Friday, January 18, 2008

समुद्र मंथन का साक्षी मंदार




इतिहास यहां कविता बनकर गूंजता है। कहते हैं, समुद्र मंथन में देवताओं ने मंदार पर्वत को मथानी बनाया था। सदियों से खड़ा मंदार आज भी लोक की आस्था का पर्वत बना हुआ है।


लोक मान्यता है कि भगवान विष्णु सदैव मंदार पर्वत पर निवास करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह वही पर्वत है, जिसकी मथानी बनाकर कभी देव और दानवों ने समुद्र मंथन किया था। मकर-संक्रांति के अवसर पर यहां एक मेला भी लगता है जो करीब पंद्रह दिन तक चलता है। मंदार पर्वत से लोगों की आस्थाएं कई रूप से जुड़ी हैं। हिंदुओं के लिए यह पर्वत भगवान विष्णु का पवित्र आश्रय स्थल है तो जैन धर्म को मानने वाले लोग प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य से इसे जुड़ा मानते हैं। वहीं आदिवासियों के लिए भी मंदार पर्वत पर लगनेवाला मेला कई उम्मीद लेकर आता है। सोनपुर मेले की समाप्ति के बाद से ही लोग इंतजार करते हैं मंदार पर्वत के पास लगने वाले मेले का। सोनपुर मेले के बाद मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला बौंसी का दूसरा बड़ा मेला माना जाता है।
बौंसी भागलपुर से दक्षिण में रेल और सड़क मार्ग पर स्थित बिहार राज्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मेले का इतिहास काफी पुराना है इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी बड़े पैमाने पर मिलजुल कर मेले का आनंद लेते हैं।
मेले का मुख्य आकर्षण काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित सात सौ फीट ऊंचा मंदार पर्वत है। यह अनेक दंत कथाओं को समेटे बौंसी से करीब दो किलोमीटर उत्तर में स्थित है। समुद्र मंथन की पौराणिक गाथा से जुड़ा होने के कारण इसका विशेष महत्व है। मंदार की चट्टानों पर उत्कीर्ण सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां, गुफाएं, ध्वस्त चैत्य और मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव के मूक साक्षी हैं। विभिन्न पुराणों, ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों में अनेक बार मंदार का नाम आया है स्कंद पुराण में तो मंदार महातम्य नामक एक अलग अध्याय ही है। मंदार वैष्णव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है। प्रसिद्ध वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु ने भी अनेक जगह मंदार पर्वत की चर्चा की है। समुद्र मंथन का आख्यान महाभारत के आदि पर्व के 18वें अध्याय में भी है। महाभारत के मुताबिक भगवान विष्णु की प्रेरणा से मेरू पर्वत पर काफी विचार विमर्श के बाद देवताओं और दानवों ने समुद्र को मथा।
मकर संक्रांति के दिन मंदार पर्वत की तलहट्टी में उपस्थित पापहरणि तालाब का महत्व तो कुछ और है। लोकमान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है। लोग मकर संक्रांति के दिन अवश्य यहां स्नान करते हैं। जगह-जगह जल रही आग का लुत्फ उठाते हैं। उसके बाद भगवान मधुसूदन की पूजा अर्चना करते हैं। दही-चूड़ा और तिल के लड्डू विशेष रूप से खाए जाते हैं।
पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक मंदार पर्वत की अधिकांश मूर्तियां उत्तर गुप्त काल की हैं। उत्तर गुप्त काल में मूर्तिकला की काफी सन्नति हुई थी। मंदार के सर्वोच्च शिखर पर एक मंदिर है, जिसमें एक प्रस्तर पर पद चिह्न अंकित है। बताया जाता है कि ये पद चिह्न भगवान विष्णु के हैं। पर जैन धर्मावलंबी इसे प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के चरण चिह्न बतलाते हैं और पूरे विश्वास और आस्था के साथ दूर-दूर से इनके दर्शन करने आते हैं। एक ही पदचिह्न को दो संप्रदाय के लोग अलग-अलग रूप में मानते हैं लेकिन विवाद कभी नहीं होता है। इस प्रकार यह दो संप्रदाय का संगम भी कहा जा सकता है। इसके अलावा पूरे पर्वत पर यत्र-तत्र अनेक सुंदर मूर्तियां हैं, जिनमें शिव, सिंह वाहिनी दुर्गा, महाकाली, नरसिंह आदि की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। चतुर्भुज विष्णु और भैरव की प्रतिमा अभी भागलपुर संग्रहालय में रखी हुई हैं। फ्रांसिस बुकानन, मार्टिन हंटर और ग्लोब जैसे पाश्चात्य विद्वानों की आत्मा जिन्हें मंदार के सौंदर्य ने कभी प्रभावित किया था, सदियों से प्राकृतिक आपदाएं सहन करती हुई ये मूर्तियां उद्धार के लिए तरसती होंगी । स्थानीय लोगों ने इन प्राचीन मूर्तियों का आकार परिवर्तित कर इच्छा के मुताबिक देवी-देवता के रूप में स्थापित कर लिया है और भक्तों को आकर्षित कर पैसा कमाया जा रहा है। इससे प्राचीन मूर्तियों का अस्तित्व खतरे में है। पर्वत परिभ्रमण के बाद लोग बौंसी मेला की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। बौंसी स्थित भगवान मधुसूदन के मंदिर में साल भर श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है। मकर संक्रांति के दिन यहां से आकर्षक शोभायात्रा निकलती है।
-प्रीतिमा वत्स

Sunday, January 6, 2008

स्वस्तिक का सफर


स्वस्तिक का अर्थ होता है- कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
कभी पूजा की थाली में, कभी दरवाजे पर, वेदों-पुराणों में प्रयुक्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ पवित्र धर्मचिह्न के रूप में प्रयुक्त स्वस्तिक चिह्न आज फैशन की दुनिया में भी शुमार होता जा रहा है। अब यह पूजा की थाली से उठकर घर की दीवारों तथा सुंदरियों के परिधानों में सजने लगा है।
स्वस्तिक चिह्न का डिजाइन इजिप्सन क्रास, चाइनीज ताउ, रोसीक्रूसियंस और क्रिश्चियन क्रास से मिलता जुलता है। विभिन्न आकृतिओं से मिलने वाला यह चिह्न हर युग में अपना अलग-अलग महत्व भी रखता है। सनातन धर्म और जैन धर्म हो या बौद्ध धर्म, हर धर्म और युग में अपनी महत्ता के साथ स्वस्तिक उपस्थित है।
ईसा पूर्व में स्वस्तिक आकृति के दायें और बायें पक्ष से आदमी लापरवाह थे। उस समय इस रहस्यमय आकृति की गंभीरता से लोग बेखबर थे। तब यह धार्मिक रूप से दो सिद्धान्तों के विकास और विनाश को दर्शाता था। स्वस्तिक का महत्व समाज और धर्म दोनों ही स्थानों में है। भारतवर्ष में एक विशाल जनसमूह स्वस्तिक निशान का उपयोग करता है। कोई इसे सजाने के तौर पर तो कोई इसका उपयोग धर्म और आत्मा को जोड़कर करता है। दक्षिण भारत में जहां इसका उपयोग दीवारों और दरवाजों को सजाने में किया जाता है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में इस आकृति को तंत्र-मंत्र से जोड़कर देखा जाता है। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में इस आकृति को एक पवित्र धार्मिक चिह्न के रूप में माना जाता है। स्वस्तिक संस्कृत का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है- कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
वेदों में स्वस्तिक चिह्न के बनावट की व्याख्या विभिन्न अर्थों में की गई है। कभी इसके चारों भागों को समाज के चार वर्ण के रूप में माना गया है। कभी इसकी चारों भुजाओं को विष्णु के चार भुजा के रूप में माना गया है जो विकास और विनाश के बीच संतुलन बनाकर सृष्टि को चला रहे हैं। कई बार स्वस्तिक के निशान हमें भ्रम में भी डाल देते हैं। पौराणिक काल में जहां इसका उपयोग धर्म के प्रतीक चिह्न के रूप में किया जाता था, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाजी पार्टी के लोग स्वस्तिक के निशान को बहुत ही महत्वपूर्ण एवं संभावनाओं से भरा हुआ माध्यम मानते थे। वहीं आज यह स्वस्तिक सुंदरियों के परिधानों और आभूषणों तक पहुंच गया है। अर्थात कई पड़ावों से गुजर चुका है -स्वस्तिक का सफर।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, January 1, 2008

लोक देव हनुमान


हनुमान एक अखिल भारतीय लोक देव हैं। कन्या कुमारी से काश्मीर तक तथा द्वारका से कामाख्या तक उसका देवस्वरूप लोकमान्य हैं। केरल मे शुचीन्द्रम के शिवालय की सन्निधि में उसकी लघुमूर्ति है, तो तमिलनाडु में नामक्कल वैष्णव मन्दिर के सामने उसकी मूर्ति तीन पुरूष लम्बे कद की है। कर्नाटक के लोकना्टय यक्षगान में हनुमान का पात्र महत्वपूर्ण होता है। महाराष्ट्र में गांवों के प्रवेशद्वारों में मारूति प्रतिष्ठित रहता है। नासिक- पंचवटी के राममंन्दिर के सम्मुख हनुमान की पत्थरमूर्ति पर धातु का टोप चढाया हुआ है। किन्तु पास ही टाककी गांव में गोबर तथा मिट्टी का मारुति स्थित है, जिसकी साक्ष्य में समर्थ रामदास ने सत्रहवीं सदी में बरसों तप किया था। मध्यप्रदेश के बस्तर में आदिवासी हनुमान खुले आंगन में भुनी मिट्टी का शिल्प होता है। वहां हिमाचल में घर की पुती दीवार पर हनुमान जी की लेप की मूर्ति पूजनीय रहती है। वाराणसी में तुलसीदासजी का बाल हनुमान भक्तजनों को प्रिय है, वैसे ही उसका पंचमुखीभव्य रूप संकटमोचन होकर प्रार्थनीय है। अंगजनपद के हर घर हर मोड, हर चौराहे पर हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। मीरा के राजस्थान,कृष्णजी की मथुरा, जगन्नाथजी का ओडिया..... विभिन्न कारीगरी में हनुमान साकार करते हैं। मिट्टी,काठ,पत्थर आदि में, अथवा केवल मानसिक रूप में, शक्ति तथा बुद्धि,युक्ति तथा सरलता, भक्ति तथा भक्तसहायता, लघुता तथा विशालता आदि परस्पर विरूद्ध गुणों का भाजन हनुमान माना जाता है।
फिर भी उनका मूर्तरूप, राम कृष्ण जैसे अवतार, शंकर पार्वती जैसे देवता, आदि के समान, मानव का न होकर सपुच्छ वानर का ही रहता है। गाय अथवा नाग अपने प्राणिरूप में पूज्य हैं, उस प्रकार वानर स्वयं पूज्य नहीं होते। फिर भी खेत में ऊधम मचानेवाले वानर को किसी हद तक अभय प्राप्त है, अथवा गांव में मृत वानर के यात्रापूर्वक संस्कार किये जाते हैं- यह मानकर कि वह हनुमान के वंशज हैं। सारांश, वानर नाम प्राणी में देवत्व नहीं, हनुमान नामक देव वानर हैं। हनुमान का रूप वानर का है, किन्तु उसका चरित्र दैवी है। यह भावना इतनी दृढ तथा सर्वगामी है कि, शिल्प चित्र या अन्य कारीगरी की तफतीस कुछ भी हो, वानर का चेहरातथा पूंछ उसमें अवश्य होते हैं।
एक सामान्य वानर को प्राप्त न होने वाला देवत्व हनुमान को कैसे प्राप्त हुआ । भारत भर में इसका उत्तर उसके विलक्षण कर्मों के कारण यही होगा। जन्म लेते ही सूर्य के प्रति उडान, लंकादहन तथा औषधियों के लिए पर्वत उठाकर लाना......... ये दिव्य कर्म करने वाला दैवी वानर यही हनुमान की लोकमानस में प्रतिमा है।

प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...