Saturday, November 29, 2008

लक्ष्मी उर्फ लछमी जगार


धान की फसल कटनी शुरु होने के साथ-साथ हीं अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग लोकपर्व शुरु हो जाता है। बिहार झारखंड में जहाँ यह पर्व नवान्न के रूप में मनाया जाता है बस्तर के ग्रामीण इलाके में भी यह पर्व मनाया जाता है,लेकिन एक बदले अंदाज में जिसे हम लछमी जगार के नाम से जानते हैं।

अगहन के महीने में लछमी जगार मनाया जाता है। चारों तरफ कच्चे धान की खुशबू के बीच बड़ी हंसी खुशी के माहौल में यह पर्व मनाया जाता है।
यह पर्व गुड़ी में मनाया जाता है। गुड़ी की साफ-सफाई कर उसके दीवार पर देवी-देवताओं तथा जानवरों के चित्र बनाये जाते हैं। इसे गढ़ लिखना कहते हैं। उसके बाद जमीन पर चावल के आटे से बहुत ही कलात्मक ढंग से चित्रकारी की जाती है, इसे चौक पूरना या बाना लिखना भी कहते हैं।
लछमी जगार का मतलब अन्न लक्ष्मी को जगाना या जागरण करना। कुछ लोग इस शब्द का सम्बन्ध यज्ञ से भी जोड़ते हैं। लगातार आठ-दस दिनों तक सारी रात जागकर लछमी-नारायण की कथा कही- सुनी जाती है। कहीं-कहीं तो यह कथा पंद्रह दिनों तक भी चलती रहती है।
लछमी जगार की कथा प्रायः महिलाएँ ही सुनाती हैं। इन्हें गुरुमायँ कहते हैं। यह कथा गीत के रूप में गा कर सुनायी जाती है। गुरुमायँ यह कथा धनकुल नामक वाद्य बजाते हुए सुनाती हैं।
लछमी जगार के पहले दिन खेतों से धान की बालियाँ लाकर नारियल से उसका विवाह रचाया जाता है, क्योंकि नारियल को भगवान नारायण का रूप माना जाता है। और फिर बड़े ही धूमधाम से शुरु होती है कथा वाचन की प्रक्रिया।

इस व्रत की एक अत्यंत ही रोचक लोककथा भी है जो मैं अभी सहेज नहीं पाई हूँ, इसलिए जल्दी हीं अगले पोस्ट में डालुंगी।
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, November 26, 2008

गमछा नहीं, तो नाच नहीं


फरुआही नृत्य कारी वह लोक विधा है जिसमें नर्तक का अंग प्रत्यंग नाचता है और काफी श्रम साध्य होता है। इसके दर्शक भी कम नहीं हैं पर टीवी व सीडी के बढ़ते चलन ने इसका मान कम कर दिया है।

न मेकअप का खर्चा न सजने-संवरने का झंझट। सिर्फ धोती और गंजी पहन कमर में एक गमछा कसा और शुरु हो जाते हैं फरुआह कलाकार। कमीज पहनी है तो बड़ी अच्छी बात है नहीं पहनी है तो कोई बात नहीं। अपने गमछे से नर्तक कभी महिला का स्वांग करते हैं तो कभी कमर में बांधकर अपने नृत्य को गति देते हैं। बहरहाल गमछा इस नृत्य का प्रमुख हिस्सा है। इसको अलग कर कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर सकता शायद। या यूं कहें कि गमछा नहीं तो नृत्य नहीं, शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस नृत्य के लिए ज्यादा वाद्य यंत्रों का भी प्रयोग नहीं किया जाता है। नृत्य के लिये टिमकी (तासा), नगाड़ा व झाल का ही प्रयोग किया जाता है। स्वयं प्रशिक्षित कलाकार होने के बावजूद फरुआही कलाकारों के नृत्य में कला में शास्त्रीय व लोक नृत्य का अद्भुत संयोग मिलता है।
इस विधा को देखने से लगता है कि इसका चलन वीरगाथा काल में सैनिकों के मनोरंजन को ध्यान में रखकर शुरू किया गया और आज भी वह जीवंत है। शायद इसलिए यह नृत्य महिलाएं नहीं बल्कि केवल पुरुष हीं करते हैं। पिछले दिनों राप्तीनगर के हरिसेवकपुर दुर्गामंदिर पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ एवं रघुनन्दन मारुतिनन्दन महायज्ञ के प्रथम दिन आहूत फरुआह चन्द्रिका प्रसाद की टीम ने लोगों को बरबस अपनी ओर खींचा। टीम के आधा दर्जन नर्तकों ने लगभग 4 घण्टे तक लोगों को बांधे रखा। टीम के नर्तक धर्मेन्द्र, रूदल, जीतेन्द्र, अंजनी, छेदी व चिनिगी ने फरुआही नृत्य की बेहतर प्रस्तुति कर आज के दौर में अपनी सार्थकता साबित की। उनके साथ झाल व टिमकी-नगाड़ा के अलावा कोई वाद्य यंत्र प्रयुक्त नहीं किया गया। नृत्य के साथ भोजपुरी गीत प्रस्तुत कर रहे टीम के मुखिया चद्रिका ने कहा कि फरुआही की बची-खुची टीमें भोजपुरी संस्कृति में ही मर खप रही हैं पर इन्हें पूछनेवाला कोई नहीं रहा। चन्दि्रका प्रसाद ने कहा कि फरुआही नृत्य कारी वह लोक विधा है जिसमें नर्तक का अंग प्रत्यंग नाचता है और काफी श्रम साध्य होता है। इसके दर्शक भी कम नहीं हैं पर टीवी व सीडी के बढ़ते चलन ने इसका मान कम कर दिया है। उन्होंने कहा कि पहले गांव में शादी ब्याह के समय लोग इसे ले जाते थे पर अब ऐसा नहीं। बदलते परिवेश व मनोरंजन के आधुनिक संसाधनों ने काफी हद तक लोक विधाओं को मारा है। कला की इज्जत करने वाले व कलाकारों की टीम में शामिल लोगों ने भी अपना कैरियर फिल्म व कैसेट में बनाना शुरू कर दिया है। शहर से लेकर कस्बों तक नयी नाट्य संस्थाएं बन रही हैं और लोक कलाकार छंटते चले जा रहे हैं।
लेकिन कुछ भी हो जाए,आधुनिकता की कैसी भी बयार क्यों न बहे लोक की उष्मा तो बनी ही रहेगी।

-प्रीतिमा वत्स

Monday, November 24, 2008

कागा अभागा नकबेसर ले भागा...

किसने लिखी होगी ये लोक कविता...शायद किसी को नहीं मालुम?.....उस कवि ने भी अपने नाम की चिन्ता न की होगी।
तब कोई आलोचक भी नहीं रहा होगा....लेकिन सालों से ये लोक कविता पीढी दर पीढी लोक की हवाओं में गुंजती रही है।
शायद लोक गीत की सबसे बड़ी विशेषता भी यही है कि......अनाम कवि की रचना होते हुए भी हर घर में देती है दस्तक।
आप भी देखिए...कैसे अभागा कागा नकबेसर लेकर भागा है...


नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,

उड उड कागा मोरी बिंदिया पे बैठा...बिंदिया पे बैठा.
अरे मोरे माथे का सब रस ले भागा,नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,

उड उड कागा मोरे नथुनी पे बैठा अरे नथुनी पे बैठा.
मोरे होंठ्वा का सब रस ले भागा,
नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,

उड उड कागा मोरे चोलिया पे बैठ, अरे चोलिया पे बैठा....
अरे जुबना का सब रस ले भागा, अरे जोबना का सब रस ले भागा
नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,

उड उड कागा मोरे करधन पे बैठा अरे करधन पे बैठा,
अरे मेरी जोबना का सब रस ले भागा मोरा
अरे नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,

Tuesday, November 11, 2008

सामा-चकेवा में ही नहीं,हर जगह हैं चुगलखोर?


सामा-चकेबा में एक पात्र होता है चुगला। सबसे बड़ा चुगलखोर। यानी पीठ पीछे निंदा करने में माहिर। भाई बहन का अटूट प्यार, ननद-भौजाई की नोंक-झोंक तथा पति-पत्नी का अशेष प्रेम अभिव्यंजित करते लोक पर्व सामा-चकेबा में और भी कई पात्र दिलचस्प हैं।

मिथिला की औरतों के बीच काफी प्रचलित है सामा-चकेबा। कार्तिक शुक्ल पंचमी से शुरु होकर पूर्णिमा तक चलने वाला यह लोक पर्व उत्साह और उल्लास से पूरी तरह सरावोर है। यह पर्व मुख्यतः कुवांरी लड़कियों तथा नवविवाहिताओं में अधिक लोकप्रिय है। इसका सम्बन्ध मुख्य रूप से कृषि से है। इस लोक-नाट्य में भाई बहन का अटूट प्यार, ननद-भौजाई की नोंक-झोंक तथा पति-पत्नी का प्रेम अभिव्यंजित हुआ है। सामा बहन है चकेवा भाई। अन्य पात्र हैः चुगला, सतभइया, वन-तीतर, झाँझी, कुत्ता एवं वृन्दावन। इनमें चुगला सबसे दिलचस्प पात्र है। इसका अभिनय अत्यंत मनोरंजक होता है। चुगला वह व्यक्ति होता है जो किसी की पीठ पीछे निंदा करने में माहिर होता है, अथवा इधर-उधर लगा-बुझाकर अपना उल्लू सीधा करता है। हर समाज में इस तरह के चुगलखोर मिलते हैं। इस लोक-नाट्य का प्रमुख उद्देश्य भाई-बहन के हृदय में विशुद्ध प्रेम-भाव को दर्शाना उसे ताजा करना है। चुगला अपनी चुगलखोरी वृत्ति के कारण उनमें व्यवधान पैदा करता है। यही कारण है कि वहनें चुगला का उपहास करती है। चुगला की मूर्ति ऐसी बनायी जाती है जिससे वह मूर्ख दिखायी दे। उसकी कमर में आर-पार छेद करके सुतली लगा दी जाती है। इसको लड़कियाँ प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके सरकाती रहती हैं, जिसका मतलब उसे दंडित करना होता है। साथ हीं गाती हैं-
चुगला करे चुगलपन बिलइया करे म्याऊँ
ध.....के चुगला के फांसी दीउ
जतय हमार बाबा बइसे ततय चुगला चुगली करे
जनय हमार भइया बइसे तनय चुगला चुगली करे
ध.....के चुगला के फांसी दीउ।।

इसमें सतभइया नाम का एक महत्वपूर्ण पात्र होता है। सतभइया का अर्थ है सात भाई। इस पात्र के माध्यम से किसी विशेष भाई-बहन का गुणगान करके समस्त भाई-बहनों का गुणगान किया जाता है।
खँजन चिड़िया शरद् ऋतु में आती है। इस ऋतु की अग्रदूत मानी जाती है खँजन चिड़िया को इस लोकनाट्य में सर्वाधिक महत्व प्राप्त है। वन-तीतर की कल्पना इसलिए की गई है कि इस लोक-नाट्य का प्रदर्शन नदी किनारे-खेद या वन में होता है। कुत्ता एक पारिवारिक पशु है। झांझी कुत्ते की परिकल्पना का भी यही कारण है। जब कन्याएं, बहुएं सामा-चकेबा का गीत गाती हुई नदी-तालाब या खेतों की ओर जाती हैं तो यह कुत्ता भी उनके साथ अवश्य होता है। वृन्दावन वन विशेष का प्रतीक है। इसका मानवीकरण किया गया है। इसकी आकृति मनुष्य सी बनाई जाती है तथा इसकी देह में सींकीं खोंस दी जाती हैं। कन्याएँ जब गीत गाती हुई अभिनय के हेतु जाती हैं तब सींकी में आग लगाकर गाती हैं-
वृन्दावन में आगि लागल है केओ न बुझावय हे...
हमरो से फलाँ भइया....... से हे बुझावय हे........

इस लोक नाट्य में बहनें अपने भाई के स्वास्थय और समृद्धि की कामना लक्ष्मी माता का आह्वान करके करती हैं । और बदले में इस बात की कामना करती हैं कि जब वह दूर अपने ससुराल से कभी माता-पिता से मिलने के लिए आए तो भाई और भाभी उनका आदर करें, जाते समय कुछ-न-कुछ संदेश अवश्य दें, नहीं तो ससुराल में उसकी बेइज्जती हो जाएगी। इस लोक पर्व में कहीं-कहीं नारियों की समाज में जो वास्तविक स्थिति है वह दर्शाती हैं।
सामा-चकेवा के अभिनय काल में कुवांरी लड़कियाँ चंगेरे में मिट्टी के विभिन्न पात्रों को रखकर, दीप जलाकर अपने-अपने सिर पर रखकर खेतों की ओर नाचती-गाती निकल पड़ती हैं और वहां रखकर अभिनय करती हैं। कृष्ण की बाँसुरी बजाती हुई मूर्ति को केन्द्र में रखकर शेष पात्रों को गोलाकार रख दिया जाता है। इसके उपरान्त लड़कियाँ नाचती-गाती हैं। इस अभिनय में कथोपकथन बहुत स्पष्ट रूप में नहीं होता है बल्कि सामूहिक रूप से गाये जानेवाले गीत संवादयुक्त होते हैं। मिट्टी के बने पात्र कन्याओं के माध्यम से प्रतीक रूप में अभिनय में भाग लेते हैं। खेतों में अभिनय की यह क्रिया सम्पन्न होने का तात्पर्य है- उपज में दृद्धि। अंतिम तिथि को जुते खेत में सामा को नया चूड़ा,दही,गुड़ आदि का भोजन कराया जाता है, उसके बाद उसे विसर्जित कर दिया जाता है। यह नृत्य नाट्य मिथिला के सभी वर्गों में लोकप्रिय है।
-प्रीतिमा वत्स

Monday, November 3, 2008

आक विवाह, आम और महुए से विवाह,कैसे-कैसे विवाह?

उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों में पहले वृक्ष विवाह किया जाता है। इनमें वर का विवाह पहले आम के पेड़ से होता है तथा कन्या का विवाह महुए के पेड़ से होता है।

पुष्प विवाह- गुजरात में कुनबी आदिवासियों में पुष्प विवाह की प्रथाएं प्रचलित हैं। यहां लड़की का विवाह पहले पुष्पों से किया जाता है। विवाह योग्य कन्या को यदि उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। फिर विधि विधान से उस गुच्छे को किसी जलाशय में डाल दिया जाता है। इस रिवाज के बाद लड़की को सदा सुहागन माना जाता है। बाद में जब कभी वर मिल जाता है तो लड़की का विवाह कर दिया जाता है। यदि उस लड़की का वर कभी मर भी जाता है तो भी उसे विधवा नहीं माना जाता है क्योंकि सदा सुहागन तो वह पहले ही हो चुकी है।
आम और महुए से विवाहः- गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों में कुरमी जातियों में पहले वृक्ष विवाह किया जाता है। इनमें वर का विवाह पहले आम के पेड़ से होता है तथा कन्या का विवाह महुए के पेड़ से होता है। विवाह के समय लड़के को दृक्ष के समीप खड़ा कर दिया जाता है उसके बाद लड़के तथा वृक्ष को सूत से बांध दिया जाता है। बाद में पत्तों से बनी माला वर के गले में डालकर वर को वृक्ष से मुक्त किया जाता है। वृक्ष से मुक्त होकर वर पेड़ पर सिन्दूर के टीके लगाता है। दूसरी ओर कन्या का विवाह भी महुए के पेड़ के साथ कर दिया जाता है। इसके बाद हीं लड़के -लड़की का विवाह किया जाता है।
इही संस्कार विवाह- पड़ोसी देश नेपाल में नेवार जाति है। नेवार जाति में लड़की का विवाह पहले किसी आदमी से नहीं किया जाता है बल्कि भगवान नारायण की प्रतिमा से होता है। इस विवाह को सुवर्ण विवाह, प्रतिमा विवाह या इही कहा जाता है। इस विवाह में लड़की की उम्र 5 से 8 होती है। यानि युवावस्था आने से पूर्व यह संस्कार पूरा किया जाता है। नेवार जाति में इही संस्कार बड़ा ही पवित्र माना जाता है। और इसको देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं।
आक विवाह- उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ब्राह्मणों का आक से विवाह की प्रथा प्रचलित है। यदि किसी पुरुष की मृत्यु हो जाती है और वह दूसरा विवाह करना चाहता है। तब उसका विवाह पहले आक के पौधों से किया जाता है। लोग वर को निवास स्थान से दूर खेतों के बीच जन्में आक के पौधे के पास ले जाते हैं। पौधे के पास ही विवाह की वेदी बनाई जाती है वहाँ विवाह सम्पन्न होता है। लोगों का ऐसा कहना है कि आक से विवाह होने के थोड़े दिन बाद लड़के का विवाह लड़की से कर दिया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स

Saturday, November 1, 2008

अबके बरस में महंगा भइले गेहुँआ


चारों तरफ ढोल -बाजों का आवाजें हैं। लाउडस्पीकर में भोजपूरी भाषा में शारदा सिन्हा की आवाज में,
ले ले अइहो हो भइया गेहूँ के मोटरिया..., आ गइले हो उजे छठ के बरतिया।
अबके बरस में महंगा भइले गेहुँआ......., छोड़ी दही गे बहिना छठ के बरतिया।।

जैसे गीतों से वातावरण गुंजायमान हो रहा है।
हर गली से झुंड में सजे हुए नर-नारी तथा उछलते कूदते बच्चे किसी जलाशय की तरफ चले जा रहे हैं। जी हाँ ............यह छठ पूजा का उत्सव है। जो बिहार,झारखंड तथा उससे सटे हुए कुछ इलाकों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हाल के कुछ वर्षों में इस पर्व की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। लोक पर्व से यह अब एक महापर्व हो चला है।
कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथी को छठ का पर्व मनाया जाता है। बिहार और झारखंड में यह पर्व सदियों से मनाया जाता रहा है। सूर्य भगवान को समर्पित यह व्रत स्त्रियाँ अपने पति व बच्चों की सलामती तथा स्वास्थय की कामना से करती हैं। कुछ इलाके में इस व्रत को पुरूष भी करते हैं । इस व्रत को करने का विधान भी बड़ा रोचक है। प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत होकर व्रती एक दिन-रात का निर्जल व्रत रखते है। संध्या के समय किसी नदी या सरोवर के पास जाकर अस्त होनेवाले सूर्य की विधिवत पूजा करते हैं कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। बांस के सूप में नारियल, सेब, नारंगी आदि फलों के विभिन्न प्रकार के पकवान सूर्य भगवान को चढ़ाए जाते हैं।जलाशय के किनारे गन्ने,केले तथा अदरक के पौधे से गेट सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद व्रती अपने-अपने घर चले आते हैं तथा रातभर जागकर हर पहर उठ-उठकर सूर्य भगवान की प्रार्थना करते हैं। फिर दूसरे दिन सप्तमी को प्रातःकाल सूर्योदय होने पर स्नान करके सूर्य भगवान को नियम पूर्वक अर्ध्य प्रदान करते हैं। और तब पारण करते हैं।
-प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

Intro- इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...