Thursday, April 21, 2011

हर जगह मिलते हैं बलेसर के गीत Baleser's songs are available in everywhere



लोकगीतों का हर देश और क्षेत्र में अपनी लंबी परंपरा होती है। जिन भावों में तनिक भी बनावटीपन नहीं, उन्हीं का प्रकाश हमें इन गीतों में मिलता है। लोकगीतों की परंपरा को जीवित रखने के लिए हमें यूरोप से अभी बहुत कुछ सीखना है। यूरोपीय देशों ने अपने लोकगीतों को नष्ट होने से बचाया है। हमारे यहां यह हमेशा से उपेक्षित रहा है। कलाओं के लिए बनी ढेरों अकादमियों का रवैया भी इससे जुड़े कलाकारों के लिए हतोत्साहन का रहा है। सही अर्थों में जो लोक कलाकार या लोक गायक हैं उनकी अब भी उपेक्षा हो रही है। ऐसे ही एक कलाकार हैं भोजपुरी के लोकगायक बालेश्वर जिन्हें भोजपूरिया लोग बलेसरा कहते हैं।
बिहार के गोपालगंज, सिवान, छपरा होते पटना जाने वाली किसी भी वस में बैठिए आप को बालेश्वर के गीत बजते मिलेंगे। लोग इन बसों में बैठते ही बालेश्वर के गीत बजाने की फरमाइश करते हैं। पूरे भोजपूरी क्षेत्र का यही हाल है। इन क्षेत्रों में बालेश्वर के गानों को सुनने के लिए 20-25 हजार की भीड़ आसानी से जमा हो जाती है। बालेश्वर आजमगढ़ के घोसी के बदनापुरा के रहनेवाले हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश पर्व में भाग लेने बालेश्वर दिल्ली आए थे। तब उनसे यह बातचीत हुई । उसके कुछ अंशः
आपने गाना कब शुरु किया?जवाबः यही कोई छह-सात साल की उम्र में। भैंस चराने के लिए गांव से अपने मित्रों के साथ जाया करता था भैंस पर चढ़कर ही मैं खुले आसमान को निहारते हुए गाया करता था। पूरा गाना तो याद नहीं रहता था इसलिए लोकगीतों के दो-तीन लाइनें ही गुनगुनाता था।
लोक गायक के रूप में आपने कब से गाना शुरु किया?जवाबः 1960 तक तो मैं इधर-उधर भटकता रहा। कोी गाने का मौका नहीं देता था। कबसे पहले मुझे झारखंड राय ने चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं में गाने का मौका दिया। विधायक बनने के बाद लखनऊ सचिवालय में उन्होंने नौकरी भी दिला दी। इसके बाद से ही रेडियो और टीवी पर गाने का मौका मिला है।
आपके गीतों का कोई रिकार्ड भी निकला है?जवाबः सबसे पहले मेरा रिकार्ड 1970 में निकला। उसमें वही हमार बलिया बीचो बलमु भुलाइल सजनी, निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के और भागलपूर के पावर पानी, झारा के कठोर। गोरिया छपरा वाली......, जैसे गीत थे। सच पूछिए तो इस रिकार्ड के आने के बाद जितनी मुझे खुशी हुई इतनी शायद ही कभी हुई हो। इसके बाद कई और रिकार्ड निकले जिसमें कजरवा ए धनिया बड़ा निक लागे, अचरा में टांगे लू रुमाल ए धनि सांवर गोरिया और बड़ा दगाबाज रे बनारस का पंडा मुख्य है।
लोकगीत गाने के पीछे क्या प्रेरणा रही?जवाबः भोजपूरी का प्रचार करना मेरा मुख्य उद्देश्य है। मैं चाहता हूं कि देश के कोने-कोने में लोग भोजपूरी संस्कृति को जाने । डिस्को की दौड़ में भारतीय. लोकसंगीत का प्रचार करना और इसका स्तर ऊंचा उठाना भी मैं चाहता हूं।
आप किस लोक कलाकार से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?जवाबः भिखारी ठाकुर और मुकुंदी भांड़ ने मुझे काफी प्रभावित किया। भिखारी ठाकुर ने भोजपूरी लोक संगीत को काफी आगे बढ़ाया । उन्होंने बिदेशिया की भी धुन दी। समाज की कुरीतियों के खिलाफ अंतिम दम तक समाज से लड़े। आरा, छपरा के मजदूर बड़ी संख्या में असम की चाय बगानों और कलकत्ता की जूट मिलों में काम करने जाते हैं। कम वेतन और मलेरिया से पीड़ित होकर या तो वे पीले होकर लौटते या फिर लौटते ही नहीं थे। इस पर भिखारी ठाकुर ने पुरब पुरब बड़ दिन से सुन तानि। पुरब के पनिया खराब रे बिदेसिया गाया। भिखारी ठाकुर की प्रेरणा से ही मैं भी अपनी ताकत भर कुरीतियों से लड़ने की कोशिश कर रहा हूं। दुख यह है कि संगीत नाटक कला जैसे संस्थानों ने इस महान कलाकार की उपेक्षा की। जहां छोटी-छोटी संस्थाओं को संगीत नाटक अकादेमी हजारों रुपए अनुदान देती है वहीं इस लोक कलाकार के नाम से बनी संस्था को कोई पूछने वाला नहीं है। भोजपूरी लोक संगीत के विकास के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है। उसके विकास के लिए खुद कलाकार को ही भागदौड़ करनी पड़ती रही है।
भोजपूरी में आप क्या-क्या गाते हैं?जवाबः बिरहा, लाचारी , सोहर, सोरठी, कहरवा, झूमर, कजरी, होली, कचरी, चैता........... सभी कुछ गाते हैं।
कहां-कहां कार्यक्रम ज्यादा होते हैं?
जवाब आजमगढ़ का रहने वाला हुं और लखनऊ में काम करता हुं। लेकिन लखनऊ में लोक कलाकारों को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना पटना, धनबाद, बोकारो झरिया और कलकत्ता में मिलता है। वे कहते हैं दुनिया वाले हमके कहले बिहारी मितवा।
आजकल भोजपुरी में कौन-कौन से लोकगायक प्रमुख हैं?जवाबः हीरा लाल यादव चैती के प्रमुख गायक हैं। गुल्लू यादव, रामदेव, बेचन राम तथा बबुनंदन का धोबिया नाच प्रसिद्ध है। इनके अलावा आरा के मुन्ना और बलिया के नथुनी सिंह भी प्रमुख लोकगायक है।
आप गीत खुद लिखते हैं या किसी और से लिखा कर गाते हैं?जवाबः मैं कोई गाना किसी दूसरे का लिखा हुआ नहीं गाता। जो भी गाना गाता हूं उसे काफी चिंतन-मनन के बाद तैयार करता हूं। उसे लिखता नहीं बल्कि धुन में बदल देता हूं। लिखित रूप से कोई भी गाना मेरे पास सुरक्षित नहीं है जो है वह सब रिकार्ड में ही है।
क्या भारत महोत्सव के लिए आपको आमंत्रित किया गया था?जवाबः भारत महोत्सव के लिए मुझे किसी ने भी आमंत्रित नहीं किया उ सब बड़ लोग के बात है बाबू हमनी के के पूछि। भोजपुरी के किसी भी लोक कलाकार को उसमें नहीं बुलाया गया सुनते हैं कोई पुपुल जयकर हैं, बनारस रही भी हैं। लेकिन पता नहीं कैसे भोजपुरी को इन लोगों ने भुला दिया। भोजपूरी कलाकारों को ऐसी जगहों पर ले जाए बिना भारतीय संसंकृति की संपूर्ण झांकी दिखाने का दावा झूठा ही होगा।
कुछ दिन पहले अफवाह उड़ी थी कि आपकी हत्या कर दी गई?जवाबः हां ऐसी कोशिश कुछ लोगों ने की थी। वे मेरी लोकप्रियता से नाखुश थे। मेरे गाने के कार्यक्रमों में 15-20 हजार की बीड़ से ये लोग काफी परेशान थे। एक कार्यक्रम के दौरान इन भाड़े के लोगों ने मारपीट करना शुरू कर दी। भगदड़ मच गई। कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। इसके बाद इन लोगों ने ही प्रचार शुरू किया कि मेरी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों के बाद जब मैंने फिर से कार्यक्रम देना शुरू किया तब जाकर लोगों को बात समझ में आई।
जनसत्ता के एक बहुत पुराने अंक (30-7-86) में छपा यह वार्ता मुझे मेरी छोटी सी लाईब्रेरी से मिली है। यह आलेख लोकगायक बालेश्वर से सुभाषचंद्र पांडे जी की बातचीत का अंश है।
प्रस्तुति-प्रीतिमा वत्स