Thursday, November 3, 2016

शक्ति साधना ऐसे भी SHAKTI SADHNA AISE BHI


आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
विश्व में बहुत सी जातियां हैं। ढेर सारे संप्रदाय हैं।कई धर्म हैं। विभिन्न भाषाएं हैं। बहुत से धार्मिक ग्रंथ हैं। इतना ही नहीं हर धर्म-संप्रदाय और जातियों में पूज्यनीय भावनाओं के आधार पर देवी-देवताओं की कल्पना की गयी है। ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, गॉड, परमात्मा आदि नामों से ब्रह्म को, खुदा को पुकारा जाता है। किंतु यह जितने नाम हैं वे भाषा के आधार पर दिए गए हैं। यह बहस बहुत पुरानी पड़ गयी कि इस संसार को चलाने वाला कोई है ? इसका उत्तर सभी निकाल चुके हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो इस सृष्टि के कण-कण का ठीक-ठीक समयानुसार चालन करती है। हम उसे गॉड कहें, खुदा कहें, परमात्मा कहें, ज्योति कहें, प्रकाश कहें या ज्ञान कहें।
परंतु इस बात को सभी धर्मों में माना गया है कि कोई तो अदृश्य शक्ति है जो हम सबको पैदा करती है,पोषण करती है और अंत में स्वरुप परिवर्तन कर देती है या विनष्ट कर देती है। भले ही यह शक्ति हमें दिखाई नहीं देती परंतु हमें उसका ज्ञान होता है। हम अपनी उपासना से उस शक्ति को महसूस कर सकते हैं। अपनी ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं।
उसी शक्ति को हम निर्गुण रूप में मानें तो शक्ति और सगुण रूप में मानें तो जगदंबिका अर्थात् जगत जननी हैं।
सर्व देव मयी देवी सर्व देवीमयं जगत।
अतोSहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।
सतयुग,त्रेता और द्वापर से लेकर आज के इस युग में भी देवी अपने भक्तों पर समान रूप से प्रसन्न होती रही हैं। परंतु हर युग की मांग अलग-अलग थी। पहले व्यक्ति, ईश्वर की शरणणागति मांगता था, भक्ति मांगता था और मुक्ति की इच्छा करता था। परंतु आज के युग में भौतिकता, सांसारिकता का मोह फंसा हुआ व्यक्ति जब साधना करता है तो उसकी साधना भी स्वार्थपूर्ण हो गयी है। फिर भी मां भगवती अपने भक्तों के स्वार्थ को पूर्ण करने की कृपा करती हैं जो उन्हें हृदय से पुकारता है उस पर प्रसन्न होकर उसे उसका मनचाहा सुख प्रदान करती हैं। शीघ्र ही सिद्धि देती हैं।
इसीलिए कहा गया है कि कलयुग में मां रूप में देवी की शक्ति की उपासना शीघ्र अभीष्ट फल देती है। क्योंकि आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
शक्ति साधना कई प्रकार से की जाती रही है। वैदिक शक्ति साधना,तांत्रिक शक्ति साधना और भक्ति मार्गीय शक्ति साधना।
उपरोक्त साधनाओं में सांसारिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को भक्ति मार्ग की साधना को अपनाना चाहिए। साधारण मनुष्य वैदिक तथा तांत्रिक विधि से देवी की न उपासना कर सकता है, न साधना कर सकता है। ये दोनों मार्ग कठिन एवं तपस्या करने के समान है। अतः खुद को मां का बेटा मानकर भक्त मानकर, सेवक, दास, पुजारी मानकर शक्ति उपासना करना चाहिए। शक्ति को यदि शक्ति भी न मानें , केवल मां माने, स्वामिनी माने तो सर्वश्रेष्ठ साधना होगी।
देवी के किसी भी रूप-नाम को या हर रूप-नाम को माता के समान पूजे, मां मानकर उपासना करें तो मानव का पूर्ण कल्याण मां के हाथों निश्चय है। वो अपने भक्तों की सच्ची पुकार की इस कलयुग में भी अनसूना नहीं कर सकती हैं।
जो शक्ति,ब्रह्मा,विष्णु और महेश आदि समस्त देवताओं की मां हैं जिनसे सारी सृष्टि का जन्म हुआ है वही शक्ति हमारी भी मां है और मां कभी अपने बालक का बुरा नहीं सोच सकतीं, वह सदैव अपने बेटों का हित चिंतन ही करेगी। अतः उसी मां की साधना उपासना हमें करनी चाहिए।
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, June 8, 2016

पुत्रदा देवी षष्ठी की उपासना विधि Shashti Devi ki Upasana.

मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण ये षष्ठी देवी कहलाती हैं। बालकों की ये अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें विष्णु माया और बालंदा भी कहा जाता है। मातृकाओं में देवसेना के नाम से ये प्रसिद्ध हैं। उत्तम व्रत का पालन करनेवाली इन साध्वी देवी को स्वामी कार्तिकेय की पत्नी होने का सौभाग्य प्राप्त है। बालकों को दीर्घायु बनाना तथा उनका भरण-पोषण एवं रक्षण करना इनका स्वाभाविक गुण है। ये सिद्ध योगिनी देवी अपने योग के प्रभाव से बच्चों के पास सदा विराजनाम रहती हैं। लोक जीवन में इनकी पूजा अर्चना विधि-विधान के साथ की जाती है। पूजा के साथ कथा भी प्रचलित है।

प्रियव्रत नाम के एक राजा थे उनके पिता का नाम था स्वायंभुव मनु। प्रियव्रत योगीराज होने के कारण विवाह नहीं करना चाहते थे। तपस्या में उसकी विशेष रुचि थी। परंतु ब्रह्मा जी की आज्ञा से उन्होंने विवाह कर लिया। विवाह के बाद दीर्घकाल तक उन्हें कोई संतान न हो सकी। तब कश्यपजी ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। राजा की प्रेयसी भार्या का नाम मालिनी था। मुनि ने उन्हें प्रसाद प्रदान किया। प्रसाद को खाने के बाद रानी मालिनी गर्भवती हुई, परंतु उन्हें एक मृत संतान की प्राप्ति हुई। जिसे देखकर राजा- रानी के साथ-साथ नगर के सभी लोग अति दुखी हो गये।

राजा प्रियव्रत उस मृत बालक को लेकर श्मशान घाट गये। उस एकांत भूमि में राजा पुत्र को सीने से लगाकर विलाप करने लगे। इतने में वहां एक दिव्य विमान दिखाई दिया। तेज से जगमगाते हुए उस विमान में माता षष्ठी विराजमान थी। उन्होंने राजा के समक्ष आकर अपना परिचय दिया।
स्वाभाव से नरमदिल राजा ने उस देवी की पूजा अर्चना की, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उसके पुत्र को जीवित कर दिया और साथ हीं यह भी कहा कि यदि तुम मेरी पूजा अर्चना नियमित करोगे तथा प्रजा से करवाओगे तो तुम्हें एक सर्वगुण संपन्न पुत्र और पैदा होगा, जिसका नाम सुव्रत होगा। वह नारायण का कलावतार तथा प्रधान योगी होगा। उसे पूर्व जन्म की सारी बातें याद रहेंगी। सभी उसका सम्मान करेंगे। त्रिलोक में उसकी कीर्ति फैलेगी। जो व्यक्ति भी मन से मेरी पूजा अर्चना करेंगे उनके घर में सुख-शान्ति बनी रहेगी। उनके बच्चे हमेशा स्वस्थ रहेंगे।

राजा ने देवी की सारी बातें मान लीं और खुशी-खुशी अपने घर आ गया। उनकी पूजा अर्चना में मन लगाने लगा तथा अपने नगरवासियों को भी उनकी पूजा करने के लिए कहता। देवी की कृपा से राजा के घर में एक सर्वगुण संपन्न पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम राजा नें देवी के आदेशानुसार सुव्रत रखा। जो बाद में चलकर बड़ा ही प्रतापी राजा बना। तब से प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवती का महोत्सव मनाया जाने लगा।
आज भी देश के कई हिस्सों में हमारे समाज में कमोवेश इस पूजा का प्रचलन है।

-प्रीतिमा वत्स






Tuesday, November 17, 2015

सूर्य को नमस्कार


चारों तरफ ढोल -बाजों का आवाजें हैं। लाउडस्पीकर पर भोजपूरी भाषा में शारदा सिन्हा की आवाज में कहीं पर,
ले ले अइहो हो भइया गेहूँ के मोटरिया..., आ गइले हो उजे छठ के बरतिया।
अबके बरस में महंगा भइले गेहुँआ......., छोड़ी दही गे बहिना छठ के बरतिया।।
तो कहीं पर-
पान सुपाड़ी,परसाद लेने खाड़ छईं, उगहो सुरुज देव अरग के बेर। हो अरग के बेर।।
जैसे गीतों से वातावरण गुंजायमान हो रहा है। हर गली से झुंड में सजे हुए नर-नारी तथा उछलते कूदते बच्चे किसी जलाशय की तरफ चले जा रहे हैं। समवेत स्वर में लोकप्रिय भक्ति संगीत गाते हुए लोगों के छोटेछोटे समूह प्रत्येक घर से निकलते हैं और नदी तट तक पहुँचतेपहुँचते ये जुलूस एक विशाल जनसमूह का रूप ले लेते हैं। जी हाँ ............यह छठ पूजा का उत्सव है। जो बिहार,झारखंड,उत्तरप्रदेश तथा उससे सटे हुए कुछ इलाकों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हाल के कुछ वर्षों में इस पर्व की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। लोक पर्व से यह अब एक महापर्व हो चला है।
कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथी को छठ का पर्व मनाया जाता है। बिहार, झारखंड ,नेपाल की तराई तथा उत्तप्रदेश में यह पर्व सदियों से मनाया जाता रहा है। सूर्य भगवान को समर्पित यह व्रत स्त्रियाँ अपने पति व बच्चों की सलामती तथा स्वास्थ्य की कामना से करती हैं। कुछ इलाके में इस व्रत को पुरूष भी करते हैं । इस व्रत को करने का विधान भी बड़ा रोचक है। प्रौढ़ विवाहित स्त्रियाँ ही सभी तैयारियाँ करती हैं। एक ओर आयु में कम स्त्रियाँ व बच्चे घर के अन्य कार्यों का सम्भालती हैं, दूसरी ओर प्रौढ़ स्त्रियाँ उन वस्तुओं की भलीभाँति सफ़ाई-धुलाई करती हैं, जिनका प्रयोग पूजा, प्रसाद में होता है। सभी वस्तुओं की चाहे वह रसोई का चूल्हा हो, करछुल हो, पकाने में प्रयोग आने वाली पकड़ हो या भूनने का पात्र-सबकी पूरी तरह से सफ़ाई की जाती है। नये पीसे हुए चावलों की लेई बनाई जाती है। सूखा मेवा व नारियल के टुकड़ों को स्वाद बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है। इनको आटे में मिला कर लड्डू बनाए जाते हैं। पारम्परिक व्यंजन 'ठेकुआगेहूँ के मड़े हुए आटे को विभिन्न आकारों में काटकर बनाया जाता है। इसके लिए काष्ठ के साँचों का भी प्रयोग किया जाता है। तत्पश्चात इसे गाढ़े भूरे रंग का होने तक तला जाता है। इस प्रसाद को बनाने के लिए गृहस्थ प्रौढ़ महिला कुछ नियमों का पालन करती है। जैसे- वह पका हुआ खाना नहीं खाती तथा सिले हुए वस्त्र नहीं पहनतीं। रसोई में जाने से पहले प्रत्येक व्यक्ति का स्नान करना आवश्यक होता है।
यह व्रत चार दिन का होता है। पहले दिन व्रती सेंधा नमक में बना लौकी और चावल खाते हैं। शायद इसलिए इस दिन का नाम ही लौकी भात रख दिया गया है। दूसरे दिन डूबते सूर्य को अर्ध्य देकर खीर,पूड़ी,केला और गुड़ का भोग लगाकर वही एक बार रात को खाते हैं। इस दिन का नाम खड़ना है। तीसरे दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत होकर व्रती एक दिन-रात का निर्जल व्रत रखते है। संध्या के समय किसी नदी या सरोवर के पास जाकर अस्त होनेवाले सूर्य की विधिवत पूजा करते हैं कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है।  सूप में नारियल, सेब, नारंगी आदि मौसमी फलों के साथ विभिन्न प्रकार के पकवान सूर्य भगवान को चढ़ाए जाते हैं। जलाशय के किनारे गन्ने,केले तथा अदरक के पौधे से गेट सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद व्रर्ती अपने-अपने घर चले आते हैं। तथा रातभर जागकर हर पहर उठ-उठकर सूर्य की अराधना करते हैं। सूर्योदय होने पर स्नान करके सूर्य भगवान को नियम पूर्वक अर्ध्य प्रदान करते हैं और ब्राह्मणों को दान देते हैं,सुहागनों की मांग भरकर उन्हे आंचल में प्रसाद देते हैं, तब पारण करते हैं। कहीं- कहीं हवण का भी विधान है।

    छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्‍य इस परंपरा में है। छठ पर्व के पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है। छठ पर्व के पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है।
एक लोक मान्यता के अनुसार छठ के व्रत के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोक की माने तो कहा तो यह भी जाता है कि सूर्यदेव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। 
परंपरओं और मान्यताओं के साथ-साथ छठपर्व अत्यन्त रंगबिरंगा उत्सव है, जिसमें श्रद्धालुओं को नये वस्त्र धारण करना आवश्यक होता है। घर व नदी के तट पर संगीत के सुर भक्ति व लोकभाषा से महक उठते हैं।  लाखों लोग गंगा के तट पर मीलों लम्बी कतारों में बैठे रहते हैं।कई बार तो देखा गया है कि बचपन की बिछड़ी सहेलियां इस पवित्र गंगातट पर प्रौढ़ावस्था में मिल जाती हैं। कभी-कभी लड़के,लड़कियों की शादियां इस भीड़ में तय हो जाती हैं। पर्व से उत्पन्न यह आपसी मेलजोल अनूठा ही प्रतीत होता है।
स्थान बदलने से लोक कथाएं बदल जाती हैं, कुछ बेसिक नियमों में फेर बदल हो जाता है, लेकिन इस पर्व के मूल में जो बात है, श्रद्धा है, उसमें लेशमात्र भी कमी नहीं आती। सदियों से चलते आ रहे ये लोक उत्सव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वतः हस्तांतरित होती रहती है, और निर्बाध गति से चलती आ रही है।

 -प्रीतिमा वत्स
 फोटोग्राप्स - नेट से साभार

Wednesday, September 2, 2015

पहाड़ से ऊंचा आदमी Dashrath Manjhi.



शाम का वक्त था। रोज की तरह मिहिर अपने बाबा के साथ घूमने निकला था। मिहिर को अपने बाबा के साथ घूमना बहुत अच्छा लगता था। क्योंकि उसे सवाल पूछने की आदत थी और घर भर में बाबा ही ऐसे थे जो उसके हर सवाल का जवाब देते थे। आज अचानक चलते-चलते मिहिर ने पूछ लिया-बाबा कोई आदमी पहाड़ से भी ऊंचा हो सकता है क्या? उसके गाव से बहुत दूर खड़े एक विशाल पहाड़ को ही देखकर मिहिर के मन में यह सवाल उठा था। मिहिर की बातों को सुनकर उसके बाबा पहले तो मुस्कुराए, फिर सुस्ताने के लिहाज से पास की एक पुलिया पर बैठ गए। मिहिर भी उनके साथ जाकर बैठ गया-बताओ न बाबा कोई आदमी पहाड़ से भी ऊंचा हो सकता है क्या?
बाबा ने मिहिर के बालों को सहलाते हुए कहा-लंबाई में तो कोई आदमी पहाड़ से ऊंचा नहीं हो सकता, लेकिन कई लोग ऐसे हुए हैं, जिनका कद पहाड़ से भी ऊंचा है।
मिहिर को बात समझ में नहीं आई-ऐसा कैसे हो सकता है?
बाबा ने बताना शुरु किया-अपने काम से कई लोग पहाड़ से भी बड़े साबित हुए हैं जैसे कि गया के दशरथ मांझी।
मिहिर को अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था तो वह फिर पूछ बैठा -दशरथ मांझी कौन थे और उनका कद पहाड़ से ऊंचा कैसे हो गया?
अब बाबा ने बिस्तार से बताना शुरु किया-बिहार के गया जिले के एक छोटे से गांव गहलौर में दशरथ मांझी पैदा हुए थे। लोगों के पास जीने का एकमात्र जरिया खेती-बारी। गहलौर गांव एक पहाड़ी से घिरा हुआ है। गांव से बाहर निकलने या उस गांव में जाने के लिए उस पहाड़ी को पार करना जरूरी था। उसी गांव में अपनी जिंदगी जीते, खेती-बारी करते दशरथ मस्त थे। वह अक्खड़ भी थे और फक्कड़ भी। कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन कबीर को खूब सुना कबीर को खूब गाया। अपने गांव के अपने कबीर थे दशरथ मांझी
आठवीं क्लास में महान कवि कबीर को पढ़ चुके मिहिर को अब इस कहानी में मजा आने लगा। वह चहक उठा और गौर से बाबा को सुनने लगा-दशरथ हमेशा दूसरों की भलाई की बातें किया करते थे। लेकिन गांव के लोगों को कम ही फुरसत थी कि वे दशरथ को सुनें। लेकिन अचानक एक छोटी सी घटना ने दशरथ की पूरी जिंदगी ही बदल दी। जीने का मकसद बदल दिया।
फिर क्या हुआ बाबा, मिहिर पहाड़ से भी ऊंचे आदमी के बारे में जानने को बेताब था।
बाबा ने कहानी आगे बढ़ाई-दोपहर का वक्त था। दशरथ मांझी पहाड़ी के उस पार खेतों में काम कर रहे थे। हर रोज की तरह उनकी पत्नी फागुनी देवी उनके लिए भोजन और पानी ले के आ रही थीं। वह अभी पहाड़ी पर चढ़ ही रही थी कि अचानक उनका पांव फिसल गया। वह गिर गईं। उनके पांवों में चोट भी लगी और वह बुरी तरह घायल हो गई। जब तक दशरथ मांझी को बात पता चली और वह भागते-भागते वहां तक पहुंचते तो काफी देर हो चुकी थी। इसके बाद भी सबके सामने समस्या ये थी कि जख्मी हालत में फागुनी देवी को किसी डॉक्टर के पास कैसे पहुंचाया जाए। गांव से सबसे नजदीक का कस्बा लगभग साठ किलोमीटर दूर था और उसपर भी कई किलोमीटर तक पहाड़ की चढ़ाई। घर में जो भी उपचार संभव था,उससे किसी तरह फागुनी देवी की जान तो बच गई, लेकिन दशरथ मांझी बैचेन हो गए।
ऐसा क्यों बाबा, उनकी पत्नी की जान तो बच गई,मिहिर को बाबा की इस कहानी में रस आने लगा था।
बाबा ने एक लंबी सांस ली और बताना शुरु किया-दशरथ मांझी इसलिए बैचेन हो उठे क्योंकि उन्हें सिर्फ अपनी पत्नी की चिंता नहीं थी, उन्हें पूरे गांव की फिक्र थी। इस एक छोटी सी घटना ने दशरथ मांझी के पूरे जीवन को ही बदल दिया। उन्होंने ठान लिया की इस पहाड़ी को काट कर के आने-जाने लायक रास्ता बनाना है। एक ऐसा रास्ता जो न सिर्फ शहर की दूरी को ही कम कर दे, बल्कि लोगों की यात्रा को आसान भी बना दे।
फिर दशरथ मांझी ने क्या किया बाबा, मिहिर सब कुछ जान लेना चाहता था।
बाबा थोड़ी देर रूके, मानो पुरानी कहानी को याद कर रहे हों फिर कहना शुरु किया-दशरथ मांझी ने तय कर लिया कि वह पहाड़ को काटकर गांव वालों के लिए रास्ता बनाएंगे। एक हथौड़ी ....एक छेनी ...और एक तसला ले कर जुट गया वह आदमी अपने काम में। शुरू में तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। गाव के लड़के बोले, सनकी हो गए हैं दशरथ मांझी। किसी ने कहा कि यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था। उस समय तो देवता भी यहां रहते थे। उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया, अब कलयुग में आप क्यों यह पागलपन कर रहे हैं। पत्नी ने उन्हें झिड़का था- तुम पागल हुए हो क्या? तुम्हीं को चिंता है रास्ता बनाने की? और फिर यह दरार तो तबसे है, जबसे यह धरती बनी. पागल मत बनो, चुपचाप जाकर खेतों में काम करो. तब वह हंस कर रह जाते. पिता ने समझाना चाहा, तब उन्होंने कहा था- आज तक हमारा खानदान मजदूरी करता रहा है. मजदूरी करते-करते लोग मर गये. खाना, कमाना और मर जाना. इतना ही तो काम रह गया है. सिर्फ यह एक काम है जो मैं अपने मन से करना चाहता हूं. आप लोग मुझे रोकिए मत, करने दीजिए. उनका काम जारी रहा। वह लगे रहे...बस लगे रहे। और दो चार दिन या महीना दो महीना नहीं, पूरे 22 साल अकेले लगे रहे।
इस बीच गांव वालों को कौतूहल तो होता था। कुछ लोग आते थे कभी-कभी देखने। बाद में कुछ लोगों ने दशरथ मांझी को छेनी-हथौड़ी वगैरह देना शुरू कर दिया।
अपनी तरफ से पूरे 22 साल वह अकेले लगे रहे।
22 साल, मिहिर को एक झटके में तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि 22 साल तक एक आदमी पहाड़ों को काटता रहा। बाबा
थोड़ी देर के लिए रूके और फिर बताना शुरु किया-22 सालों में न जाने कितनी तरह की बातें दशरथ को सुननी पड़ीं, लेकिन
एक अच्छी पत्नी की तरह फागुनी  दिन में दो बार उनका खाना पानी ले कर जरूर आती थी।
और अंत में 22 साल बाद उस आदमी का सपना पूरा हुआ जब उसने उस पहाड़ी की छाती चीर के 360 फुट ( 110 मीटर ) लम्बा , 25 फुट (7 .6 मीटर ) गहरा और 30 फुट ( 9 .1 ) मीटर चौड़ा रास्ता बना डाला । एकदम निपट अकेले । बिना किसी सहायता के । बिना किसी प्रोत्साहन के और बिना किसी प्रलोभन के। वह आदमी पूरे 22 साल लगा रहा। न दिन देखा न रात। न धूप देखी, न छाँव। न सर्दी न बरसात। वहां न कोई पीठ ठोकने वाला था। न शाबाशी देने वाला। उलटे गांव वाले मजाक उड़ाते थे। कभी-कभी तो घऱवाले भी हतोत्साहित करते थे। 22 साल तक वह आदमी अपना काम-धाम छोड़ के लगा रहा। अरे! कहीं किसी के खेत में काम करता तो पेट भरने लायक अनाज या मजदूरी तो पाता? फिर भी वह लगे रहे। उस सुनसान बियाबान में।
.......और एक बात बता दूं मिहिर! बाबा खुद इस कहानी में डूबे हुए थे-गर्मियों में उस जगह का तापमान 50 डिग्री तक पहुँच जाता है। और 22 साल बाद, जब वह सड़क या यूं कहें कि रास्ता बन कर तैयार हो गया तो उस इलाके के और गांव के लोगों को अहसास हुआ कि क्या गजब हो गया। गहलौर से वजीरगंज की दूरी जो पहले 60 किलोमीटर होती थी अब सिर्फ 10 किलोमीटर रह गयी है। बच्चों का स्कूल, जो 10 किलोमीटर दूर था, अब सिर्फ 3 किलोमीटर रह गया है। पहले अस्पताल पहुँचने में सारा दिन लग जाता था। उस अस्पताल में अब लोग सिर्फ आधे घंटे में पहुँच जाते हैं । आज उस रास्ते को उस इलाके के 60 गांव के लोग इस्तेमाल करते हैं।
मिहिर को यकीन नहीं हो रहा था कि यह गप्प है या हकीकत, लेकिन बाबा कह रहे हैं तो सच ही होगा, यह सोचकर मिहिर को भरोसा हुआ। अब उसे यह जानना था कि रास्ता बन जाने के बाद दशरथ मांझी को कैसा लगा?
बाबा बोले-यह बात १९६० की है। 19 82 में जाकर वह रास्ता तैयार हुआ। इस अजूबे का बाद दुनिया उन्हें माउन्टेन कटर के नाम से पुकारने लगी। रास्ता तो बन गया, लेकिन इस काम को पूरा होने के पहले उनकी पत्नी का देहांत हो गया। मांझी ने अपना पसीना बहाकर असंभव सा लगने वाला काम संभव कर दिखाया। उन्हें सम्मान मिला। उनके नाम से पुरस्कार बंट रहे हैं। 17 अगस्त 2007 को कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई लेकिन लोगों के दिलों में आज भी दशरथ मांझी जिंदा हैं, जिन्होंने सामान्य जीवन जीते हुए अपने कर्मों से इतिहास में खुद को स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया।  हम सभी को उस कर्मयोगी से प्रेरणा लेनी चाहिए! यह कहकर बाबा ने एक गहरी सांस ली।
अब बाबा की बातों से मिहिर को समझ में आ गया था कि पहाड़ से ऊंचे आदमी कैसे होते हैं। 
- Pritima Vats.
- Photographs- Internet.




   

Sunday, August 30, 2015

दशरथ मांझी The mountain man Dashrath Manjhi.

फिल्म की अपनी सीमा होती है, इसलिए केतन मेहता ने फिल्म में दिखा दिया कि पहाड़ से गिरकर दशरथ मांझी की पत्नी की मौत हो गयी थी, जबकि सच यह है कि सिर्फ उनका घड़ा फूटा था. फिल्म सड़क बनने के आगे विस्तार नहीं ले पायी. फिल्म में हम दशरथ मांझी के कबीरपंथी रूप को नहीं देख पाये.








बाद के दिनों में दशरथ मांझी कबीरपंथी हो गये थे और वे नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाने लगे थे. इसके अलावा उन्होंने साफ-सफाई को भी लेकर अभियान शुरू किया था. अपने समाज के लोगों से वे लगातार अनुरोध करते थे कि गंदगी के बीच में न रहें. घर के आसपास साफ-सुथरा माहौल बसायें. मगर लोग नहीं माने. ऐसे में वे अपने भाइयों के साथ गेहलोर मुख्य बस्ती से एक-डेढ़ किमी दूर आकर बस गये. जिस टोले को कुछ ही साल पहले दशरथ नगर का नाम दिया गया है.

2012 के दिसंबर में मैं वहां गया था. वहां यह देखकर मैं हैरान रह गया कि जो टोला दशरथ मांझी ने साफ-सफाई की जिद की वजह से बसाया था वह काफी गंदा था. लोग फिर से गंदगी के आसपास रहने लगे थे. उस टोले में भी मुझे कई लोग नशे के आदी मिले. यानि महज पांच साल में लोग दशरथ मांझी की सीख को भूलने लगे थे. हालांकि उनका पुत्र इन व्यसनों से दूर लगता था. मगर उसे उम्मीद रहती है कि दशरथ मांझी के नाम पर सरकार को जितनी सहायता देनी चाहिये थी वह नहीं दी गयी है.
उस टोले में कुछ सरकारी हैंडपंप लगे थे, मगर वाशर खराब होने की वजह से बंद पड़े थे और लोग गंदे कुएं का पानी पीने को विवश हो गये थे. मैंने उनसे पूछा कि आप लोग उस दशरथ मांझी के वंशज हो जिसने पहाड़ तोड़कर रास्ता बना दिया, मगर आप हैंडपंप का वाशर तक नहीं बदल सकते और गंदा पानी पी रहे हो. मुझे लगा कि लोगों को मेरी यह बात पसंद नहीं आयी.  
Report- Pushyamitra, Photographs- Pushyamitra.
Presented by - Pritima vats.

Saturday, August 23, 2014

Experiment with Manjusha painting. (रग मंजूषा कला के)

Manjusha painting is the form that mirrors the myth and feelings of eastern Bihar(India). The Manjusha art is also associated with a religious festival of Ang Janpath- the Bihla Bishari worship and the folk tale related with it. That painting is fairly popular form of art, is an accepted fact. One only has to remind oneself of M.F. Husain and his recent paintings to understand what heights it can achieve. But the rural people of Bihar do not know Husain. The folk painting is the only language of colours and lines that they know.Manjusha painting is the form that mirrors the myth and feelings of eastern Bihar. It has a touch of tribal culture too. Manjusha art forms an integral part of the rich culture heritage og the Ang janapath ( old Bjagalpur Commissionary). This traditional art resembles Madhubani paintion of Mithila,
Zadopatian painting of Santhal pargana, Kolam of Tamil Nadu and Rangoli of Karnataka. Simplicity of form and use of minimum materials are its cornerstones.Like the Madhubani painting, the Manjusha art is also associated with a religious festival of Ang Janath- the Bihla Bishari worship and the folk tale related with it. The main festival is held after the onset of rains in August, at Champamagar, about five kilometres from Bhagalpur railway station. A two- day fair is also held on the occasion. A folk tale is that Chando, a soudagar of Angjanpath was opposed the


worship of Bishari, the Goddess of cobras and he therefore had to face her wrath. His son Bala lakender was bitten by a cobra on the night of his marriage with Bihla. Bihla took her husband away fron Champa for treatment in a newly built boat with a shape of Manjusha, to keep Bala lakender safe from further attacks of the snakes. The walls and canopy of the boat were painted by veteran artist of that time, Lahsan Malli.The beautifuly sketched figures represrnted the prayer to the Goddess. In the painting there were snakes, Bishari, elephant, peacock, sun and moon. The colours used wree pink, green and yellow only. It is said that, since that incident, the tradition of Manjusha paintings has continued to be practised by the Malkhar families of Champanagar.Though the original Manjusha ( boat) was made of metal. the Manjusha built today on the occasion of Bihla-Bishari Puja are made of paper, himp and a frame built of Santhi a light wood. The frame is given a shape of a temple and it rests on eight pillars that form a square shaped room with a door. Then the whole frame is covered with paper on which beautiful paintings depicting the story of Bihla- Bishari are made. The snake is sketched in different painted as symbols for depicting the sky.The folk songs related with Bihla - Bishari van easily be seen to have a ready expression in the Manjusha art paintings. Along with the symbolism and liveliness of the characters. Manjusha art is very rich in colour combination and the original shade of paper used.the Manjusha artist also gives equal attention to the decoration of the art piece with the very effective user of the Mihrabs and borders. These Mihrabs provide an identity to the Manjusha painting. Unfortunately today, the Manjusja art is on its decline. For some time this form of art was practised by a few Malkhar families of Champanagar, but they too seem to have lost interest in it.This unique traditional painting which formed an inseparable part of centuries of Ang culture is now facing threat for want of patrons and onslought of consumerism. There is an urgent need to establish production canters at different spots besides providing financial assistance to the artists. To save Manjusha, it must be made commercially viable.

First ,second and third paintings are traditional manjusha painting.
In tradional Manjusha paintings only three colours-pink,green& yellow used. All paintings are in water colour. Art by- Pritima Vats.