Wednesday, September 17, 2008

गरुड़ को भी दया आ गई



पिछले पोस्ट में मैंने जिउतिया व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा के बारे में बताया था। परंतु जिउतिया व्रत की एक पौराणिक कथा भी है। जो मैं अपने इस पोस्ट में बताने जा रही हूँ।

प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक का एक राजा था । बह बहुत धर्मात्मा, परोपकारी, दयालु, न्यायप्रिय तथा प्रजा को पुत्र की भाँति प्यार करने वाला था। एक बार शिकार करने के लिए मलयगिरि पर्वत पर गए। वहाँ उनकी भेंट मलयगिरि की राजकुमारी मलयवती के हो गई,जो कि वहाँ पर पूजा करने के लिए सखियों के साथ आई थी। दोनों एक दूसरे को पसंद आ गए। वहीं पर मलयवती का भाई भी आया हुआ था। मलयवती का पिता बहुत दिनों से जीमूतवाहन से अपनी बेटी का विवाह करने का चिन्ता में था। अतः जब मलयवती के भाई को पता चला कि जीमूतवाहन और मलयवती एक दूसरे को चाहते हैं तो वह बहुत खुश हुआ, और अपने पिता को यह शुभ समाचार देने के लिए चला गया।
इधर मलयगिरि की चोटियों पर घूमते हुए राजा जीमूतवाहन ने दूर से किसी औरत के रोने की आवाज सुनी। उनका दयालु हृदय विह्वल हो उठा। वह उस औरत के समीप पहुँचे। उससे सानुरोध पूछने पर पता चला कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके एकलौते पुत्र शंखचूर्ण को आज गरुड़ के आहार के लिए जाना पड़ेगा। नागों के साथ गरुड़ का जो समझौता हुआ था उसके अनुसार मलयगिरि के शिखर पर रोज एक नाग उनके आहार के लिए पहुँच जाया करता था। शंखचूर्ण की माता की यह विपत्ति सुनकर जीमूतवाहन का हृदय सहानुभूति और करुणा से भर गया, क्योंकि शंखचूर्ण ही उसके बुढ़ापे का एक मात्र सहारा था।
जीमूतवाहन ने शंखचूर्ण का माता को आश्वासन दिया कि- माता आप चिंता न करें मैं स्वयं आपके बेटे के स्थान पर गरुड़ का आहार बनने को तैयार हूँ।
जीमूतवाहन ने यह कहकर शंखचूर्ण के हाथ से उस अवसर के लिए निर्दिष्ट लाल वस्त्र को लेकर पहन लिया और उसकी माता को प्रणाम कर विदाई की आज्ञा माँगी। नाग माता आश्चर्य में डूब गई। उसका हृदय करुणा से और भी बोझिल हो उठा उसने जीमूतवाहन को बहुत कुछ रोकने की कोशिश की, किन्तु वह कहाँ रुक सकता था। उसने तुरंत गरुड़ के आहार के लिए नियत पर्वत शिखर का मार्ग पकड़ा और माँ-बेटे आश्चर्य से उसे जाते हुए देखते रह गए।
उधर समय पर गरुड़ जब अपने भोजन-शिखर पर आया और बड़ी प्रसन्नता से इधर-उधर देखते हुए अपने भोजन पर चोंच लगाई तो उसकी प्रतिध्वनि से संपूर्ण शिखर गूँज उठा। जीमूतवाहन के दृढ़ अंगों पर पड़कर उसकी चोंच को भी बड़ा धक्का लगा। यह भीषण स्वर उसी धक्के से उत्पन्न हुआ था। गरुड़ का सिर चकराने लगा। थोड़ी देर बाद जब गरुड़ को थोड़ा होश आया तब उसने पूछा- आप कौन हैं। मैं आपका परिचय पाने के लिए बेचैन हो रहा हूँ।
जीमूतवाहन अपने वस्त्रों में उसी प्रकार लिपटे हुए बोले , पक्षिराज मैं राजा जीमूतवाहन हूँ, नाग की माता का दुख मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मैं उसकी जगह आपका भोजन बनने के लिए आ गया हूँ, आप निःसंकोच मुझे खाइए।
पक्षिराज जीमूतवाहन के यश और शौर्य के बारे में जानता था,उसने राजा को बड़े सत्कार से उठाया और उनसे अपने अपराधों की क्षमा-याचना करते हुए कोई वरदान माँगने का अनुरोध किया।
गरुड़ की बात सुनकर प्रसन्नत्ता और कृतज्ञता की वाणी में राजा ने कहा- मेरी इच्छा है कि आपने आज तक जितने नागों का भक्षण किया है, उन सबको अपनी संजीवनी विद्या के प्रभाव से जीवित कर दें, जिससे शंखचूर्ण का माता के समान किसी की माता को दुःख का अवसर न मिले।
राजा जीमुतवाहन की इस परोपकारिणी वाणी मे इतनी व्यथा भरी थी कि पक्षिराज गरुड़ विचलित हो गए। उन्होंने गदगद कंठ से राजा को वचन पूरा होने का वरदान दिया और अपनी अमोघ संजीवनी विद्या के प्रभाव से समस्त नागों को जीवित कर दिया।
इसी अवसर पर राजकुमारी मलयवती के पिता तथा भाई भी जीमूतवाहन को ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गए थे । उन लोगों ने बड़ी धूमधाम से मलयवती के साथ जीमूतवाहन का विवाह भी कर दिया।
यह घटना आश्विन महीने के कृष्ण अष्टमी के दिन ही घटित हुई थी, तभी से समस्त स्त्री जाति में इस त्यौहार की महिमा व्याप्त हो गई। तब से लेकर आज तक अपने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना करते हुए स्त्रियाँ बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से इस व्रत को पूरा करती हैँ।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, September 9, 2008

कर्ण का पुनर्जन्म


आश्विन महीने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन पितृपक्ष के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं।पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है।

अंगराज कुंती पुत्र कर्ण परम दानी था। वह नित्य सवा मन सोना विद्वान, सदाचारी एवं कुलीन ब्राह्मणों को दान करता था, किन्तु सोने के साथ किसी अन्य वस्तु का दान नहीं करता था। जब उसकी मृत्यु हुई तो वह अपने अच्छे कर्मों की वजह से स्वर्ग लोक में पहुँचा। मृत्यु लोक में दिए गए सोने के दान के फलस्वरूप उसे स्वर्ग में एक स्वर्ण निर्मित आलीशान महल रहने को मिला, किन्तु उसके भीतर और कुछ भी नहीं था। कर्ण को यह देखकर बड़ा दुख हुआ, किन्तु अब हो ही क्या सकता था। महल के रक्षकों ने उन्हे बताया कि मनुष्य मृत्यु लोक में जो कुछ दान करता है, वही उसे यहाँ प्राप्त होता है। कर्ण ने देवराज और यमराज से प्रार्थना करके कहा कि एक पक्ष के लिए उन्हे पुनः धरती पर वापस भेजा जाय, जिससे वे अपने छूटे हुए कर्मों को पूरा कर सके। कर्ण की प्रार्थना स्वीकृत हो गई। फिर तो धरती पर आकर कर्ण ने पंद्रह दिनों तक बड़े संयम और सदाचार से विविध प्रकार की वस्तुओं के दान किए, उसके बाद पुनः कर्ण का स्वर्गवास हुआ। इन पंद्रह दिनों के जीवन में वे दान पुण्य करने में इतने अधिक व्यस्त थे कि हजामत भी नहीं करा सके। उनके इस जीवन के अच्छे कर्मों का फल यह हुआ, कि अब की बार उन्हें स्वर्ग में सब प्रकार के सुख मिले।

कहा जाता है कि दानी कर्ण के पुनर्जीवन के ये पंद्रह दिन इसी पितृपक्ष के थे। तभी से पितृपक्ष में संयम, सदाचार एवं दानादि की अपार महिमा बताई गई है।

-प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

Intro- इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...