Friday, January 30, 2009

चटख रंगों और लय का अद्भुत मेल है छऊ नृत्य


छऊ नृत्य में कंठ-संगीत गौण होता है और वाद्य-संगीत का प्रधानता होती है। चटख रंग के कपड़े पहनना तथा मुखौटा धारण करना इस नृत्य के लिए आवश्यक होता है।

छऊ नृत्य नाटिका पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के पडोसी राज्यों में आज भी अपने पारंपरिक रूप में देखने को मिलती है। इन राज्यों में यह नृत्य वार्षिक सूर्य पूजा के अवसर पर की जाती है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और मिदनापुर जिलों के कुछ क्षेत्रों में इस नृत्य में रामायण की पूरी कथा पर होती है, जबकि अन्य जगहों पर रामायण और महाभारत तथा पुराणों में वर्णित अलग-अलग घटनाओं को आधार बनाकर यह नृत्य किया जाता है।
पश्चिम बंगाल में नृत्य खुले मैदान में किया जाता है। इसके लिए लगभग 20 फुट चौड़ा एक घेरा बना लिया जाता है, जिसके साथ नर्तकों के आने और जाने के लिए कम से कम पांच फुट का एक गलियारा जरूर बनाया जाता है। जिस घेरे में नृत्य होता है, वह गोलाकार होता है। सभी बजनिए अपने-अपने बाजों के साथ एक तरफ बैठ जाते हैं। प्रत्येक दल के साथ उसके अपने पांज या छह बजनिए होते हैं। घेरे में किसी प्रकार की सजावट नहीं की जाती और कोई ऐसी चीज भी नहीं होती जो इस नृत्य के लिए अनिवार्य समझी जाती हो।

दर्शक खुली जमीन पर गोलाकार बैठ जाते हैं, लेकिन महिला दर्शकों के बैठने के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। उनके बैठने के लिए लकड़ी के तख्तों से छह या सात फुट ऊंजा अस्थाई मंच बनाया जाता है। मंच, आदमी के कद से थोड़ा ऊंचा होता है। जगह की कमी हैने पर पुरुष दर्शक उसके नीचे भी खड़े हो जाते हैं। यह नृत्य देर रात से शुरु होकर सुबह तक चलता है।
इस नृत्य के वस्त्रों की कुछ विशेषताएं हैं, जो इस क्षेत्र अथवा बंगाल के किसी अन्य भाग में प्रचलित दूसरे प्रकार के कलात्मक प्रदर्शनों के वस्त्रों में अकसर नहीं पाई जातीं। प्रत्येक मुख्य पात्र अत्यंत साधारण किस्म का रंगीन पायजामा पहनता है। देवता पात्रों और राक्षस पात्रों के पायजामों के रंग अलग-अलग होते हैं । देवताओं के पायजामे गहरे हरे और गहरे पीले रंग के और राक्षसों के गहरे लाल और गहरे काले रंग के होते हैं । इन अलग-अलग रंगों के अलावा कपड़े पर लगभग छह-छह इंच की दूरी पर धारियां भी लगी होती हैं। शिव जैसे कुछ पात्र पायजामे के बदले बाघचर्म के प्रतीक-स्वरूप धोती या लुंगी पहनते हैं। गणेश पायजामे के साथ-साथ बंगाली शौली में एक वस्त्र खंड भी धारण करते हैं। स्त्री पात्र बंगाली शैली में साड़ी या स्त्रियों के वस्त्र पहनते हैं, लेकिन स्त्रियां बहुत कम ही होती हैं। काली का अभिनय अकसर किया जाता है, जो भयंकर दिखने के लिए विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करती है।
देवता और राक्षस नाटकों का अभिनय करने वाले नर्तक अपने ऊपरी अंगों में अलंकृत वस्त्र पहनते हैं। सभी पात्र महीन या साधारण मखमल से बनी एक कशीदाकारी की हुई मिरजई पहनते हैं। सभी पात्रों के लिए या चाहे वे देवता हों या मानव हों या पशु, अपने चेहरे पर उपयुक्त मुखौटा लगाना जरूरी होता है। बंगाल में मुखौटे, पुरुलिया जिले के सिर्फ एक गांव में बनाए जाते हैं जो बागभुंडी क्षेत्र में स्थित है। मुखौटे का निर्माण झरने के तल से प्राप्त मिट्टी, रद्दी कागज के टुकड़े, कपड़े के टुकड़े या चिथड़े आटे से बने गोंद, छोटी छेनी, स्थानीय बाजार से खरीदा गया सजावट के सामानों से किया जाता है।
छऊ नृत्य के संगीत में कंठ-संगीत गौण होता है और वाद्य-संगीत की प्रधानता होती है। लेकिन, नृत्य के प्रत्येक विषय की शुरुआत एक छोटे गीत से की जाती है, जिसे उस विषय का प्रदर्शन करने के क्रम में कभी-कभी दुहराया जाता है, खास-तौर पर तब जब शहनाई या वंशी न बज रही हो। प्रत्येक पात्र का परिचय एक छोटे गीत से दिया जाता है जो अगले विषय के प्रारंभ होने तक चलता रहता है। इसके बाद कोई दूसरा पात्र घेरे में आता है और उसका परिचय देने वाला गीत शुरु हो जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, January 16, 2009

मलूटी के मंदिर

मलूटी के मंदिर छायाचित्रों में-

















































-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, January 14, 2009

लोक देवी-देवताओं की पूजा


भारतवर्ष के करीब हर राज्य में लोक देवी-देवताओं का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। हर खुशी के अवसर पर जैसे- शादी-ब्याह, जनेउ, मुंडन आदि में सबसे पहले इन देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। बिहार तथा झारखंड में इस अवसर पर जो गीत गाये जाते हैं उन्हें मनान गीत कहते हैं। किसी भी लोक देवी-देवता की पूजा के पहले मनान गीत गाकर उन्हें खुश किया जाता है।
कौन काती कतरव बॉस क् बीट हे कओन काती साजब में कामी
कि ओही रे मंडप घर हे ।
सोने काती कतरव बॉस बीट हे रूपे काती साजब में कामी
कि ओही रे मंडप घर हे।
ओही कामी बिनबो में डाला डूली हे भरबो में ओड़हुल फूल
कि ओही रे मंडप घर हे।
ओही फूल पुजवो में जदवावीर देव हे जिनि मोरा पुराओल आस
कि ओही रे मंडप घर हे।
पुजु पुजु तिरिया सम्पूर्ण भए हे हम तोहर पुरायेव आस
कि ओही रे मंडप घर हे।

अर्थ:
किस तरह से बाँस काटकर मंडप सजाया जायेगा ?
किस प्रकार कुलदेवताओं के पूजन के लिए उचित सामग्री तैयार की जाएगी ?
सोने के हँसुआ से बाँस के टुकड़े काटे जायेंगे और चाँदी के अलंकरण से मंडप का द्वार सजेगा जहाँ कुलदेवताओं की पूजा होगी।
उसी बाँस से पूजन की डलिया तैयार की जायेगी और उसमें जवा कुसुम का फूल भरकर पूजन की सामग्री तैयार की जायेगी।
इसी प्रकार जदवावीर देवता की पूजा होगी जिन्होंने मेरी मनोकामना पूरी की है।
देवता कहते हैं- हे रमणी. पूजन करो। हम तुम्हारी सभी मनोकामनाओं को पूरा करेंगे।


हर इलाके के अलग-अलग कुल देवता होते हैं। बंदी देव, शैलू गोसांई, बंदी, सोखा, गोरेया, जदवावीर, परमेसरी, काली महामाया तथा हनुमानजी आदि कुलदेवताओं के अलग-अलग नाम हैं। जिनके घर में जो देवता हैं, उनका नाम लेकर यह गीत गाया जाता है। किसी-किसी घर में पाँच या उससे भी अधिक कुलदेवता होते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, January 8, 2009

झारखंड की लोक कथा

झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जाते हैं।

एक गांव में एक समृद्ध व्यक्ति के पास धातु के बने हुए कुछ बर्तन थे। गांव के लोग शादी आदि के अवसरों पर यह बर्तन उससे मांग लिया करते थे। एक बार एक आदमी ने ये बर्तन मांगे। वापस करते समय उसने कुछ छोटे बर्तन बढ़ाकर दिए। समृद्ध व्यक्ति ने पूछा कि बर्तन कैसे बढ़ गए। उसने कहा कि मांगकर ले जाने वाले बर्तन में से कुछ गर्भ से थे। उनके छोटे बच्चे हुए हैं। समृद्ध व्यक्ति व्यक्ति को छोटे बर्तनों का लोभ हो गया। उसने बर्तन देने वाले आदमी को ऐसे देखा जैसे उसे कहानी पर विश्वास हो गया हो और उसने बर्तन रख लिए। कुछ दिन बाद वही व्यक्ति फिर से बर्तन मांगने आया। समृद्ध-व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए बर्तन दे दिए। काफी समय तक बर्तन वापस नहीं आए। बर्तनों के स्वामी ने इसका कारण पूछा। मांगने वाले ने कहा कि वह बर्तन नहीं दे सकता, क्योंकि उनकी मृत्यु हो गई है। परंतु बर्तन कैसे मर सकते हैं समृद्ध व्यक्ति ने पूछा। क्यूं ? उत्तर मिला, यदि बर्तन बच्चे दे सकते हैं तो वे मर भी सकते हैं।
अब उस समृद्ध व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह हाथ मलता ही रह गया।

-प्रीतिमा वत्स

महिमा कालभैरव अष्टमी का

मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी कहा जाता है। कालभैरव जी के जन्मदिवस के रूप में यह तिथि मनाई जाती है। देवता...