Tuesday, December 30, 2008

आज भी मायके आती हैं टुसु

टुसु का जन्म कब हुआ, कब उसकी शादी हुई, कब ससुराल गई। शायद किसी को भी इसका ठीक-ठीक पता नहीं है लेकिन सदियों से झारखंड,बिहार और बंगाल के कुछ हिस्सों में हर साल एक महीने के लिए टुसु के ससुराल से मायके आने की बात कही जाती है। तथा इसे एक बहुत ही मनोरंजक लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है।

अगहन की समाप्ति के साथ ही घरों में लड़कियाँ अरवा चावल (कच्चे चावल) के आटे और गोबर के गोल-गोल पिण्ड बनाती हैं। तथा घर के एक आले में मिट्टी के बर्तन में इसकी स्थापना कर दी जाती है। ये ही टुसु हैं, इनमें काजल और सिन्दूर लगाया जाता है तथा अनेक तरह से इनकी वन्दना की जाती है। प्रत्येक संध्या को दीप,धूप, अगरबत्ती के द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है तथा लड़कियाँ इसके सामने बैठकर विविध गीत गाती है।
वास्तव में टुसु एक कन्या का नाम है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, उसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। टुसु के गीतों में भी इसका बहुत अच्छा वर्णन मिलता है। विसर्जन से एक दिन पहले विदाई के कारुणिक गीत गाये जाते हैं। ये टुसु के प्रति उनके स्नेह और आदर के द्योतक हैं -

तीस दिनों तक टुसु तुम्हें रखा
तीस दिनों तक तुम्हारी संध्या वंदना की।
अब मैं और कितने दिनों तुम्हें रख पाऊंगी।
इतने दिनों तक टुसु थी, तो घर भरा-भरा था,
आज टुसु चली जायेगी, तो घर सूना-सूना हो जाएगा।


मकर संक्रान्ति के एक पहले-रात्रि जागरण किया जाता है। यह दिन बांउडी के नाम से विख्यात है। रात्रि को आठ प्रकार के अनाज मिट्टी की कड़ाही में डालकर उसे आग पर भूनते हैं। इस भूने हुए अनाज को भूँजा कहा जाता है। यह टुसु को भोग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि टुसु को भूँजा बहुत पसंद है। तथा रातभर गीत गाकर जागकर समय बिताया जाता है। सूर्योदय के पूर्व ही विसर्जन के लिए जाया जाता है। इस पर्व का अंतिम दिन मकर-संक्रांति का दिन होता है। चूंकि यह पर्व पूस में मनाया जाता है इसलिए कई इलाको में इस पर्व को पौष पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, December 23, 2008

उपनयन संस्कार गीत

पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था, सो मैं यहां पर इन गीतों का अनुवाद करने की कोशिश कर रही हूँ-
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......

धरती पर खड़े होकर बालक(जिसका जनेऊ हो रहा है।) जनेऊ माँग रहे है।
इस पृथ्वी के मालिक कौन है जो इन्हें जनेऊ पहनाएंगे।
इस पृथ्वी के मालिक तो सूर्य भगवान हैं,
और वह(सूर्यभगवान) उठकर बोले-
हम हीं इस पृथ्वी के मालिक हैं,इन बालकों को जनेऊ धारण करवाएंगे।
इन्हें सम्पूर्ण ब्राह्मण होने का आशिर्वाद देंगे।


2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।

राजा दशरथ के चारो पुत्र उपनयन मंडप पर विराजमान हैं
वे मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
मुंज की डोरी,मृग की छाला कहां शोभायमान है,
साथ हीं पीले रंग का जनेऊ कहां सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हाथ में मूंज की डोरी, कमर में मृग की छाला।
शरीर पर पीले रंग का जनेऊ, मंडप पर सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं


-प्रीतिमा वत्स

Monday, December 15, 2008

यज्ञोपवीत अथवा उपनयन संस्कार


बालक जब किशोरावस्था में प्रवेश करने लगता है तो उसे जनेऊ के माध्यम से संस्कारित किया जाता है। इसे यज्ञोपवीत तथा उपनयन संस्कार भी कहा जाता है। यह प्रथा ज्यादातर बिहार तथा झारखंड के ब्राह्मण तथा राजपूत जातियों में प्रचलित है। इस मौके पर महिलाएँ लोकगीत भी गाती हैं।
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......

2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।

-प्रीतिमा वत्स

Sunday, December 7, 2008

क्यों पाला मुझे इतने जतन से माँ


कुछ आदिवासी (संथाली) संस्कार गीतों के अनुवादः

सौहर

"ओ मेरी माँ
क्यों रो रही हो तुम
दरवाजे पर,छाती पकड़कर !"

"क्यों न रोऊँ मैं, मेरी बेटी
पाला है बड़े यतन से
बड़े लाड़-प्यार से मैंने तुम्हें।"

"कटोरे के सुसुम गर्म पानी,
और अँगीठी की गर्म ताप से
की है मैंने परवरिश तुम्हारी।
क्या देने पराए घर तुझे
किए हैं मैंने इतने यतन?"

सौहर

पिताजी!
थी जब मैं छोटी
तो आए थे कुटुम्ब
-शादी के लिए मेरी,
पर कर दिया था आपने इन्कार!
बाबा, अब हो गई हूँ बड़ी मैं
कहाँ हैं मेरे बाराती, कहाँ हैं मेरे कुटुम्ब
बोलो अब क्या करूँ मैं?
पुआल की मोटी रस्सी की तरह
बना के रख दो 'खोचर' मुझे!

-प्रीतिमा वत्स

Monday, December 1, 2008

लोककथा लछमी जगार की


बहुत पुराने समय की बात है, ऊपरपुर में मेंगराजा और मेंगिन रानी राज्य करते थे। मेंगिन रानी ने हठ किया कि बह मंजपुर देखना चाहती है। तब मेंगराजा के कहने पर अजगलभिमा ने मंजपुर जाकर उनके रहने के लिए वहाँ एक झोपड़ी बनवा दी। वे दोनों मंजपुर में आकर रहने लगे। उनके कोई संतान नहीं थी। मेंगिन रानी ने कई जतन किये किन्तु उन्हें संतान की प्रप्ति नहीं हुई। तब उसने मेंगराजा को अपने काका माहादेव के पास फल माँगने को भेजा। मेंगराजा कैलासपुर से आम का फल लेकर लौटे और उसे रोप दिया। समय आने पर वह फल अंकुरित होकर पौधा, और फिर पेड़ बना। उसमें फल लगे। मेंगराजा ने वह फल मेंगिन रानी को दिया। उस फल को खाने से मेंगिन रानी को पुत्री की प्राप्ति हुई। उसका नाम रखा गया, माहालखी। माहादेव का एक छोटा भाई था। उसका नाम था नरायन। वह बालिखंडपुर में रहता था। उसकी इक्कीस रानियाँ थीं। किन्तु इसके बावजूद वह माहालखी से विवाह करना चाहता था। उसने अपने भाई और भौजी से मिलने का बहाना बनाया और कैलासपुर आ गया। वहाँ से वह बेसरा (बाज पक्षी) लेकर आखेट के बहाने माहालखी की खोज में चला । उसका बेसरा छूट कर माहालखी के पास चला गया। वह बेसरा के बिना ही कैलासपुर लौटा। पारबती ने बेसरा के बारे में पूछा तो नरायन ने सारी घटना बतला दी और माहालखी के विवाह की जिद करने लगा। इस पर उसके भाई माहादेव ने पारबती से कहा कि उसकी बात मान लें और माहालखी के उसका विवाह करा दिया जाए। इस तरह उसका विवाह माहालखी के करवा दिया गया। विवाह के बाद वह माहालखी को लेकर बालिखंडपुर जाना चाहता था किन्तु पारबती ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया। तब वह अकेला ही बालिखंडपुर चला गया। किन्तु वहाँ उसका मन नहीं लगता था। तब वह एक रात कैलासपुर पहुँचा और माहालखी को उठा ले गया। वहाँ उसकी राधा-तुलसा- उडद,मूँग, चना, बडरा सरकों, तिल, राहेड़, कोसरा, सावाँ, वदई आदि इक्कीस रानियाँ माहालखी को तरह-तरह के कष्ट देने लगीं। सही बात से अनजान नरायन ने एक दिन माहालखी को बहुत पीटा। यहाँ तक कि उस पर लात भी उठाया। तब माहालखी अपमानित और दुखी होकर बालिखंडपुर छोड़कर इन्दरपुर चली गयी। उसके साथ-साथ नरायन राजा की सारी सम्पत्ति भी चली गयी। नरायन राजा अपनी रानियों के साथ भूखों दिन बिताने लगा। तब रानियों ने थक-हार कर कहा कि माहालखी के चले जाने के कारण ही उनके घर से धन-धान्य भी चला गया है। इसलिए वह माहालखी को खोज कर लाए। तब नरायन राजा माहालखी की खोज में भटकने लगा। बड़ी मुश्किल से इन्दरपुर में वह उसे देख सका। वहाँ किसी तरह उससे उसकी भेंट हुई। तब माहालखी ने रानियों द्वारा उस पर किए गए अत्याचारों की कथा सुनायी। नरायन राजा पछताने लगा और किसी तरह माहालखी को मनाकर बालिखंडपुर ले आया। उसके साथ ही धन-धान्य भी बालिखंडपुर लौट आए। इसी जगार के भीतर माहादेव द्वारा खेती करने और धान उपजाने की कथा भी आती है। इस कथा के अनुसार पहले धरती पर धान नहीं था। पारबती के कहने पर माहादेव ने खेती की और धान का उत्पादन किया। वही धान कैलासपुर से धरती पर आया और लोगों का भोजन बना।
इसा दिन की याद में लछमी जगार में खेतों से धान की बालियाँ लाकर नारियल के उसका विवाह रचाया जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...