Thursday, August 5, 2010

अंगिका की लोरी


झूल-झूल, नूनू झूले झूल-झूल।
बांस ऊपर पर सुग्गा झूल
अपनी महलियां नूनू झूल।
सुगवा कहे म सरोवर जाउं
नूनू कहे हम ननिहर जाउं।
ननिहर जाउं त की-की खाउं
दहि-चूड़ा मिठैईये खाउं
एक मन करे कि खईयै लौं
एक मन करे कि रुसियै जाउं।
पानी पियत नूनू पोखर जाए
पोखरी के बेंगवा ले लुलुआय
जहिया ऐते नूनू के माय
तहिया देबै जिमा लगाय।।
झूल-झूल नूनू झूले झूल-झूल।

अर्थ- बांस के ऊपर तोता झूल रहा है,
अपने महल में नन्हा बालक झूल रहा है,
तोते का मन है कि वह सरोवर जाए
बालक का मन है कि वह अपने ननिहाल जाए।
ननिहाल जाकर दही चूड़ा और मिठाई खाए।
खाए या रूठ जाए, सोच रहा है।
पानी पीने का मन हो तो पोखर की तरफ ही जाए।
पोखर के मेंढक उसे चिढ़ा रहे हैं
जब बालक की मां आएगी, तब मैं उसे बालक को सौंप दूंगा।।
-प्रीतिमा वत्स

Monday, August 2, 2010

लोकरंग मड़ई में

मड़ई का नया अंक आ चुका है। (मड़ई-2009) मड़ई के संपादक डॉ कालीचरण यादव हैं। जो वर्षों से लोक कला के उत्थान के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं।
मैं डॉ कालीचरण यादव जी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती हूं परन्तु मुझे यह पत्रिका इतनी प्रभावी और मुकम्मल लगती है कि मैं इसे अपने छोटे से ब्लाग के माध्यम से आपलोगों की जानकारी में भी देना चाहती हूं। वैसे लोक और साहित्य की दुनिया में यह पत्रिका काफी चर्चित है। मुझे उम्मीद है कि कालीचरण जी को मेरी यह हिमाकत बुरी नहीं लगेगी।




Sunday, July 25, 2010

गीत रोपनी के


सावन-भादो के महीने में धान की रोपाई खेतों में होती है। यह कार्य मुख्यतः महिलाएं करती हैं। घुटने भर पानी में घंटों रहकर रोपाई का काम बहुत ही कठिन होता है लेकिन महिलाएं इसे सरस बनाती हैं शायद गीतों के माध्यम से। बहुत हीं सरस और मधुर होते हैं ये गीत जो समवेत स्वर में गाये जाते हैं। इन गीतों के कुछ छंद यहां मौजूद हैं-
1 हाथ के लेल गे रेशमा
बांस के चंगेरिया गे
चली भेल कोईरिया फुलवरिया
एक कोस गेले गे रेशमा दूही कोस गेले
तीसरी कोस कोईरिया फुलवरिया गे।
पहेरी लेले गे रेशमा
धानी रंग चुनरिया गे
जली भेल कोईरिया फुलवरिया गे।।
हाथ में बांस की डलिया लिए हुए रेशमा कोयरी (खेतिहर जाति) के फुलवारी की ओर जा रही है। रेशमा एक कोस गई, दूसरा कोस भी पार कर लिया और तिसरे कोस में कोयरी का फुलवारी मिल गया। रेशमा धानी रंग की चुनरी पहनकर कोइरी के फुलवारी की ओर गई है।
2. सातों ही भैया के एके बहनिया अझोला
सातों भैया गेलो बनीजवा रे भैया,बनीजवा रे भैया।
सातों लाए, भौजो लाए सातो रंग चोलिया
से चंदो लाए लाहरी पटोरबा देबै
चंदो लाए गज मोती हरबा रे देबै।
सातों ही भैया के एके बहनिया अझोला।।
सात भाईयों की सिर्फ एक बहन है अझोला। सातों भाई परदेश गए हैं काम करने के लिए। लौटते हुए सभी अपनी-अपनी पत्नियों के लिए सौगात के रूप में सात रंगों वाली चोली लेकर आए हैं, परन्तु अझोला के लिए वे लोग लहंगा-पटोरी(लहंगा-चूनरी) लेकर आए हैं।
3. एके रे कोठरिया में दोनों रे सौतीनियां
दोनों रे सौतीनियां
दोनों मिली करल झगड़ा रे साम्भरिया
किनका क मारल, किनका गरियाएल,
किनका क हृदय लगावल हे साम्भरिया।।

एक ही कमरे में दो सौतनें अपने पति के साथ रहती हैं। दोनों आपस में झगड़ती रहती हैं। पति किसे मारता है और किसे हृदय से लगाता है? यह बड़े उत्सुकता की बात है।
4. उत्तर-दक्खिन स ऐलै चूड़ी दरबा
बैठी ही गेलै चूड़ीदार बीच ही एंगनमा
बैठी ही गेलै चूड़ीदार बीच ही एंगनमा।
मचिया बैठली तोहूं सासू ठकुरैनिया
पसीन करो न सासू, हरे-हरे चूड़िया।।
उत्तर-दक्षिण दिशाओं से चूड़ी बेचनेवाला आया है। वह आंगन में अपने चूड़ियों को बिछाकर बैठ गया है। सासू ठाकुरानी जी मचिया पर बैठी चुड़ीयां देख रही है। बहू सास से कहती है,- कृपया हरे-हरे रंग की चूड़ियां पसंद करो ना सासू जी।
-प्रीतिमा वत्स

फोटोग्राफ- राजेश त्रिपाठी

Friday, May 28, 2010

बिहार के लोक नृत्य


बिहार के लोक नृत्यों की फेहरिस्त काफी लंबी है, उनमें से कुछ के बारे में संक्षिप्त परिचय इस पोस्ट के माध्यम से दे रही हूं। प्रत्येक के बारे में विस्तार से पुनः एक-एक कर लिखूंगी।

1. नारदी-

यह एक कीर्तनिया नाच है। इसमें परंपरागत साज मृदंग एवं झाल का प्रयोग किया जाता है। कीर्तनकार इस नृत्य के दौरान विभिन्न प्रकार के स्वांग किया करते हैं।
2. गंगिया -
गंगा बिहार की प्रमुख ही नहीं, अपितु पतित पावनी भी कहलाती है। इसके स्नान से मानवों का समस्त पाप धुल जाता है। गंगा स्तुति महिलाओं के द्वारा नृत्य के माध्यम से की जाती है जिसे गंगिया नृत्य की संज्ञा दी गयी है।
3. मांझी -
नदियों में नाविकों द्वारा यह गीत नृत्य- मुद्रा में गाया जाता है।
4. घो-घो रानी -
छोटे-छोटे बच्चों का खेल, जिसे लोक शैली में घो-घो रानी कहा जाता है। इस नृत्य में एक लड़की बीच में रहती है तथा चारों तरफ से बांकी लड़कियां गोल घेरा बनाकर गीत गाती हैं, और घूमती हैं।
5. गोढ़िन -
इसमें मछली बेचने वाली तथा ग्राहकों का स्वांग किया जाता है।
6. लौढ़ियारी -
इसमें नायक, जो एक किसान होता है, अपने बथान (गाय-भैंस बांधने की जगह) पर भाव-भंगिमाओं के साथ गाता और नाचता है।
7.धन कटनी -
फसल कट जाने के बाद किसान सपरिवार खुशियां मनाता हुआ गाता और नृत्य करता है। जो धनकटनी नाच के नाम से प्रसिद्ध हो गया है।
8. बोलबै -
यह नृत्य बिहार के भागलपुर तथा उसके आस-पास के इलाकों में प्रचलित रहा है, इसमें पति के परदेश जाते समय का प्रसंग होता है।
9. सामा-चकेबा-
यह नृत्य मिथिला का एक प्रमुख नृत्य है। इसमें औरतें एवं लड़कियां अपने भाइयों के हित के लिए इसे कार्तिक मास में करता हैं।
10. घांटो -
अतिथि देवता होता है, परंतु जब घर में कुछ खाने का न हो तब अतिथि क्या होता है । यह तो शायद सभी जानते हैं। इस नृत्य में ससुराल में रह रही गरीब बहन को जब भाई के आने की सूचना मिलती है तो वह काफी खुश हो जाती है लेकिन खाने का आभाव उसे परेशान कर देता है। सत्कार के चिंता में विरह गीत गाया जाता है तथा बेचैनी भरा थोड़ा नृत्य भी होता है।
11. झिझिया -
यह नृत्य तंत्र-मंत्र तथा डायन से संबंधित है। राजा-रजवाड़े का सीन भी दिखाया जाता है। मिथिला का बहुत ही प्रचलित नृत्य है।
12. इन्नी-विन्नी -
यह अंगिका का प्रमुख नृत्य है। इसमें पति-पत्नी प्रसंग पर महिलाएं नृत्य करती हैं।
13. डोमकछ-
अपने यहां शादी-ब्याह के अवसर पर महिलाएं डोमकक्ष का नृत्य करती हैं। जब बारात दुल्हन के घर की तरफ रवाना हो चुकी होती है और घर पर सिर्फ महिलाएं हीं रह जाती हैं तो वे लोग पुरुषों का वेश बनाकर नृत्य नाटिका करती हैं।
14. देवहर -
देवहर देवी-देवता का प्रतिनिधित्व करता हुआ गीत एवं नृत्य है। यह संपूर्ण बिहार तथा झारखंड में प्रचलित हैं। कहीं-कहीं यह नृत्य भगता नाच के नाम से भी प्रसिद्ध है।
15. बगुलो -
उत्तर बिहार में बगुलो नृत्य बड़ा ही प्रचलित है। इसमें ससुराल से रूठकर जानेवाली एक स्त्री का राह चलते एक दूसरी स्त्री के साथ नोंक-झोंक का बड़ा ही सजीव चित्रण किया जाता है।
16. कजरी -
कजरी सावन के महीने में गाया और खेला जानेवाला एक नृत्य नाटिका है। जो सावन के सुहावने मौसम को और भी सुहावना बना देता है।
17. झरणी -
यह मुहर्रम के अवसर पर झूमते हुए गाये जाने वाला एक प्रकार का नृत्य और गीत है।

18. जट-जटिन -

पंजाब से आयातित यादवों के द्वारा गाया जानेवाला गीत और नृत्य जट-जटिन के नाम से प्रचलित है। यह सामान्यतया इन्द्र भगवान को मनाने के लिए वर्षा ऋतु में किया जाता है।
19. होरी - बसंत के आगमन पर गाया जाता है होरी। यह गीत और नृत्य होली के दिन अपने चरम पर होता है।
20. बसंती-

यह पतझड़ के बाद बसंत ऋतु के आगमन पर गाया जाता है। इन गीतों को प्रायः महिलाएं ही गाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स


Wednesday, May 5, 2010

जंतसार


आज की रेडी टू इट वाली जिन्दगी में भले ही यह अटपटा लगता है, लेकिन कुछ दशक पहले तक गांव की औरतों की जिन्दगी काफी मेहनत मशक्कत करने वाली थी। घर लीपने से लेकर अनाज तैयार करने तक का सारा काम घर की स्त्रियों के जिम्मे हीं होता था। ऐसे में अपनी थकावट दूर करने तथा मन की व्यथा को कुछ हद तक गीतों के माध्यम से निकालती थीं। इन गीतों में अक्सर घरेलू जीवन के संघर्ष तथा सामाजिक समस्याओं का जिक्र होता था। यह बात अलग है कि शारीरिक श्रम उनके स्वास्थ्य के लिए काफी हद तक फायदेमंद ही साबित होता था। चक्की पीसना इन कामों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम था। इसे वह अक्सर दोपहर के समय जब घर के सभी लोग आराम कर रहे होते करती थी। काम के साथ जो गीत वह गाती रहती थीं उन्हें जंतसार कहा जाता है। प्रायः इन गीतों को अकेले हीं गाया जाता था। अब तो इन गीतों को गानेवाले भी विरले हीं मिलते हैं -

1. पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।
एंगना में कुइंया खनाय देहो हो दियोरे
बांटी देहो रेशम के डोर
पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।
चैत बैशाख के धूपवा बड़ी तेज
एंगना में चंदोवा लागय देहो हो दियोरे
जरत नरमियो मोर गोड़
पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।

अर्थ- इस गीत में भाभी अपने देवर से अपनी समस्याओं के बारे में बता रही है। पूरब की हवा बहुत तेज रफ्तार से बहती है और जब पछिया हवा बहती है तो अंधकार छा जाता है। पानी लाने के लिए दूर जाती हूं तो परेशान हो जाती हूं। आंगन में ही आप एक कुआं खुदवा दो और साथ में रेशम की डोरी भी ला दो। चैत-बैशाख के महीने में जब कड़ाके ही धूप पड़ती है तो मेरे पांव गर्मी से छिल जाते हैं।आप आंगन में चंदोवा लगवा दो जिससे कि मैं आराम से घर के सारे काम निबटा सकूं।

2. पनमा जे खैले डोमनिया गे
मिसिया जे लगोले निसिया सुरतिया
डोमिन गे राजा के बेटा लुभावल
जेहूं तोहं राजा-बेटा हे निसिया हे लुभैयले
पनमा काहे खैले डोमनिया गे
मिसिया काहे लगौले निसिया सुरतिया
डोमिन गे राजा के बेटा लुभावल

अर्थ- इस गीत में डोम जाति की एक लड़की की चर्चा की गई है। सांवली सूरत पर काजल लगाकर पान खाकर जब वह निकलती है तो उस नगर का राजकुमार भी उसके सौन्दर्य पर आकर्षित हो जाता है। गीतो के माध्यम से ही डोमिन की बेटी से पूछा जाता है कि तुमने ये कैसा कहर कर दिया । आंखों में काजल लगाकर,पान खाकर क्यों निकली।

3. रैयो खेत में रैया हे
मसूरियो खेत में हेरैले रे ना
सासू बेसरी हे हेरैले ना
एतना हे सुनिये सासू
उठली रिसैली रे ना।
हंसुली खोजी अइहैं न त
कलेवा नाहीं दियवो रे ना।

अर्थ- इस गीत में गाने वाली खुद अपनी आपबीती सुना रही है। सरसों के खेत में सरसों लगा हुआ था, और मसूर के खेत में मसूर। मैं तो बस घास छीलने गई हुई थी। वहीं पर मेरी हंसुली न जाने कहां खो गई। सास ने जब यह बात सुनी तो काफी नाराज हो गई और कहने लगी, जाओ और हंसुली खोजकर लाओ, जब तक हंसुली लेकर नहीं आती तुम्हें खाना नहीं मिलेगा।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, April 23, 2010

है ऐसे मनाया जाता भांजो

पश्चिम बंगाल के ज्यादातर गांवों में बांग्ला भाद्र महीने के आते हीं भांजो नामक फसल की देवी की पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है। यह पर्व फसल के अच्छी पैदावार की कामना से की जाती है। संभवतः भांजो शब्द भाद्र महीने के नाम से निकला है जिस महीने में यह पूजा की जाती है। यह पूजा शुक्ल पक्ष में द्वादशी को की जाती है। इस दिन गांव की कुछ अविवाहित युवतियां गांव से बाहर किसी जगह मिट्टी के पिंड एकत्र करती हैं। इसी प्रकार पड़ोस के गांवों के कुछ युवक भी उसी जगह आते हैं और ये दोनों दल आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। कुछ देर तक वे अपनी-अपनी जगह पर खड़े रहकर नाचते-गाते हैं, जिसके बाद कोई एक दल पीछे हट जाता है। इस पर दूसरा दल कुछ आगे बढ़कर मिट्टी के कुछ पिडों को उठा लेता है और विजय के गीत गाते हुए गांव लौट जाता है। इस दल के लौट जाने के बाद दूसरा दल अपने हिस्से के पिंड एकत्र करता है। यह दो प्रतिस्पर्धी गांवों के बीच लड़ाई का प्रतीक है, जिसमें कोई एक जीतता और दूसरा दल हारता है। किंवदन्ती है कि पुराने जमाने में गांवों के वयस्क पुरुष भी अपने-अपने दलों के साथ इस नकली लड़ाई में भाग लेते थे। कुछ गांवों में युवतियों के दल के साथ गांव के छोटे लड़के भी आते हैं।
युवतियां मिट्टी के पिंडों को गांव के सार्वजनिक पूजा-स्थल पर ले जाती है। वे इसमें से सभी प्रकार के कंकड़-पत्थर निकालकर साफ करती हैं। चूहों के बिलों और परित्यक्त घरों से कुछ और मिट्टी लेकर इसमें मिला दी जाती है। इसके बाद मिट्टी को पीतल या मिट्टी की थालियों में भरकर उसके ऊपर दो तरह की दालों और जौ के बीज, सनई(जूट) का पौधा और सरसों डाल दिया जाता है। इसे शस्य पाता कहा जाता है। कहीं-कहीं पर इसे आंकुर थापना भी कहा जाता है। इसके बाद इन थालियों को किसी पवित्र स्थान पर, अकसर तुलसी या पीपल के पौधे की छाया में रख दिया जाता है। इन युवतियों में से कोई एक प्रतिदिन प्रातः स्नान करके इन बीजों को सींचने का भार उठाती हैं। सिंचाई का यह क्रम पूरे एक सप्ताह तक चलता है, तब तक बीज फूटकर पौधे कुछ हो जाते हैं। आठवें दिन पूजा-स्थल पर बनाए गए मिट्टी के टीले को इस प्रकार ढंका जाता है जिससे वह किसी स्त्री के पुतले-सा दिखाई दे। इस पुतले को फूलों से सजा दिया जाता है। संध्यासमय इन पौधों को टीले के चारों ओर रख दिया जाता है और पुरोहित को बुलाकर उससे पूजा कराई जाती है और युवतियां घेरा बनाकर टीले और थालियों के चारों ओर नाचने लगती हैं। वे नाचते हुए नगाड़े और कांसे के बने अन्य बाजे बजाकर लोकगीत भी गाती हैं। कभी-कभी इन नृत्यांगनाएं संगीत रोककर भांजो के उपर रची अनगढ़ कविताओं का पाठ भी करती हैं। इसके बाद युवतियां अपने-अपने घर लौटती हैं। अगली सुबह वे फिर उसी जगह पर नाचने-गाने के लिए जुटती हैं। कुछ देर तक नाच-गा लेने के बाद वे स्त्री के पुतले और बीजों के फूटने से उगे पौधों को लेकर नाचते-गाते हुए किसी नदी या तालाब के तट पर ले जाती हैं। भांजो से प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि-
इस रास्ते से जाओ, भांजो
इस रास्ते से जाओ,
बेना के वृक्ष में कौड़ी है
उसे देकर दूध खरीदो
पानी के पास पहुंचने पर वे स्त्री के पुतले को पानी में बहा देती हैं। थालियों में रखी मिट्टी फेंक दी जाती हैं, लेकिन पौधों को पानी से साफ करके वे घर लाती हैं। इनमें से कुछ पौधे घरों के छाजन में खोंस दिए जाते हैं और कुछ मवेशियों को खिला दिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि घरों के छाजन में टंगी रहने के कारण पूरा घर अन्न और धन से भरा रहता है और मवेशियों को खिलाने से मवेशी खुशहाल रहते हैं, गाय-भैंस हों तो ज्यादा दूध देती हैं।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 6, 2010

प्रकृति को समर्पित मेरी दो नयी पेंटिंग


20X30inch,Acrylic on canvas,title- beauty of nature,by-Pritima Vats
16X24inch, water colour on paper,title-beauty of nature,by-Pritima Vats

Tuesday, February 16, 2010

मेरी कुछ नयी पेंटिंग

जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंच
जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंच
जादोपेटियन कला में कुछ नया प्रयोग,24X36 इंच

Saturday, January 30, 2010

भिटौली की कथा


उत्तराखण्ड के करीब-करीब हर गाँव में भिटौली की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है। पहाड़ों पर चैत के महीने में एक चिड़िया कुई-कुई बोलती है। इसे घुघुती कहते हैं। भिटौली (उपहार) के साथ इसका मोहिल सम्बन्ध है। यह लोक कथा इस प्रकार है, एक गांव में देबुली नाम की लड़की रहती थी। उसका एक भाई था नरिया, देबुली अपने भाई को बहुत प्यार करती थी। एक दिन देबुली के पिता ने देबुली की शादी सात नदी, सात पहाड़ दूर एक गांव में तय कर दी। अपनी शादी की खबर और नरिया का बिछोह देबुली को खलने लगा। वह दिन-रात आंसू बहाती रहती। एक दिन विवाह का मुहूर्त आ ही गया। बारात आ गई। विदा होने पर उसका भाई नरिया यह विदाई सहन नहीं कर सका और खूब रोने लगा। तब दुल्हन बनी देबुली ने नरिया के आँसू पोछते हुए कहा कि रो मत भैया, जब चैत्र का महीना नजदीक आयेगा, उस समय तू मुझसे मिलने आना व भिटौली लाना, भैया मैं ससुराल में तेरी राह देखूंगी। यह सुनकर नरिया ने जैसे-तैसे अपने आंसू रोके और देबुली को विदा किया।
चैत्र का महीना आया। नरिया की माँ ने देबुली के लिए भिटौली तैयार की। एक बड़ी टोकरी में पूरी,सिंगल,मिठाई,फल,अक्षत-पिठ्या(रोली) के अलावा कपड़े-लत्ते रखे। नरिया से कहा- जा रे नरिया मेरी इकलौती प्यारी देबुली को भिटौली देकर आ। वो तेरी राह देखती होगी। भिटौली की आस लगाये होगी और बहुओं की भिटौली आते देखकर रोती होगी। बेटा तू आज ही चला जा और अपनी देबुली दीदी को भिटौली देकर उसकी नाराजगी दूर कर आ।
नरिया ने खुशी-खुशी नये कपड़े कुर्ता, पाजामा, टोपी पहनी। अपनी दीदी के लिए चूड़ी,माला,बिन्दी खरीद कर लाया। सिर पर भिटौली की टोकरी रखकर "चैत को भेटणा दीदी चैत को भेटणा" (मैं आ रहा हूँ) गुनगुनाते रवाना हुआ। जाते-जाते उसे चार पांच दिन लग गये। सात नदी पार, सात पहाड़ पार, सात पट्टी पार उधर उसकी दीदी भाई की राह देखती रही। चलते-चलते नरिया शुक्रवार की रात देबुली के ससुराल पहुंचा। उसने देखा देबुली दीदी सो चुकी है। नरिया ने सोई हुई देबुली के पैर छुए व भिटौली की टोकरी एक ओर रख दी। थका मांदा, भूखा-प्यासा नरिया थोड़ी ही देर में सो गया। सुबह उजाला होने में काफी देर थी। नरिया की नींद खुल गई। उसने देखा देबुली गहरी नींद में सोई हुई है। अचानक उसे ख्याल आया कि आज शनिवार है। शनिवार का दिन शुभ काम के लिए अशुभ होता है। यह उसकी माँ ने समझाया था कि शनिवार का दिन पड़ेगा तो देबुली के घर मत जाना। ये सब सोचते-सोचते नरिया ने निर्णय लिया और अक्षत-पिठ्या निकाल कर देबुली दीदी के पैर छुए, भेटणे की टोकरी वहीं रखकर बिना देबुली को बताए निकल पड़ा घर की ओर। जब काफी दूर निकल गया तब देबुली की नींद खुली। नींद खुलने से पहले वह एक सपना देख रही थी कि उसका भाई आया है भेटणा लेकर और उसके पैर छू रहा है। सपना टूटा देबुली की नींद खुल गई, उसने देखा सचमुच रंग-बिरंगी भेटणे की टोकरी है। वह चौंक गई,पास में भाई को ना देखकर नरिया-नरिया चिल्लाती हुई दूर-दूर तक अपने भाई को देखने गई। पर भाई का कहीं पता न चल सका। बड़े अफसोस के साथ कहने लगी-हाय मेरा भाई। इतनी दूर से आया, मैं सोती रही। भूखा-प्यासा भिटौली लेकर आया, मैं सोती रही। यह सोचती-सोचती देबुली भीतर-ही-भीतर मन को बहलाती आंसू बहाती। देबुली का मन इस आघात को बर्दाश्त नहीं कर पाया। भाई व भिटौली की भेंट का दुःख सम्भाल नहीं सकी देबुली और उसके प्राण निकल गए।
यह भिटौली का त्योहार कुमाऊं क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण है। आज भी इस त्योहार में लड़कियों को सम्मानपूर्वक मायके बुलाकर भिटौली(उपहार) दी जाती है। जो बहन दूर है, आने में असमर्थ है, भाई उसे वहीं भिटौली पहुँचाता है।
-प्रीतिमा वत्स

Saturday, December 19, 2009

धर्म और आस्था का प्रतीक गौरी नृत्य

राजस्थान के आदिवासियों की विभिन्न आंचलिक लोक नृत्यों की श्रृंखला में गौरी नृत्य का विशेष स्थान है। इस नृत्य में मनोरंजन के साथ-साथ धार्मिक परंपरा का विशेष रूप से समावेश किया गया है। अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए किया जानेवाला यह नृत्य राजस्थान और गुजरात में बसे भीलों में काफी प्रचलित हैं। वैसे भीलों के साथ-साथ गिरासिया और गमेटी जनजाति के लोगों में भी यह नृत्य बहुत लोकप्रिय है।
गौरी नृत्य वास्तव में लोक नृत्य-नाटिका है। जिसमें 15-20 से लेकर 30-40 पात्रों का समूह अपना किरदार अदा करता है। गौरी नृत्य की पृष्ठभूमि और कथानक किसी न किसी रूप में लोक कथाओं और घटनाओं पर आधारित होती है। इस नृत्य में औरतें भाग नहीं लेतीं। पुरुष ही स्त्रियों की भूमिका निभाते हैं। ग्रामवासियों का समूह ढोल, मजीरा,डमरू, कांसे की थाली जैसे साजों की धुनों पर थिरकता हुआ जैसे ही गांव में प्रवेश करता है तो समूह का जोरदार स्वागत किया जाता है। धूप-अगरबत्ती से मां गौरी की अर्चना की जाती है तथा इसके साथ ही नृत्य की शुरुआत होती है।
आदिवासी समाज में आज भी यह मान्यता है कि यदि कुल देवी नाराज हो जाएं तो समाज को घोर संकट का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि आज भी ये इस सम्भावित विपदा से छुटकारा पाने के लिए गांव के लोगों से चन्दा इकट्ठा करते हैं तथा गौरी पूजा के लिए भक्तों को आमंत्रित करते हैं। इन भक्तों को स्थानिय भाषा में भोपा भी कहते हैं। गौरी नृत्य सावन और भादो मास के प्रथम पक्ष में ही आयोजित किया जाता है। आयोजन तक लोग खेती-बाड़ी के काम से मुक्त हो जाते हैं। खुशहाल खेतों को देखकर आदिवासियों का मन प्रफुल्लित हो उठता है और वे पूरे उत्साह से नृत्य में शामिल होते हैं। यह नृत्य सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किए जाते हैं सवसे पहले गौरी के निशान की स्थापना होती है। उस स्थान में त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया जाता है। मां की स्तुति गायन के साथ समूह का एक वृद्ध भक्त अन्य कलाकारों के साथ वृत्ताकार परिधि में उनके विपरीत दिशा में घूमता हुआ नृत्य करता है। इसे बुढिया के नाम से पुकारा जाता है। इन सभी कलाकारों में यह वृद्ध कलाकार मुखौटा लगाकर घुंघरु बांधकर सब लोगों से अलग दिखता है। लोग नृत्य करते हुए झूमने लगते हैं। यहां के लोगों का विश्वास है कि नृत्य के दौरान देवी किसी एक भोपे के शरीर में प्रविष्ट होती है। उसका शरीर कांपने लगता है तथा थोड़ी देर के लिए उसकी शक्ल बड़ी अजीब सी हो जाती है। अर्धमूर्छित अवस्था में भोपा झूमने लगता है और मुँह से तरह-तरह की आवाजें निकालता है। इसके बाद बुढ़िया जिसे मुख्य भावधारी भी कहते हैं, उस गांव की समस्याओं के बारे में बात करता है। उसके निवारण का उपाय सुझाता है। कुछ देर बाद यह नृत्य अपना धार्मिक और पौराणिक जामा त्यागकर मनोंरंजन का रूप ले लेता है। हंसी और उल्लास से सारा वातावरण तरो-ताजा हो जाता है। तरह-तरह के मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गौरी नृत्य के ही दौरान अनेक नाटिकाओं का मंचन किया जाता है। नृत्य में पात्रों को मूलतः चार भागों में बांटते हैं। कुछ देव पात्र तो कुछ मानव पात्र होते हैं। ये सब पात्र अपनी भूमिकाएं बड़ी मेहनत से निभाते हैं। नृत्य के पश्चात समाज के वृद्ध गण कलाकारों को कुछ पुरस्कार भी देते हैं।
और इस तरह हँसी खुशी के माहौल में नृत्य उत्सव का समापन होता है।
-प्रीतिमा वत्स

Sunday, September 13, 2009

दिवाल चित्रण की संथाली शैली


संथाल आदिवासियों में दिवाल चित्रण की एक समृद्ध परंपरा रही है। इतिहास को तलाशें या फिर मानवीय. सौन्दर्य की अनुभूति की बात करें तो चित्रांकन की प्रवृति आदिम प्रवृति से जुड़ी हुई है। दिवाल चित्रण का पहला उदाहरण गुफा चित्र के रूप में पाते हैं। भारत के इतिहास में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के निकट कैमूर की पहाड़ियों में अंकित चित्र को पहली उपलब्धि के रूप में देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बांदा तथा मध्य प्रदेश के रायगढ़,होशंगाबाद,भोपाल आदि जगहों पर गुफा चित्र मिले हैं। बिहार के संदर्भ में शाहाबाद,चक्रधरपुर,राजगृह तथा इस्को के गुफा चित्रों को ले सकते हैं। रामायण और महाभारत काल में भवनों के वर्णन में दिवाल चित्रण की भी व्याख्या मिलती है।
संथाल आदिवासियों के चित्रों को दो क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है- एक संथाल परगना का क्षेत्र और दूसरा छोटानागपुर। इन दोनों क्षेत्रों के रहन-सहन, आचार-विचार,जीवन शैली में भिन्नता के साथ-साथ चित्र बनाने के तकनीक तथा आकार में भी भिन्नता है।
संथाल परगना के दिवाल चित्र में प्राचीन तथा परंपरागत शैली ज्यादातर देखने को मिलती है वहीं छोटानागपुर के इलाकों में आधुनिकता का भाव हावी रहता है। संथाल परगना के चित्र जहां दीवाल से थोड़ा उभार लिए हुए होते हैं वहीं छोटानागपुर के चित्र समतल होते हैं तथा इनमें रंगों की प्रधानता होती है।
संथाल परगना के चित्रों में जहां मोर, मछली, ज्यामीतिय आकार के फूल तथा बेलों की प्रधानता अभी भी देखने को मिलती है वहीं छोटानागपुर के चित्रों में तरह-तरह के फूल,बस, एरोप्लेन आदि भी बनने लगे हैं।
दिवाल चित्रण का कार्य ज्यादातर सोहराय पर्व के अवसर पर किया जाता है। यह पर्व जनवरी के महीने में मनाया जाता है। कृषि के काम से निवृत होने के बाद जब ये लोग फसल अपने घर ले आते हैं तब थोड़ा फुर्सत का समय होता है। महिलाएं तनमयता से अपने-अपने घरों का मरम्मत करने में जुट जाती हैं। बारिश में खराब हुए दीवरों को अपने कुशल हाथों से संवारती हैं। फोताहोसा (घर लिपाई की एक खास मिट्टी) से घरों को लिपने के साथ हीं यह तय कर लिया जाता है कि किस दिवाल तथा दरवाजों के ऊपर कौन सी आकृतियाँ बनाई जाएंगी। उभार वाले चित्र के लिए डिजाइन के अनुरूप कच्चे दिवाल पर खुरपी, करनी तथा अन्य सहायक उपकरणों की मदद से मिट्टी को काट कर आकृति को उभारा जाता है। यह विधि झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में काफी प्रचलित है। छोटानागपुर में प्रायः चित्र समतल बनाए जाते हैं। दिवाल की सतह पर सफेद खड़िया की सहायता से डिजाइन बनाया जाता है, फिर रंग भरा जाता है। रंग भी करीब-करीब सभी प्राकृतिक ही होते हैं। झारखंड के जमीन की यह विशेषता ही है कि यहां लाल, पीली, काली, सफेद कई तरह की मिट्टी मिलती है। जिसे यहां के स्थानीय निवासी अपने हिसाव से विभिन्न उपयोगों में लाते हैं। घर लीपने से लेकर सर के बाल धोने तक के कामों ये मिट्टी उपयोगी होते हैं।
आधुनिकता की हवा और बाजार के बयार के बावजूद भी संथाली दिवाल चित्रण की शैली अपनी कुछ खास विशेषताओं के कारण भीड़ से अलग दिखती है। जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि संथाल आदिवासियों के पास अलंकरण के प्रति एक दृष्टि है।

-प्रीतिमा वत्स

चित्रकारी कोहबर की


बिहार के मिथिला तथा सम्पूर्ण मैथिली समाज में शादी के मंडप के साथ-साथ कोहबर का भी बड़ा हीं महत्व है। कोहबर ही वह जगह होती है जहां शादी की रात दुल्हे के द्वार लगने से पहले तक दुल्हन गौरी मां की पूजा करती है। गणपति जी की चित्रकारी से शुरु होकर तरह-तरह के बेल-बूटे से सजाया जानेवाला कोहबर जितना सुन्दर लगता है उतना ही गूढ़ अर्थ भी रखता है। गणपति भगवान विघ्नहर्ता माने जाते हैं इसलिए इनकी तस्वीर कोहबर के बीच में बनाई जाती है। इसके बाद बांस का झुरमुट बनाया जाता है। बांस बहुत जल्दी बढते हैं तथा इसका मूल जल्दी नष्ट नहीं होता है। इसे आधार मानकर नवदम्पत्ति के सुखद वंश वृद्धि की कामना की जाती है। बांस के बाद कमल के फूल और पत्तों को बनाया जाता है। कमल कीचड़ में खिलकर भी बेहद खूबसूरत होता है। इसके पत्तों पर पानी की एक बूंद भी ठहर नहीं पाती है। इस फूल की विशेषता के आधार पर नवदम्पत्ति के सुखद जीवन की कामना की जाती है। जिन्दगी के उतार-चढ़ाव के बीच भी ये कमल की तरह दमकते रहें ऐसी कामना की जाती है। कोहबर में मंगल कलश का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है।
कोहबर में प्रथम प्रजापति माना जानेवाला तितली भी अवश्य ही चित्रित किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के फूल तथा चिड़ियां भी बनाए जाते हैं। जो अपना-अपना विशेष महत्व लिए हुए होते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल

दशहरा के आते ही झूम उठता है हमारा गांव। देवी मां के मंडप पर तरह-तरह के लोक गीत गाए जाते हैं, वह सारे गीत मुझे इतने अच्छे लगते हैं कि मन ही नहीं होता कि वहां से उठकर कहीं इधर-उधर जाया जाए। वैसे तो झारखंड के गांवों में भी देवी के फिल्मी गातों को बजाने की शुरुआत काफी पहले से हो चुकी है। पर मुझे लगता है मेरे ससुराल (मोतिया,झारखंड) का वह एक ऐसा मंडप है जहां मुहल्ले भर के पुरुष और महिलाएं इकट्ठे होकर खुद हीं दुर्गा मां की पूजा करते हैं और गीत-भजन वगैरह गाते हैं। आज भी वहां केले के पेड़ से मां की आकृति बनाई जाती है और तांत्रिक विधि से मां की पूजा होती है।

1.
कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल
कौनी दिन परिचार,
हे देवी कौनी दिन परिचार हे।
पड़िबा दिन देवी जनम तोहार भेल,
दुतिया लेल परिचार
हे देवी, दुतिया लेल परिचार हे।
तिरतिया दिन देवी तीनों लोक तारल,
चौठी चरण पखार हे देवी चौठी चरण पखार हे।
पंचमी खष्टी देवी नाग नचावली,
सप्तमी करल उद्धार हे देवी सप्तमी करल उद्धार हे।
अष्टमी दिन देवी आठो भुजा धरलिनी,
नौमी नाक श्रृंगार हे देवी, नौमी नाक श्रृंगार हे।
दशमी दिन देवी दसो भुजा धरलिनी,
आरो यल बिदाई हे देवी आरो लियल विदाई हे।
आपहु हंसे देवी लोगों को हंसाए, हंसे जगत-संसार हे देवी, हंसे जगत-संसार हे।

इस गीत में मां के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। लोक में नवरात्रों के नौ दिन में मां के अलग अलग रूप होते हैं। जन्म से लेकर दसो भुजा धारण करने की पूरी व्याख्या है इस गीत में।
2
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै देवी स् विवाह है कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, है कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
शोणित पिबिये मैया खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार हे कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पाचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
इस गीत में देवी मां के पांच कुवांरी बहन होने की बात कही गई है। महिषासुर वध करके किस प्रकार मां उसका रक्त पीतीं हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं इसकी भी व्याख्या है इस प्यारे से गीत में।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, September 3, 2009

लोक में जीतिया


आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका अथवा जीतिया का व्रत सम्पन्न किया जाता है। इस व्रत को मुख्यतः वही स्त्रियाँ करती हैं, जिनके पुत्र होते हैं। यह व्रत पुत्र के दीर्घायु तथा आरोग्य के लिए किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार,झारखंड, मध्यप्रदेश ,आदि क्षेत्रों में स्त्रियों के बीच यह बहुत हीं लोकप्रिय व्रत है। यह एक ऐसा व्रत है जिसमें सूर्य भगवान की पूजा के साथ-साथ ही अपने पुर्वजों की भी उपासना की जाती है।
इस व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा है। जिसे व्रत करनेवाली स्त्रियां बड़े प्रेम से सुनती हैं।
किसी जंगल में एक सेमर के वृक्ष पर एक चील रहती थी और उसी से कुछ दूर पर एक झाड़ी से भरी खंदक में एक सिआरिन की माँद थी। दोनों में बहुत पटती थी। चील जो कुछ शिकार करती उसमें से सिआरिन को भी हिस्सा देती और सिआरिन भी चील के उपकारों का यदा-कदा बदला चुकाया करती। वह अपने भोजन में से कुछ न कुछ बचाकर चील के लिए अवश्य लाती। इस प्रकार दोनों के दिन बड़े सुख से कट रहे थे।
एक बार उसी जंगल में पास के गाँव की स्त्रियां जिउतिया का व्रत कर रही थीं। चील ने उसे देखा। उसे अपने पूर्वजन्म की याद थी उसने भी यह व्रत करने की प्रतिज्ञा की। दोनों ने बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से व्रत को पूरा किया। दोनों दिन भर निर्जल और निराहार रहकर सभी प्राणियों की कल्याण-कामना करती रहीं। किन्तु जब रात्रि आई तो सिआरिन को भूख और प्यास से बेचैनी होने लगी। उसे एक क्षण काटना भी कठिन हो गया। वह चुपचाप जंगल की ओर गई और वहाँ शिकारी जानवरों के खाने से बचे माँस और हड्डियों को लाकर धीरे-धीरे खाने लगी। चील को पहले से कुछ भी मालूम नहीं था। किन्तु जब सिआरिन ने हड्डी चबाते हुए कुछ कड़-कड़ की आवाज की तो चील ने पूछा- बहिन तुम क्या खा रही हो ?
सिआरिन बोली- बहिन क्या करूँ ! भूख के मारे मेरी हड्डियाँ चड़मड़ा रही हैं ऐसे व्रत में भला खाना-पीना कहाँ हो सकता है।
किन्तु चील इतनी बेवकूफ नहीं थी। वह सब जान गई थी। उसने कहा- बहिन तुम झूठ क्यों बोल रही हो। हड्डी चबा रही हो और बताती हो कि भूख के मारे हड्डी चड़मड़ा रही है। तुम्हे तो पहले ही सोच लेना चाहिए था कि व्रत तुमसे निभेगा या नहीं।
सिआरिन लज्जित होकर दूर चली गई। उसे भूख और प्यास के कारण इतनी बेचैनी हो रही थी कि दूर जाकर उसने भर पेट खाकर खूब पानी पिया। किन्तु चील रात भर वैसे ही पड़ी रही। परिणाम भी उसी तरह हुआ। चील को जितने बच्चे हुए सभी स्वस्थ, सुन्दर और सदाचारी किन्तु सिआरिन के जितने बच्चे हुए वे थोड़े ही दिनों बाद मरते गए।

इसलिए स्त्रियां व्रतकथा सुनने के बाद यह कामना करती हैं कि चील की तरह सब कोई हों और सिआरिन की तरह कोई नहीं।

-प्रीतिमा वत्स

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...