें अपने रसोई का काम खत्म करके सो जाती हैं।
बड़े जोर-शोर से सुबह घर की सफाई की जाती है। फिर तुलसी के पौधे के ऊपर एक घड़ा लटकाया जाता है। जिसमें नीचे एक छेद होता है। इस छेद से बूंद-बूंद पानी टपकता रहता है। यह घड़ा पूरे बैशाख भर लटका रहता है। रोज सुबह घर के हर आदमी नहा-धोकर इस घड़े में जल डालते हैं। जिससे पूरे महीने पौधा हरा रहता है।
उस दिन जौ के सत्तु,गुड़, कच्चे आम, और दही से भगवान विष्णु तथा तुलसी जी की पूजा की जाती है। इसके बाद आधी रात को बना हुआ खाना भगवान तथा पितरों को भोग लगाया जाता है। फिर वही खाना सारा दिन घर के सब लोग खाते हैं। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।
इस पर्व को मनाने के पीछे शायद यह कामना रही हो कि बैशाख से शुरू होनेवाले प्रचंड गर्मी में भगवान घड़े के बूंद-बूंद टपकते पानी की तरह शीतलता बनाए रखें। घर में चूल्हा शायद इसलिए भी नहीं जलाया जाता है कि इस चिलचिलाती धूप में धरती माँ को थोड़ी सी तो राहत महसूस हो।
-प्रीतिमा वत्स

Thursday, April 9, 2009

लोक देवता चूटोनाथ

चूटोनाथ के पूजन-दर्शन का कार्य यूँ तो बारहों महीने चलता रहता है। पर वैशाख के महीने में उनकी विशेष पूजा की जाती है जिसे स्थानीय लोग चड़क पूजा कहते हैं।

दुमका (संताल परगना) से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर चूटो पहाड़ियों के बीच झारखंड का एक महत्वपूर्ण धार्मिक तथा ऐतिहासिक स्थल स्थित है जहाँ लोक-आस्था के प्रतीक बाबा चूटोनाथ का मंदिर है। बाबा चूटोनाथ भगवान् भोले शंकर के प्रतिरूप माने जाते हैं और इनकी मान्यता बैद्यनाथधाम और बासुकीनाथ जैसे प्रमुख एवं प्रसिद्ध शैव-स्थल के रूप में है।
ऐसी लोक-मान्यता है कि बाबा चूटोनाथ अपने भक्तों की हर प्रकार के अनिष्ट से रक्षा करते हैं और उनके दरबार में माँगी गयी हर प्रकार की मनौतियाँ पूरी होती हैं। हरे-भरे वृक्षों से बीच चूटो पहाड़ की तलहटी में चूटो बाबा के मंदिर के निकट ही पहाड़ी बाबा का पूजा-स्थल स्थित है जिनकी मान्यता चूटो बाबा के कर्ता के रूप में है, अर्थात बाबा चूटोनाथ से माँगी गयी मनौतियाँ पहाड़ी बाबा पूरी करते हैं। मनौतियाँ पूरी होने पर लोग पहाड़ी बाबा को पाठा(बकरा),मुर्गा आदि की बलि चढ़ाते हैं और मदिरा भी अर्पित करते हैं क्योंकि ये वनदेव के रूप में पूजित हैं। यहाँ पर चढ़ाई जानेवाली बलि को किसी बलिवेदी में नहीं लगाया जाता है, सीधे कटार से वार किया जाता है। यह भी विडम्बना है कि एक ही बार में सर धड़ से अलग हो जाता है और बलि के लिए प्रयुक्त कटार पर रक्त का नामोंनिशान नहीं रहता है। पहाड़ी पर स्थित चूटोनाथ के मंदिर में किसी तरह की बलि नहीं चढ़ती। वहाँ फूल-बेलपत्र और जल से बाबा का पूजन- अर्चन होता है।
चूटोनाथ में झारखंड और बिहार के अतिरिक्त पश्चिम बंगाल के श्रद्धालु भक्त और दर्शनार्थी भी सालोंभर आते रहते हैं। हालाँकि बाबा चूटोनाथ की मान्यता वनदेव या जंगली देवता के रूप में है, किन्तु इनके प्रति आदिवासी और गैर-आदिवासी सभी लोगों की आस्था समान रूप से है। संताल परगना के घटवाल जाति के लोगों में इनके प्रति विशेष श्रद्धा है और वे लोग इन्हें अपने इष्टदेव के रूप में पूजते हैं। उनकी ऐसी मान्यता है कि चूटोनाथ बाबा हर प्रकार के रोग, व्याधि और संकट से रक्षा करते हैं। बाबा चूटोनाथ के दूत स्वरूप पूजित पहाड़ी बाबा के पुजारी जहाँ चूटोनाथ के परम घटवाल भक्त फक्कू राय के वंशज हैं, बाबा चूटोनाथ के पुजारी ब्राह्मण कुल के होते हैं।
चूटोनाथ की आस-पास की पहाड़ियों में पाँच गुफाएँ हैं जहाँ देवी की पूजा होती है। निकट के झंझरा पहाड़ी की गुफा में स्थित देवी का मान्यता बड़ी देवी के रूप में है। किंवदन्ती है कि झंझरा पहाड़ी मे स्थित बड़ी देवी को पुराने समय में नर-बलि भी दी जाती थी।
बाबा चूटोनाथ के भक्तों की सूची बड़ी लंबी है, जिनमें मखना साधु, पहाड़ी बाबा और महानन्दों साधु के नाम श्रद्धापूर्वक लिये जाते हैं। इनमें मखना साधु का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है। मखना बाबा चूटोनाथ के अनन्य भक्त थे। वे प्रतिदिन बाबा चूटोनाथ के शिवलिंग को निकट के सरोवर में ले जाकर स्नान कराते थे। उन दिनों चूटोनाथ की आस-पास की पहाड़ियों में घने जंगल थे। मखना बाबा को पेड़-पौधे, जंगल और वन्य जीवों से अत्यंत लगाव था। कहते हैं कि उन्होंने एक बाघ पाल रखा था जो सदैव उनके साथ रहता था। प्रत्येक पूर्णिमा की रात्रि में वे बाबा चूटोनाथ के पूजन के बाद पत्तल के 52 दोने मंदिर के सामने लगाते थे । दोना लगाने के बाद वे एक खास तरह की आवाज लगाते थे और इसे सुनते ही निकट के जंगल से आकर मोर, खरगोश, तीतर, जंगली बिल्ली, चूहा सरीखे पशु-पक्षी मखना बाबा के साथ भोग खाते थे। मखना बाबा ने चूटोनाथ मंदिर के पास अनेक वृक्ष लगाये थे जिनमें से कई आज भी उनकी याद दिलाते हैं। मखना बाबा की मृत्यु होने पर उन्हें चूटोनाथ मंदिर के समक्ष दफनाकर उनकी समाधि बना दी गयी है।
चूटोनाथ के पूजन-दर्शन का कार्य साल के बारहों महीने चलता रहता है। पर वैशाख के महीने में उनकी विशेष पूजा की जाती है जिसे स्थानीय लोग चड़क पूजा कहते हैं। बाबा चूटोनाथ की चड़क पूजा के पूर्व निकट के गाँव दीघी के काली मंदिर में देव-रूप में पूजित शिलाखंड बनेसर (अर्थात वन के ईश्वर बनेश्वर) की आस पास के सभी गांवों में समारोह पूर्वक प्रदक्षिणा करायी जाती है और फिर उन्हें चूटोनाथ मंदिर परिसर में लाया जाता है।
बनेसर देव के यहाँ पहुँचते ही चड़क पूजा की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है जो कि रात भर चलता रहता है। चूटोनाथ शिवलिंग का दर्शन कर भगतिया लोग लकड़ी के एक खम्भे जिसे ढोल शिवा कहते हैं, पर उल्टा लटककर झूलते हैं और नीचे आग जलती रहती है। इसके बाद भक्तगण कँटीली झाड़ियों पर नंगे बदन लोटकर लफरा काँटा की रस्म पूरी करते हैं। फिर रोमांचक फूल खेला होता है जिसमें हजारों भक्त नंगे पाँव जलते हुए आंगारों पर नृत्य करते हैं । जिन लकड़ी के लट्ठों के जलने से बने अंगारों पर यह नृत्य होता है उसे भक्त द्वारा चूटोनाथ के मंदिर से हथेली पर लायी अग्नि से प्रज्वलित किया जाता है। यह शिव स्वरूप चूटोबाबा का ही चमत्कार है कि रातभर इस हठयोगपूर्ण पूजा-साधना में लीन रहने के बावजूद कोई भी भक्त आहत नहीं होता है। भक्तों के लिए बाबा चूटोनाथ एक जागृत देव हैं, जिनके दर से कोई भी निराश नहीं लौटता है।

-प्रीतिमा वत्स

Monday, April 6, 2009

सोहराय पर्व का आरंभ कैसे हुआ ?

लोक जीवन में हर पर्व, हर उत्सव,हर पहलू के पीछे कुछ न कुछ किंवदन्तियां जरूर होती हैं। सोहराय पर्व को मनाने के पीछे भी एक बहुत ही रोचक कथा है-
लोक मान्यता हैं,ठाकरान(आदिदेवी) की हंसली हड्डी (गले की हड्डी) के मैल से बने हांस-हांसिल (हंस-हंसिनी) पक्षियों ने विशाल जल-राशि पर तैरते हुए बिरना (खस घास) के झाड़ में अपना घोंसला बनाया था जहां हांसिल (हंसिनी) ने दो अंडे दिए थे, जिनसे दो मानव शिशु उत्पन्न हुए थे। तब, ठाकुर जिउ (सृष्टिकर्ता) को चिंता हुई कि उन दोनों मानव -शिशुओं के आहार की व्यवस्था की जाए।
उस समय स्वर्गपुरी में आइनी-बाइनी कपिला गाएं थीं। ठाकुर जिउ ने मारांग बुरू (महादेव) को अपने पास बुलाकर कहा कि उन गौओं को पृथ्वी पर ले जाएं। मारांग बुरू स्वर्ग पुरी में ही रहते थे, परंतु वे पृथ्वी पर तोड़े सुताम (काल्पनिक तंतु) के सहारे आसानी से आ-जा सकते थे।
ठाकुर जिउ के आदेशानुसार, मारांग बुरू बहुत अनुनय-विनय करके नर-मादा आइनी-बाइनी कपिला गौओं को पृथ्वी पर ले आए और उन्हें जंगल में रखा। साथ ही, पृथ्वी पर मारांग बुरू ने मड़ुआ,सावां आदि कुछ मोटे अनाजों के बीज जहां-तहां छींट दिए। कालक्रम में प्रथम मानव -दंपत्ति, पिलचू हाड़ाम-पिलचू बूढ़ी तथा कपिला गौओं की वंश-वृद्धि हो गई। मानव-संतानें बाकुक नाहेल (हाथों से चलाने वाले हल) से जमीन जोतकर अनाज उपजाना सीख चुकी थीं। उस पर मारांग बुरू ने उनलोगों से कहा, अपने हाथों से कबतक हल जोतते रहोगे ? जाओ, जंगल से नर-मादा कपिला गौओं को ले आओ। उनमें से नर-गौओं(बैलों) से हल चलाया करना और मादा-गौओं(गायों) के दूध खाया-पीया करना। तब, वे मानव उन गौओं की खोज में जंगल को गए। वहां उन्हें वे गौएं झुंड में एक ही जगह इकट्ठी मिल गईं। अतः मानव गौओं को जंगल से हांककर अपने यहां ले आए। गायों के आने की खुशी में लोगों ने उन पशुओं के सींगों में तेल-सिंदूर लगाकर उनका स्वागत किया गया, उनका परिछन किया गया और उन्हें गोहाल (मवेशी-घर) में रखा,दूसरे दिन उन मवेशियों को गोहाल से निकालकर चरने के लिए, चरवाहों के साथ, बाहर भेज दिया गया और गोहालों को साफ-सुथरा करके पूजा की गई। सांझ हो जाने पर वे सभी मवेशी गोहालों में अपनी-अपनी जगह पर आ गए। तब, धूप-दीपों के साथ उन मवेशियों का परिछन किया गया। साथ ही, गीत-नाद के साथ उस दिन रात्रि-जागरण किया गया। फिर, तीसरे दिन, बैलों को अपने-अपने दरवाजे पर निकालकर, उन्हें सजा-धजाकर गली में गाड़े गए खूंटों में बांधकर हड़काए जाते हुए खेल-कूद किया जाता रहा। चौथे दिन घर-घर से कुछ-कुछ अनाज मांगकर सहभोज किया गया और पांचवें दिन बेझा तुंग (लक्ष्य-वेध) करके गोधन-पर्व की समाप्ति की गई।
कहते हैं, सोहराय पर्व का आरंभ उसी दिन से हुआ है। उस पर्व का पहला दिन गोट पूजा का दूसरा दिन गोहाल पूजा का तीसरा दिन खुण्टाउ (बैल खूंटने) का, चौथा दिन जाले का और पांचवां दिन बेझा तुंग का दिन कहलाता है। तब से यह पर्व हर साल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। संताल परगना में यह पर्व मकर-संक्रांति के ठीक पहले मनाया जाता है जबकि दक्षिण बिहार,उड़ीसा आदि में दीपावली के अवसर पर मनाया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, March 18, 2009

क्या आपने चैती सुना है ?

चैती एक खास तरह का गीत है जिसे चैत के महीने में गाया जाता है। इन गीतों में मुख्य रूप से भगवान राम का स्मरण किया जाता है। झारखंड के गोड्डा जिले में रहनेवाले कंचन महतो का कहना है, चैत के महीने में तो सिर्फ राम के लिए ही चित्त चंचल होता है। उनके सुर आज भी चैत की रातों सजाते हैं।

लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
ऐसो सुन्दर ललनमा के देखी
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा।।
घुंघराली काली-काली लुटरिया
शोभित कमल नयनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा
अखिया सुफल भई,अखिया सुफल
भई।।

इस चैती गीत में रामचंद्र जी की सुन्दरता का वर्णन किया गया है। उनकी घुंघराली काली लटें, उनके सुंदर नयन जो कमल की तरह खिले हुए लगते हैं। जिन्हे देखकर आंखे सफल हो गई।

बाजत आनंद बधैया हो रामा।
ऐलै चैत का महीनवा हो रामा
बाजत आनंद बधैया हो रामा।
राजा दशरथ के चार पुत्र भई
श्याम घोर छवि छैया हो रामा।
बाजत आनंद बधैया हो रामा।।

इन गीतो में भगवान रामचंद्र जी के जन्म उत्सव का वर्णन किया गया है।

-प्रीतिमा वत्स

Saturday, March 14, 2009

देवगुड़ी में धरतीपूजा


जिस दिन देवगुड़ी में हल चलाया जाता है उस दिन पूरे गांव में हल चलाने की मनाही होती है, तथा दूसरे दिन से धान की बोआई शुरु हो जाती है।

छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाकों में चैत के महीने में धरती माँ की पूजा बड़े ही धूमधाम से की जाती है।इस पर्व को यहाँ माटी तिहार के नाम से जाना जाता है।
पर्व के दिन सुबह-सवेरे नहा-धोकर पुजारी देव गुड़ी(देव मंदिर) में जा पहुँचता है। पुजारी दिनभर का उपवास रखता है। गाँवभर के सभी पुरुष अपने हाथों में सिंयाड़ी के पत्ते के दोने में धान भरकर देवगुड़ी में जमा होते हैं। फिर वे अपने-अपने दोने देवी माँ के चरणों में अर्पित कर देते हैं। देवगुड़ी के पास हीं एक लम्बा-चौड़ा गड्ढा खोदा जाता है, लेकिन इस गड्ढे की मिट्टी निकाली नहीं जाती है। कुछ आदमी हल लेकर इस गड्ढे की गुड़ाई करते हैं। इस हल में बैलों की जगह आदमी जुते रहते हैं। इस रस्म के बाद उस गड्ढे में ढेर सारा पानी डालकर छोड़ दिया जाता है। तब पुजारी इनमें धान बोता है।धान बोये जाने के बाद सभी लोग इकट्ठे होकर देवी माँ,धान और पुजारी की पूजा करते हैं।पूजा के बाद सबलोग मंदिर में ही बना हुआ खाना खाते हैं। खाना खाने के बाद पुनः सब उस गड्ढे के पास इकट्ठे हो जाते हैं, और एक-दूसरे को कीचड़ में घसीट-घसीटकर खूब खेलते हैं। एक दूसरे के ऊपर कीचड़ लगाते हैं और अपने-अपने घर आ जाते हैं।
दूसरे दिन पुजारी के घर पर खाना-पीना होता है, तथा रात्रिजागरण भी किया जाता है।

यद्यपि यह पर्व काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन इस पर्व में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है।
माटी तिहार का पर्व यूँ तो छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाके में मनाया जाता है लेकिन पर्व मनाने के तरीकों में थोड़ी बहुत भिन्नता पाई जाती है। कहीं-कहीं पर डाही जलाने (बुरी नजर से बचाने) की प्रथा भी है।
-प्रीतिमा वत्स

Saturday, March 7, 2009

फुलवा जैसनी सुकुमार


बिहार और झारखंड (प्राचीन अंगजनपद) के कुछ हिस्सों में आज भी होरी (होली पर गाया जानेवाला गीत) अपने पुराने अंदाज और ठाट से गाया जाता है। शिवरात्रि के दिन से आरंभ होकर होलिका दहन के दिन तक रोज रात में गाया जाता है। दिनभर के कामों से निवृत होकर जब लोग रात को करीव दस बजे होरी गाने बैठते हैं तो मानों नयी स्फुर्ति से भर जाते हैं। पुरुषों की भीड़ में कोई एक पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर भी नाचता है। और पूरा गांव होली के रंग में आधी रात तक डूबा रहता है।

होली के कुछ गीत-

1.
गोरिया पातरी हे गोरिया पातरी
गोरिया पातरी----------------।
जैसे लचके अंगुरिया के डार, गोरिया पातरी,
होरी हो-------होरी हो-----------।
पनवा जैसनी हे गोरिया पातरी छितरी
फुलवा जैसनी सुकुमार,
सोनवा जैसनी हे गोरिया देखैम् सुन्दरी
बिजुरी छिटकावै बतीसो दाँत
होरी हो--------होरी हो---------।
गोरिया पातरी हे, गोरिया पातरी।।


अर्थ- इस होरी में गोरी (नारी) के दैहिक सुन्दरता का वर्णन है। गोरी बहुत नाजुक और पतली है। जैसे अंगुर की बेल लचकती है वैसे ही गोरी का कमर लचकता है।
गोरी पान के जैसे पतली और फूल से भी सुकुमार है। सोने के जैसी सुन्दर है। बत्तीसो दांत तो मानों बिजली की तरह चमकते हैं।


2.
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग--------------------।
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग-------------------।
होरी हो----होरी हो---------।
किनका के हाथ कनक पिचकारी,
किनका हाथ अबीर झोली, राधा संग,
हो राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग------------------.
कृष्णा के हाथ कनक पिचकारी,
राधा रानी हाथ अबीर झोली
राधा संग-------------------।
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग----------------------।


अर्थ- इस होरी में राधा और श्याम के द्वारा खेले गये होली का वर्णन है।
राधा के संग श्याम होली खेल रहे हैं। कृष्ण के हाथों में सोने की पिचकारी है
और राधा के हाथों में अबीर की झोली है।
दोनों एक दूसरे में मस्त हैं और होली खेल रहे हैं।

3.
बिकन चले, बिकन चले तीनों प्राणी है दानी बिकन चले।
कौनी घर में राजा बिक गये, किनका घर में रानी,
किनका घर में रोहित बिक गये।
बिक गए तीनों प्राणी हो दानी बिकन चले।
होली हो----------होली हो--------------।
डोम घर में राजा बिक गए, मालिनी घर में रानी,
डोम घर में रोहित बिक गए।
बिक गए तीनों प्राणी हो दानी बिकन चले।
होली हो---------होली हो-------------।


अर्थ- इस होरी में राजा हरिश्चन्द्र के सपरिवार बिकने की बड़ी मार्मिक कथा है।
किस घर में राजा बिक गए और किस घर में रानी, कौन से घर में राजकुमार रोहित बिक गए।
आज तो पूरा परिवार हीं बिकने को निकल पड़ा है।
डोम के घर में राजा बिक गए, मालिन के घर में रानी सैव्या बिक गईं।
डोम के घर में ही राजकुमार रोहित बिक गए।
के आज तो तीनों प्राणी ही बिक गए।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, March 5, 2009

संताली लोक समाज में शराब की कथा

संताली लोक समाज में शराब के निर्माण को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा है। कल्पनाओं पर आधारित होते हुए भी यह बहुत हीं मनोरंजक और शिक्षाप्रद है।

पुराने जमाने की बात है। एक बार एक आदमी एक पीपल के पेड़ के नीचे शराब बनाने बैठा। उसके लिए उसने चूल्हा सुलगाया। उस पर महुए की हांड़ी चढ़ाई और आंच देने लगा। परंतु, बहुत देर तक आंच देते रहने पर भी एक बूंद भी शराव नहीं निकली। उससे हैरान हो वह एक ओझा (तांत्रिक) के पास गया और उससे बोला, बाबा, मैंने अमुक पेड़ के नीचे शराब चुलाने के लिए चूल्हा जलाया है, परंतु लाख कोशिश करने पर भी एक बूंद भी शराब नहीं निकाल पा रहा हूं। कृपा करके मुझे बताएं कि मैं क्या करूं जिससे शराब निकाल सकूं।
उस ओझा बाबा ने उसे बताया, तुम जिस पेड़ के नीचे शराब चुवा रहे हो उसी पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंक दो। फिर, देखोगे कि इतनी आधिक शराब चूने लगेगी कि तुम्हें शराब रखने की जगह तक नहीं मिलेगी।
इस पर वह आदमी झटपट उस पेड़ के पास लौट आया और उसे काटकर चूल्हे में झोंकने लगा।
उस पेड़ की शरण में चार जीव रहा करते थे- एक मैना, एक तोता, एक बाघ और एक सूअर। चारों दिन-भर तो इधर-उधर रहा करते, परंतु सांझ होते ही उस पेड़ की शरण में आ जाया करते और वहीं रात गुजारा करते थे।
उस दिन भी सांझ होते-न-होते वे चारों एक-एककर वहां आने लगे।
सबसे पहले मैना आई। उसने देखा कि पेड़ काट डाला गया है और चूल्हे में उसे झोंका जा रहा है। यह देखकर उस मैने को बहुत दुख हुआ। अपने शरणस्थल उस पेड़ को जलते हुए देख वह भी उस चूल्हे में कूद पड़ी। उससे कुछ शराब चू निकली।
उसके बाद तोता उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है तो वह भी उसमें कूदकर जल-मर गया। शराब कुछ अधिक चू निकली।
उसके बाद बाघ उस पेड़ के पास आया और देखा कि उस पेड़ को काट डाला गया है और चूल्हे में झोंका जा रहा है। इस पर उस बाघ को भी बहुत दुख हुआ और वह भी उसी चूल्हे में कूदकर जल-मर गया। शराब अधिक चू निकली।
अंत में सूअर उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है । इस पर वह भी बहुत दुखी हुआ और उसने भी उसी चूल्हे में कूदकर अपनी जान दे डाली। शराब बहुत अधिक चू निकला।
वह आदमी बहुत खुश हुआ। उसने ओझा को बधाई दी।
कहा जाता है कि उसी दिन से शराब में मैने, तोते, बाघ और सूअर के खूनों का असर व्याप गया है। इसीलिए जब शराब का पहला दोना ढलता है तब पीनेवाला मैने की तरह मीठी-मीठी बातें करने लगता है, वाह भई, शराब तो खूब बनी है, किसने इतनी अच्छी शराव बनाई है। इत्यादि। उसके बाद दूसरा दोना पीते-पीते वह तोते की तरह बातुनी हो जाता है, तीसरे दोने में वह मानो बाघ बन जाता है, बाघ की तरह ही गरजना दहाड़ना और दंभ मारना शुरू कर देता है। वह बात-वात में बिगड़ जाया करता है और समझने लगता है कि दुनिया में उससे बढ़कर कोई नहीं है। और, अंत में वह सूअर-जैसा बन जाता है। उसे न तो अपने तन-मन की सुध रहती है और न भले-बुरे का ज्ञान। वह जहां तहां गिरा पड़ा रहता है।
यही कारण है कि संताल लोगों के पुरखों में आज-कल की तरह बेहिसाव शराब पीने का चलन नहीं था।
-प्रीतिमा वत्स

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...