Wednesday, November 15, 2017

महिमा कालभैरव अष्टमी का


मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी कहा जाता है। कालभैरव जी के जन्मदिवस के रूप में यह तिथि मनाई जाती है। देवताओं की तरह पूजे जानेवाले कालभैरव जी रुद्र के गण हैं, इनकी प्रकृति अत्यंत उग्र तथा क्रोधी है। इनका वाहन कुत्ता है तथा इनके हाथ में त्रिशूल, खड्ग तथा दण्ड रहता है। ये यात्रा तथा युद्धभूमि में सदा उपस्थित रहते हैं। इसलिए आदमी अपने वाहन खरीदने पर भी इनकी पूजा करते हैं। इनका एक नाम दंडपाणि भी है। शैव मतानुयायियों में भैरव-पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। किसी शुभ कार्य में विघ्नों के विनाश तथा रोग-दोष की शान्ति के लिए भैरव का व्रत किया जाता है। कालभैरव के कई अवतार माने जाते हैं, काशी में काल भैरव, बटुक भैरव, आनन्द भैरव, आश भैरव आदि। काशी, मथुरा, दिल्ली, उज्जैन सहित करीब-करीब पूरे देश में इनके मंदिर बने हुए हैं, जहाँ लोग श्रद्धा पूर्वक इतवार और मंगल के दिन जाते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। अपने नए सफर की शुरूआत करनी हो या वाहन पूजा करनी हो अथवा शरीर से किसी प्रकार के जहर का शमन कराना हो, लोग इनकी पूजा जरूर करते हैं। 
काल भैरव अष्टमी पर लोक में एक कथा भी प्रचलित है- एक बार ब्रह्मा जी, विष्णु भगवान, शंकर जी तथा इन्द्र भगवान में परस्पर यह स्पर्धा हुई कि इनमें कौन श्रेष्ठ है। सबलोग अपने को दूसरे से बढ़कर बताने को तुले हुए थे। यही नहीं ब्रह्मा जी शिव की तथा शिव जी ब्रह्मा की निन्दा करने लगे। शिव जी ब्रह्मा की अपमानजनक बातें सुनकर बहुत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने कालभैरव को पैदा किया और उन्हें आज्ञा दी कि ब्रह्मा का एक मुख काट डालो। भैरव ने वैसा ही किया। पंचमुख ब्रह्मा का एक मुख काटकर उन्हें चतुर्मुख बना दिया। ऐसा माना जाता है कि तभी से सभी देवी-देवता भैरव जी से डरते हैं। ये केवल शंकर जी के आज्ञाकारी गण माने जाते हैं। क्रोधी होते हुए भी ये अपने भक्तों की पुकार तुरत सुनते हैं, तथा शुभ फलदायी होते हैं।
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-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, November 8, 2017

शिव मानते ही नहीं

(इस लोकगीत में शिव को मनाने की बात कही जा रही है। किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि मतवाले भोलेनाथ की पूजा किस प्रकार की जाए कि वह मान जाएँ।)
किए लाए शिव के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
बेली-चमेली शिव के मनहूँ न भावे -2
आक-धथूरा कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव के मनाईब हो शिव मानत नाहीं।
पाट-पीताम्बर शिव के मनहूँ न भावे-2
मृगा के छाल कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
मेवा ओ मिश्री शिव के मनहूँ न भावे-2
भांग के गोला कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
गौरा औ संझा शिव के मनहूँ न भावे-2
वन के जोगिनी कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
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अर्थ-
शिव जी को कैसे मनाएं, वो मानते ही नहीं।
बेली चमेली के फूल शिव के मन को नहीं भाते,
आक और धथूरा कहाँ से लाऊँ । शिव मानते ही नहीं।
शिव जी को कैसे मनाएं, वो मानते ही नहीं।
अच्छे-अच्छे वस्त्र, पाट-पीताम्बर उनके मन को नहीं भाते,
मृग के छाल मैं कहाँ से लाऊँ। शिव मानते हीं नहीं।
शिव जी को कैसे मनाएं, वो मानते ही नहीं।
मेवा और मिश्री शिव जी के मन को ही नहीं भाते,
भांग का गोला मैं कहाँ से लाऊँ। शिव मानते ही नहीं।
शिव जी को कैसे मनाएं, वो मानते ही नहीं।
गौरी माँ और संध्या देवी में उनका मन नहीं रम रहा,
वन की योगिनी मैं कहाँ से लाऊँ। शिव मानते ही नहीं।

शिव जी को कैसे मनाएं, वो मानते ही नहीं।

Friday, September 15, 2017

कितने अपने थे वे आँगन



इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।

सुबह की पहली किरण के साथ आँगन के उस अमरूद पेड़ पर चिड़ियों का चहचहाना। दादाजी का आँगन के चबूतरे पर बैठे खाँसते रहना। दादी का सुबह-सुबह नहाकर आँगन में बैठकर रामायण बाँचना। बच्चों की पूरी टीम का आँगन में धमाचौकड़ी मचाना। समय-समय पर महरियों का घर की बहुओं के साथ हाथ नचा-नचाकर लड़ना। जाड़े की दोपहरी में घर के कामों से छुट्टी पाकर पूरे घर का आँगन की गुनगुनी धूप में बैठकर गप्पे मारना। सच कितना अपना लगता था वो आँगन।

बहुत  कुछ जुड़ा है आँगन की यादों से। वो आँगन जो जगह के अभाव में सिमटता चला जा रहा है। जब भी अपने गाँव जाती हूँ और वो बड़ा सा आँगन देखती हूँ जो अब छोटे-छोटे हिस्सों में बँटता हुआ लगभग खत्म हो चुका है,जिसके चारों ओर से मकान बने हुए थे, तो बचपन की बहुत सारी मीठी-मीठी यादें भी ताजा हो जाती हैं। घर के आधे से ज्यादा काम तो अकेले आँगन में ही होता था। कितना सुहावना लगता था जब माँ आँगन के एक कोने में बैठकर चावल चुन रही होती और जाने कहाँ से दो चिड़ियाँ के बच्चे आकर उन फेंके हुए दानों को खाने लगती। माँ भी खुश हो जाती थीं उन चिड़ियों को देखकर। हम सभी भाई-बहनों ने भी तो इसी आँगन के चारों तरफ के दालानों को पकड़-पकड़कर चलना सीखा था। पकड़म-पकड़ाई खेलना हो या लँगड़ी टाँग। कबड्डी खेलना हो या ऊँच-नीच का पापड़ा। हर खेल के लिए सबसे अच्छी जगह ये आँगन ही था।
इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।
कुछ दशक पहले तक जब घर बनाए जाते थे तो हर चीज के साथ घर में आँगन की भी जगह छोड़ी जाती थी। वास्तुशास्त्र के हिसाब से घर को बीचोंबीच आँगन की जगह छोड़ी जाती थी। ऐसा माना जाता था कि घर के बीचों-बीच वास्तुदेवता विश्राम करते हैं और उन्हें खुली जगह बहुत पसंद है। उनकी खुशी से ही घर में सुख-शान्ति बनी रहती है। सुपरिचित वास्तुशास्त्री और ज्योतिषाचार्य पूनम वेदी का कहना है कि घर के आँगन में वास्तुदेवता की छाती होती है। यह पूरे घर का हृदयस्थल माना जाता है। जिस तरह हम अपने दिल में सबको जगह देते हैं और घर के सब लोग एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उसी तरह आँगन भी घर के हर व्यक्ति को एक दूसरे से जोड़े रखने का काम करता है।
आज हमारे आँगन की तरह हमारे दिलों में भी दूसरे व्यक्तियों के लिए जगह खत्म होती चली जा रही है
वास्तुदेवता की उपस्थिति बहस का विषय हो सकती है, लेकिन हर घर में तुलसी के बिरवे के साथ सजता हुआ आँगन कितना उपयोगी होता है,यह हम बचपन से ही देखते आ रहे हैं।
जब हमारे दादाजी का देहांत हुआ था तो इसी तुलसी के बिरवे के पास आँगन में उनके पार्थिव शरीर की रखा गया था। पूरे गाँव के लोग आए थे तब हमारे आँगन में।
जब भी हमारे घर में कोई मन-मुटाव होता, घर के सभी लोग इसी आँगन में आकर लड़ाई-झगड़े करते। एक-दूसरे को भला-बुरा कहते। लेकिन अपनी-अपनी भड़ास निकालने के बाद एक दूसरे का चेहरा देखते हुए कब उनका गुस्सा शान्त हो जाता पता भी नहीं चलता। फिर माँ और चाची मिलकर चाय और पकौड़े से सबको शान्त करतीं थीं। कुछ ही देर बाद सभी हल्के मन से अपने-अपने काम में लग जाते।
परंतु समय हमेशा ऐसा नहीं रहा। पहले आँगन में दीवारें खिंची। फिर धीरे-धीरे आँगन नाम की चीज हीं खत्म होती चली गईं।आज तो माहौल ऐसा हो गया है कि एक ही परिवार में आदमी एक दूसरे से कई दिनों तक नहीं मिल पाते। समय की कमी के साथ इसका एक कारण आँगन का न होना भी है। जरा सी बात पर यदि कुछ मन-मुटाव हो जाता है तो एक-दूसरे से मिलकर हम उसे दूर नहीं करते बल्कि अपने-अपने घरों में बैठे कुढ़ते रहते हैं और मन-मुटाव बढ़ता चला जाता है।
जब काफी दिनों तक माहौल सुधरता नहीं है और बात बिगड़ती चली जाती है तो बहुत याद आता है वह आँगन।
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-प्रीतिमा वत्स

Sunday, August 6, 2017

कृष्ण ने लाज रख ली द्रौपदी के रक्षासूत्र की








इन्द्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया था। सम्पूर्ण आर्यावर्त के सभी जाने-माने राजा इस यज्ञ में आमंत्रित थे। अतिथि सत्कार के बाद अग्रिम पूजा की बारी आई। सबकी सहमति से युधिष्ठिर श्री कृष्ण की अग्रिम पूजा करने आगे बढ़े, ज्योहिं उन्होंने सोने के परात में प्रभु के चरण धोने के लिए रखे। पीछे से चेदि राजा शिशुपाल बहुत ही असभ्य तरीके से गरजता हुआ खड़ा हो गया और श्री कृष्ण के अग्रिम पूजा का विरोध करने लगा। पूरी सभा ने शिशुपाल को समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माना,और कृष्ण का अपमान करता रहा। कृष्ण चुपचाप सुन रहे थे और मन ही मन उसके सौ गलतियों के पूरा होने की प्रतिक्षा कर रहे थे, क्योंकि कृष्ण ने शिशुपाल की माँ को उसके किए सौ गलतियों के लिए माफ करने का वचन दिया था। जिस समय शिशुपाल की सौ गलतियाँ पूरी हो गई, कृष्ण ने कहा , बस शिशुपाल अब और नहीं। तुम्हारी गलतियाँ माफी की पराकाष्ठा पार कर चुकी हैं। क्रोध से काँपते कृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र नाचने लगा। देखते ही देखते चक्र हाथ से निकला और शिशुपाल के सर को धड़ से अलग करता हुआ पुनः कृष्ण की अंगुलियों में समा गया। उसी समय कृष्ण की अंगुली पर द्रौपदी को खून नजर आया। वह घबरा गईं और अपना दुपट्टा फाड़कर कृष्ण की अंगुली पर बाँध दिया।
कृष्ण ने बड़े प्यार से द्रौपदी से कहा, हे कृष्णा मेरी प्यारी बहन आज तुम्हारे प्यार का ऋणी हो गया मैं तो। समय आने पर मैं तुम्हारे इस रक्षासूत्र के एक-एक धागे की कीमत अदा कर दूंगा। जिसे युगों-युगों तक संसार याद रखेगा और आदर्श मानेगा। 

उस वक्त किसी की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन द्रौपदी चीरहरण के समय कृष्ण ने जो किया वह तो सर्वविदित है।

-प्रीतिमा वत्स

Monday, July 17, 2017

लोक में शिव पूजा ( LOK MAIN SHIV POOJA)

worship of god with nature
सृष्टि के प्रत्येक कण की उत्पत्ति तथा समाप्ति जिस शक्ति से होती है वह शिव हैं। अर्थात जो वस्तु सृष्टि के पूर्व हो वही जगत् का कारण है, और जो जगत् का कारण है, वही शिव है। 108 नामों से जाने-जानेवाले शिव सभी देवी-देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं तभी तो इनका एक नाम महादेव भी है।
पवित्र ग्रंथ बाईबिल में भी शिव का वर्णन मिलता है, ईसा मसीह  ने अपना पिता कहकर जिन्हें संबोधित किया है, वह शिव जी ही है। वैसे तो शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है, लेकिन उनके विग्रह  में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। इनके मस्तक पर एक ओर चंद्रमा है तो गले में  सर्प का हार है। वे अर्धनारीश्वर कहे जाते हैं,गृहस्थ हैं फिर भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी रुद्र हैं सृष्टि के विनाश का कारण बनते हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है।
हालाँकि लोक की आस्था 33 करोड़ देवी- देवताओं में है। लेकिन शिव का नाम वहाँ भी सबसे लोकप्रिय है। उनकी लोकप्रियता के, उनके सृष्टि के निर्माण के तथा उनके प्रलयंकारी रूप के अनेक किस्से लोक में प्रचलित हैं जो कई बार पुराणों की कथाओं से भी मेल खाते हैं। उन्हीं कथाओं में एक है -
जब इस धरती का निर्माण हुआ तब यहाँ कोई प्राणी नहीं थे तो
ब्रह्मा जी ने सबसे पहले शिव जी से इस धरती पर प्राणियों की उत्पत्ति करने के लिए कहा । पहले तो शिव जी ने हाँ कर दिया लेकिन प्राणियों में विभिन्न दोषों को देख वे जल में मग्न हो गये तथा चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा जी उनके तप पूरा होने की प्रतीक्षा करते रहे। बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी जब ब्रह्मा जी ने शिव जी को जल में ही पाया तथा सृष्टि का विकास नहीं देखा तो मानसिक बल से प्रजापति को उत्पन्न किया। उस विराट पुरुष ने कहा- 'यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।'
ब्रह्मा जी ने प्रजापति को बताया कि इस संसार में श्रेष्ठ तो केवल शिव हीं हैं लेकिन वह तो चिरकाल से जल में ही डूबे हुए हैं, अतः वह सृष्टि का निर्माण करें। ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रजापति ने चार तरह के प्राणियों का निर्माण किया। सृष्टि होते ही प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से दौड़ी। तब प्रजापति ने ब्रह्मा जी से अपनी संतान के भूख के निवारण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने इस धरती पर तरह-तरह के अनाज, फल, औषधि, जल आदि का निर्माण किया। हिंसक पशुओं के लिए, दुर्बल पशुओं के लिए,पक्षियों आदि के आहार की व्यवस्था की। धीरे-धीरे एक आहार श्रृंखला का निर्माण हो गया। लेकिन इससे भी बात नहीं बनी तो सभी देव आपस में मंत्रणा करने लगे, सूर्यदेव ने एक तरकीब निकाली, 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात बना दी। साथ ही यह व्यवस्था कर दी गई कि रात को कोई भोजन नहीं और सभी विश्राम करेंगे। इससे सृष्टि में थोड़ी सी स्थिरता आई।
शिव जी जब अपनी तपस्या समाप्त कर जल से निकले तो पृथ्वी पर समस्त जीवों को निर्मित देखकर क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा ने पूछा- 'प्रभु इतने समय जल में रहकर आपने क्या किया, और लिंग उत्पन्न कर इस प्रकार क्यों फेंक दिया?'
शिव जी ने कहा- 'मैं इस पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले जीवों की नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान पहले चाहता था, जिस कारण तपस्या कर रहा था। परंतु प्राणियों का निर्माण तो हो चुका है, अतः  इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही।' ब्रह्मा उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाये। सत युग बीत जाने पर देवताओं ने भगवान का भजन करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया । परंतु शिव का क्रोध शांत न होकर तीनों लोकों में प्रलय लाने को आतुर हो गया।
जब देवताओं को भागने का कोई रास्ता नहीं बचा तब उन्होंने वाणी का सहारा लिया। वाणी ने महादेव के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, अत: धनुष उछलकर पृथ्वी पर जा गिरा।
तब सब देवी - देवता हाथ जोड़कर शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने उन सब पर कृपा कर अपना कोप समुद्र में छोड़ दिया । समुद्र में उठने वाला ज्वार शिव जी के क्रोध का हीं अंश माना जाता है।
तब से सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति की उपासना का महीना माना जाता है। पूरे महीने लोग अपनी आस्था और विश्वास के आधार पर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। लोक में यह मान्यता है कि शिव की पूजा किसी भी तरह से की जा सकती है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं इनकी पूजा में।
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- प्रीतिमा वत्स

Friday, July 7, 2017

गुरू पूर्णिमा GURU PURNIMA



विद्या दान के द्वारा हमारे जीवन को सब प्रकार से सार्थक और सुगम करने वाले गुरू का स्थान हिन्दू धर्म में पिता तथा माता से भी बढ़कर आदरणीय तथा पूज्य है। गुरू को ब्रह्मा,विष्णु और महेश्वर से समान देवता समझ कर पूजा करने की पद्धति हिन्दू धर्म की अपनी विशेषता है। 'आचार्य देवो भवः'। आचार्य मनु के अनुसार- विद्या हमारी माता है और आचार्य हमारे पिता हैं।
गुरू तो संपत्ति का ऐसा भंडार हैं जो अपनी ज्ञान रूपी संपत्ति को अपने शिष्यों पर ताउम्र लुटाते रहते हैं। अपने शिष्य से गुरू कुछ भी बचाकर अपने पास नहीं रखना चाहते है। जिस दिन कोई शिष्य सही अर्थों में विद्वान हो जाता है,उसके गुरू की सबसे बड़ी जीत होती है।
गुरू पुर्णिमा उसी गुरू की पूजा करने की पावन तिथि है जो वर्ष में केवल एक बार आती है। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा को गुरू की पूजा का विशेष महत्व है। यों तो हमें प्रतिदिन गुरू की पूजा करनी चाहिए किन्तु इस पूर्णिमा के दिन गुरू के मानव-शरीर में ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, और शंकरत्व की समन्वित शक्ति का समावेश होता है।
गुरू की पूजा का विधान भी कठिन नहीं है। प्राचीन काल में स्नानादि से निवृत होकर शुद्द मन से गुरू की सेवा,आराधना, तथा यथायोग्य उन्हें कुछ दान का विधान था।
लेकिन आज के इस भौतिक वादी युग में जहां हर रिश्ते की परिभाषा ही बदलती जा रही है। गुरू शिष्य की रिश्ता भी अछूता नहीं रहा है। अन्य सम्बन्धों की भांति यह भी अब अर्थ से जुड़ा सम्बन्ध हो गया है। गुरू शिष्य को इसलिए पढ़ाता है क्योंकि उन्हें जीविकोपार्जन के लिए वेतन मिलता है और शिष्य इसलिए गुरू की प्रतिष्ठा नहीं करता कि उसे पूरी फीस देनी पड़ती है अनेक प्रकार की कठिनाईयां उठानी पड़ती है। लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। शिष्य गुरू के आश्रम में प्रवेश करते हीं सारी चिंताओं से मुक्त होकर गुरू का आश्रित हो जाता था। अब उसके शिक्षा से लेकर खान-पान और वस्त्रादि की चिंता गुरू की होती थी। गुरू अपने शिष्यों पर पुत्रवत स्नेह रखकर उनके सर्वतोन्मुखी कल्याण की चिंता करता था। उनके आश्रम में अमीरी-गरीबी का कोई भेद-भाव नहीं था। किन्तु आश्रम और शिष्यों की  चिंता गुरू की व्यक्तिनिष्ठ नहीं थी। एक आचार्य का आश्रम समाज की चेतना का केन्द्रबिन्दु था। बड़े-बड़े राजा- महराजा से लेकर सेठ साहुकार तक इस बात की प्रतिक्षा करते रहते कि गुरू उन्हें भी अपने आश्रम तथा शिष्यों की सेवा का कुछ अवसर देंगे।
लेकिन आज के दौर में ऐसा कतई नहीं है। अब तो गुरू और शिष्य का रिश्ता भी करीब-करीब वैसा ही हो गया है, जैसे कि एक व्यापारी और खरीददार का होता है। पैसे दो और ज्ञान का पैकेज खरीदो। जितना पैसा दोगे पैकेज उतना अच्छा माना जाएगा। अच्छे अंकों से पास हो जाओगे तो अच्छी नौकरी मिलेगी,और अच्छी नौकरी मिलेगी तभी समाज में प्रतिष्ठा पा सकोगे।
इस आपाधापी में आगे निकलने की होड़ इतनी बढ़ गई है कि रिश्तों की मर्यादा को हम भूलते चले जा रहे हैं। गुरू-शिष्य के पवित्र रिश्ते को भी बाजार में खरीद-फरोख्त की चीज बना दी गई है, जिसपर हमारे पूरे समाज को आज विचार करने की जरूरत है। इस मर्यादा को पुनः कायम करने की जरूरत है।
- प्रीतिमा वत्स

Thursday, November 3, 2016

शक्ति साधना ऐसे भी SHAKTI SADHNA AISE BHI


आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
विश्व में बहुत सी जातियां हैं। ढेर सारे संप्रदाय हैं।कई धर्म हैं। विभिन्न भाषाएं हैं। बहुत से धार्मिक ग्रंथ हैं। इतना ही नहीं हर धर्म-संप्रदाय और जातियों में पूज्यनीय भावनाओं के आधार पर देवी-देवताओं की कल्पना की गयी है। ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, गॉड, परमात्मा आदि नामों से ब्रह्म को, खुदा को पुकारा जाता है। किंतु यह जितने नाम हैं वे भाषा के आधार पर दिए गए हैं। यह बहस बहुत पुरानी पड़ गयी कि इस संसार को चलाने वाला कोई है ? इसका उत्तर सभी निकाल चुके हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो इस सृष्टि के कण-कण का ठीक-ठीक समयानुसार चालन करती है। हम उसे गॉड कहें, खुदा कहें, परमात्मा कहें, ज्योति कहें, प्रकाश कहें या ज्ञान कहें।
परंतु इस बात को सभी धर्मों में माना गया है कि कोई तो अदृश्य शक्ति है जो हम सबको पैदा करती है,पोषण करती है और अंत में स्वरुप परिवर्तन कर देती है या विनष्ट कर देती है। भले ही यह शक्ति हमें दिखाई नहीं देती परंतु हमें उसका ज्ञान होता है। हम अपनी उपासना से उस शक्ति को महसूस कर सकते हैं। अपनी ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं।
उसी शक्ति को हम निर्गुण रूप में मानें तो शक्ति और सगुण रूप में मानें तो जगदंबिका अर्थात् जगत जननी हैं।
सर्व देव मयी देवी सर्व देवीमयं जगत।
अतोSहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।
सतयुग,त्रेता और द्वापर से लेकर आज के इस युग में भी देवी अपने भक्तों पर समान रूप से प्रसन्न होती रही हैं। परंतु हर युग की मांग अलग-अलग थी। पहले व्यक्ति, ईश्वर की शरणणागति मांगता था, भक्ति मांगता था और मुक्ति की इच्छा करता था। परंतु आज के युग में भौतिकता, सांसारिकता का मोह फंसा हुआ व्यक्ति जब साधना करता है तो उसकी साधना भी स्वार्थपूर्ण हो गयी है। फिर भी मां भगवती अपने भक्तों के स्वार्थ को पूर्ण करने की कृपा करती हैं जो उन्हें हृदय से पुकारता है उस पर प्रसन्न होकर उसे उसका मनचाहा सुख प्रदान करती हैं। शीघ्र ही सिद्धि देती हैं।
इसीलिए कहा गया है कि कलयुग में मां रूप में देवी की शक्ति की उपासना शीघ्र अभीष्ट फल देती है। क्योंकि आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
शक्ति साधना कई प्रकार से की जाती रही है। वैदिक शक्ति साधना,तांत्रिक शक्ति साधना और भक्ति मार्गीय शक्ति साधना।
उपरोक्त साधनाओं में सांसारिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को भक्ति मार्ग की साधना को अपनाना चाहिए। साधारण मनुष्य वैदिक तथा तांत्रिक विधि से देवी की न उपासना कर सकता है, न साधना कर सकता है। ये दोनों मार्ग कठिन एवं तपस्या करने के समान है। अतः खुद को मां का बेटा मानकर भक्त मानकर, सेवक, दास, पुजारी मानकर शक्ति उपासना करना चाहिए। शक्ति को यदि शक्ति भी न मानें , केवल मां माने, स्वामिनी माने तो सर्वश्रेष्ठ साधना होगी।
देवी के किसी भी रूप-नाम को या हर रूप-नाम को माता के समान पूजे, मां मानकर उपासना करें तो मानव का पूर्ण कल्याण मां के हाथों निश्चय है। वो अपने भक्तों की सच्ची पुकार की इस कलयुग में भी अनसूना नहीं कर सकती हैं।
जो शक्ति,ब्रह्मा,विष्णु और महेश आदि समस्त देवताओं की मां हैं जिनसे सारी सृष्टि का जन्म हुआ है वही शक्ति हमारी भी मां है और मां कभी अपने बालक का बुरा नहीं सोच सकतीं, वह सदैव अपने बेटों का हित चिंतन ही करेगी। अतः उसी मां की साधना उपासना हमें करनी चाहिए।
-प्रीतिमा वत्स

महिमा कालभैरव अष्टमी का

मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी कहा जाता है। कालभैरव जी के जन्मदिवस के रूप में यह तिथि मनाई जाती है। देवता...