Saturday, December 19, 2009

धर्म और आस्था का प्रतीक गौरी नृत्य

राजस्थान के आदिवासियों की विभिन्न आंचलिक लोक नृत्यों की श्रृंखला में गौरी नृत्य का विशेष स्थान है। इस नृत्य में मनोरंजन के साथ-साथ धार्मिक परंपरा का विशेष रूप से समावेश किया गया है। अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए किया जानेवाला यह नृत्य राजस्थान और गुजरात में बसे भीलों में काफी प्रचलित हैं। वैसे भीलों के साथ-साथ गिरासिया और गमेटी जनजाति के लोगों में भी यह नृत्य बहुत लोकप्रिय है।
गौरी नृत्य वास्तव में लोक नृत्य-नाटिका है। जिसमें 15-20 से लेकर 30-40 पात्रों का समूह अपना किरदार अदा करता है। गौरी नृत्य की पृष्ठभूमि और कथानक किसी न किसी रूप में लोक कथाओं और घटनाओं पर आधारित होती है। इस नृत्य में औरतें भाग नहीं लेतीं। पुरुष ही स्त्रियों की भूमिका निभाते हैं। ग्रामवासियों का समूह ढोल, मजीरा,डमरू, कांसे की थाली जैसे साजों की धुनों पर थिरकता हुआ जैसे ही गांव में प्रवेश करता है तो समूह का जोरदार स्वागत किया जाता है। धूप-अगरबत्ती से मां गौरी की अर्चना की जाती है तथा इसके साथ ही नृत्य की शुरुआत होती है।
आदिवासी समाज में आज भी यह मान्यता है कि यदि कुल देवी नाराज हो जाएं तो समाज को घोर संकट का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि आज भी ये इस सम्भावित विपदा से छुटकारा पाने के लिए गांव के लोगों से चन्दा इकट्ठा करते हैं तथा गौरी पूजा के लिए भक्तों को आमंत्रित करते हैं। इन भक्तों को स्थानिय भाषा में भोपा भी कहते हैं। गौरी नृत्य सावन और भादो मास के प्रथम पक्ष में ही आयोजित किया जाता है। आयोजन तक लोग खेती-बाड़ी के काम से मुक्त हो जाते हैं। खुशहाल खेतों को देखकर आदिवासियों का मन प्रफुल्लित हो उठता है और वे पूरे उत्साह से नृत्य में शामिल होते हैं। यह नृत्य सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किए जाते हैं सवसे पहले गौरी के निशान की स्थापना होती है। उस स्थान में त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया जाता है। मां की स्तुति गायन के साथ समूह का एक वृद्ध भक्त अन्य कलाकारों के साथ वृत्ताकार परिधि में उनके विपरीत दिशा में घूमता हुआ नृत्य करता है। इसे बुढिया के नाम से पुकारा जाता है। इन सभी कलाकारों में यह वृद्ध कलाकार मुखौटा लगाकर घुंघरु बांधकर सब लोगों से अलग दिखता है। लोग नृत्य करते हुए झूमने लगते हैं। यहां के लोगों का विश्वास है कि नृत्य के दौरान देवी किसी एक भोपे के शरीर में प्रविष्ट होती है। उसका शरीर कांपने लगता है तथा थोड़ी देर के लिए उसकी शक्ल बड़ी अजीब सी हो जाती है। अर्धमूर्छित अवस्था में भोपा झूमने लगता है और मुँह से तरह-तरह की आवाजें निकालता है। इसके बाद बुढ़िया जिसे मुख्य भावधारी भी कहते हैं, उस गांव की समस्याओं के बारे में बात करता है। उसके निवारण का उपाय सुझाता है। कुछ देर बाद यह नृत्य अपना धार्मिक और पौराणिक जामा त्यागकर मनोंरंजन का रूप ले लेता है। हंसी और उल्लास से सारा वातावरण तरो-ताजा हो जाता है। तरह-तरह के मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गौरी नृत्य के ही दौरान अनेक नाटिकाओं का मंचन किया जाता है। नृत्य में पात्रों को मूलतः चार भागों में बांटते हैं। कुछ देव पात्र तो कुछ मानव पात्र होते हैं। ये सब पात्र अपनी भूमिकाएं बड़ी मेहनत से निभाते हैं। नृत्य के पश्चात समाज के वृद्ध गण कलाकारों को कुछ पुरस्कार भी देते हैं।
और इस तरह हँसी खुशी के माहौल में नृत्य उत्सव का समापन होता है।
-प्रीतिमा वत्स

Sunday, September 13, 2009

दिवाल चित्रण की संथाली शैली


संथाल आदिवासियों में दिवाल चित्रण की एक समृद्ध परंपरा रही है। इतिहास को तलाशें या फिर मानवीय. सौन्दर्य की अनुभूति की बात करें तो चित्रांकन की प्रवृति आदिम प्रवृति से जुड़ी हुई है। दिवाल चित्रण का पहला उदाहरण गुफा चित्र के रूप में पाते हैं। भारत के इतिहास में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के निकट कैमूर की पहाड़ियों में अंकित चित्र को पहली उपलब्धि के रूप में देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बांदा तथा मध्य प्रदेश के रायगढ़,होशंगाबाद,भोपाल आदि जगहों पर गुफा चित्र मिले हैं। बिहार के संदर्भ में शाहाबाद,चक्रधरपुर,राजगृह तथा इस्को के गुफा चित्रों को ले सकते हैं। रामायण और महाभारत काल में भवनों के वर्णन में दिवाल चित्रण की भी व्याख्या मिलती है।
संथाल आदिवासियों के चित्रों को दो क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है- एक संथाल परगना का क्षेत्र और दूसरा छोटानागपुर। इन दोनों क्षेत्रों के रहन-सहन, आचार-विचार,जीवन शैली में भिन्नता के साथ-साथ चित्र बनाने के तकनीक तथा आकार में भी भिन्नता है।
संथाल परगना के दिवाल चित्र में प्राचीन तथा परंपरागत शैली ज्यादातर देखने को मिलती है वहीं छोटानागपुर के इलाकों में आधुनिकता का भाव हावी रहता है। संथाल परगना के चित्र जहां दीवाल से थोड़ा उभार लिए हुए होते हैं वहीं छोटानागपुर के चित्र समतल होते हैं तथा इनमें रंगों की प्रधानता होती है।
संथाल परगना के चित्रों में जहां मोर, मछली, ज्यामीतिय आकार के फूल तथा बेलों की प्रधानता अभी भी देखने को मिलती है वहीं छोटानागपुर के चित्रों में तरह-तरह के फूल,बस, एरोप्लेन आदि भी बनने लगे हैं।
दिवाल चित्रण का कार्य ज्यादातर सोहराय पर्व के अवसर पर किया जाता है। यह पर्व जनवरी के महीने में मनाया जाता है। कृषि के काम से निवृत होने के बाद जब ये लोग फसल अपने घर ले आते हैं तब थोड़ा फुर्सत का समय होता है। महिलाएं तनमयता से अपने-अपने घरों का मरम्मत करने में जुट जाती हैं। बारिश में खराब हुए दीवरों को अपने कुशल हाथों से संवारती हैं। फोताहोसा (घर लिपाई की एक खास मिट्टी) से घरों को लिपने के साथ हीं यह तय कर लिया जाता है कि किस दिवाल तथा दरवाजों के ऊपर कौन सी आकृतियाँ बनाई जाएंगी। उभार वाले चित्र के लिए डिजाइन के अनुरूप कच्चे दिवाल पर खुरपी, करनी तथा अन्य सहायक उपकरणों की मदद से मिट्टी को काट कर आकृति को उभारा जाता है। यह विधि झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में काफी प्रचलित है। छोटानागपुर में प्रायः चित्र समतल बनाए जाते हैं। दिवाल की सतह पर सफेद खड़िया की सहायता से डिजाइन बनाया जाता है, फिर रंग भरा जाता है। रंग भी करीब-करीब सभी प्राकृतिक ही होते हैं। झारखंड के जमीन की यह विशेषता ही है कि यहां लाल, पीली, काली, सफेद कई तरह की मिट्टी मिलती है। जिसे यहां के स्थानीय निवासी अपने हिसाव से विभिन्न उपयोगों में लाते हैं। घर लीपने से लेकर सर के बाल धोने तक के कामों ये मिट्टी उपयोगी होते हैं।
आधुनिकता की हवा और बाजार के बयार के बावजूद भी संथाली दिवाल चित्रण की शैली अपनी कुछ खास विशेषताओं के कारण भीड़ से अलग दिखती है। जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि संथाल आदिवासियों के पास अलंकरण के प्रति एक दृष्टि है।

-प्रीतिमा वत्स

चित्रकारी कोहबर की


बिहार के मिथिला तथा सम्पूर्ण मैथिली समाज में शादी के मंडप के साथ-साथ कोहबर का भी बड़ा हीं महत्व है। कोहबर ही वह जगह होती है जहां शादी की रात दुल्हे के द्वार लगने से पहले तक दुल्हन गौरी मां की पूजा करती है। गणपति जी की चित्रकारी से शुरु होकर तरह-तरह के बेल-बूटे से सजाया जानेवाला कोहबर जितना सुन्दर लगता है उतना ही गूढ़ अर्थ भी रखता है। गणपति भगवान विघ्नहर्ता माने जाते हैं इसलिए इनकी तस्वीर कोहबर के बीच में बनाई जाती है। इसके बाद बांस का झुरमुट बनाया जाता है। बांस बहुत जल्दी बढते हैं तथा इसका मूल जल्दी नष्ट नहीं होता है। इसे आधार मानकर नवदम्पत्ति के सुखद वंश वृद्धि की कामना की जाती है। बांस के बाद कमल के फूल और पत्तों को बनाया जाता है। कमल कीचड़ में खिलकर भी बेहद खूबसूरत होता है। इसके पत्तों पर पानी की एक बूंद भी ठहर नहीं पाती है। इस फूल की विशेषता के आधार पर नवदम्पत्ति के सुखद जीवन की कामना की जाती है। जिन्दगी के उतार-चढ़ाव के बीच भी ये कमल की तरह दमकते रहें ऐसी कामना की जाती है। कोहबर में मंगल कलश का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है।
कोहबर में प्रथम प्रजापति माना जानेवाला तितली भी अवश्य ही चित्रित किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के फूल तथा चिड़ियां भी बनाए जाते हैं। जो अपना-अपना विशेष महत्व लिए हुए होते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल

दशहरा के आते ही झूम उठता है हमारा गांव। देवी मां के मंडप पर तरह-तरह के लोक गीत गाए जाते हैं, वह सारे गीत मुझे इतने अच्छे लगते हैं कि मन ही नहीं होता कि वहां से उठकर कहीं इधर-उधर जाया जाए। वैसे तो झारखंड के गांवों में भी देवी के फिल्मी गातों को बजाने की शुरुआत काफी पहले से हो चुकी है। पर मुझे लगता है मेरे ससुराल (मोतिया,झारखंड) का वह एक ऐसा मंडप है जहां मुहल्ले भर के पुरुष और महिलाएं इकट्ठे होकर खुद हीं दुर्गा मां की पूजा करते हैं और गीत-भजन वगैरह गाते हैं। आज भी वहां केले के पेड़ से मां की आकृति बनाई जाती है और तांत्रिक विधि से मां की पूजा होती है।

1.
कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल
कौनी दिन परिचार,
हे देवी कौनी दिन परिचार हे।
पड़िबा दिन देवी जनम तोहार भेल,
दुतिया लेल परिचार
हे देवी, दुतिया लेल परिचार हे।
तिरतिया दिन देवी तीनों लोक तारल,
चौठी चरण पखार हे देवी चौठी चरण पखार हे।
पंचमी खष्टी देवी नाग नचावली,
सप्तमी करल उद्धार हे देवी सप्तमी करल उद्धार हे।
अष्टमी दिन देवी आठो भुजा धरलिनी,
नौमी नाक श्रृंगार हे देवी, नौमी नाक श्रृंगार हे।
दशमी दिन देवी दसो भुजा धरलिनी,
आरो यल बिदाई हे देवी आरो लियल विदाई हे।
आपहु हंसे देवी लोगों को हंसाए, हंसे जगत-संसार हे देवी, हंसे जगत-संसार हे।

इस गीत में मां के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। लोक में नवरात्रों के नौ दिन में मां के अलग अलग रूप होते हैं। जन्म से लेकर दसो भुजा धारण करने की पूरी व्याख्या है इस गीत में।
2
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै देवी स् विवाह है कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, है कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
शोणित पिबिये मैया खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार हे कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पाचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
इस गीत में देवी मां के पांच कुवांरी बहन होने की बात कही गई है। महिषासुर वध करके किस प्रकार मां उसका रक्त पीतीं हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं इसकी भी व्याख्या है इस प्यारे से गीत में।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, September 3, 2009

लोक में जीतिया


आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका अथवा जीतिया का व्रत सम्पन्न किया जाता है। इस व्रत को मुख्यतः वही स्त्रियाँ करती हैं, जिनके पुत्र होते हैं। यह व्रत पुत्र के दीर्घायु तथा आरोग्य के लिए किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार,झारखंड, मध्यप्रदेश ,आदि क्षेत्रों में स्त्रियों के बीच यह बहुत हीं लोकप्रिय व्रत है। यह एक ऐसा व्रत है जिसमें सूर्य भगवान की पूजा के साथ-साथ ही अपने पुर्वजों की भी उपासना की जाती है।
इस व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा है। जिसे व्रत करनेवाली स्त्रियां बड़े प्रेम से सुनती हैं।
किसी जंगल में एक सेमर के वृक्ष पर एक चील रहती थी और उसी से कुछ दूर पर एक झाड़ी से भरी खंदक में एक सिआरिन की माँद थी। दोनों में बहुत पटती थी। चील जो कुछ शिकार करती उसमें से सिआरिन को भी हिस्सा देती और सिआरिन भी चील के उपकारों का यदा-कदा बदला चुकाया करती। वह अपने भोजन में से कुछ न कुछ बचाकर चील के लिए अवश्य लाती। इस प्रकार दोनों के दिन बड़े सुख से कट रहे थे।
एक बार उसी जंगल में पास के गाँव की स्त्रियां जिउतिया का व्रत कर रही थीं। चील ने उसे देखा। उसे अपने पूर्वजन्म की याद थी उसने भी यह व्रत करने की प्रतिज्ञा की। दोनों ने बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से व्रत को पूरा किया। दोनों दिन भर निर्जल और निराहार रहकर सभी प्राणियों की कल्याण-कामना करती रहीं। किन्तु जब रात्रि आई तो सिआरिन को भूख और प्यास से बेचैनी होने लगी। उसे एक क्षण काटना भी कठिन हो गया। वह चुपचाप जंगल की ओर गई और वहाँ शिकारी जानवरों के खाने से बचे माँस और हड्डियों को लाकर धीरे-धीरे खाने लगी। चील को पहले से कुछ भी मालूम नहीं था। किन्तु जब सिआरिन ने हड्डी चबाते हुए कुछ कड़-कड़ की आवाज की तो चील ने पूछा- बहिन तुम क्या खा रही हो ?
सिआरिन बोली- बहिन क्या करूँ ! भूख के मारे मेरी हड्डियाँ चड़मड़ा रही हैं ऐसे व्रत में भला खाना-पीना कहाँ हो सकता है।
किन्तु चील इतनी बेवकूफ नहीं थी। वह सब जान गई थी। उसने कहा- बहिन तुम झूठ क्यों बोल रही हो। हड्डी चबा रही हो और बताती हो कि भूख के मारे हड्डी चड़मड़ा रही है। तुम्हे तो पहले ही सोच लेना चाहिए था कि व्रत तुमसे निभेगा या नहीं।
सिआरिन लज्जित होकर दूर चली गई। उसे भूख और प्यास के कारण इतनी बेचैनी हो रही थी कि दूर जाकर उसने भर पेट खाकर खूब पानी पिया। किन्तु चील रात भर वैसे ही पड़ी रही। परिणाम भी उसी तरह हुआ। चील को जितने बच्चे हुए सभी स्वस्थ, सुन्दर और सदाचारी किन्तु सिआरिन के जितने बच्चे हुए वे थोड़े ही दिनों बाद मरते गए।

इसलिए स्त्रियां व्रतकथा सुनने के बाद यह कामना करती हैं कि चील की तरह सब कोई हों और सिआरिन की तरह कोई नहीं।

-प्रीतिमा वत्स

Sunday, August 2, 2009

मिथिला में दामाद

दामाद तो हर जगह हर समाज में प्यारा होता है, परंतु मिथिला के दामाद की तो बात ही कुछ और होती है। मिथिला में दामाद की खादिरदारी ऐसे की जाती है मानों वह कोई आदमी नहीं भगवान उतर आए हैं धरती पर। दामाद गाँव में प्रवेश किये नहीं कि हर का हर जरुरी से जरुरी काम करीब-करीब बंद हो जाता है, फिर उनका एक हीं मकसद रह जाता है। उनका एक हीं मकसद रह जाता है अपने पाहुन की खातिरदारी करना। पूरे घर में हँसी-खुशी का माहौल छाया रहता है। सभी दामाद के इर्द-गिर्द हीं चक्कर काटते रहते हैं। किसी भी हाल में दामाद जी को कोई तकलीफ नहीं पहुँचना चाहिए। चाहे इसके पीछे कर्ज की भारी रकम हीं क्यों न लेनी पड़े। मिथिला के गाँवों में आज भी कमोबेश यह परंपरा जारी हैः-

पहुना अब मिथिले में रहुंना,
पहुना अब मिथिले में रहुंना।
जतने सुखवा ससुरारी में
ततने और कहूं ना,
पहुना अब मिथिले में रहुंना।
नित नवीन मनभावन व्यंजन,
सखी शलहज के गारी,
नित नवीन मनभावन व्यंजन,
सखी शलहज के गारी,
बार-बार धनि तोहरे निहारे,
आरो किछुओ,लहुना,
पहुना अब मिथिले में रहुंना।.............

शब्दार्थ- इस लोकगीत में दामाद से अनुरोध किया जा रहा है कि आप अब मिथिला में ही रह जाइए। जितना सुख ससुराल में मिलता है उतना और कहीं भी नहीं मिल सकता है। हर रोज तरह-तरह के मनभावन व्यंजन बनते रहते हैं। साली शलहज का मीठी-मीठी झिड़कियाँ सुनने को मिलती है। उसपर पत्नी बार-बार इस आसरे में खड़ी देखती रहती है कि कहीं किसी चीज की जरुरत तो नहीं, कुछ चाहिए तो नहीं।

-प्रीतिमा वत्स

Monday, July 27, 2009

दुबिया कहे हम जमबे करब


झारखंड के लोक में दूर्वा(हरीघास) का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। लोक कथाओं में इसे अमरत्व का वरदान प्राप्त है, तो लोकगीतों के माध्यम से भी इसकी महानता दर्शायी जाती रही है। ऐसी मान्यता है कि जिस जगह ये उपस्थित है वहाँ समृद्धि और सुख हमेशा रहेगा। इसलिए हर पारम्परिक उत्सव,पर्व-त्योहार तथा शुभ कार्यों में तुलसी की तरह ही दुर्वादलों का भी उपयोग किया जाता है।

दुबिया कहे हम जमबे करब।
आहो दुबिया कहे हम जमबे करब।।
कबो लतो तर परब, कबो जूतो तर परब।
श्री गणेश जी के सिर पर चढ़बे करब।।
दुबिया .........................................।
कतो खुरपी चले, कतो कुदाली चले।
दुई धार के हँसुआ से कटबे करब।
दुई यौवन के पेटवा हम भरवे करब।।
दुबिया.......................................।
नई दुल्हनिया के खोइचा हम भरबे करब।
हर सुहागिन के आशिष हम दियबे करब।।

दुबिया.......................................।




इस गीत के माध्यम से हरी-हरी घास जिसे हम दुर्वा भी कहते है, उसकी महत्ता को दर्शाया गया है।
दुर्वा कहती है, हम तो हर हाल में उगेंगे (जन्म लेंगे)। कभी पैर के नीचे पड़ती हूँ, कभी जूतों से कुचली जाती हूँ।
पर श्री गणेश जी के सिर पर तो चढ़ती ही हूँ।
कभी खुरपी से उखाड़ी जाती हूँ तो कभी कुदाली से।
कभी हँसुए (दराँती) से काटी जाती हूँ।
पर पशुओं का पेट मैं हमेशा भरती हूँ।
नई दुल्हिन का खोइचा मेरे द्वारा हमेशा भरा जाता है।
सुहागिनों को मैं हमेशा आशिर्वाद देती हूं।
दुर्वा कहती है, मैं हमेशा उगती (जन्म लेती ) रहूंगी।

-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, July 22, 2009

मनोरंजक राई गीत


गीत-1
फागुन महीने रंगीले घर आ जइयो राजा।
हाय-हाय रे घर आ जइयो राजा,
चार महीना जड़कारे के लागे,
थर-थर काँपे बिछौना में,
घर आ जइयो राजा।
चार महीन गरमी के लागे,
चोली भींजे पसीना में,
घर आ जइयो राजा।
चार महीना बरसा के लागे,
पानी जूंवे बिछौना में,
घर आ जइयो राजा।

गीत-2

श्याम मेरी गगरी उठाय जइयो,
फेर जा बैठ रइयो।
बड़े वजन की गागर हमारी,
गागर पे घेला धरांय जइये,
फेर जा बैठे रइयो।
संग की सहेली दूर निकर गई,
तनकई इशारो लगाये जइयो।
फेर जा बैठे रइयो।
जोड़ा मड़ोरी की लेज बनाई,
हाथों में लेज गहाय दइयो।
फेर जा बैठे रइयो।

गीत-3

तनक हँस बोल ल ये जलती बेरा।
कहाँ लगी बेरी, कहाँ लग मुनगा,
कहाँ लगे यार के हरियर केरा,
आंगन लगी बेरी, पछीत लगे मुनगा,
बागों लगे यार के जे हरियर केरा,
तनक हँस बोल ले ये चलती बेरा।

गीत-4

बेला के नये गोने आ गये रे, पलका लटका ले।
हाय-हाय रे पलका लटका ले।
कौना सा महीना में व्याव में हैं,
कौना में जौक करा ले रे।
हाय हाय रे पलका लटका ले।
मांओ के महीना में व्याव में है,
फागुन में चोक करा ले रे।
हाय हाय रे पलका लटका ले।।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, July 21, 2009

वाद्ययंत्र झारखंड के


नृत्य,गीत और संगीत झारखंड वासियों के प्राण हैं। यह जनजातीय जीवन की सामूहिक यात्रा के अभिन्न अंग हैं उनसे ही लोक जीवन को अभिव्यक्ति मिलती है। पर्व-त्योहार जातीय संस्कृति के अंग हैं। इन त्योहारों में देर रात तक झारखंड के गांवों में सामूहिक नृत्य, गीत और संगीत की धूम मची रहती है। इन समारोहों में मांदर, नगाड़ा, ढोलकी, बांसुरी और झांझ जैसे वाद्य यंत्रों के सुर-ताल की लहर आनंद को दोगुना कर देती है। कुछ वाद्य यंत्रों के बारे में मैं यहां बताने की कोशिश कर रही हूँ।

केंदरी- संथालों का यह प्रिय वाद्य है। इसे झारखंडी वायलिन भी कहा जाता है। कछुए की खाल या नारियल के खोल से इसका तुम्बा बनाया जाता है। तुम्बा से बांस या लकड़ी का दंड जुड़ा रहता है। उस पर तीन तार लगे रहते हैं। घोड़े की पूछ के बाल से गज बनाया जाता है। गज और दंड के तारों की रगड़ से स्वर निकलते हैं।
एकतारा- एकतारा को गुपिजंत्र भी कहा जाता है। इसमें एक ही तार होता है। झारखंड क्षेत्र में अक्सर फकीर या साधु लोग इस वाद्य का प्रयोग करते हैं। भजन, भक्तिगीत गाने वाले साधु-संन्यासियों की पहचान एकतारा और उसकी आवाज से ही होती है। इसके नीचे का हिस्सा खोखली लौकी या लकड़ी का बना होता है और उसका मुंह चमड़ा से मढ़ा रहता है। गायक को एकतारा से आधार स्वर मिलता है।
भुआंग- भुआंग संथालों का प्रिय वाद्य है। दशहरा के समय दासांई नाच में वे भुआंग बजाते हुए नृत्य करते हैं। यह तार वाद्य है। इसके बावजूद इसमें ऐसे अधिक स्वर निकलने की गुंजाइश नहीं रहती है। इसमें धनुष और तुम्बा होता है। इसमें तार को ऊपर खींचकर छोड़ देने से धनुष-टंकार जैसी आवाज निकलती है।
बांसुरी- सुषिर वाद्यों में बांसुरी या आड़बांसी झारखंड में काफी लोकप्रिय हैं। डोंगी बांस से सबसे अच्छी बासुरी बनायी जाती है। यह बांस पतला और मजबूत होता है। बांसुरी में कुल सात छेद होते हैं सबसे ऊपर वाले छेद में फूंक भरी जाती है।
सानाई- बांसुरी की तरह ही सानाई (शहनाई) भी झारखंड में लोकप्रिय है। यह यहां का मंगल वाद्य भी है। पूजा, विवाह आदि मौकों पर इसे बजाया जाता है। साथ ही छऊ,नटुआ, पइका आदि नृत्यों में भी सानाई बजायी जाती है। दस इंच का सानाई में लकड़ी का नली होती है। उसमें छह छेद होते हैं। इसके एक सिरे पर ताड़ के पत्ते की पेंपती होती है और दूसरे सिरे पर कांसे की धातु का गोलाकार मुंह होता है। पेंपती से फूंक मारी जाती है। लकड़ी के छेदों पर उंगलियां थिरकती हैं तो अलग-अलग स्वर निकलते हैं कांसे के मुंह की वजह से आवाज तेज और तीखी होती है, जिसे दूर-दूर तक सुनी जा सकती है।
सिंगा- भैंस की सींग से सिंगा बनाया जाता है। इसके नुकीले सिरे से फूंक मारी जाती है। दूसरा सिरा चौड़े मुंह का होता है और वह आगे की ओर मुड़ा रहता है छऊ नाच में इसका उपयोग किया जाता है। शिकार के वक्त पशुओं को खदेड़ने के लिए इसे बजाया जाता है। पशुओं पर नियंत्रण के लिए चरवाहे लोग भी सिंगा बजाते हैं।
मदनभेरी- यह एक सहायक वाद्य है। इसे ढोल,सानाई,बांसुरी आदि के साथ बजाया जाता है। छऊ नृत्य,विवाह समारोह आदि में भी इसे बजाया जाता है। इसमें लकड़ी की सीधी नली होती है, जिसके आगे पीतल का मुंह रहता है। करीब चार फीट लम्बे इस वाद्य में कोई छेद नहीं होता । इसलिए फूंक मारने पर इससे एक ही स्वर निकलता है।
इसके अतिरिक्त निशान, शंख आदि भी झारखंड में बजते हैं। शंख मंगल वाद्य हैं। पहले उसका उपयोग संदेश देने के लिए भी होता है।


मांदर- मांदर झारखंड का प्राचीन और अत्यंत लोकप्रिय वाद्य है। इसे यहां लगभग सभी समुदाय के लोग बजाते हैं। यह पाश्वमुखी वाद्य है। लाल मिट्टी के बने मांदर का गोलाकार ढांचा अंदर से खोखला होता है। इसके देने तरफ के खुले मुंह बकरे की खाल से ढंके रहते हैं। मांदर की आवाज गूंजदार होती है। नाच के वक्त उसे बजाने वाला भी घूमता-थिरकता है। इसके लिए वह रस्सी के सहारे मांदर को कंधे से लटका लेता है।
ढोल- मांदर के साथ झारखंड में ढोल भी अवश्य ही बजाया जाता है। यह आम,कटहल या गमहर की लकड़ी से बनता है। इसमें भी अंदर से खोखला करीब दो फीट लम्बा ढांचा होता है। इसके भी दोनों किनारे गोलाकार होते हैं। दोनों किनारों की तुलना में बीच का हिस्सा कुछ उभरा हुआ होता है। इसके भी मुंह बकरे का खाल से ढंके रहते हैं। इसे हाथ तथा लकड़ी दोनों तरह से बजाया जाता है।
धमसा- यह विशालकाय वाद्य है। इसका मांदर, ढोल आदि मुख्य वाद्यों के सहायक वाद्य के रूप में इस्तोमाल किया जाता है। इसकी आकृति कड़ाही जैसी होती है। इसका ढांचा लोहे की चद्दर से तैयार किया जाता है। इसे लकड़ियों के सहारे बजाया जाता है। इसकी आवाज गंभीर और वजनदार होती है। छऊ नृत्य में धमसा की आवाज से युद्ध और सैनिक प्रयाण जैसे दृश्यों को साकार किया जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, July 16, 2009

अंबुवासी का मेला


कामाख्या मंदिर के अंबुवासी मेले के बारे में संडे नईदुनिया के मैग्जीन में पढ़ा तो अपने बचपन के बीते दिन की याद ताजा हो गई। नीलाचल पर्वत की वो सुन्दरता मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। रंग बिरंगे जंगली फूलों से भरा वह पहाड़ और पहाड़ों के बीच चक्कर खाती हुई घूम-घूमकर उपर चढती बस। गहरे हरे रंग का वह सरोवर जो मानों ऐसा लगता था जैसे पत्थर के बड़े से कटोरे में हरे रंग का पानी रखा हो। गर्भगृह का वह मोटा-मोटा पत्थर का खंभा, जिसमें बड़ी मुश्किल से एक-एक आदमी पार होते हैं। मंदिर के अंदर का माहौल ऐसा था मानों सभी माता की भक्ति में लीन हो जाना चाहते हों। मन्नत पूरा होने पर लोग वहाँ तरह-तरह की घंटियाँ भी चढ़ावे में चढ़ाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि साल में एक बार माँ कामाख्या रजस्वला होती है। इसी तिथि को वहाँ के लोग अंबुवासी के मेले के रूप में मनाते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीया चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनी नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाखया महापीठ को सर्वश्रेष्ठ और जाग्रत माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में मां की योनी की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।


एक मान्यता यह भी है कि रतिपति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं भस्म हुए थे। कामदेव ने अपना पूर्वरूप भी यहीं प्राप्त किया इसलिए इस क्षेत्र का नाम कामरूप पड़ा। इस बात का उल्लेख कल्कि पुराण में है। इस संदर्भ में कुमारसंभवम् का यह श्लोक वर्णित हैः

पिनाकिना भग्नमनोरथाः सती,
निनिन्द रूपं हृदयेन् पार्वती,
प्रियेषु सौभाग्यफलाहि चारुता।।

अर्थः- अपनी नजरो के सामने शिव के कोप से भस्म होते कामदेव को देखकर पार्वती जी ने अपने रूप की हृदय से निन्दा की।
क्योंकि सुन्दरता वही सार्थक होती है, जो अपने पति को आकर्षित कर सकती हो।

साधु और तांत्रिक मंदिर के आसपास की वीरान जगहों और कंदराओं में साधना में लीन रहते हैं। उस दौरान चार दिनों के लिए मंदिर का पट बंद रहता है और चार दिन बाद पट खुलने पर पूजा-अर्चना के बाद ही श्रद्धालु लौटते हैं।
हिन्दु समाज में रजोवृति के जौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान असम में भी कोई शुभ कार्य नहीं होता है। विधवाएं, साधुसंत आदि अग्नि को नहीं छूते हैं और आग में पका भोजन नहीं करते हैं। पट खुलने के बाद श्रद्धालु मां पर चढ़ाए गए लाल कपड़े के टुकड़े का अंश मात्र भी मिल से अपने आप को धन्य मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये कपड़े का टुकड़ा मिल जाने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।
वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है और साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह पहाड़ ब्रह्मपुत्र नही से बिल्कुल सटा है। सामने ब्रह्मपुत्र के बीच में स्थित छोटी सी पहाड़ी पर शिव का उमानंद मंदिर है। यह माना जाता है कि वहां विराजमान शिव ही कामाख्या माता के भैरव हैं, इसलिए कामाख्या आने वाले भक्त उमानंद मंदिर भी जरूर जाते हैं। पूरा मंदिर बड़े-बड़े पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने के कारण मंदिर का गर्भगृह बाहरी सतह से करीव दस फुट नीच चला गया है, जहां तक जाने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं।
कामाख्या मंदिर में लगने वाला यह मेला वहाँ की कृषि से भी जुड़ा हुआ है। माता के ऋतुवती होने के बाद ही वहां के लोग कृषिकार्य का प्रारंभ करते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, June 30, 2009

गुड़ी में गोन्चा


आषाढ़ का महीना आते ही बस्तर के लोगों की चहल-पहल देखते ही बनती है। सीरासार के सामने जगन्नाथ गुड़ी (मंदिर) में भगवान जगन्नाथ -बलराम-सुभद्रा की पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है। यह लोक की विशेषता ही है कि हर काम के पीछे कुछ कथाएँ कुछ किंवदन्तियाँ होती हैं. जो मनोरंजक होने के साथ-साथ शिझाप्रद भी होती हैं।
इस पूजा के पीछे एक बहुत ही प्रचलित लोककथा है-बस्तर के महाराजापुरुषोत्तम देव को एक बार भगवान जगन्नाथ ने सपने में दर्शन देकर जगन्नाथपुरी(ओडीसा) जाने को कहा। राजा पुरुषोत्तम देव अपने कुछ लोगों के साथ पैदल ही जगन्नाथपुरी के लिए चल पड़े। उधर जगन्नाथपुरी में, आषाढ़ शुक्ल पझ द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ का रथ खींचा ही जा रहा था कि रथ रुक गयाघ सभी अचरज से भर गये। तब पुरी-मुखिया गजपति राजा ने कहा कि जरुर अभी भगवान जगन्नाथ का कोई भक्त यहाँ नहीं पहुँचा है। तभी बस्तर- महाराजा पुरुषोत्तम देव वहाँ पहुँचे और रथ खींचने लगे तो रथ चल पड़ा। इससे लोगों ने भगवान और भक्त राजा पुरुषोत्तम देव की जय-जयकार की। उसी समय राजा गजपति ने पुरुषोत्तम देव को रथपति कहा और बस्तर में भी बारह चक्कों का रथ चलाने की सलाह दी। वहाँ से लौटने के बाद बस्तर - महाराजा ने जगदलपुर में गोन्चा और दशहरा के समय रथ चलाने की रस्म शुरु की। <
आषाढ़ के महीने में मनाये जाने वाले रथयात्रा पर्व को गोन्चा कहने के पीछे भी एक लोक कथा है। पौराणिक काल में राजा इन्द्रद्युम्न थे, उनकी रानी का नाम था गुंडिचा। यह उत्सव उन्हीं गुंडिचा रानी के नाम पर मनाया जाता है। गुंडिचा ही आगे चलकर गोन्चा हो गया।
विष्णु भगवान के भक्त इन्द्रद्युम्न और उनकी रानी गुंडिचा भगवान का दर्शन पाना चाहते थे। एक दिन भगवान ने उन्हें सपने में आकर कहा कि वे उनका दर्शन नीलगिरि की गुफा में कर सकते हैं। राजा और रानी यह जानते थे कि शबर राजा विश्वावसु नीलगिरि की गुफामें भगवान नीलमाधव की पूजा किया करते हैं। उन्होंने अपने राजपुरोहित विद्यापति को भगवान नीलमाधव की मूर्ति के लिए भेजा। राजपुरोहित छल करके वह मुर्ति जगन्नाथपुरी ले आये। किन्तु भगवान जगन्नाथ ने एक रात सपने में राजा इन्द्रद्युम्न को दर्शन दिया और कहा कि महासागर के तट पर लकड़ी का एक टुकड़ा मिलेगा, जिससे श्रीकृष्ण,बलराम, और सुभद्रा की मूर्तियाँ बनवा लेना। दूसरे दिन राजा को महासागर के किनारे व ऐसी ही लकड़ी मिली। उन्होंने उसे उठा लिया और राजमहल ले आये। मूर्तियाँ बनाने के लिए विश्वकर्मा जी स्वयं एक कलाकर के वेश में वहाँ आए। उन्होने शर्त रखी कि वे एक बन्द कमरे में मूर्तियाँ बनाएँगे। उन्हें कोई तंग न करें। वे कमरे में बन्द होकर मूर्तियाँ बनाने लगे। कई दिनों के बाद जब कमरे से छेनी-हथौड़ी की कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ी तो रानी गुंडिचा को डर लगा कि कहीं कलाकर, जो काफी बूढ़ भी था, मर न गया हो। उन्होंने दरवाजा तुड़वाया तो देखा कि कलाकार वहाँ नहीं था। मूर्तियाँ अधूरी बनी थीं। इसी से इस पर्व का नाम गुंडिचा हुआ। यहीं गुंडिचा आगे चलकर गोन्चा हो गया।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, June 16, 2009

बंगाली लोक गीत


आमि स्वप्ने देखि मधुमालार मुख रे
स्वप्न जोदि मिथ्या रे होइतो
गलार हार की बोदोल होइतो रे लोकजन।
स्वप्न जोदि मिथ्या रे होइतो
अंगुरी की बोदोल होइतो रे लोकजन।
मदनकुमार जात्रा कोरे,
मस्तुल भांग्या पानित पोड़े रे, लोकजन।।
आमि स्वप्न देखि मधुमालार मुख रे।।



मैं स्वप्न में मधुमाला का मुख देखता हूँ
यदि यह स्वप्न झूठा है, ओ लोगो,
तो फिर मेरे हार की उसके हार से अदला-बदली कैसे हो गई।
मदनकुमार जात्रा आरंभ करता है (मधुमाला की खोज में)
बजरे का मस्तूल टूटकर पानी में गिर जाता है।

आमि धेरज धारिते पारिना हाय,
आमि धेरज धारिते पारिना......
देखा दियो हे मोर बंधु श्याम राय,
तोमार ना दिखिया जाप दिखा, राय,
देखा दियो हे मोर बोधु श्याम राय
धेरज धारिते नारी नारिर प्रानेते
उपाय बाला गा बृंदे, ओ कृष्ण प्रेयेते
उपाय बाला गो बृंदे।
आमि धेरज धारिते पारिना.......।


अब मुझसे और अधिक धैर्य नहीं रखा जा रहा।
ओ मेरे प्रिय कृष्ण, कृपा करके दर्शन दो।
तुम्हारे बिना मैं बेसुध पड़ी हूँ।
धीरज शायद नारी की नियति है लेकिन
मेरा नारी-हृदय आकुल-व्याकुल हो उठा है
मुझे मेरे प्रियतम की राह बता दो, ओ बृंदा।
अब मुझसे और धैर्य नहीं रखा जा रहा।।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, June 12, 2009

बांग्ला लोकोक्तियाँ

बांग्ला लोकजीवन में लोकोक्तियों को बड़े ही मनोरंजक अंदाज में प्रयोग किया जाता है। कुछ लोकोक्तियां मैंने यहां पर संकलित करने का प्रयास किया है। शायद आप पाठकों को भी पसंद आएगा-

दशजन राजी जेखाने खोदा राजी सेखाने।
दस आदमियों का सहमती जहाँ होती है वहाँ भगवान भी राजी हो जाते हैं।

माछ आर अतिथि दुइ दिन पोरे विष।
मछली और अतिथि - ये दो दिन बाद अप्रिय हो जाते हैं।

अल्पविद्या भयंकारी।
थोड़ी विद्या भयंकर परिणाम देती है।

एक गाछेर छाल की आर गाछे लागे?
एक पेड़ की छाल क्या दूसरे पेड़ पर लगती है?

पर्बतेर मूषिक प्रसव।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

आटुरे बोऊ नेंगटा होये नाचे।
अधिक प्यार से बहू नंगी नाचने लगती है।

-प्रीतिमा वत्स

Thursday, May 7, 2009

आज भी गाये जाते हैं प्रभाती


सुबह के समय गाये जानेवाले गीतों को प्रभाती कहा जाता है। इन लोकगीतों में अधिकांशतः प्रभू स्मरण ही किया जाता है। अंग जनपद में खासकर गंगा नदी के किनारे के इलाके में जो प्रभाती गाये जाते हैं उनमें गंगा ही प्रायः अराध्य होती हैं। कवि विद्यापति के जीवनी को पढ़ने से पता चलता है कि उनके जीवन में भी प्रभाती गीतों का विशेष महत्व था। उनके गाये कुछ गीत प्रभाती गीत ही प्रतीत होते हैं। आज भी कभी-कभी सुनने को मिल ही जाते हैं प्रभाती गीत।

1.
कथी केरो कंघई हे गंगा मइया,
कथी केरो काम।
कथी बैठली गंगा मइया
चिरै लम्बी हे केश।
सोना केरो कंघई मइया हे रूपे केरो काम
मचिया बैठली हे गंगा मइया चिरै लम्बी केश



2.
बहे पुरबैया हे मइया, है डोले हे सेमार
झट दाये हे मलहा, पार देहो हे उतार
टूटली नैया हे मइया,टूटली पतवार
कैसे काए उतरब मैया सातो नदी है पार
सोने देबो नैया रे मलहा रूपे पतियाल
झिंझरी खेलतैं मलहा, पार देहो हे उतार
बहे पुरबैया हे मइया, है डोले हे सेमार
नैया खेबू नैया खेबू रे झिमला मलाहा
हमू जे कुमारी झिमला पारो देहो हे उतार
कहाँ तोरो घर हे गंगा माय, किय तोरो नाम
बतिया बिचारो गंगा मइया
समुन्दर होयबो हे पार



3.
ऐसन खिड़की कटैहियो हे गंगा मइया
वै खिड़की सचवा उतरत पार।।
नैहरा के प्यारी दुलारी हे गंगा मैया
ससुरा में कईस काटती दिन,
ऐसन बोलिया बोलियोह हे गंगा माय
वै बोलिया होइतो सलख के मान।।
किरपा करिहों भगता पर हे गंगा मैया
हमें होइब निहाल।
ऐसन खिड़की कटैहियो हे गंगा मइया
वै खिड़की सचवा उतरत हे पार।।
-प्रीतिमा वत्स

Saturday, April 18, 2009

बासी भात

चैत पूर्णिमा की रात और बैशाख की सुबह झारखंड और बिहार के अधिकांश इलाकों में बासी भात के नाम से प्रसिद्ध है। यह पर्व मुख्यतः गोड्डा,भागलपुर,बांका,दुमका ,देवघर,दरभंगा आदि जिले के गांवों में आज भी बड़े उत्सव के साथ मनाया जाता है।
चैत पूर्णिमा की रात को घर की महिलाएँ अपने रसोई घर की अच्छी तरह से सफाई करके सोती हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि कोई जूठा या बचा हुआ खाना न रह जाए। रात के दो से तीन बजे के बीच औरतें उठकर अपना चौका चूल्हा संभाल लेती हैं। दूसरे दिन खाया जानेवाला पूरा खाना उसी समय बना लिया जाता है। इस खाने में तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। सुबह होने से पहले ही औरतें अपने रसोई का काम खत्म करके सो जाती हैं।
बड़े जोर-शोर से सुबह घर की सफाई की जाती है। फिर तुलसी के पौधे के ऊपर एक घड़ा लटकाया जाता है। जिसमें नीचे एक छेद होता है। इस छेद से बूंद-बूंद पानी टपकता रहता है। यह घड़ा पूरे बैशाख भर लटका रहता है। रोज सुबह घर के हर आदमी नहा-धोकर इस घड़े में जल डालते हैं। जिससे पूरे महीने पौधा हरा रहता है।
उस दिन जौ के सत्तु,गुड़, कच्चे आम, और दही से भगवान विष्णु तथा तुलसी जी की पूजा की जाती है। इसके बाद आधी रात को बना हुआ खाना भगवान तथा पितरों को भोग लगाया जाता है। फिर वही खाना सारा दिन घर के सब लोग खाते हैं। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।
इस पर्व को मनाने के पीछे शायद यह कामना रही हो कि बैशाख से शुरू होनेवाले प्रचंड गर्मी में भगवान घड़े के बूंद-बूंद टपकते पानी की तरह शीतलता बनाए रखें। घर में चूल्हा शायद इसलिए भी नहीं जलाया जाता है कि इस चिलचिलाती धूप में धरती माँ को थोड़ी सी तो राहत महसूस हो।
-प्रीतिमा वत्स

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...