Monday, July 17, 2017

लोक में शिव पूजा ( LOK MAIN SHIV POOJA)

worship of god with nature
सृष्टि के प्रत्येक कण की उत्पत्ति तथा समाप्ति जिस शक्ति से होती है वह शिव हैं। अर्थात जो वस्तु सृष्टि के पूर्व हो वही जगत् का कारण है, और जो जगत् का कारण है, वही शिव है। 108 नामों से जाने-जानेवाले शिव सभी देवी-देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं तभी तो इनका एक नाम महादेव भी है।
पवित्र ग्रंथ बाईबिल में भी शिव का वर्णन मिलता है, ईसा मसीह  ने अपना पिता कहकर जिन्हें संबोधित किया है, वह शिव जी ही है। वैसे तो शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है, लेकिन उनके विग्रह  में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। इनके मस्तक पर एक ओर चंद्रमा है तो गले में  सर्प का हार है। वे अर्धनारीश्वर कहे जाते हैं,गृहस्थ हैं फिर भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी रुद्र हैं सृष्टि के विनाश का कारण बनते हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है।
हालाँकि लोक की आस्था 33 करोड़ देवी- देवताओं में है। लेकिन शिव का नाम वहाँ भी सबसे लोकप्रिय है। उनकी लोकप्रियता के, उनके सृष्टि के निर्माण के तथा उनके प्रलयंकारी रूप के अनेक किस्से लोक में प्रचलित हैं जो कई बार पुराणों की कथाओं से भी मेल खाते हैं। उन्हीं कथाओं में एक है -
जब इस धरती का निर्माण हुआ तब यहाँ कोई प्राणी नहीं थे तो
ब्रह्मा जी ने सबसे पहले शिव जी से इस धरती पर प्राणियों की उत्पत्ति करने के लिए कहा । पहले तो शिव जी ने हाँ कर दिया लेकिन प्राणियों में विभिन्न दोषों को देख वे जल में मग्न हो गये तथा चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा जी उनके तप पूरा होने की प्रतीक्षा करते रहे। बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी जब ब्रह्मा जी ने शिव जी को जल में ही पाया तथा सृष्टि का विकास नहीं देखा तो मानसिक बल से प्रजापति को उत्पन्न किया। उस विराट पुरुष ने कहा- 'यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।'
ब्रह्मा जी ने प्रजापति को बताया कि इस संसार में श्रेष्ठ तो केवल शिव हीं हैं लेकिन वह तो चिरकाल से जल में ही डूबे हुए हैं, अतः वह सृष्टि का निर्माण करें। ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रजापति ने चार तरह के प्राणियों का निर्माण किया। सृष्टि होते ही प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से दौड़ी। तब प्रजापति ने ब्रह्मा जी से अपनी संतान के भूख के निवारण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने इस धरती पर तरह-तरह के अनाज, फल, औषधि, जल आदि का निर्माण किया। हिंसक पशुओं के लिए, दुर्बल पशुओं के लिए,पक्षियों आदि के आहार की व्यवस्था की। धीरे-धीरे एक आहार श्रृंखला का निर्माण हो गया। लेकिन इससे भी बात नहीं बनी तो सभी देव आपस में मंत्रणा करने लगे, सूर्यदेव ने एक तरकीब निकाली, 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात बना दी। साथ ही यह व्यवस्था कर दी गई कि रात को कोई भोजन नहीं और सभी विश्राम करेंगे। इससे सृष्टि में थोड़ी सी स्थिरता आई।
शिव जी जब अपनी तपस्या समाप्त कर जल से निकले तो पृथ्वी पर समस्त जीवों को निर्मित देखकर क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा ने पूछा- 'प्रभु इतने समय जल में रहकर आपने क्या किया, और लिंग उत्पन्न कर इस प्रकार क्यों फेंक दिया?'
शिव जी ने कहा- 'मैं इस पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले जीवों की नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान पहले चाहता था, जिस कारण तपस्या कर रहा था। परंतु प्राणियों का निर्माण तो हो चुका है, अतः  इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही।' ब्रह्मा उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाये। सत युग बीत जाने पर देवताओं ने भगवान का भजन करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया । परंतु शिव का क्रोध शांत न होकर तीनों लोकों में प्रलय लाने को आतुर हो गया।
जब देवताओं को भागने का कोई रास्ता नहीं बचा तब उन्होंने वाणी का सहारा लिया। वाणी ने महादेव के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, अत: धनुष उछलकर पृथ्वी पर जा गिरा।
तब सब देवी - देवता हाथ जोड़कर शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने उन सब पर कृपा कर अपना कोप समुद्र में छोड़ दिया । समुद्र में उठने वाला ज्वार शिव जी के क्रोध का हीं अंश माना जाता है।
तब से सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति की उपासना का महीना माना जाता है। पूरे महीने लोग अपनी आस्था और विश्वास के आधार पर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। लोक में यह मान्यता है कि शिव की पूजा किसी भी तरह से की जा सकती है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं इनकी पूजा में।
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- प्रीतिमा वत्स

Friday, July 7, 2017

गुरू पूर्णिमा GURU PURNIMA



विद्या दान के द्वारा हमारे जीवन को सब प्रकार से सार्थक और सुगम करने वाले गुरू का स्थान हिन्दू धर्म में पिता तथा माता से भी बढ़कर आदरणीय तथा पूज्य है। गुरू को ब्रह्मा,विष्णु और महेश्वर से समान देवता समझ कर पूजा करने की पद्धति हिन्दू धर्म की अपनी विशेषता है। 'आचार्य देवो भवः'। आचार्य मनु के अनुसार- विद्या हमारी माता है और आचार्य हमारे पिता हैं।
गुरू तो संपत्ति का ऐसा भंडार हैं जो अपनी ज्ञान रूपी संपत्ति को अपने शिष्यों पर ताउम्र लुटाते रहते हैं। अपने शिष्य से गुरू कुछ भी बचाकर अपने पास नहीं रखना चाहते है। जिस दिन कोई शिष्य सही अर्थों में विद्वान हो जाता है,उसके गुरू की सबसे बड़ी जीत होती है।
गुरू पुर्णिमा उसी गुरू की पूजा करने की पावन तिथि है जो वर्ष में केवल एक बार आती है। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा को गुरू की पूजा का विशेष महत्व है। यों तो हमें प्रतिदिन गुरू की पूजा करनी चाहिए किन्तु इस पूर्णिमा के दिन गुरू के मानव-शरीर में ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, और शंकरत्व की समन्वित शक्ति का समावेश होता है।
गुरू की पूजा का विधान भी कठिन नहीं है। प्राचीन काल में स्नानादि से निवृत होकर शुद्द मन से गुरू की सेवा,आराधना, तथा यथायोग्य उन्हें कुछ दान का विधान था।
लेकिन आज के इस भौतिक वादी युग में जहां हर रिश्ते की परिभाषा ही बदलती जा रही है। गुरू शिष्य की रिश्ता भी अछूता नहीं रहा है। अन्य सम्बन्धों की भांति यह भी अब अर्थ से जुड़ा सम्बन्ध हो गया है। गुरू शिष्य को इसलिए पढ़ाता है क्योंकि उन्हें जीविकोपार्जन के लिए वेतन मिलता है और शिष्य इसलिए गुरू की प्रतिष्ठा नहीं करता कि उसे पूरी फीस देनी पड़ती है अनेक प्रकार की कठिनाईयां उठानी पड़ती है। लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। शिष्य गुरू के आश्रम में प्रवेश करते हीं सारी चिंताओं से मुक्त होकर गुरू का आश्रित हो जाता था। अब उसके शिक्षा से लेकर खान-पान और वस्त्रादि की चिंता गुरू की होती थी। गुरू अपने शिष्यों पर पुत्रवत स्नेह रखकर उनके सर्वतोन्मुखी कल्याण की चिंता करता था। उनके आश्रम में अमीरी-गरीबी का कोई भेद-भाव नहीं था। किन्तु आश्रम और शिष्यों की  चिंता गुरू की व्यक्तिनिष्ठ नहीं थी। एक आचार्य का आश्रम समाज की चेतना का केन्द्रबिन्दु था। बड़े-बड़े राजा- महराजा से लेकर सेठ साहुकार तक इस बात की प्रतिक्षा करते रहते कि गुरू उन्हें भी अपने आश्रम तथा शिष्यों की सेवा का कुछ अवसर देंगे।
लेकिन आज के दौर में ऐसा कतई नहीं है। अब तो गुरू और शिष्य का रिश्ता भी करीब-करीब वैसा ही हो गया है, जैसे कि एक व्यापारी और खरीददार का होता है। पैसे दो और ज्ञान का पैकेज खरीदो। जितना पैसा दोगे पैकेज उतना अच्छा माना जाएगा। अच्छे अंकों से पास हो जाओगे तो अच्छी नौकरी मिलेगी,और अच्छी नौकरी मिलेगी तभी समाज में प्रतिष्ठा पा सकोगे।
इस आपाधापी में आगे निकलने की होड़ इतनी बढ़ गई है कि रिश्तों की मर्यादा को हम भूलते चले जा रहे हैं। गुरू-शिष्य के पवित्र रिश्ते को भी बाजार में खरीद-फरोख्त की चीज बना दी गई है, जिसपर हमारे पूरे समाज को आज विचार करने की जरूरत है। इस मर्यादा को पुनः कायम करने की जरूरत है।
- प्रीतिमा वत्स

कितने अपने थे वे आँगन

इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...