Sunday, September 13, 2009

चित्रकारी कोहबर की


बिहार के मिथिला तथा सम्पूर्ण मैथिली समाज में शादी के मंडप के साथ-साथ कोहबर का भी बड़ा हीं महत्व है। कोहबर ही वह जगह होती है जहां शादी की रात दुल्हे के द्वार लगने से पहले तक दुल्हन गौरी मां की पूजा करती है। गणपति जी की चित्रकारी से शुरु होकर तरह-तरह के बेल-बूटे से सजाया जानेवाला कोहबर जितना सुन्दर लगता है उतना ही गूढ़ अर्थ भी रखता है। गणपति भगवान विघ्नहर्ता माने जाते हैं इसलिए इनकी तस्वीर कोहबर के बीच में बनाई जाती है। इसके बाद बांस का झुरमुट बनाया जाता है। बांस बहुत जल्दी बढते हैं तथा इसका मूल जल्दी नष्ट नहीं होता है। इसे आधार मानकर नवदम्पत्ति के सुखद वंश वृद्धि की कामना की जाती है। बांस के बाद कमल के फूल और पत्तों को बनाया जाता है। कमल कीचड़ में खिलकर भी बेहद खूबसूरत होता है। इसके पत्तों पर पानी की एक बूंद भी ठहर नहीं पाती है। इस फूल की विशेषता के आधार पर नवदम्पत्ति के सुखद जीवन की कामना की जाती है। जिन्दगी के उतार-चढ़ाव के बीच भी ये कमल की तरह दमकते रहें ऐसी कामना की जाती है। कोहबर में मंगल कलश का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है।
कोहबर में प्रथम प्रजापति माना जानेवाला तितली भी अवश्य ही चित्रित किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के फूल तथा चिड़ियां भी बनाए जाते हैं। जो अपना-अपना विशेष महत्व लिए हुए होते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल

दशहरा के आते ही झूम उठता है हमारा गांव। देवी मां के मंडप पर तरह-तरह के लोक गीत गाए जाते हैं, वह सारे गीत मुझे इतने अच्छे लगते हैं कि मन ही नहीं होता कि वहां से उठकर कहीं इधर-उधर जाया जाए। वैसे तो झारखंड के गांवों में भी देवी के फिल्मी गातों को बजाने की शुरुआत काफी पहले से हो चुकी है। पर मुझे लगता है मेरे ससुराल (मोतिया,झारखंड) का वह एक ऐसा मंडप है जहां मुहल्ले भर के पुरुष और महिलाएं इकट्ठे होकर खुद हीं दुर्गा मां की पूजा करते हैं और गीत-भजन वगैरह गाते हैं। आज भी वहां केले के पेड़ से मां की आकृति बनाई जाती है और तांत्रिक विधि से मां की पूजा होती है।

1.
कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल
कौनी दिन परिचार,
हे देवी कौनी दिन परिचार हे।
पड़िबा दिन देवी जनम तोहार भेल,
दुतिया लेल परिचार
हे देवी, दुतिया लेल परिचार हे।
तिरतिया दिन देवी तीनों लोक तारल,
चौठी चरण पखार हे देवी चौठी चरण पखार हे।
पंचमी खष्टी देवी नाग नचावली,
सप्तमी करल उद्धार हे देवी सप्तमी करल उद्धार हे।
अष्टमी दिन देवी आठो भुजा धरलिनी,
नौमी नाक श्रृंगार हे देवी, नौमी नाक श्रृंगार हे।
दशमी दिन देवी दसो भुजा धरलिनी,
आरो यल बिदाई हे देवी आरो लियल विदाई हे।
आपहु हंसे देवी लोगों को हंसाए, हंसे जगत-संसार हे देवी, हंसे जगत-संसार हे।

इस गीत में मां के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। लोक में नवरात्रों के नौ दिन में मां के अलग अलग रूप होते हैं। जन्म से लेकर दसो भुजा धारण करने की पूरी व्याख्या है इस गीत में।
2
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै देवी स् विवाह है कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, है कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
शोणित पिबिये मैया खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार हे कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पाचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
इस गीत में देवी मां के पांच कुवांरी बहन होने की बात कही गई है। महिषासुर वध करके किस प्रकार मां उसका रक्त पीतीं हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं इसकी भी व्याख्या है इस प्यारे से गीत में।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, September 3, 2009

लोक में जीतिया


आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका अथवा जीतिया का व्रत सम्पन्न किया जाता है। इस व्रत को मुख्यतः वही स्त्रियाँ करती हैं, जिनके पुत्र होते हैं। यह व्रत पुत्र के दीर्घायु तथा आरोग्य के लिए किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार,झारखंड, मध्यप्रदेश ,आदि क्षेत्रों में स्त्रियों के बीच यह बहुत हीं लोकप्रिय व्रत है। यह एक ऐसा व्रत है जिसमें सूर्य भगवान की पूजा के साथ-साथ ही अपने पुर्वजों की भी उपासना की जाती है।
इस व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा है। जिसे व्रत करनेवाली स्त्रियां बड़े प्रेम से सुनती हैं।
किसी जंगल में एक सेमर के वृक्ष पर एक चील रहती थी और उसी से कुछ दूर पर एक झाड़ी से भरी खंदक में एक सिआरिन की माँद थी। दोनों में बहुत पटती थी। चील जो कुछ शिकार करती उसमें से सिआरिन को भी हिस्सा देती और सिआरिन भी चील के उपकारों का यदा-कदा बदला चुकाया करती। वह अपने भोजन में से कुछ न कुछ बचाकर चील के लिए अवश्य लाती। इस प्रकार दोनों के दिन बड़े सुख से कट रहे थे।
एक बार उसी जंगल में पास के गाँव की स्त्रियां जिउतिया का व्रत कर रही थीं। चील ने उसे देखा। उसे अपने पूर्वजन्म की याद थी उसने भी यह व्रत करने की प्रतिज्ञा की। दोनों ने बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से व्रत को पूरा किया। दोनों दिन भर निर्जल और निराहार रहकर सभी प्राणियों की कल्याण-कामना करती रहीं। किन्तु जब रात्रि आई तो सिआरिन को भूख और प्यास से बेचैनी होने लगी। उसे एक क्षण काटना भी कठिन हो गया। वह चुपचाप जंगल की ओर गई और वहाँ शिकारी जानवरों के खाने से बचे माँस और हड्डियों को लाकर धीरे-धीरे खाने लगी। चील को पहले से कुछ भी मालूम नहीं था। किन्तु जब सिआरिन ने हड्डी चबाते हुए कुछ कड़-कड़ की आवाज की तो चील ने पूछा- बहिन तुम क्या खा रही हो ?
सिआरिन बोली- बहिन क्या करूँ ! भूख के मारे मेरी हड्डियाँ चड़मड़ा रही हैं ऐसे व्रत में भला खाना-पीना कहाँ हो सकता है।
किन्तु चील इतनी बेवकूफ नहीं थी। वह सब जान गई थी। उसने कहा- बहिन तुम झूठ क्यों बोल रही हो। हड्डी चबा रही हो और बताती हो कि भूख के मारे हड्डी चड़मड़ा रही है। तुम्हे तो पहले ही सोच लेना चाहिए था कि व्रत तुमसे निभेगा या नहीं।
सिआरिन लज्जित होकर दूर चली गई। उसे भूख और प्यास के कारण इतनी बेचैनी हो रही थी कि दूर जाकर उसने भर पेट खाकर खूब पानी पिया। किन्तु चील रात भर वैसे ही पड़ी रही। परिणाम भी उसी तरह हुआ। चील को जितने बच्चे हुए सभी स्वस्थ, सुन्दर और सदाचारी किन्तु सिआरिन के जितने बच्चे हुए वे थोड़े ही दिनों बाद मरते गए।

इसलिए स्त्रियां व्रतकथा सुनने के बाद यह कामना करती हैं कि चील की तरह सब कोई हों और सिआरिन की तरह कोई नहीं।

-प्रीतिमा वत्स