
बिहार के मिथिला तथा सम्पूर्ण मैथिली समाज में शादी के मंडप के साथ-साथ कोहबर का भी बड़ा हीं महत्व है। कोहबर ही वह जगह होती है जहां शादी की रात दुल्हे के द्वार लगने से पहले तक दुल्हन गौरी मां की पूजा करती है। गणपति जी की चित्रकारी से शुरु होकर तरह-तरह के बेल-बूटे से सजाया जानेवाला कोहबर जितना सुन्दर लगता है उतना ही गूढ़ अर्थ भी रखता है। गणपति भगवान विघ्नहर्ता माने जाते हैं इसलिए इनकी तस्वीर कोहबर के बीच में बनाई जाती है। इसके बाद बांस का झुरमुट बनाया जाता है। बांस बहुत जल्दी बढते हैं तथा इसका मूल जल्दी नष्ट नहीं होता है। इसे आधार मानकर नवदम्पत्ति के सुखद वंश वृद्धि की कामना की जाती है। बांस के बाद कमल के फूल और पत्तों को बनाया जाता है। कमल कीचड़ में खिलकर भी बेहद खूबसूरत होता है। इसके पत्तों पर पानी की एक बूंद भी ठहर नहीं पाती है। इस फूल की विशेषता के आधार पर नवदम्पत्ति के सुखद जीवन की कामना की जाती है। जिन्दगी के उतार-चढ़ाव के बीच भी ये कमल की तरह दमकते रहें ऐसी कामना की जाती है। कोहबर में मंगल कलश का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है।
कोहबर में प्रथम प्रजापति माना जानेवाला तितली भी अवश्य ही चित्रित किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के फूल तथा चिड़ियां भी बनाए जाते हैं। जो अपना-अपना विशेष महत्व लिए हुए होते हैं।
-प्रीतिमा वत्स
कोहबर में प्रथम प्रजापति माना जानेवाला तितली भी अवश्य ही चित्रित किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के फूल तथा चिड़ियां भी बनाए जाते हैं। जो अपना-अपना विशेष महत्व लिए हुए होते हैं।
-प्रीतिमा वत्स






