Friday, September 15, 2017

कितने अपने थे वे आँगन



इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।

सुबह की पहली किरण के साथ आँगन के उस अमरूद पेड़ पर चिड़ियों का चहचहाना। दादाजी का आँगन के चबूतरे पर बैठे खाँसते रहना। दादी का सुबह-सुबह नहाकर आँगन में बैठकर रामायण बाँचना। बच्चों की पूरी टीम का आँगन में धमाचौकड़ी मचाना। समय-समय पर महरियों का घर की बहुओं के साथ हाथ नचा-नचाकर लड़ना। जाड़े की दोपहरी में घर के कामों से छुट्टी पाकर पूरे घर का आँगन की गुनगुनी धूप में बैठकर गप्पे मारना। सच कितना अपना लगता था वो आँगन।

बहुत  कुछ जुड़ा है आँगन की यादों से। वो आँगन जो जगह के अभाव में सिमटता चला जा रहा है। जब भी अपने गाँव जाती हूँ और वो बड़ा सा आँगन देखती हूँ जो अब छोटे-छोटे हिस्सों में बँटता हुआ लगभग खत्म हो चुका है,जिसके चारों ओर से मकान बने हुए थे, तो बचपन की बहुत सारी मीठी-मीठी यादें भी ताजा हो जाती हैं। घर के आधे से ज्यादा काम तो अकेले आँगन में ही होता था। कितना सुहावना लगता था जब माँ आँगन के एक कोने में बैठकर चावल चुन रही होती और जाने कहाँ से दो चिड़ियाँ के बच्चे आकर उन फेंके हुए दानों को खाने लगती। माँ भी खुश हो जाती थीं उन चिड़ियों को देखकर। हम सभी भाई-बहनों ने भी तो इसी आँगन के चारों तरफ के दालानों को पकड़-पकड़कर चलना सीखा था। पकड़म-पकड़ाई खेलना हो या लँगड़ी टाँग। कबड्डी खेलना हो या ऊँच-नीच का पापड़ा। हर खेल के लिए सबसे अच्छी जगह ये आँगन ही था।
इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।
कुछ दशक पहले तक जब घर बनाए जाते थे तो हर चीज के साथ घर में आँगन की भी जगह छोड़ी जाती थी। वास्तुशास्त्र के हिसाब से घर को बीचोंबीच आँगन की जगह छोड़ी जाती थी। ऐसा माना जाता था कि घर के बीचों-बीच वास्तुदेवता विश्राम करते हैं और उन्हें खुली जगह बहुत पसंद है। उनकी खुशी से ही घर में सुख-शान्ति बनी रहती है। सुपरिचित वास्तुशास्त्री और ज्योतिषाचार्य पूनम वेदी का कहना है कि घर के आँगन में वास्तुदेवता की छाती होती है। यह पूरे घर का हृदयस्थल माना जाता है। जिस तरह हम अपने दिल में सबको जगह देते हैं और घर के सब लोग एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उसी तरह आँगन भी घर के हर व्यक्ति को एक दूसरे से जोड़े रखने का काम करता है।
आज हमारे आँगन की तरह हमारे दिलों में भी दूसरे व्यक्तियों के लिए जगह खत्म होती चली जा रही है
वास्तुदेवता की उपस्थिति बहस का विषय हो सकती है, लेकिन हर घर में तुलसी के बिरवे के साथ सजता हुआ आँगन कितना उपयोगी होता है,यह हम बचपन से ही देखते आ रहे हैं।
जब हमारे दादाजी का देहांत हुआ था तो इसी तुलसी के बिरवे के पास आँगन में उनके पार्थिव शरीर की रखा गया था। पूरे गाँव के लोग आए थे तब हमारे आँगन में।
जब भी हमारे घर में कोई मन-मुटाव होता, घर के सभी लोग इसी आँगन में आकर लड़ाई-झगड़े करते। एक-दूसरे को भला-बुरा कहते। लेकिन अपनी-अपनी भड़ास निकालने के बाद एक दूसरे का चेहरा देखते हुए कब उनका गुस्सा शान्त हो जाता पता भी नहीं चलता। फिर माँ और चाची मिलकर चाय और पकौड़े से सबको शान्त करतीं थीं। कुछ ही देर बाद सभी हल्के मन से अपने-अपने काम में लग जाते।
परंतु समय हमेशा ऐसा नहीं रहा। पहले आँगन में दीवारें खिंची। फिर धीरे-धीरे आँगन नाम की चीज हीं खत्म होती चली गईं।आज तो माहौल ऐसा हो गया है कि एक ही परिवार में आदमी एक दूसरे से कई दिनों तक नहीं मिल पाते। समय की कमी के साथ इसका एक कारण आँगन का न होना भी है। जरा सी बात पर यदि कुछ मन-मुटाव हो जाता है तो एक-दूसरे से मिलकर हम उसे दूर नहीं करते बल्कि अपने-अपने घरों में बैठे कुढ़ते रहते हैं और मन-मुटाव बढ़ता चला जाता है।
जब काफी दिनों तक माहौल सुधरता नहीं है और बात बिगड़ती चली जाती है तो बहुत याद आता है वह आँगन।
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-प्रीतिमा वत्स

Sunday, August 6, 2017

कृष्ण ने लाज रख ली द्रौपदी के रक्षासूत्र की








इन्द्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया था। सम्पूर्ण आर्यावर्त के सभी जाने-माने राजा इस यज्ञ में आमंत्रित थे। अतिथि सत्कार के बाद अग्रिम पूजा की बारी आई। सबकी सहमति से युधिष्ठिर श्री कृष्ण की अग्रिम पूजा करने आगे बढ़े, ज्योहिं उन्होंने सोने के परात में प्रभु के चरण धोने के लिए रखे। पीछे से चेदि राजा शिशुपाल बहुत ही असभ्य तरीके से गरजता हुआ खड़ा हो गया और श्री कृष्ण के अग्रिम पूजा का विरोध करने लगा। पूरी सभा ने शिशुपाल को समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माना,और कृष्ण का अपमान करता रहा। कृष्ण चुपचाप सुन रहे थे और मन ही मन उसके सौ गलतियों के पूरा होने की प्रतिक्षा कर रहे थे, क्योंकि कृष्ण ने शिशुपाल की माँ को उसके किए सौ गलतियों के लिए माफ करने का वचन दिया था। जिस समय शिशुपाल की सौ गलतियाँ पूरी हो गई, कृष्ण ने कहा , बस शिशुपाल अब और नहीं। तुम्हारी गलतियाँ माफी की पराकाष्ठा पार कर चुकी हैं। क्रोध से काँपते कृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र नाचने लगा। देखते ही देखते चक्र हाथ से निकला और शिशुपाल के सर को धड़ से अलग करता हुआ पुनः कृष्ण की अंगुलियों में समा गया। उसी समय कृष्ण की अंगुली पर द्रौपदी को खून नजर आया। वह घबरा गईं और अपना दुपट्टा फाड़कर कृष्ण की अंगुली पर बाँध दिया।
कृष्ण ने बड़े प्यार से द्रौपदी से कहा, हे कृष्णा मेरी प्यारी बहन आज तुम्हारे प्यार का ऋणी हो गया मैं तो। समय आने पर मैं तुम्हारे इस रक्षासूत्र के एक-एक धागे की कीमत अदा कर दूंगा। जिसे युगों-युगों तक संसार याद रखेगा और आदर्श मानेगा। 

उस वक्त किसी की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन द्रौपदी चीरहरण के समय कृष्ण ने जो किया वह तो सर्वविदित है।

-प्रीतिमा वत्स

Monday, July 17, 2017

लोक में शिव पूजा ( LOK MAIN SHIV POOJA)

worship of god with nature
सृष्टि के प्रत्येक कण की उत्पत्ति तथा समाप्ति जिस शक्ति से होती है वह शिव हैं। अर्थात जो वस्तु सृष्टि के पूर्व हो वही जगत् का कारण है, और जो जगत् का कारण है, वही शिव है। 108 नामों से जाने-जानेवाले शिव सभी देवी-देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं तभी तो इनका एक नाम महादेव भी है।
पवित्र ग्रंथ बाईबिल में भी शिव का वर्णन मिलता है, ईसा मसीह  ने अपना पिता कहकर जिन्हें संबोधित किया है, वह शिव जी ही है। वैसे तो शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है, लेकिन उनके विग्रह  में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। इनके मस्तक पर एक ओर चंद्रमा है तो गले में  सर्प का हार है। वे अर्धनारीश्वर कहे जाते हैं,गृहस्थ हैं फिर भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी रुद्र हैं सृष्टि के विनाश का कारण बनते हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है।
हालाँकि लोक की आस्था 33 करोड़ देवी- देवताओं में है। लेकिन शिव का नाम वहाँ भी सबसे लोकप्रिय है। उनकी लोकप्रियता के, उनके सृष्टि के निर्माण के तथा उनके प्रलयंकारी रूप के अनेक किस्से लोक में प्रचलित हैं जो कई बार पुराणों की कथाओं से भी मेल खाते हैं। उन्हीं कथाओं में एक है -
जब इस धरती का निर्माण हुआ तब यहाँ कोई प्राणी नहीं थे तो
ब्रह्मा जी ने सबसे पहले शिव जी से इस धरती पर प्राणियों की उत्पत्ति करने के लिए कहा । पहले तो शिव जी ने हाँ कर दिया लेकिन प्राणियों में विभिन्न दोषों को देख वे जल में मग्न हो गये तथा चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा जी उनके तप पूरा होने की प्रतीक्षा करते रहे। बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी जब ब्रह्मा जी ने शिव जी को जल में ही पाया तथा सृष्टि का विकास नहीं देखा तो मानसिक बल से प्रजापति को उत्पन्न किया। उस विराट पुरुष ने कहा- 'यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।'
ब्रह्मा जी ने प्रजापति को बताया कि इस संसार में श्रेष्ठ तो केवल शिव हीं हैं लेकिन वह तो चिरकाल से जल में ही डूबे हुए हैं, अतः वह सृष्टि का निर्माण करें। ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रजापति ने चार तरह के प्राणियों का निर्माण किया। सृष्टि होते ही प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से दौड़ी। तब प्रजापति ने ब्रह्मा जी से अपनी संतान के भूख के निवारण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने इस धरती पर तरह-तरह के अनाज, फल, औषधि, जल आदि का निर्माण किया। हिंसक पशुओं के लिए, दुर्बल पशुओं के लिए,पक्षियों आदि के आहार की व्यवस्था की। धीरे-धीरे एक आहार श्रृंखला का निर्माण हो गया। लेकिन इससे भी बात नहीं बनी तो सभी देव आपस में मंत्रणा करने लगे, सूर्यदेव ने एक तरकीब निकाली, 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात बना दी। साथ ही यह व्यवस्था कर दी गई कि रात को कोई भोजन नहीं और सभी विश्राम करेंगे। इससे सृष्टि में थोड़ी सी स्थिरता आई।
शिव जी जब अपनी तपस्या समाप्त कर जल से निकले तो पृथ्वी पर समस्त जीवों को निर्मित देखकर क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा ने पूछा- 'प्रभु इतने समय जल में रहकर आपने क्या किया, और लिंग उत्पन्न कर इस प्रकार क्यों फेंक दिया?'
शिव जी ने कहा- 'मैं इस पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले जीवों की नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान पहले चाहता था, जिस कारण तपस्या कर रहा था। परंतु प्राणियों का निर्माण तो हो चुका है, अतः  इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही।' ब्रह्मा उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाये। सत युग बीत जाने पर देवताओं ने भगवान का भजन करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया । परंतु शिव का क्रोध शांत न होकर तीनों लोकों में प्रलय लाने को आतुर हो गया।
जब देवताओं को भागने का कोई रास्ता नहीं बचा तब उन्होंने वाणी का सहारा लिया। वाणी ने महादेव के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, अत: धनुष उछलकर पृथ्वी पर जा गिरा।
तब सब देवी - देवता हाथ जोड़कर शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने उन सब पर कृपा कर अपना कोप समुद्र में छोड़ दिया । समुद्र में उठने वाला ज्वार शिव जी के क्रोध का हीं अंश माना जाता है।
तब से सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति की उपासना का महीना माना जाता है। पूरे महीने लोग अपनी आस्था और विश्वास के आधार पर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। लोक में यह मान्यता है कि शिव की पूजा किसी भी तरह से की जा सकती है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं इनकी पूजा में।
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- प्रीतिमा वत्स

Friday, July 7, 2017

गुरू पूर्णिमा GURU PURNIMA



विद्या दान के द्वारा हमारे जीवन को सब प्रकार से सार्थक और सुगम करने वाले गुरू का स्थान हिन्दू धर्म में पिता तथा माता से भी बढ़कर आदरणीय तथा पूज्य है। गुरू को ब्रह्मा,विष्णु और महेश्वर से समान देवता समझ कर पूजा करने की पद्धति हिन्दू धर्म की अपनी विशेषता है। 'आचार्य देवो भवः'। आचार्य मनु के अनुसार- विद्या हमारी माता है और आचार्य हमारे पिता हैं।
गुरू तो संपत्ति का ऐसा भंडार हैं जो अपनी ज्ञान रूपी संपत्ति को अपने शिष्यों पर ताउम्र लुटाते रहते हैं। अपने शिष्य से गुरू कुछ भी बचाकर अपने पास नहीं रखना चाहते है। जिस दिन कोई शिष्य सही अर्थों में विद्वान हो जाता है,उसके गुरू की सबसे बड़ी जीत होती है।
गुरू पुर्णिमा उसी गुरू की पूजा करने की पावन तिथि है जो वर्ष में केवल एक बार आती है। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा को गुरू की पूजा का विशेष महत्व है। यों तो हमें प्रतिदिन गुरू की पूजा करनी चाहिए किन्तु इस पूर्णिमा के दिन गुरू के मानव-शरीर में ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, और शंकरत्व की समन्वित शक्ति का समावेश होता है।
गुरू की पूजा का विधान भी कठिन नहीं है। प्राचीन काल में स्नानादि से निवृत होकर शुद्द मन से गुरू की सेवा,आराधना, तथा यथायोग्य उन्हें कुछ दान का विधान था।
लेकिन आज के इस भौतिक वादी युग में जहां हर रिश्ते की परिभाषा ही बदलती जा रही है। गुरू शिष्य की रिश्ता भी अछूता नहीं रहा है। अन्य सम्बन्धों की भांति यह भी अब अर्थ से जुड़ा सम्बन्ध हो गया है। गुरू शिष्य को इसलिए पढ़ाता है क्योंकि उन्हें जीविकोपार्जन के लिए वेतन मिलता है और शिष्य इसलिए गुरू की प्रतिष्ठा नहीं करता कि उसे पूरी फीस देनी पड़ती है अनेक प्रकार की कठिनाईयां उठानी पड़ती है। लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। शिष्य गुरू के आश्रम में प्रवेश करते हीं सारी चिंताओं से मुक्त होकर गुरू का आश्रित हो जाता था। अब उसके शिक्षा से लेकर खान-पान और वस्त्रादि की चिंता गुरू की होती थी। गुरू अपने शिष्यों पर पुत्रवत स्नेह रखकर उनके सर्वतोन्मुखी कल्याण की चिंता करता था। उनके आश्रम में अमीरी-गरीबी का कोई भेद-भाव नहीं था। किन्तु आश्रम और शिष्यों की  चिंता गुरू की व्यक्तिनिष्ठ नहीं थी। एक आचार्य का आश्रम समाज की चेतना का केन्द्रबिन्दु था। बड़े-बड़े राजा- महराजा से लेकर सेठ साहुकार तक इस बात की प्रतिक्षा करते रहते कि गुरू उन्हें भी अपने आश्रम तथा शिष्यों की सेवा का कुछ अवसर देंगे।
लेकिन आज के दौर में ऐसा कतई नहीं है। अब तो गुरू और शिष्य का रिश्ता भी करीब-करीब वैसा ही हो गया है, जैसे कि एक व्यापारी और खरीददार का होता है। पैसे दो और ज्ञान का पैकेज खरीदो। जितना पैसा दोगे पैकेज उतना अच्छा माना जाएगा। अच्छे अंकों से पास हो जाओगे तो अच्छी नौकरी मिलेगी,और अच्छी नौकरी मिलेगी तभी समाज में प्रतिष्ठा पा सकोगे।
इस आपाधापी में आगे निकलने की होड़ इतनी बढ़ गई है कि रिश्तों की मर्यादा को हम भूलते चले जा रहे हैं। गुरू-शिष्य के पवित्र रिश्ते को भी बाजार में खरीद-फरोख्त की चीज बना दी गई है, जिसपर हमारे पूरे समाज को आज विचार करने की जरूरत है। इस मर्यादा को पुनः कायम करने की जरूरत है।
- प्रीतिमा वत्स

Thursday, November 3, 2016

शक्ति साधना ऐसे भी SHAKTI SADHNA AISE BHI


आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
विश्व में बहुत सी जातियां हैं। ढेर सारे संप्रदाय हैं।कई धर्म हैं। विभिन्न भाषाएं हैं। बहुत से धार्मिक ग्रंथ हैं। इतना ही नहीं हर धर्म-संप्रदाय और जातियों में पूज्यनीय भावनाओं के आधार पर देवी-देवताओं की कल्पना की गयी है। ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, गॉड, परमात्मा आदि नामों से ब्रह्म को, खुदा को पुकारा जाता है। किंतु यह जितने नाम हैं वे भाषा के आधार पर दिए गए हैं। यह बहस बहुत पुरानी पड़ गयी कि इस संसार को चलाने वाला कोई है ? इसका उत्तर सभी निकाल चुके हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो इस सृष्टि के कण-कण का ठीक-ठीक समयानुसार चालन करती है। हम उसे गॉड कहें, खुदा कहें, परमात्मा कहें, ज्योति कहें, प्रकाश कहें या ज्ञान कहें।
परंतु इस बात को सभी धर्मों में माना गया है कि कोई तो अदृश्य शक्ति है जो हम सबको पैदा करती है,पोषण करती है और अंत में स्वरुप परिवर्तन कर देती है या विनष्ट कर देती है। भले ही यह शक्ति हमें दिखाई नहीं देती परंतु हमें उसका ज्ञान होता है। हम अपनी उपासना से उस शक्ति को महसूस कर सकते हैं। अपनी ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं।
उसी शक्ति को हम निर्गुण रूप में मानें तो शक्ति और सगुण रूप में मानें तो जगदंबिका अर्थात् जगत जननी हैं।
सर्व देव मयी देवी सर्व देवीमयं जगत।
अतोSहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।
सतयुग,त्रेता और द्वापर से लेकर आज के इस युग में भी देवी अपने भक्तों पर समान रूप से प्रसन्न होती रही हैं। परंतु हर युग की मांग अलग-अलग थी। पहले व्यक्ति, ईश्वर की शरणणागति मांगता था, भक्ति मांगता था और मुक्ति की इच्छा करता था। परंतु आज के युग में भौतिकता, सांसारिकता का मोह फंसा हुआ व्यक्ति जब साधना करता है तो उसकी साधना भी स्वार्थपूर्ण हो गयी है। फिर भी मां भगवती अपने भक्तों के स्वार्थ को पूर्ण करने की कृपा करती हैं जो उन्हें हृदय से पुकारता है उस पर प्रसन्न होकर उसे उसका मनचाहा सुख प्रदान करती हैं। शीघ्र ही सिद्धि देती हैं।
इसीलिए कहा गया है कि कलयुग में मां रूप में देवी की शक्ति की उपासना शीघ्र अभीष्ट फल देती है। क्योंकि आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
शक्ति साधना कई प्रकार से की जाती रही है। वैदिक शक्ति साधना,तांत्रिक शक्ति साधना और भक्ति मार्गीय शक्ति साधना।
उपरोक्त साधनाओं में सांसारिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को भक्ति मार्ग की साधना को अपनाना चाहिए। साधारण मनुष्य वैदिक तथा तांत्रिक विधि से देवी की न उपासना कर सकता है, न साधना कर सकता है। ये दोनों मार्ग कठिन एवं तपस्या करने के समान है। अतः खुद को मां का बेटा मानकर भक्त मानकर, सेवक, दास, पुजारी मानकर शक्ति उपासना करना चाहिए। शक्ति को यदि शक्ति भी न मानें , केवल मां माने, स्वामिनी माने तो सर्वश्रेष्ठ साधना होगी।
देवी के किसी भी रूप-नाम को या हर रूप-नाम को माता के समान पूजे, मां मानकर उपासना करें तो मानव का पूर्ण कल्याण मां के हाथों निश्चय है। वो अपने भक्तों की सच्ची पुकार की इस कलयुग में भी अनसूना नहीं कर सकती हैं।
जो शक्ति,ब्रह्मा,विष्णु और महेश आदि समस्त देवताओं की मां हैं जिनसे सारी सृष्टि का जन्म हुआ है वही शक्ति हमारी भी मां है और मां कभी अपने बालक का बुरा नहीं सोच सकतीं, वह सदैव अपने बेटों का हित चिंतन ही करेगी। अतः उसी मां की साधना उपासना हमें करनी चाहिए।
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, June 8, 2016

पुत्रदा देवी षष्ठी की उपासना विधि Shashti Devi ki Upasana.

मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण ये षष्ठी देवी कहलाती हैं। बालकों की ये अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें विष्णु माया और बालंदा भी कहा जाता है। मातृकाओं में देवसेना के नाम से ये प्रसिद्ध हैं। उत्तम व्रत का पालन करनेवाली इन साध्वी देवी को स्वामी कार्तिकेय की पत्नी होने का सौभाग्य प्राप्त है। बालकों को दीर्घायु बनाना तथा उनका भरण-पोषण एवं रक्षण करना इनका स्वाभाविक गुण है। ये सिद्ध योगिनी देवी अपने योग के प्रभाव से बच्चों के पास सदा विराजनाम रहती हैं। लोक जीवन में इनकी पूजा अर्चना विधि-विधान के साथ की जाती है। पूजा के साथ कथा भी प्रचलित है।

प्रियव्रत नाम के एक राजा थे उनके पिता का नाम था स्वायंभुव मनु। प्रियव्रत योगीराज होने के कारण विवाह नहीं करना चाहते थे। तपस्या में उसकी विशेष रुचि थी। परंतु ब्रह्मा जी की आज्ञा से उन्होंने विवाह कर लिया। विवाह के बाद दीर्घकाल तक उन्हें कोई संतान न हो सकी। तब कश्यपजी ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। राजा की प्रेयसी भार्या का नाम मालिनी था। मुनि ने उन्हें प्रसाद प्रदान किया। प्रसाद को खाने के बाद रानी मालिनी गर्भवती हुई, परंतु उन्हें एक मृत संतान की प्राप्ति हुई। जिसे देखकर राजा- रानी के साथ-साथ नगर के सभी लोग अति दुखी हो गये।

राजा प्रियव्रत उस मृत बालक को लेकर श्मशान घाट गये। उस एकांत भूमि में राजा पुत्र को सीने से लगाकर विलाप करने लगे। इतने में वहां एक दिव्य विमान दिखाई दिया। तेज से जगमगाते हुए उस विमान में माता षष्ठी विराजमान थी। उन्होंने राजा के समक्ष आकर अपना परिचय दिया।
स्वाभाव से नरमदिल राजा ने उस देवी की पूजा अर्चना की, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उसके पुत्र को जीवित कर दिया और साथ हीं यह भी कहा कि यदि तुम मेरी पूजा अर्चना नियमित करोगे तथा प्रजा से करवाओगे तो तुम्हें एक सर्वगुण संपन्न पुत्र और पैदा होगा, जिसका नाम सुव्रत होगा। वह नारायण का कलावतार तथा प्रधान योगी होगा। उसे पूर्व जन्म की सारी बातें याद रहेंगी। सभी उसका सम्मान करेंगे। त्रिलोक में उसकी कीर्ति फैलेगी। जो व्यक्ति भी मन से मेरी पूजा अर्चना करेंगे उनके घर में सुख-शान्ति बनी रहेगी। उनके बच्चे हमेशा स्वस्थ रहेंगे।

राजा ने देवी की सारी बातें मान लीं और खुशी-खुशी अपने घर आ गया। उनकी पूजा अर्चना में मन लगाने लगा तथा अपने नगरवासियों को भी उनकी पूजा करने के लिए कहता। देवी की कृपा से राजा के घर में एक सर्वगुण संपन्न पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम राजा नें देवी के आदेशानुसार सुव्रत रखा। जो बाद में चलकर बड़ा ही प्रतापी राजा बना। तब से प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवती का महोत्सव मनाया जाने लगा।
आज भी देश के कई हिस्सों में हमारे समाज में कमोवेश इस पूजा का प्रचलन है।

-प्रीतिमा वत्स






Wednesday, September 2, 2015

पहाड़ से ऊंचा आदमी Dashrath Manjhi.



शाम का वक्त था। रोज की तरह मिहिर अपने बाबा के साथ घूमने निकला था। मिहिर को अपने बाबा के साथ घूमना बहुत अच्छा लगता था। क्योंकि उसे सवाल पूछने की आदत थी और घर भर में बाबा ही ऐसे थे जो उसके हर सवाल का जवाब देते थे। आज अचानक चलते-चलते मिहिर ने पूछ लिया-बाबा कोई आदमी पहाड़ से भी ऊंचा हो सकता है क्या? उसके गाव से बहुत दूर खड़े एक विशाल पहाड़ को ही देखकर मिहिर के मन में यह सवाल उठा था। मिहिर की बातों को सुनकर उसके बाबा पहले तो मुस्कुराए, फिर सुस्ताने के लिहाज से पास की एक पुलिया पर बैठ गए। मिहिर भी उनके साथ जाकर बैठ गया-बताओ न बाबा कोई आदमी पहाड़ से भी ऊंचा हो सकता है क्या?
बाबा ने मिहिर के बालों को सहलाते हुए कहा-लंबाई में तो कोई आदमी पहाड़ से ऊंचा नहीं हो सकता, लेकिन कई लोग ऐसे हुए हैं, जिनका कद पहाड़ से भी ऊंचा है।
मिहिर को बात समझ में नहीं आई-ऐसा कैसे हो सकता है?
बाबा ने बताना शुरु किया-अपने काम से कई लोग पहाड़ से भी बड़े साबित हुए हैं जैसे कि गया के दशरथ मांझी।
मिहिर को अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था तो वह फिर पूछ बैठा -दशरथ मांझी कौन थे और उनका कद पहाड़ से ऊंचा कैसे हो गया?
अब बाबा ने बिस्तार से बताना शुरु किया-बिहार के गया जिले के एक छोटे से गांव गहलौर में दशरथ मांझी पैदा हुए थे। लोगों के पास जीने का एकमात्र जरिया खेती-बारी। गहलौर गांव एक पहाड़ी से घिरा हुआ है। गांव से बाहर निकलने या उस गांव में जाने के लिए उस पहाड़ी को पार करना जरूरी था। उसी गांव में अपनी जिंदगी जीते, खेती-बारी करते दशरथ मस्त थे। वह अक्खड़ भी थे और फक्कड़ भी। कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन कबीर को खूब सुना कबीर को खूब गाया। अपने गांव के अपने कबीर थे दशरथ मांझी
आठवीं क्लास में महान कवि कबीर को पढ़ चुके मिहिर को अब इस कहानी में मजा आने लगा। वह चहक उठा और गौर से बाबा को सुनने लगा-दशरथ हमेशा दूसरों की भलाई की बातें किया करते थे। लेकिन गांव के लोगों को कम ही फुरसत थी कि वे दशरथ को सुनें। लेकिन अचानक एक छोटी सी घटना ने दशरथ की पूरी जिंदगी ही बदल दी। जीने का मकसद बदल दिया।
फिर क्या हुआ बाबा, मिहिर पहाड़ से भी ऊंचे आदमी के बारे में जानने को बेताब था।
बाबा ने कहानी आगे बढ़ाई-दोपहर का वक्त था। दशरथ मांझी पहाड़ी के उस पार खेतों में काम कर रहे थे। हर रोज की तरह उनकी पत्नी फागुनी देवी उनके लिए भोजन और पानी ले के आ रही थीं। वह अभी पहाड़ी पर चढ़ ही रही थी कि अचानक उनका पांव फिसल गया। वह गिर गईं। उनके पांवों में चोट भी लगी और वह बुरी तरह घायल हो गई। जब तक दशरथ मांझी को बात पता चली और वह भागते-भागते वहां तक पहुंचते तो काफी देर हो चुकी थी। इसके बाद भी सबके सामने समस्या ये थी कि जख्मी हालत में फागुनी देवी को किसी डॉक्टर के पास कैसे पहुंचाया जाए। गांव से सबसे नजदीक का कस्बा लगभग साठ किलोमीटर दूर था और उसपर भी कई किलोमीटर तक पहाड़ की चढ़ाई। घर में जो भी उपचार संभव था,उससे किसी तरह फागुनी देवी की जान तो बच गई, लेकिन दशरथ मांझी बैचेन हो गए।
ऐसा क्यों बाबा, उनकी पत्नी की जान तो बच गई,मिहिर को बाबा की इस कहानी में रस आने लगा था।
बाबा ने एक लंबी सांस ली और बताना शुरु किया-दशरथ मांझी इसलिए बैचेन हो उठे क्योंकि उन्हें सिर्फ अपनी पत्नी की चिंता नहीं थी, उन्हें पूरे गांव की फिक्र थी। इस एक छोटी सी घटना ने दशरथ मांझी के पूरे जीवन को ही बदल दिया। उन्होंने ठान लिया की इस पहाड़ी को काट कर के आने-जाने लायक रास्ता बनाना है। एक ऐसा रास्ता जो न सिर्फ शहर की दूरी को ही कम कर दे, बल्कि लोगों की यात्रा को आसान भी बना दे।
फिर दशरथ मांझी ने क्या किया बाबा, मिहिर सब कुछ जान लेना चाहता था।
बाबा थोड़ी देर रूके, मानो पुरानी कहानी को याद कर रहे हों फिर कहना शुरु किया-दशरथ मांझी ने तय कर लिया कि वह पहाड़ को काटकर गांव वालों के लिए रास्ता बनाएंगे। एक हथौड़ी ....एक छेनी ...और एक तसला ले कर जुट गया वह आदमी अपने काम में। शुरू में तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। गाव के लड़के बोले, सनकी हो गए हैं दशरथ मांझी। किसी ने कहा कि यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था। उस समय तो देवता भी यहां रहते थे। उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया, अब कलयुग में आप क्यों यह पागलपन कर रहे हैं। पत्नी ने उन्हें झिड़का था- तुम पागल हुए हो क्या? तुम्हीं को चिंता है रास्ता बनाने की? और फिर यह दरार तो तबसे है, जबसे यह धरती बनी. पागल मत बनो, चुपचाप जाकर खेतों में काम करो. तब वह हंस कर रह जाते. पिता ने समझाना चाहा, तब उन्होंने कहा था- आज तक हमारा खानदान मजदूरी करता रहा है. मजदूरी करते-करते लोग मर गये. खाना, कमाना और मर जाना. इतना ही तो काम रह गया है. सिर्फ यह एक काम है जो मैं अपने मन से करना चाहता हूं. आप लोग मुझे रोकिए मत, करने दीजिए. उनका काम जारी रहा। वह लगे रहे...बस लगे रहे। और दो चार दिन या महीना दो महीना नहीं, पूरे 22 साल अकेले लगे रहे।
इस बीच गांव वालों को कौतूहल तो होता था। कुछ लोग आते थे कभी-कभी देखने। बाद में कुछ लोगों ने दशरथ मांझी को छेनी-हथौड़ी वगैरह देना शुरू कर दिया।
अपनी तरफ से पूरे 22 साल वह अकेले लगे रहे।
22 साल, मिहिर को एक झटके में तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि 22 साल तक एक आदमी पहाड़ों को काटता रहा। बाबा
थोड़ी देर के लिए रूके और फिर बताना शुरु किया-22 सालों में न जाने कितनी तरह की बातें दशरथ को सुननी पड़ीं, लेकिन
एक अच्छी पत्नी की तरह फागुनी  दिन में दो बार उनका खाना पानी ले कर जरूर आती थी।
और अंत में 22 साल बाद उस आदमी का सपना पूरा हुआ जब उसने उस पहाड़ी की छाती चीर के 360 फुट ( 110 मीटर ) लम्बा , 25 फुट (7 .6 मीटर ) गहरा और 30 फुट ( 9 .1 ) मीटर चौड़ा रास्ता बना डाला । एकदम निपट अकेले । बिना किसी सहायता के । बिना किसी प्रोत्साहन के और बिना किसी प्रलोभन के। वह आदमी पूरे 22 साल लगा रहा। न दिन देखा न रात। न धूप देखी, न छाँव। न सर्दी न बरसात। वहां न कोई पीठ ठोकने वाला था। न शाबाशी देने वाला। उलटे गांव वाले मजाक उड़ाते थे। कभी-कभी तो घऱवाले भी हतोत्साहित करते थे। 22 साल तक वह आदमी अपना काम-धाम छोड़ के लगा रहा। अरे! कहीं किसी के खेत में काम करता तो पेट भरने लायक अनाज या मजदूरी तो पाता? फिर भी वह लगे रहे। उस सुनसान बियाबान में।
.......और एक बात बता दूं मिहिर! बाबा खुद इस कहानी में डूबे हुए थे-गर्मियों में उस जगह का तापमान 50 डिग्री तक पहुँच जाता है। और 22 साल बाद, जब वह सड़क या यूं कहें कि रास्ता बन कर तैयार हो गया तो उस इलाके के और गांव के लोगों को अहसास हुआ कि क्या गजब हो गया। गहलौर से वजीरगंज की दूरी जो पहले 60 किलोमीटर होती थी अब सिर्फ 10 किलोमीटर रह गयी है। बच्चों का स्कूल, जो 10 किलोमीटर दूर था, अब सिर्फ 3 किलोमीटर रह गया है। पहले अस्पताल पहुँचने में सारा दिन लग जाता था। उस अस्पताल में अब लोग सिर्फ आधे घंटे में पहुँच जाते हैं । आज उस रास्ते को उस इलाके के 60 गांव के लोग इस्तेमाल करते हैं।
मिहिर को यकीन नहीं हो रहा था कि यह गप्प है या हकीकत, लेकिन बाबा कह रहे हैं तो सच ही होगा, यह सोचकर मिहिर को भरोसा हुआ। अब उसे यह जानना था कि रास्ता बन जाने के बाद दशरथ मांझी को कैसा लगा?
बाबा बोले-यह बात १९६० की है। 19 82 में जाकर वह रास्ता तैयार हुआ। इस अजूबे का बाद दुनिया उन्हें माउन्टेन कटर के नाम से पुकारने लगी। रास्ता तो बन गया, लेकिन इस काम को पूरा होने के पहले उनकी पत्नी का देहांत हो गया। मांझी ने अपना पसीना बहाकर असंभव सा लगने वाला काम संभव कर दिखाया। उन्हें सम्मान मिला। उनके नाम से पुरस्कार बंट रहे हैं। 17 अगस्त 2007 को कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई लेकिन लोगों के दिलों में आज भी दशरथ मांझी जिंदा हैं, जिन्होंने सामान्य जीवन जीते हुए अपने कर्मों से इतिहास में खुद को स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया।  हम सभी को उस कर्मयोगी से प्रेरणा लेनी चाहिए! यह कहकर बाबा ने एक गहरी सांस ली।
अब बाबा की बातों से मिहिर को समझ में आ गया था कि पहाड़ से ऊंचे आदमी कैसे होते हैं। 
- Pritima Vats.
- Photographs- Internet.




   

कितने अपने थे वे आँगन

इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...