Monday, July 27, 2009

दुबिया कहे हम जमबे करब


झारखंड के लोक में दूर्वा(हरीघास) का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। लोक कथाओं में इसे अमरत्व का वरदान प्राप्त है, तो लोकगीतों के माध्यम से भी इसकी महानता दर्शायी जाती रही है। ऐसी मान्यता है कि जिस जगह ये उपस्थित है वहाँ समृद्धि और सुख हमेशा रहेगा। इसलिए हर पारम्परिक उत्सव,पर्व-त्योहार तथा शुभ कार्यों में तुलसी की तरह ही दुर्वादलों का भी उपयोग किया जाता है।

दुबिया कहे हम जमबे करब।
आहो दुबिया कहे हम जमबे करब।।
कबो लतो तर परब, कबो जूतो तर परब।
श्री गणेश जी के सिर पर चढ़बे करब।।
दुबिया .........................................।
कतो खुरपी चले, कतो कुदाली चले।
दुई धार के हँसुआ से कटबे करब।
दुई यौवन के पेटवा हम भरवे करब।।
दुबिया.......................................।
नई दुल्हनिया के खोइचा हम भरबे करब।
हर सुहागिन के आशिष हम दियबे करब।।

दुबिया.......................................।




इस गीत के माध्यम से हरी-हरी घास जिसे हम दुर्वा भी कहते है, उसकी महत्ता को दर्शाया गया है।
दुर्वा कहती है, हम तो हर हाल में उगेंगे (जन्म लेंगे)। कभी पैर के नीचे पड़ती हूँ, कभी जूतों से कुचली जाती हूँ।
पर श्री गणेश जी के सिर पर तो चढ़ती ही हूँ।
कभी खुरपी से उखाड़ी जाती हूँ तो कभी कुदाली से।
कभी हँसुए (दराँती) से काटी जाती हूँ।
पर पशुओं का पेट मैं हमेशा भरती हूँ।
नई दुल्हिन का खोइचा मेरे द्वारा हमेशा भरा जाता है।
सुहागिनों को मैं हमेशा आशिर्वाद देती हूं।
दुर्वा कहती है, मैं हमेशा उगती (जन्म लेती ) रहूंगी।

-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, July 22, 2009

मनोरंजक राई गीत


गीत-1
फागुन महीने रंगीले घर आ जइयो राजा।
हाय-हाय रे घर आ जइयो राजा,
चार महीना जड़कारे के लागे,
थर-थर काँपे बिछौना में,
घर आ जइयो राजा।
चार महीन गरमी के लागे,
चोली भींजे पसीना में,
घर आ जइयो राजा।
चार महीना बरसा के लागे,
पानी जूंवे बिछौना में,
घर आ जइयो राजा।

गीत-2

श्याम मेरी गगरी उठाय जइयो,
फेर जा बैठ रइयो।
बड़े वजन की गागर हमारी,
गागर पे घेला धरांय जइये,
फेर जा बैठे रइयो।
संग की सहेली दूर निकर गई,
तनकई इशारो लगाये जइयो।
फेर जा बैठे रइयो।
जोड़ा मड़ोरी की लेज बनाई,
हाथों में लेज गहाय दइयो।
फेर जा बैठे रइयो।

गीत-3

तनक हँस बोल ल ये जलती बेरा।
कहाँ लगी बेरी, कहाँ लग मुनगा,
कहाँ लगे यार के हरियर केरा,
आंगन लगी बेरी, पछीत लगे मुनगा,
बागों लगे यार के जे हरियर केरा,
तनक हँस बोल ले ये चलती बेरा।

गीत-4

बेला के नये गोने आ गये रे, पलका लटका ले।
हाय-हाय रे पलका लटका ले।
कौना सा महीना में व्याव में हैं,
कौना में जौक करा ले रे।
हाय हाय रे पलका लटका ले।
मांओ के महीना में व्याव में है,
फागुन में चोक करा ले रे।
हाय हाय रे पलका लटका ले।।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, July 21, 2009

वाद्ययंत्र झारखंड के


नृत्य,गीत और संगीत झारखंड वासियों के प्राण हैं। यह जनजातीय जीवन की सामूहिक यात्रा के अभिन्न अंग हैं उनसे ही लोक जीवन को अभिव्यक्ति मिलती है। पर्व-त्योहार जातीय संस्कृति के अंग हैं। इन त्योहारों में देर रात तक झारखंड के गांवों में सामूहिक नृत्य, गीत और संगीत की धूम मची रहती है। इन समारोहों में मांदर, नगाड़ा, ढोलकी, बांसुरी और झांझ जैसे वाद्य यंत्रों के सुर-ताल की लहर आनंद को दोगुना कर देती है। कुछ वाद्य यंत्रों के बारे में मैं यहां बताने की कोशिश कर रही हूँ।

केंदरी- संथालों का यह प्रिय वाद्य है। इसे झारखंडी वायलिन भी कहा जाता है। कछुए की खाल या नारियल के खोल से इसका तुम्बा बनाया जाता है। तुम्बा से बांस या लकड़ी का दंड जुड़ा रहता है। उस पर तीन तार लगे रहते हैं। घोड़े की पूछ के बाल से गज बनाया जाता है। गज और दंड के तारों की रगड़ से स्वर निकलते हैं।
एकतारा- एकतारा को गुपिजंत्र भी कहा जाता है। इसमें एक ही तार होता है। झारखंड क्षेत्र में अक्सर फकीर या साधु लोग इस वाद्य का प्रयोग करते हैं। भजन, भक्तिगीत गाने वाले साधु-संन्यासियों की पहचान एकतारा और उसकी आवाज से ही होती है। इसके नीचे का हिस्सा खोखली लौकी या लकड़ी का बना होता है और उसका मुंह चमड़ा से मढ़ा रहता है। गायक को एकतारा से आधार स्वर मिलता है।
भुआंग- भुआंग संथालों का प्रिय वाद्य है। दशहरा के समय दासांई नाच में वे भुआंग बजाते हुए नृत्य करते हैं। यह तार वाद्य है। इसके बावजूद इसमें ऐसे अधिक स्वर निकलने की गुंजाइश नहीं रहती है। इसमें धनुष और तुम्बा होता है। इसमें तार को ऊपर खींचकर छोड़ देने से धनुष-टंकार जैसी आवाज निकलती है।
बांसुरी- सुषिर वाद्यों में बांसुरी या आड़बांसी झारखंड में काफी लोकप्रिय हैं। डोंगी बांस से सबसे अच्छी बासुरी बनायी जाती है। यह बांस पतला और मजबूत होता है। बांसुरी में कुल सात छेद होते हैं सबसे ऊपर वाले छेद में फूंक भरी जाती है।
सानाई- बांसुरी की तरह ही सानाई (शहनाई) भी झारखंड में लोकप्रिय है। यह यहां का मंगल वाद्य भी है। पूजा, विवाह आदि मौकों पर इसे बजाया जाता है। साथ ही छऊ,नटुआ, पइका आदि नृत्यों में भी सानाई बजायी जाती है। दस इंच का सानाई में लकड़ी का नली होती है। उसमें छह छेद होते हैं। इसके एक सिरे पर ताड़ के पत्ते की पेंपती होती है और दूसरे सिरे पर कांसे की धातु का गोलाकार मुंह होता है। पेंपती से फूंक मारी जाती है। लकड़ी के छेदों पर उंगलियां थिरकती हैं तो अलग-अलग स्वर निकलते हैं कांसे के मुंह की वजह से आवाज तेज और तीखी होती है, जिसे दूर-दूर तक सुनी जा सकती है।
सिंगा- भैंस की सींग से सिंगा बनाया जाता है। इसके नुकीले सिरे से फूंक मारी जाती है। दूसरा सिरा चौड़े मुंह का होता है और वह आगे की ओर मुड़ा रहता है छऊ नाच में इसका उपयोग किया जाता है। शिकार के वक्त पशुओं को खदेड़ने के लिए इसे बजाया जाता है। पशुओं पर नियंत्रण के लिए चरवाहे लोग भी सिंगा बजाते हैं।
मदनभेरी- यह एक सहायक वाद्य है। इसे ढोल,सानाई,बांसुरी आदि के साथ बजाया जाता है। छऊ नृत्य,विवाह समारोह आदि में भी इसे बजाया जाता है। इसमें लकड़ी की सीधी नली होती है, जिसके आगे पीतल का मुंह रहता है। करीब चार फीट लम्बे इस वाद्य में कोई छेद नहीं होता । इसलिए फूंक मारने पर इससे एक ही स्वर निकलता है।
इसके अतिरिक्त निशान, शंख आदि भी झारखंड में बजते हैं। शंख मंगल वाद्य हैं। पहले उसका उपयोग संदेश देने के लिए भी होता है।


मांदर- मांदर झारखंड का प्राचीन और अत्यंत लोकप्रिय वाद्य है। इसे यहां लगभग सभी समुदाय के लोग बजाते हैं। यह पाश्वमुखी वाद्य है। लाल मिट्टी के बने मांदर का गोलाकार ढांचा अंदर से खोखला होता है। इसके देने तरफ के खुले मुंह बकरे की खाल से ढंके रहते हैं। मांदर की आवाज गूंजदार होती है। नाच के वक्त उसे बजाने वाला भी घूमता-थिरकता है। इसके लिए वह रस्सी के सहारे मांदर को कंधे से लटका लेता है।
ढोल- मांदर के साथ झारखंड में ढोल भी अवश्य ही बजाया जाता है। यह आम,कटहल या गमहर की लकड़ी से बनता है। इसमें भी अंदर से खोखला करीब दो फीट लम्बा ढांचा होता है। इसके भी दोनों किनारे गोलाकार होते हैं। दोनों किनारों की तुलना में बीच का हिस्सा कुछ उभरा हुआ होता है। इसके भी मुंह बकरे का खाल से ढंके रहते हैं। इसे हाथ तथा लकड़ी दोनों तरह से बजाया जाता है।
धमसा- यह विशालकाय वाद्य है। इसका मांदर, ढोल आदि मुख्य वाद्यों के सहायक वाद्य के रूप में इस्तोमाल किया जाता है। इसकी आकृति कड़ाही जैसी होती है। इसका ढांचा लोहे की चद्दर से तैयार किया जाता है। इसे लकड़ियों के सहारे बजाया जाता है। इसकी आवाज गंभीर और वजनदार होती है। छऊ नृत्य में धमसा की आवाज से युद्ध और सैनिक प्रयाण जैसे दृश्यों को साकार किया जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, July 16, 2009

अंबुवासी का मेला


कामाख्या मंदिर के अंबुवासी मेले के बारे में संडे नईदुनिया के मैग्जीन में पढ़ा तो अपने बचपन के बीते दिन की याद ताजा हो गई। नीलाचल पर्वत की वो सुन्दरता मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। रंग बिरंगे जंगली फूलों से भरा वह पहाड़ और पहाड़ों के बीच चक्कर खाती हुई घूम-घूमकर उपर चढती बस। गहरे हरे रंग का वह सरोवर जो मानों ऐसा लगता था जैसे पत्थर के बड़े से कटोरे में हरे रंग का पानी रखा हो। गर्भगृह का वह मोटा-मोटा पत्थर का खंभा, जिसमें बड़ी मुश्किल से एक-एक आदमी पार होते हैं। मंदिर के अंदर का माहौल ऐसा था मानों सभी माता की भक्ति में लीन हो जाना चाहते हों। मन्नत पूरा होने पर लोग वहाँ तरह-तरह की घंटियाँ भी चढ़ावे में चढ़ाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि साल में एक बार माँ कामाख्या रजस्वला होती है। इसी तिथि को वहाँ के लोग अंबुवासी के मेले के रूप में मनाते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीया चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनी नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाखया महापीठ को सर्वश्रेष्ठ और जाग्रत माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में मां की योनी की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।


एक मान्यता यह भी है कि रतिपति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं भस्म हुए थे। कामदेव ने अपना पूर्वरूप भी यहीं प्राप्त किया इसलिए इस क्षेत्र का नाम कामरूप पड़ा। इस बात का उल्लेख कल्कि पुराण में है। इस संदर्भ में कुमारसंभवम् का यह श्लोक वर्णित हैः

पिनाकिना भग्नमनोरथाः सती,
निनिन्द रूपं हृदयेन् पार्वती,
प्रियेषु सौभाग्यफलाहि चारुता।।

अर्थः- अपनी नजरो के सामने शिव के कोप से भस्म होते कामदेव को देखकर पार्वती जी ने अपने रूप की हृदय से निन्दा की।
क्योंकि सुन्दरता वही सार्थक होती है, जो अपने पति को आकर्षित कर सकती हो।

साधु और तांत्रिक मंदिर के आसपास की वीरान जगहों और कंदराओं में साधना में लीन रहते हैं। उस दौरान चार दिनों के लिए मंदिर का पट बंद रहता है और चार दिन बाद पट खुलने पर पूजा-अर्चना के बाद ही श्रद्धालु लौटते हैं।
हिन्दु समाज में रजोवृति के जौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान असम में भी कोई शुभ कार्य नहीं होता है। विधवाएं, साधुसंत आदि अग्नि को नहीं छूते हैं और आग में पका भोजन नहीं करते हैं। पट खुलने के बाद श्रद्धालु मां पर चढ़ाए गए लाल कपड़े के टुकड़े का अंश मात्र भी मिल से अपने आप को धन्य मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये कपड़े का टुकड़ा मिल जाने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।
वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है और साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह पहाड़ ब्रह्मपुत्र नही से बिल्कुल सटा है। सामने ब्रह्मपुत्र के बीच में स्थित छोटी सी पहाड़ी पर शिव का उमानंद मंदिर है। यह माना जाता है कि वहां विराजमान शिव ही कामाख्या माता के भैरव हैं, इसलिए कामाख्या आने वाले भक्त उमानंद मंदिर भी जरूर जाते हैं। पूरा मंदिर बड़े-बड़े पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने के कारण मंदिर का गर्भगृह बाहरी सतह से करीव दस फुट नीच चला गया है, जहां तक जाने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं।
कामाख्या मंदिर में लगने वाला यह मेला वहाँ की कृषि से भी जुड़ा हुआ है। माता के ऋतुवती होने के बाद ही वहां के लोग कृषिकार्य का प्रारंभ करते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...