Wednesday, March 18, 2009

क्या आपने चैती सुना है ?

चैती एक खास तरह का गीत है जिसे चैत के महीने में गाया जाता है। इन गीतों में मुख्य रूप से भगवान राम का स्मरण किया जाता है। झारखंड के गोड्डा जिले में रहनेवाले कंचन महतो का कहना है, चैत के महीने में तो सिर्फ राम के लिए ही चित्त चंचल होता है। उनके सुर आज भी चैत की रातों सजाते हैं।

लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
ऐसो सुन्दर ललनमा के देखी
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा।।
घुंघराली काली-काली लुटरिया
शोभित कमल नयनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा
अखिया सुफल भई,अखिया सुफल
भई।।

इस चैती गीत में रामचंद्र जी की सुन्दरता का वर्णन किया गया है। उनकी घुंघराली काली लटें, उनके सुंदर नयन जो कमल की तरह खिले हुए लगते हैं। जिन्हे देखकर आंखे सफल हो गई।

बाजत आनंद बधैया हो रामा।
ऐलै चैत का महीनवा हो रामा
बाजत आनंद बधैया हो रामा।
राजा दशरथ के चार पुत्र भई
श्याम घोर छवि छैया हो रामा।
बाजत आनंद बधैया हो रामा।।

इन गीतो में भगवान रामचंद्र जी के जन्म उत्सव का वर्णन किया गया है।

-प्रीतिमा वत्स

Saturday, March 14, 2009

देवगुड़ी में धरतीपूजा


जिस दिन देवगुड़ी में हल चलाया जाता है उस दिन पूरे गांव में हल चलाने की मनाही होती है, तथा दूसरे दिन से धान की बोआई शुरु हो जाती है।

छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाकों में चैत के महीने में धरती माँ की पूजा बड़े ही धूमधाम से की जाती है।इस पर्व को यहाँ माटी तिहार के नाम से जाना जाता है।
पर्व के दिन सुबह-सवेरे नहा-धोकर पुजारी देव गुड़ी(देव मंदिर) में जा पहुँचता है। पुजारी दिनभर का उपवास रखता है। गाँवभर के सभी पुरुष अपने हाथों में सिंयाड़ी के पत्ते के दोने में धान भरकर देवगुड़ी में जमा होते हैं। फिर वे अपने-अपने दोने देवी माँ के चरणों में अर्पित कर देते हैं। देवगुड़ी के पास हीं एक लम्बा-चौड़ा गड्ढा खोदा जाता है, लेकिन इस गड्ढे की मिट्टी निकाली नहीं जाती है। कुछ आदमी हल लेकर इस गड्ढे की गुड़ाई करते हैं। इस हल में बैलों की जगह आदमी जुते रहते हैं। इस रस्म के बाद उस गड्ढे में ढेर सारा पानी डालकर छोड़ दिया जाता है। तब पुजारी इनमें धान बोता है।धान बोये जाने के बाद सभी लोग इकट्ठे होकर देवी माँ,धान और पुजारी की पूजा करते हैं।पूजा के बाद सबलोग मंदिर में ही बना हुआ खाना खाते हैं। खाना खाने के बाद पुनः सब उस गड्ढे के पास इकट्ठे हो जाते हैं, और एक-दूसरे को कीचड़ में घसीट-घसीटकर खूब खेलते हैं। एक दूसरे के ऊपर कीचड़ लगाते हैं और अपने-अपने घर आ जाते हैं।
दूसरे दिन पुजारी के घर पर खाना-पीना होता है, तथा रात्रिजागरण भी किया जाता है।

यद्यपि यह पर्व काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन इस पर्व में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है।
माटी तिहार का पर्व यूँ तो छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाके में मनाया जाता है लेकिन पर्व मनाने के तरीकों में थोड़ी बहुत भिन्नता पाई जाती है। कहीं-कहीं पर डाही जलाने (बुरी नजर से बचाने) की प्रथा भी है।
-प्रीतिमा वत्स

Saturday, March 7, 2009

फुलवा जैसनी सुकुमार


बिहार और झारखंड (प्राचीन अंगजनपद) के कुछ हिस्सों में आज भी होरी (होली पर गाया जानेवाला गीत) अपने पुराने अंदाज और ठाट से गाया जाता है। शिवरात्रि के दिन से आरंभ होकर होलिका दहन के दिन तक रोज रात में गाया जाता है। दिनभर के कामों से निवृत होकर जब लोग रात को करीव दस बजे होरी गाने बैठते हैं तो मानों नयी स्फुर्ति से भर जाते हैं। पुरुषों की भीड़ में कोई एक पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर भी नाचता है। और पूरा गांव होली के रंग में आधी रात तक डूबा रहता है।

होली के कुछ गीत-

1.
गोरिया पातरी हे गोरिया पातरी
गोरिया पातरी----------------।
जैसे लचके अंगुरिया के डार, गोरिया पातरी,
होरी हो-------होरी हो-----------।
पनवा जैसनी हे गोरिया पातरी छितरी
फुलवा जैसनी सुकुमार,
सोनवा जैसनी हे गोरिया देखैम् सुन्दरी
बिजुरी छिटकावै बतीसो दाँत
होरी हो--------होरी हो---------।
गोरिया पातरी हे, गोरिया पातरी।।


अर्थ- इस होरी में गोरी (नारी) के दैहिक सुन्दरता का वर्णन है। गोरी बहुत नाजुक और पतली है। जैसे अंगुर की बेल लचकती है वैसे ही गोरी का कमर लचकता है।
गोरी पान के जैसे पतली और फूल से भी सुकुमार है। सोने के जैसी सुन्दर है। बत्तीसो दांत तो मानों बिजली की तरह चमकते हैं।


2.
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग--------------------।
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग-------------------।
होरी हो----होरी हो---------।
किनका के हाथ कनक पिचकारी,
किनका हाथ अबीर झोली, राधा संग,
हो राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग------------------.
कृष्णा के हाथ कनक पिचकारी,
राधा रानी हाथ अबीर झोली
राधा संग-------------------।
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग----------------------।


अर्थ- इस होरी में राधा और श्याम के द्वारा खेले गये होली का वर्णन है।
राधा के संग श्याम होली खेल रहे हैं। कृष्ण के हाथों में सोने की पिचकारी है
और राधा के हाथों में अबीर की झोली है।
दोनों एक दूसरे में मस्त हैं और होली खेल रहे हैं।

3.
बिकन चले, बिकन चले तीनों प्राणी है दानी बिकन चले।
कौनी घर में राजा बिक गये, किनका घर में रानी,
किनका घर में रोहित बिक गये।
बिक गए तीनों प्राणी हो दानी बिकन चले।
होली हो----------होली हो--------------।
डोम घर में राजा बिक गए, मालिनी घर में रानी,
डोम घर में रोहित बिक गए।
बिक गए तीनों प्राणी हो दानी बिकन चले।
होली हो---------होली हो-------------।


अर्थ- इस होरी में राजा हरिश्चन्द्र के सपरिवार बिकने की बड़ी मार्मिक कथा है।
किस घर में राजा बिक गए और किस घर में रानी, कौन से घर में राजकुमार रोहित बिक गए।
आज तो पूरा परिवार हीं बिकने को निकल पड़ा है।
डोम के घर में राजा बिक गए, मालिन के घर में रानी सैव्या बिक गईं।
डोम के घर में ही राजकुमार रोहित बिक गए।
के आज तो तीनों प्राणी ही बिक गए।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, March 5, 2009

संताली लोक समाज में शराब की कथा

संताली लोक समाज में शराब के निर्माण को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा है। कल्पनाओं पर आधारित होते हुए भी यह बहुत हीं मनोरंजक और शिक्षाप्रद है।

पुराने जमाने की बात है। एक बार एक आदमी एक पीपल के पेड़ के नीचे शराब बनाने बैठा। उसके लिए उसने चूल्हा सुलगाया। उस पर महुए की हांड़ी चढ़ाई और आंच देने लगा। परंतु, बहुत देर तक आंच देते रहने पर भी एक बूंद भी शराव नहीं निकली। उससे हैरान हो वह एक ओझा (तांत्रिक) के पास गया और उससे बोला, बाबा, मैंने अमुक पेड़ के नीचे शराब चुलाने के लिए चूल्हा जलाया है, परंतु लाख कोशिश करने पर भी एक बूंद भी शराब नहीं निकाल पा रहा हूं। कृपा करके मुझे बताएं कि मैं क्या करूं जिससे शराब निकाल सकूं।
उस ओझा बाबा ने उसे बताया, तुम जिस पेड़ के नीचे शराब चुवा रहे हो उसी पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंक दो। फिर, देखोगे कि इतनी आधिक शराब चूने लगेगी कि तुम्हें शराब रखने की जगह तक नहीं मिलेगी।
इस पर वह आदमी झटपट उस पेड़ के पास लौट आया और उसे काटकर चूल्हे में झोंकने लगा।
उस पेड़ की शरण में चार जीव रहा करते थे- एक मैना, एक तोता, एक बाघ और एक सूअर। चारों दिन-भर तो इधर-उधर रहा करते, परंतु सांझ होते ही उस पेड़ की शरण में आ जाया करते और वहीं रात गुजारा करते थे।
उस दिन भी सांझ होते-न-होते वे चारों एक-एककर वहां आने लगे।
सबसे पहले मैना आई। उसने देखा कि पेड़ काट डाला गया है और चूल्हे में उसे झोंका जा रहा है। यह देखकर उस मैने को बहुत दुख हुआ। अपने शरणस्थल उस पेड़ को जलते हुए देख वह भी उस चूल्हे में कूद पड़ी। उससे कुछ शराब चू निकली।
उसके बाद तोता उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है तो वह भी उसमें कूदकर जल-मर गया। शराब कुछ अधिक चू निकली।
उसके बाद बाघ उस पेड़ के पास आया और देखा कि उस पेड़ को काट डाला गया है और चूल्हे में झोंका जा रहा है। इस पर उस बाघ को भी बहुत दुख हुआ और वह भी उसी चूल्हे में कूदकर जल-मर गया। शराब अधिक चू निकली।
अंत में सूअर उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है । इस पर वह भी बहुत दुखी हुआ और उसने भी उसी चूल्हे में कूदकर अपनी जान दे डाली। शराब बहुत अधिक चू निकला।
वह आदमी बहुत खुश हुआ। उसने ओझा को बधाई दी।
कहा जाता है कि उसी दिन से शराब में मैने, तोते, बाघ और सूअर के खूनों का असर व्याप गया है। इसीलिए जब शराब का पहला दोना ढलता है तब पीनेवाला मैने की तरह मीठी-मीठी बातें करने लगता है, वाह भई, शराब तो खूब बनी है, किसने इतनी अच्छी शराव बनाई है। इत्यादि। उसके बाद दूसरा दोना पीते-पीते वह तोते की तरह बातुनी हो जाता है, तीसरे दोने में वह मानो बाघ बन जाता है, बाघ की तरह ही गरजना दहाड़ना और दंभ मारना शुरू कर देता है। वह बात-वात में बिगड़ जाया करता है और समझने लगता है कि दुनिया में उससे बढ़कर कोई नहीं है। और, अंत में वह सूअर-जैसा बन जाता है। उसे न तो अपने तन-मन की सुध रहती है और न भले-बुरे का ज्ञान। वह जहां तहां गिरा पड़ा रहता है।
यही कारण है कि संताल लोगों के पुरखों में आज-कल की तरह बेहिसाव शराब पीने का चलन नहीं था।
-प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

Intro- इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...