Friday, July 4, 2008

भीगने वाले हों, तो ही बरसता है मल्हार

उल्लास की ऊंचाई को दर्शन की गहराई से जोड़कर देखने वाले लोग पूरे जीवन को पानी का बुलबुला मानते हैं और उनके लिए यह संसार एक विशाल सागर हो जाता है। इसी सागर में खिलते हैं जीवन, सजते हैं सुर और यहीं भीगता है मन। मन को भीगोने वाले संगीत के कुछ राग और उन पर आधारित चित्रों की कलात्मक अभिव्यक्ति सचमुच सब कुछ बहा लेना चाहते हैं।

गांवों में बादल की हल्की रेखा दिखी नहीं कि बच्चों की टोली जमा हो जाती है-काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़-धानी दे। बच्चों की खुशी और पुकार से पानी सचमुच बरसता है या नहीं, यह तो नहीं मालूम, पर यह लोक विशवास ही है, जहां से शुरू होता है संगीत का सफर, रागों की रचना और सुनने वालों की महफिल।
इन्हीं महफिलों से रचे जाते हैं रागमाला चित्र। रागमाला चित्रों का सृजन भारत की अन्य कला शैलियों में भी हुआ है तथापि राजस्थानी कला शैली की बात ही निराली है। राजस्थान में बने रागमाला चित्रों के आधार वे संगीत ग्रंथ रहे हैं, जिनमें विभिन्न ऋतुओँ पर आधारित छह प्रमुख रागों तथा उनसे निकला रागिनियों का विवेचन किया गया है। इन संगीत ग्रंथों में हेमंत, शिशिर, बसंत, ग्रीष्म, वर्षा तथा शरद ऋतु की प्रकृति को आधार बनाकर छह प्रमुख रागों जैसे श्री, मालकोस, हिण्डोल, दीपक, मेघ तथा भैरव रागों की रचना की गई है। उक्त प्रमुख रागों के साथ-साथ रागिनियां भी प्रचलन में आईं। जैसे रागश्री के साथ मालश्री, मारुधनाश्री, बसंत तथा आसावरी रागिनियों को प्रस्तुत किया गया। इसी प्रकार राग मालकॉस के साथ गौरी, टोडी, मुणकनी, खम्मायाजी तथा कुमकुम रागिनी, राग हिण्डोल के साथ रामकली, ललित, देसाखा , बिलावल और षटमंजरी प्रचलन में आई। राग दीपक के साथ मल्हार, गूजरी भूपाली, टक तथा देसकार और राग भैरव के साथ भैरवी, मधुमाधवी,भैरागी, सैंधवी एवं बंगाली रागिनियों को भी गायकों ने अपनी मधुर वाणी से प्रचारित किया।
समयांतर से राग-रागिनियों के रूप-स्वरूप और नामकरण में और भी परिवर्तन हुए। रागिनियों के साथ कुछ गायकों और घरानों के नाम जोड़कर भी उन्हें प्रस्तुत किया जाने लगा। जैसे मियां की मल्हार, गुमारू टोडी, गौड़ मल्हार, मियां की टोडी, बिलावल, मालबी, मल्लारिका, त्रिवेणी, सारंग और विभास आदि। उक्त प्राय़ः सभी राग- रागिनियों को आधार बनाकर चित्रकारों ने सुंदर चित्रों का निर्माण किया। धीरे-धीरे अनेक रागिनियों का प्रचलन समाप्त हो गया, किन्तु उन पर बने चित्र आज भी उनके प्रचलन तथा अस्तित्व के प्रमाण हैं। राग मेघ, वर्षा ऋतु का प्रतीक है। इसका अलाप धीमे से शुरु होकर बारिश की वूंदों की तरह तेज होता है और पूरा वातावरण उत्साह से भर जाता है। लगता है सब नाद के तमाशे हैं। बादल की गरज मृदंग की तरह सुनाई पड़ती है। इस मृदंग की संगत में दामिनियां या कि बिजलियां नृत्य करती हैं बादल को मैस्कुलीन माना गया है और बिजली है फेमिनिन। क्रमशः शक्ति और सौंदर्य की प्रतीक। प्रकृति की इस अद्भुत शक्ति और सौंदर्य के मेल से ही तो आती है वर्षा ऋतु। यहां ताजगी है तो बहक जाने की मद्धिम-सी अपील भी। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए कभी आसमान को निहारा है आपने। लगेगा पूरी प्रकृति, पूरा परिवेश बहक गया हो। मानो नृत्य, गीत और संगीत की त्रिवेणी बह रही हो।
किवदंती है कि राग मेघ को जन्म देनेवाले भगवान शिव हैं। तानसेन ने राग मल्हार को एक बार फिर से स्थापित किया। कहते हैं कि वे जव राग मेघ मल्हार गाते थे तो सचमुच वर्षा होती थी। उन्होंने राग मियां का मल्हार की भी स्थापना की। यह नया राग संगीत की नई अभिव्यक्ति है। इस राग को सुनते हुए मुझे इसमें बारिश का ऊर्जावान रूप महसूस होता है। डॉ सुहासिनी घोष मानती हैं कि 'हाल के वर्षों में राग मल्हार को आधार बनाकर कई रागों का जन्म हुआ- गौड़ मल्हार अनूठे रंगों से सजा है तो राग देश, खमाज और बिलावल की बात ही निराली है।' फिर सुरदासी मल्हार के गाने और सुनने का भी अपना अंदाज है। संगीत के महान कलाकार पंडित विनायक राव पटवर्धन जब राग जयंत मल्हार गाते थे, तो ऐसा लगता था मानो 'सुनने वाले और गुनने वाले सभी के मन भीग गए हों।'
सुर का स्रोत असार है। राग और भी हैं, संगीत की दुलिया समृद्ध ही हुई है। यहां से कुछ बिसरा नहीं है। पर प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज की बात भी कम पते की नहीं- सुनने वाले हों तो ही कोई मल्हार मन को भिगोता है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, June 13, 2008

आस्था विश्वास का केंद्र बैद्यनाथ धाम


विश्वकर्मा द्वारा निर्मित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बैद्यनाथ धाम जहाँ एक ओर श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र बना हुआ है वहीं दूसरी ओर इससे असंख्य लोगों को रोजगार भी मिलता है।

द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम न सिर्फ बिहार और झारखंड, बल्कि पूरे देश का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार भगवान शंकर समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु विभिन्न तीर्थ स्थलों में लिंग रूप में निवास करते हैं। बैद्यनाथ शिवलिंग की महत्ता मनोकामना लिंग के रूप में भी है। पद्मपुराण के अनुसार बैद्यनाथ महालिंग की महत्ता भवरोगों को हरनेवाला तथा कल्याणकारी है - 'बैद्यनाथ महालिंग भवरोग हर शिवम'। बैद्यनाथ मंदिर परिसर में कुल 22 मंदिर हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण विश्वकर्मा के द्वारा किया गया है। यहां के शिव मंदिर की ऊँचाई 72 फीट है तथा सम्पूर्ण मंदिर एक ही चट्टान का बना हुआ है। कहते हैं कि काशी और बैद्यनाथधाम में स्वयं भगवान् शंकर मुक्ति देते हैं और जो भी इनका दर्शन करने आते हैं, वे सभी मुक्त हो जाते हैं।
बैद्यनाथ महादेव की प्रसिद्धि रावणेश्वर बैद्यनाथ के नाम से भी है। पौराणिक कथा के अनुसार बैद्यनाथ महालिंग की स्थापना लंकापति रावण के द्वारा की गयी है। एक बार रावण ने अपनी तपस्या से भगवान शंकर को अति प्रसन्न कर लिया। भगवान शंकर ने उसे वर मांगने के लिए कहा- रावण ने अपनी इच्छा जताई कि मैं आपका शिवलिंग अपनी नगरी में स्थापित करना चाहता हूं। शिवजी सोच में पड़ गए, थोड़ी देर बाद बोले ठीक है लेकिन शर्त यह है कि तुम उसे रास्ते में कहीं मत रखना नहीं तो मैं वहीं स्थापित हो जाऊँगा। रावण शिवलिंग को लेकर कैलाशपुरी से लंकापुरी की ओर चल पड़ा इधर देवलोक में खलबली मच गयी कि यदि रावण लंका में शिवलिंग स्थापित करने में सफल हो जाएगा तो अमरत्व को प्राप्त कर लेगा।
अतः देवताओं ने आपस में मिलकर मंत्रणा की। दैवयोग से रावण को जोरों की लघुशंका लगी। विवश होकर उसे शिवलिंग को एक वृद्ध ब्राह्मण के हाथों में थमाकर लघुशंका से निवृत होने के लिए जाना पड़ा। वह वृद्ध ब्राह्मण और कोई नहीं छद्मवेषधारी स्वयं भगवान विष्णु थे। रावण की लघुशंका से नदी बहने लगी लेकिन उसकी लघुशंका समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी। ब्राह्मण वेषधारी भगवान विष्णु ने मौका पाकर शिवलिंग को वहाँ रख दिया और चलते बने।
बाद में रावण ने बहुत प्रयास किया भगवान से अनुनय-विनय किया, पर शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। गुस्से में आकर उसने शिवलिंग पर प्रहार भी किया जिससे शिवलिंग थोड़ा सा टूट गया, वह निशान आज भी मौजूद है। अंत में हारकर रावण को उस स्थान पर ही शिवलिंग की पूजा करनी पड़ी। बाद में बैजू नामक एक आदिवासी ने उस शिवलिंग की भक्ति-आराधना की और उसके नाम पर उस स्थान को बैजूनाथ अर्थात बैद्यनाथ कहा जाने लगा। जिसकी प्रसिद्घि कालांतर में बैद्यनाथधाम के रूप में हुई।
बैद्यनाथ धाम को हार्दपीठ भी कहा जाता है, और उसकी मान्यता शक्तिपीठ के रूप में है। धार्मिक कथा के अनुसार जब राजा दक्ष ने अपने यज्ञ में शिव को आमंत्रित नहीं किया, तो सती बिना शिव की अनुमति लिए मायके पहुँच गयीं और पिता द्वारा शिव का अपमान किये जाने के कारण उन्होंने मृत्यु का वरण कर लिया। सती की मृत्यु की सूचना पाकर शिव उनमत्त हो उठे और उनके शव को कंधे पर लेकर इधर-उधर घुमने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर उन्मत्त शिव को शांत करने के लिए विष्णु भगवान अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित करने लगे। सती के अंग कट-कटकर जिन स्थानों पर गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। सती का खंडित हृदय जिस स्थान पर गिरा, वहीं बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है और वह स्थान हार्दपीठ कहलाता है।
ऐसी लोकमान्यता है कि श्रावण के महीने में साक्षात् भगवान शंकर गौरा पार्वती के साथ बाबा बैद्यनाथ के रूप में देवघर में विद्यमान रहते हैं और भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। बाबा बैद्यनाथ को उत्तरवाहिनी गंगा का जल अत्यंत प्रिय है। अतः श्रावण के महीने में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तगण सुलतानगंज से जल लेकर कांवर में रखते हैं तथा कांवर को कंधे पर उठाकर लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा तीन से चार दिन में पैदल तय करते हैं। कई ऐसे भी भक्तगण हैं जो यह यात्रा 24 घंटों के अंदर दौड़कर तय करते हैं तथा इसे देवघर स्थित बैद्यनाथ महालिंग पर अर्पित करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने की प्रार्थनाएँ करते हैं।
बैद्यनाथ मंदिर का दरवाजा प्रातः 4 बजे खुलता है तथा 3.30 बजे शाम को भगवान के विश्राम हेतु बंद होता है। शाम के 6 बजे प्रार्थना की शुरूआत की जाती है साथ हीं श्रृंगार पूजा की तैयारी भी शुरू की जाती है। अंतिम प्रार्थना का समय 9 बजे रात रखा गया है लेकिन विशेष त्योहारों के मौके पर पूजा की अवधि बढ़ाई भी जाती है। हाल के वर्षों में बैद्यनाथ महालिंग का आकार बहुत छोटा हो गया था, जिससे भीड़ में भक्तों को पूजा करने में काफी परेशानी होती थी इसलिये बगल में एक अन्य लिंग की भी स्थापना की गई है।
श्रावण के महीने में सुलतानगंज से लेकर देवघर तक का रास्ता भक्तों की आवाजाही और भोले बैद्यनाथ की जय, बोलबम आदि के नारों से गुंजायमान रहता है। और यह पूरा क्षेत्र एक विशाल मेले के रूप में तब्दील हो जाता है। सरकार भी इस भीड़ की सुरक्षा एवं सुविधा के लिए तत्पर रहती है। कई स्वयंसेवी धर्मशालाएँ भी कांवरियों के लिए भोजन-पानी,रात को ठहरने की व्यवस्था में जुटी रहती है। इसके अलावा व्यवसायियों की तो चांदी रहती है। इतने विस्तार में एक माह तक चलने वाला यह श्रावणी मेला शायद विश्व का सबसे बड़ा मेला है।

-प्रीतिमा वत्स

Saturday, May 24, 2008

मानव जीवन से जुड़ा पीपल वृक्ष


कोई शनि ग्रह के निवारण के लिए पीपल पूजता है, कोई धन की देवी लक्ष्मी को खुश करने के लिए तो कोई अपने सुहाग की रक्षा के लिए। हमारे धर्मशास्त्र में जहां पीपल वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का निवास माना जाता है वहीं आयुर्वेद में पीपल वृक्ष को सबसे ज्यादा शुद्ध हवा प्रदान करनेवाला तथा कई रोगों के दवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

सम्पूर्ण भारत में समान रूप से पवित्र माना जानेवाला पीपल वृक्ष देश के हर कोने में आसानी से पाया जाता है। जन सामान्य की यह मान्यता है कि इस पेड़ में विष्णु भगवान समेत सभी देवी-देवता निवास करते है। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब दैत्यों ने देवी-देवताओं को स्वर्ग से हराकर उन्हें खदेड़ा था तो सभी देवी-देवताओं ने पीपल पेड़ के बीच में ही शरण लिया था। धन की देवी लक्ष्मी का निवास भी पीपल वृक्ष में माना जाता है। उनकी उपासना करने के लिए लोग शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं। एक अलग मान्यता के अनुसार शनिग्रह से निजात के लिए भी लोग पीपल पेड़ की पूजा शनिवार को सुबह करते हैं, तथा शाम को सरसों तेल के दिये जलाते हैं। ऋगवेद में भी पीपल के पेड़ के महत्व का वर्णन है। वैदिक श्रोतों के आधार पर पीपल की लकड़ी का उपयोग बर्तन बनाने के काम में किया जाता था तथा इसके बचे भाग को आग जलाने में। यह आग बहुत पवित्र माना जाता था। आज भी गांवों में बीमार आदमी की कांपती आंखों तथा हाथों, भयानक सपनों आदि से निजात पाने के लिए पीपल पेड़ की पूजा करके उसके पत्ते को जल में भिगोकर रोगी के शरीर पर छिड़का जाता है।
लोकमान्या के अनुसार महिलाओं में विभिन्न रूपों में पीपल के पेड़ का महत्व है। उत्तरभारत में सोमवती अमावस्या के दिन महिलाएं जल और कच्चा दूध पीपल में डालती हैं, तथा उसके 108 फेरे लेती हैं। उनका मानना है कि इससे उसके घर तथा परिवार में सुख-शान्ति बनी रहेगी। राजस्थान में महिलाएँ इस मान्यता के साथ पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं कि वह वैधव्य के दुख से बची रहेगी। आश्विन महीने के पितृपक्ष में जब पितरों की पूजा होती है तो उसमें भी पीपल के पत्ते तथा इसकी शाखाओं का उपयोग किया जाता है। एक गड्ढा खोदा जाता है जिसमें दूध,जल,तिल तथा शहद के साथ पीपल की शाखाओं को गाड़ा जाता है। यह मान्यता है कि पूर्वजों की आत्मा इस जगह पर आती हैं तथा दान की गई वस्तु को ग्रहण करते हैं।
पीपल पेड़ का आयुर्वेद में भी बहुत महत्व है। इसके तने से निकलनेवाला रस कई तरह के त्वचा के रोगों से मुक्ति दिलाने में बहुत कारगर सिद्ध होता है। पीपल के फल को सुखाकर उसका पाउडर बनाकर रोज सुबह पानी के साथ लेने से अस्थमा की बीमारी दूर हो जाती है। पीपल के छाल का पाउडर नारियल तेल में मिलाकर लगाने से जलने के निशान तथा घाव बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। ऐसा कह सकते हैं कि पीपल का पेड़ मानव जीवन के लिए प्रकृति का एक बहुत अच्छा उपहार है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, May 9, 2008

मंदिरों का गांव मलूटी


पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं।

झारखंड और बंगाल के बार्डर पर, दुमका जिले से 55 किलोमीटर दूर एक गांव है, मलूटी। इस गांव में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सिर्फ मंदिर हीं मंदिर नजर आते हैं। शायद एक छोटी सी जगह में इतने सारे मंदिर एक साथ होने की वजह से हीं इस क्षेत्र का नाम गुप्त काशी रखा गया होगा। इस गांव में कभी 108 मंदिर स्थित थे जिनमें से अधिकांश भगवान् शंकर को समर्पित थे और इनमें भव्य शिवलिंग स्थापित थे। संरक्षण के अभाव के चलते अब इन मंदिरों में सिर्फ 69 मंदिर ही बच पाये हैं।
हरे-भरे वृक्षों के बीच पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के ये मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं। यही कारण है कि ये मंदिर न सिर्फ शिव भक्तों को, वरन् पर्यटकों, पुरा विशेषज्ञों और इतिहास प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। भगवान् भोले शंकर के मंदिरों के अतिरिक्त यहाँ दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदी देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ मौलिक्षा माता का भी मंदिर है जिनकी मान्यता जाग्रत शाक्त देवी के रूप में है।
एक गांव में इतने सारे मंदिरों का होना किसी के लिए भी एक आश्चर्य से कम नहीं है लेकिन यह सत्य है कि मलूटी के राजाओं ने समय समय पर अपनी रानियों के लिए राजप्रासादों की वजाय इन मंदिरों का निर्माण करवाया था। मलूटी राज के प्रथम राजा बसंत राय तथा उनके वंशजों द्वारा सन् 1720 से 1840 के बीच इन मंदिरों को बनवाया गया है। मलूटी के राजाओं का अंत हो जाने के बाद ये मंदिर उपेक्षित होते चले गये। एक छोटे से गाँव में इतने सारे मंदिरों की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रहा। सेना के रिटायर्ड अफसर गोपालदास मुखर्जी एक ऐसे आदमी हैं जो काफी चिंतित और सजग दिखाई देते हैं इन मंदिरों के प्रति। सेना से रिटायर्ड होने के बाद से वे समर्पित भाव से लगे हैं इन मंदिरों की सेवा में। उन्हे उम्मीद है आज न कल सरकार जरूर जागेगी इनकी हिफाजत करने।
जिर्ण-शीर्ण हालत में होते हुए भी आज भी गजब की सुंदरता झांकती है इन मंदिरों से। इन मंदिरों का निर्माण बंगाल की सुप्रसिद्ध 'चाला' रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईंटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक है। मंदिरों की दीवारों पर ज्यादातर राम और कृष्ण लीला के चित्र अंकित हैं। सावन के महीने में यहाँ मेला भी लगता है। कुछ भक्त गण बाहर ,से भी आते हैं मंदिरो में पूजा तथा मेले में शिरकत करने । लेकिन इस गांव के मंदिर में वस्तुतः उजाड़ निहित है । मलूटी में रहनेवाली एक वृद्ध महिला साधना चटर्जी कहती हैं " 1986 में , बिजली आया था। दस दिन बाद , यह चला गया,फिर कभी नहीं आया है।" सूर्यास्त पर , केवल लैंप के प्रकाश में रहने को विवश हैं यहाँ के निवासी। इस कारण पर्यटक भी घबराते हैं यहाँ रात रुकने से।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 22, 2008

लोक देवी शीतला


भयानक होते हुए भी लोकदेवी शीतला अपने भक्तों की पुकार को कभी अस्वीकार नहीं करती। विष का हरण करने वाली देवी विषहरी की तरह चेचक प्रभावी देह की जलन को शीतल करने वाली मातृका शीतला की पूजा-अर्चना बिहार झारखंड के प्रायः सभी इलाकों में समान रूप से प्रचलित है।

मालवा जनपद में शीतला की जगह लालबाई एवं केसरबाई तथा राजस्थान में सेउल माता की अराधना प्रचलित है। अलग-अलग रूपों में ये लोक देवी करीब-करीब भारत के हर कोने में पूजित हैं। सांस्कृतिक परिकल्पना के अनुसार देवी शीतला दिग्वस्त्रा है और गधा उनका वाहन है। इनके हाथों में मार्जनी तथा कलश हैं। देवी के मस्तक पर सूप शोभित है, जो इस लोक मातृका की भयंकरता एवं विभत्सता को रेखांकित करती है। अतः लोक देवी शीतला की उपासना के मूल में भय एवं त्राण की भावनाएं निहित हैं। नागदेवी विषहरी की तरह लोकदेवी शीतला भी पांच बहनें हैं और दोनों का सम्बन्ध नीम वृक्ष से अवश्य है। लोकमान्यता के अनुसार चेचक के रोगियों को नीम की डाली से हवा की जाती है, क्योंकि नीम की पत्तियां ठंडी एवं निरोग मानी जाती हैं । सामान्यतया अग्नि तत्व की प्रधानता के कारण ही शरीर चेचक ग्रस्त हो जाता है। चेचक, गोटी या माता, मैया इसी प्रकार के ताप जन्य रोग हैं, जिनका निवारण शीतला करती है। लोक विश्वास की परम्परा के अनुसार चेचक को शीतला का कोप माना जाता है। यही कारण है कि माताएं आज भी अपनी संततियों की रक्षा के लिये लोकमाता शीतला का पूजन-अर्चन करती रही हैं।
शीतला माता की विशेष पूजा अन्य लोक देवी-देवताओं की तरह श्रावण महीने की शुक्ला सप्तमी के दिन की जाती है। भक्त गण लोकदेवी को प्रसन्न करने के लिये अड़हुल या चम्पा के फूल तथा तितर चढ़ाते हैं। ज्यादातर इनके पुजारी माली और मालिन ही होते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये जाति इन्हें अधिक प्रिय हैं। अतः मालियों में इनके गीत अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित हैं। मैथिली लोक गीतों में कहीं-कहीं इस देवी का वर्णन बुढ़िया माता के रूप में भी मिलता है।
लोक मान्यता के अनुसार आदि भवानी जगदम्बा के प्रति जब लोक में उदासीनता छाने लगती है तो कभी वह ज्वाला देवी के रूप में प्रकट हो जाती है, कभी कोसी माता के रूप में बाढ़ की भयावहता उपस्थित कर देती हैं। कभी शीतला के रूप में अपने प्रभाव क्षेत्र के बालकों-बालिकाओं की काया विकृत कर देती हैं, तो कभी दक्षरूपा गहिल के रूप में नवजात शिशुओं के मन प्राणों पर मृत्यु की छाया बनकर मंडराने लगती है। अतः इन लोकदेवियों के कोप से बचने के लिए इनकी पूजा-अराधना शुरु हुई हो तो कोई आश्चर्य नहीं। दूसरो शब्दों में शीतला की पूजोपासना के मूल में भय भावना प्रमुख है, जबकि वह संतति रक्षिका ही नहीं, संतति दायिनी भी मानी जाती है।

अंगिका लोकगीतों में शीतला माता को मनाने तथा उनसे आशिर्वाद पाने के कुछ गीत आज भी बहुत हीं चर्चित हैः

हरिहर सुगवा रे गुलाबी रंग ठोर
मठ पर कुतल हे शितला मैया निन्द सं निभोर
जेकरा द्वारप शितला मैया अरदसिया छैही हे ठाढ़
सेहो कैसे सुतल हे माता निह्द स निभोर
दहीं दहीं दहीं रे भक्ता पान फूल हे नवेदे
हम जग तारण माता हे होइबो सहाय

नीपिये पोतिये अबला गे मोखा लागी ठाढ़
गे ढरं ढरं खसो गे अबला नयनमा दोनो हो लोर
पत्थल जों सेबतियै शितला मैया
हे पत्थलो जे पसीजत
अरे तोहरा सेबत शितला मैया
तरथियो फोका भेल

शीतल माय के हाथ में गुलाब के छड़ी
हे बेली फूल के छड़ी चम्पा फूल के छड़ी,
मांग सिन्दुर से भरी, मुख पान से भरी, खोइछा धान से भरी,
मैया हे देहू ना अशीष घरवा जाऊं मैं चली।


-प्रीतिमा वत्स

Monday, April 14, 2008

प्यार का नायाब तोहफा है कंघा


हाइटेक जमाने में आज जहां प्यार का इजहार करने, तोहफे देने आदि सबका अंदाज बदल गया है, वहीं उड़ीसा के सुदूर गांवों में ज भी आदिवासी जनजाति अपने परंपरागत तरीके से प्यार का इजहार करते हैं, तथा इनके तोहफों में हाथ के बने कंघे को एक नायाब तोहफा माना जाता है।

उड़ीसा के कई गांवों में आज भी आदिवासी युवक बांस की कंघियां देकर अपनी प्रेमिका से अपने प्यार का इजहार करते हैं। इसे स्वीकार करने का मतलब होता है कि युवति ने उस युवक के प्यार को स्वीकार कर लिया तथा शादी के लिए हामी भर दी है। ये कंघे खरीदकर बाजार से नहीं मंगाए जाते हैं, ब्लकि इसे वही युवक बनाता है जिसे अपनी प्रेमिका को उपहार देना होता है। ये कंघे आदिवासी कला के बेजोड़ नमूने होते हैं।
जनजातिय क्षेत्रों में हस्तकला उनके सामाजिक जरूरत से जुड़ा होता है। उनके द्वारा निर्मित सामानों का उपयोग वे दैनिक जीवन में करते हैं। इन सामानों में खूबसूरत लेम्प, कंघे, डलिया, ग्लास, खिलौने, पंखे, जेवर, खूबसूरत हेयरपिन आदि प्रमुख होते हैं। ये आदिवासी लोग कंघे को बेचा नहीं करते। यह उनकी संस्कृति से जुड़ा हुआ वह हिस्सा होता है, जिसके तार भावनाओं से जुड़े होते हैं। यहां तक कि इन क्षेत्रों में काम करनेवाली स्वयंसेवी संस्थाओं को भी इस बात की इजाजत नहीं होती है कि इन कंघों को खरीदा या बेचा जा सके। मसलन उपहार के तौर पर कभी-कभी कोई किसी को दे सकता है।
उड़ीसा में करीब 62 तरह की आदिवासी जातियां रहती हैं। लेकिन कंघे बनाने की कला मात्र 12 से 15 जातियां हीं जानती हैं। ये कंघे बांस, लकड़ी, बैल तथा भैंस की सिगों तथा लोहे के बने होते हैं। जुआंग, धारुआ, कोया, कोंध, लांजिया, साउरा, संताल आदि जातियां अपने खास अंदाज में कंघियों का निर्माण करती हैं। विभिन्न जातियों द्वारा बनाए गए इन कंघियों के डिजाइन में भी भिन्नता होती है। इस भिन्नता के जरिए आप जाति या कौम का पता लगा सकते हैं। कौम के हिसाब से इन कंघियों के उपयोग में भी थोड़ी बहुत भिन्नता पाई जाती है। लेकिन जो भी हो इसको देनेवाले युवक की भावना और प्यार की कद्र करता है पूरा समुदाय तथा लेनेवाली युवति भी। यदि युवति को युवक पसंद नहीं हो या फिर वह किसी और को पसंद कर चुकी होती है तो आदर सहित वह कंघे को उस युवक को वापस कर देती है।
बोंडा जनजाति कंघियों को अपने पर्सनल उपयोग के लिए बनाते हैं। इस जाति की औरतें कंघियों को गहने की तरह उपयोग करती हैं। घागे में बांधकर वे इसे गले में पहनती हैं, कुछ औरते इसे कंघी करने के बाद अपने जूड़े में लगाकर रखती हैं। केओनिझार जिले के गुप्त गंगा तथा गोनासिका क्षेत्रों में रहनेवाले जुआंग्स जातियां कंघे को लकड़ी,बांस के साथ प्लास्टिक की तारों से खूबसूरती के साथ बनाते हैं। वे इन्हें कट्टा कहते हैं। कुंवारे युवक इसे बड़े जतन से बनाते हैं। वे इसका उपयोग अपनी महबूबा को देने के लिए करते हैं।
सामुहिक नृत्य के दौरान आदिवासी युवक-युवति अपना जीवनसाथी चुनते हैं। जिसमें वे इन उपहारों को एक दूसरे को प्रदान करते हैं। आदिवासी समाज में छह से सात खूबसूरत डिजाइन के कंघे बनाए जाते हैं। आजकल जहां बाजार में एक से एक डिजाइन के प्लास्टिक फाइवर आदि के कंघे बने मिलते हैं वहीं परंपरागत रूप से बने कलात्मक कंघे अवसान की ओर जाते से प्रतीत होते हैं।
साबेरी नदी के तट पर बसनेवाले आदिवासी धारूआ जनजाती के लोग कंघे को बांस की पतली-पतली तिलियां बनाकर उसे सागौन के धागे से खूबसूरती से बांधते हैं तथा विभिन्न आकार और डिजाइन के कंघे तैयार करते हैं। ये अपने कंघे को न तो किसी कीमत पर बेचते हैं, और न ही अनजान आदमियों को जल्दी उपहार में देते हैं। इन लोगों का यह मानना है कि यदि इन कंघे को बेचा गया तो यो अंधे हो जाएंगे। धारूआ जनजाति के लोग कंघे बनाने में सबसे ज्यादा हुनरमंद माने जाते हैं। ये लोग कंघियों को बाल में लगाने वाले हेयरपिन की तरह भी उपयोग करते हैं। तथा इसे ककेनी कहते हैं। भूवनेश्वर से 650 किलोमीटर दूर मलकांगिरि जिले में रहनेवाले कोयास आदिवासी जनजाति के लोग भी बांस की तिलियों तथा सागौन के धागे से कंघे का निर्माण करते है, लेकिन इनके द्वारा बनाए गए कंघे के डिजाइन तथा आकार में भिन्नता पाई जाती है। ये लोग कंघे का निर्माण बड़े पैमाने पर करते हैं तथा इसको बाजार में बेचते भी हैं। कोयास जाति के लोग इन कंघे को इसाद कहते हैं। आदिवासी युवतियां इसका उपयोग गले में पहनने के साथ-साथ कान में भी टॉप्स की तरह पहनती हैं। लेकिन इन कंघों का निर्माण सिर्फ पुरुष हीं करते हैं। कान्धमकला और बेलघर इलाके में रहनेवाले कुटिया कान्दा आदिवासी लोगों के द्वारा बनाए गए कंघे छोटे तथा चिड़ियों के आकार के होते हैं। वे लोग भी इसका उपयोग अपनी प्रेमिका को उपहार देने के लिए हीं करते हैं। इस जनजाति के लोग कंघे को नकई सिरेनी कहते हैं। अधेड़ तथा बूढी स्त्रियां भी इन कंघों का उपयोग डेकोरेटिव थिंग्स की तरह करती हैं। डोंगोरिया जाति के लोग जानवरों के सिंगों से कंघे का निर्माण करते हैं। तथा इसे ककुआ कहते हैं। आदिवासी युवको द्वारा निर्मित ये कंघे उनकी कला का बेजोड़ नमूना है। कला के साथ-साथ उनकी कोमल भावनाएं भी इसमें पिरोई हुई होती हैं। जो ये अपनी प्रेमिका को अपने दिल के साथ-साथ देते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 8, 2008

डोमकछ


सुमित्रा ताई अपने बेटे की बारात विदा करके थकहार कर अभी लेटी ही थी कि एक डाकू की कड़कती आवाज से घबरा कर उठ गई। देखा तो मिलट्री की ड्रेस में बड़ी-बड़ी मूंछों वाला एक डाकू उसके सामने खड़ा था और बोल रहा था, ऐ बुढ़िया घर में जो कुछ है, जल्दी से दे दो नहीं तो आज तुमलोगों की खैर नहीं है।
डर के मारे सुमित्रा ताई का बुरा हाल था, मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। तभी पीछे से घर के तमाम औरतों के ठहाके सुनाई दिये। ताई को समझते देर नहीं लगी कि ये औरतें डोमकछ का खेल खेलने लगी हैं। झपटकर ताई ने डाकू की मूंछ पकड़ कर खींच दिया, अरे ये तो कल्याणी बुआ हैं।
इसी के साथ हो गया पूरे जोश के साथ रातभर चलनेवाला डोमकछ ड्रामा शुरू।
बिहार, झारखंड तथा उसके आस-पास के इलाके में डोमकछ शादी समारोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लड़के की शादी के दिन जब घर के सारे मर्द बारात गये होते हैं और घर पर सिर्फ औरतें रहती हैं, रातभर ये महिलाएं गाना, बजाना, मर्दों के कपड़े पहनकर नाचना, कभी मालिन बन जाना कभी शराबी तो कभी हकीम साहब बन इलाज करने लगना इत्यादि के जरिये मौज-मस्ती करती हैं।
मनोरंजन के साथ-साथ घर की पहरेदारी का काम भी आसानी से हो जाता है। लड़की की शादी में यह रस्म उस दिन किया जाता है जब घर के करीब सभी पुरुष लड़के का तिलक करने उसके घर गए होते हैं, और घर में सिर्फ महिलाएं रह जाती हैं।
डोमकछ में मर्दों का प्रवेश वर्जित होता है। यदि कोई मर्द इस बीच घर में प्रवेश कर जाता है या लुकछिप कर भी इस प्रोग्रम को देखने की कोशिश करता है तो उसकी खूब खिंचाई की जाती है। कभी-कभी तो उसे साड़ी पहनकर नाचना भी पड़ता है।
इतना दिलचस्प प्रभावी होने के बावजूद भी अब ये कला धीरे -धीरे खत्म होती नजर आती है। कुछ तो भाई चारे की कमी के कारण ये कला खत्म होती नजर आती है। एक आदमी दूसरे आदमी की खुशी और गम में शामिल होने से कतराते हैं। लॉ एण्ड आर्डर की स्थिति खराब होने की वजह से भी लोग रात को घर से निकलना सुरक्षित नहीं समझते हैं। इसके बाद जो बचा-खुचा दम है वह पाश्चात्य संस्कृति के जबरदस्त प्रभाव की चपेट में आ गया है।
शहरों में रहनेवाली महिलाऍ अब उस तरह से अपने-आप को इन रस्मों में नहीं ढाल पाती हैं। अक्सर वे कटी-कटी इधर-उधर खड़ी नजर आती हैं। पिछले 25 सालों से करीब दो सौ डोमकछ आयोजनों में हिस्सा ले चुकी कल्याणी बुआ कहती हैं, अब वो मजा नहीं रहा डोमकछ में। आजकल की महिलाएं तो ज्यादातर दर्शक बनी रहती हैं। उन्हें कोरस गाना तो दूर ताली बजाने में भी परेशानी होती है।
कुछ वर्ष पूर्व दूरदर्शन पर भी डोमकछ नाटक प्रसारित हो चुका है, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया था।
लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद भारत ही नहीं मॉरिशस, गुएना आदि देशों में भी जहां कहीं भोजपुरी, अंगिका आदि संस्कृति है, शादी-ब्याह के मौके पर कमोवेश डोमकछ नजर आ ही जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

Sunday, March 30, 2008

सुख समृद्धि का प्रतीक शंख


कभी धर्म के लिए तो कभी आयुर्वेद के लिए शंख । कभी सौन्दर्य के लिए शंख तो कभी सुख समृद्धि के लिए शंख। सदियों से आदमी की जिन्दगी से जुड़ा है शंख।

वैसे तो शंख के कई प्रकार हैं, लेकिन दक्षिणावर्ती शंख, साधना मोती शंख और गणेश शंख की महत्ता कुछ अलग ही है। कोई शंख सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, तो कोई वातावरण को स्वच्छ रखता है।
दक्षिणावर्ती शंख- दांयी तरफ की ओर खुला भाग वाला शंख दक्षिणावर्ती शंख के नाम से जाना जाता है। यह थोड़ा दुर्लभ होता है। दक्षिणावर्ती शंख सफेद रंग मे उपलब्ध होता है, जिसपर हल्के भूरे रंग की धारियां होती हैं। यह शंख मां लक्ष्मी का अति प्रिय माना जाता है। दक्षिणावर्ती शंख को साधारणतया लोग अपने पूजाघर या लॉकर में रखते हैं। तथा किसी पर्व-त्योहार या उत्सव में ही निकालते हैं। यह सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार प्रत्येक देवी देवता अपने पास शंख रखते थे, जब कभी वे बहुत खुश होते या किसी युद्ध में विजयी होते तो इसका उपयोग करते थे। यह आम धारणा है कि जिस घर में दक्षिणावर्ती शंख होता है वहां सुख समृद्धि और शकून हमेशा रहता है। यह भी विश्वास है कि जो इसे अपने लॉकर में रखते हैं उन्हें जिंदगी में कभी पैसे की तंगी नहीं होती है। दक्षिणावर्ती शंख को सफेद कपड़े में लपेटकर या सफेद कपड़े के ऊपर रखा जाता है। तांत्रिक शास्त्र में इसका दूसरा ही महत्व है। इनके अनुसार दक्षिणावर्ती शंख धन का प्रतीक नहीं माना जाता है बल्कि यह बातावरण को स्वच्छ रखता है, और बुरी शक्तियां इससे कोसों दूर रहती हैं।
गणेश शंख- गणेश शंख व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा दिमकग में मजबूती लेता है। खुशी, सोहरत, अच्छा स्वास्थ्य के साथ-ताथ आत्मदिश्वास की प्राप्ति भी होती है। गणेश शंख को भगवान गणेश का प्रतिनिधि भी माना जाता है। गणेश शंख की उपयोगिता मुख्यत पूजा में होती है। इसके साधक सत्यवादी होते हैं तथा लंबी आयु पाते हैं। उसके बच्चे भी जन्म से ही रोगों से दूर रहते हैं तथा विषम परिस्थितियों में भी धैर्यवान होते हैं। गणेश शंख व्यवसाय के क्षेत्र में भी सहायक होता है।
फेंगसुई की दृष्टि से गणेश शंख व्यवसाय तथा विदेश यात्रा को प्रभावित करता है। यह शंख बुद्ध के पांव में पाए गए आठ निशानों में से एक है।6 से 8 इंच का एक गणेश शंख लेकर घर या आफिस के किसी कोने मेो रख दें। यदि आपके काम या शोहरत में बृद्धि होने लगी हो तो आप इसे घर के दक्षिणी हिस्से में रख दें। यदि आपका झुकाव पढ़ाई की तरफ हो तो आप इसे पूर्वोत्तर कोने में रखें। गणेश शंख को लोग अपने पूजाघर या लॉकर में रखते हैं, तथा किसी विशेष अवसर पर हीं इसे निकालते हैं।
साधना मोती शंख- मोती शंख साधारणतया गोल आकार का होता है, इसमें एक सफेद धारी होती है जो ऊपर से नीचे तक खिंची होती है। तथा पूरा शंख एक मोती की तरह चमकता रहता है। यह बहुत ही दुर्लभ किस्म का शंख है। इस शंख का उपयोग ज्यादातर ऐसे व्यक्ति करते हैं, जो सन्यास के मार्ग पर चल रहे हैं। इस शंख के माध्यम से उन्हें अपने ध्यान,योग आदि में बहुत सहायता मिलती है। वैसे तो दक्षिणावर्ती शंख साधना के लिए उत्तम माना जाता है। परन्तु मोती शंख और भी महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन यह बहुत दुर्लभ होता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस शंख में मां लक्ष्मी का वास होता है, जो धन और सम्पत्ति की देवी मानी जाती हैं। प्रत्येक परिवार इस शंख को अपने घर में रख सकता है।
आयुर्वेद में मोती शंख बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। रात को शंख में थोड़ा सा पानी डालकर रख दें और सुबह उसे अपनी त्वचा पर लगाएं तो त्वचा की सारी बिमारी दूर हो जाती है। यदि त्बचा पर सफेद दाग है तो शंख में थोड़ा पानी 12 घंटे तक रखें । उसके बाद उसे निकालकर त्वचा पर लगाएं, कुछ दिनों तक इस क्रिया को दोहराने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं। पेट की समस्या हो तो 12 घंटे तक शंख में रखा हुआ पानी सुबह-सुबह एक चम्मच पीयें। इस क्रिया को कुछ दिन तक दोहराने से पेट की सारी समस्या दूर हो जाती है। इस पानी का उपयोग आंखों में करने से आंखों की सास्या भी धीरे-धीरे दूर हो जाती है।
साधना मोती शंख के आर्थिक लाभ भी बहुत सारे हैं-सुबह सुबह शोख में थोडड़ा सा पानी लेकर एक बाल्टी पानी में डाल दें, उस पानी से नहाएं तो यश और भाग्य में वृद्धि होती है। अपने घर आफिस या कार्यक्षेत्र में इस शंख को रखने से आर्थिक परेशानी दूर हो जाती है। साधक धन तथा यश को प्राप्त करता है।
इस प्रकार प्रत्येक शंख अपने-आप में बहुत सारी महत्ता समेटे हुए है, और किसी भी कीमत पर कोई शंख एक दूसरे से का महत्वपूर्ण नहीं है।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, March 18, 2008

रंग है तो जीवन है


हमारा व्यक्तित्व, हमारी दिनचर्या, हमारा रहन-सहन और मिजाज सभी कुछ रंगों से प्रभावित होता है। जीवन में रंग है तो सब कुछ है वरना वह नीरस और बेमानी लगने लगता है।

जीवन में रंगों का अपना एक विशेष महत्व है। व्यक्ति किस रंग के परदे, चादर, तकिए का कवर आदि घर में लगाना पसंद करता है। घर की दीवारों पर कौन से रंग का पेंट पसंद है, आदि दैनिक जीवन से जुड़ी कई बातें हैं जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को बताती है। औरतों के स्वभाव का पता भी एक हद तक रोजमर्रे की जिंदगी में उनके द्वारा उपयोग किए जानेवाले कपड़े, लिपस्टिक,नेलपॉलिश,सैंडिल,कार आदि के कलर से चल जाता है। हल्के रंग के कपड़े,हल्के रंग की लिपस्टिक,नेल पॉलिश आदि व्यवहार करनेवाली औरतें स्वभाव से अक्सर गंभीर होती हैं। लाल,गाढ़ा गुलाबी,नारंगी आदि कलर का उपयोग करनेवाली औरतें जहॉं शोख चुलबुली मानी जाती हैं, वहीं गाढ़ा बैंगनी, नीला आदि कलर का उपयोग करनेवाली औरतें सतही तथा फूहड़ मानी जाती हैं। यह आज की बात नहीं है, वैदिक काल से ही मानव के कुछ विशिष्ट गुणों की पहचान कुछ खास रंगों से होती रही है। केसरिया रंग शौर्य और वीरता का हरा रंग हरियाली के साथ-साथ आर्थिक विकास का और सफेद रंग शांति और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इन तीनों रंगों को भारत के राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया गया है। आदिकाल से शुभ-अशुभ, हर्ष-विषाद, शांति आदि के लिए अलग-अलग रंगों का उपयोग किया जाता है। शादी-ब्याह और दूसरे मांगलिक अवसरों पर लाल रंग प्रयुक्त होता है, क्योंकि यह शुभ माना जाता है। लेकिन मृत्यु आदि के अशुभ समझे जाने वाले मौकों पर काले रंग का प्रयोग होता है। ये रंग हमारे जीवन में इतने रच-बस गए हैं कि इनसे इतर व्यवहार की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। रामायण और महाभारत में भी महारथियों के कपड़ों का रंग बहुत कुछ उनके व्यक्तित्व से मेल खाता हुआ ही बताया गया है। दुनिया के सभी मजहबों का अपना एक प्रतीक रंग है। हिंदू धर्म का प्रतीक रंग भगवा है तो ईसाई मजहब का सफेद और इस्लाम का हरा। वहीं जैन धर्म मानने वाले दो खेमे अपना अलग-अलग रंग पीला और सफेद रंगों को अपना प्रतीक रंग मानते हैं। और तो और धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादियों के लिए यह रंग उतना ही प्रिय और पवित्र माना जाता है, जितना विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए अपना-अपना रंग।
चिकित्सा शास्त्र खासकर प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में भी विभिन्न रंगों की बोतलों में पानी भरकर धूप में कुछ देर रखकर पीने से, अलग-अलग रंग की मिट्टी तक से बीमारियों की चिकित्सा बताई गई है।
जो लोग फलित ज्योतिष शास्त्र में आस्था रखते हैं, वे जानते हैं कि उनके जीवन में रंगों की कितनी अहम भूमिका है। हफ्ते के कौन से दिन किस रंग के कपड़े पहनने से लाभ या हानि होने की संभावना है। अपनी राशि और जन्म तिथि के मूलांक के हिसाब से कौन सा रंग शुभ और अनुकूल है या कौन सा रंग अशुभ या विघ्नकारक है, इसका एहसास उन्हें हमेशा रहता है। ग्रह-नक्षत्रों के विभिन्न रंगों के साथ संबंधों को लेकर दो राय भले ही हो सकती है, लेकिन सड़कों पर चलने वाले स्वचालित वाहनों के रंगों के बारे में हमें कतई भ्रम नहीं रखना चाहिए। विशेषज्ञों के अध्ययन से अब यह साबित हो गया है कि कुछ खास रंगों के वाहनों में दुर्घटना की आशंका ज्यादा रहती है, जबकि कुछ दूसरे खास रंग निरापद माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सड़क पर सुरक्षा की दृष्टि से नीला या पीला रंग सबसे अच्छा माना जाता है और सलेटी सबसे खराब। दुनिया की सबसे महंगी कारें बनानेवाली ,एक अमेरिकी कंपनी द्वारा पिछले दिनों कराए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि सफेद, चमकदार पीले और नारंगी रंग की कारें ज्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि ये रंग आसानी से नजर आ जाते हैं और दुर्घटना की आशंका कम हो जाती है। इसके विपरीत गहरा रंग आसानी से दूसरे वाहन-चालकों को नहीं दिखाई देता है। इसलिए इस रंग के कारण दुर्घटनाग्रस्त होती रहती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि रंगों का पूरा माया संसार अपने चारों तरफ फैला पड़ा है। और आप चाहकर भी इससे नहीं बच सकते। आपको सिर्फ य़ह ही तय करना है कि कब कौन सा रंग आपके व्यक्तित्व, आपके मिजाज, आपकी जीवनशैली और पसंद के ज्यादा अनुकूल है या कौन सा रंग आपको शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा निरापद लगता है। इसलिए अच्छी तरह सोच-समझकर अपने मनपसंद रंग का चयन कीजिए और उस रंग में अपने को रंग लीजिए। वैसे मौसम भी तो रंगों का ही है।
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, February 20, 2008

लोक जीवन में तुलसी


तुलसा महाराणी....अड़वो दीजै......गड़वो दीजै.....पाट पीतांबर दीजै.........तल जमना के तीर दीजै........घी को कोपौ दीजै.......बैकुंठ को वास दीजै.......राम लछमण को खांध दीजै.........मुख में तुलसी घट में राम.....

जल चढ़ाते समय तुलसी से वांछना की ये परंपरा सदियों पुरानी है। भारतीय लोक संस्कृति में सदियों से वृक्षों,वनस्पतियों तथा सृष्टि के अन्य अंगों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और तुलसी का स्थान सबसे ऊंचा है।
प्रत्येक हिंदू परिवार के घर-आंगन में तुलसी चौरा, गमले या क्यारियों में तुलसी का पौधा अवश्य लहलहाता हुआ मिलेगा। वेदों एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार तुलसी का ना केवल औषधियुक्त पौधे के रूप में मूल्यांकन किया जाता है वरन् विष्णु के देवी प्रतिनिधि के रूप में आदरणीय भी मानी जाती है। विष्णु आयुर्वेद के आचार्य माने जाते हैं। धन्वन्तरि विष्णु के अवतार हैं। तुलसी में अनेक औषधीय गुण हैं। इसलिए तुलसी का विष्णुप्रिया होना स्वाभाविक है। इसी आधार पर तुलसी और विष्णु के विवाह की कल्पना की गई होगी। लेकिन कई आख्यानों में तुलसी को विष्णु की जगह कृष्णप्रिया भी माना जाता है। इटली से वृंदावन आकर भक्ति संगीत पर शोध कर रही सेलीना थीलमान बताती हैं, लोक मान्यता में लोग तुलसी का विवाह विष्णु के साथ ही मानते हैं, पर ब्रजक्षेत्र में श्रीकृष्ण के साथ तुलसी के विवाह का प्रचलन है। कथा है कि तुलसी के पिता ने जब अपनी पुत्री से भावी पति के बारे में पूछा था तो तुलसी ने कुछ लजाते और कुछ सकुचाते हुए श्रीकृष्ण का नाम लिया था, ' हे पिताजी । उगता हुआ सूर्य गर्म होता है, तथा चंद्र एक पखवारे का राजा। ब्रह्मा चार सिर वाले तथा विष्णु चार भुजा वाले हैं और शिव विष के साथ और गणेश सूंड़ वाले हैं। शुक्र एक आंख वाले, बुद्ध बुद्धिहीन, मंगल पीड़ादायक, शनि ग्रहों से घिरे और बृहस्पति शीतल हैं, इसलिए जग को आह्लादित करनेवाले बांसुरी वादक श्रीकृष्ण ही मेरे पति हैं।' अपनी बेटी का यह उत्तर सुनकर वह श्रीकृष्ण के यहां शादी का पैगाम लेकर गए और तुलसी का विवाह श्री कृष्ण के साथ हुआ। उसी दिन से तुलसी कृष्णप्रिया कहलाई। तुलसी के वृंदा नाम पर वृंदावन नाम पड़ा और वृंदावन कृष्ण चरित्र व रासलीलाओं का केंद्र बना।
-प्रीतिमा वत्स

Friday, January 18, 2008

समुद्र मंथन का साक्षी मंदार




इतिहास यहां कविता बनकर गूंजता है। कहते हैं, समुद्र मंथन में देवताओं ने मंदार पर्वत को मथानी बनाया था। सदियों से खड़ा मंदार आज भी लोक की आस्था का पर्वत बना हुआ है।


लोक मान्यता है कि भगवान विष्णु सदैव मंदार पर्वत पर निवास करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह वही पर्वत है, जिसकी मथानी बनाकर कभी देव और दानवों ने समुद्र मंथन किया था। मकर-संक्रांति के अवसर पर यहां एक मेला भी लगता है जो करीब पंद्रह दिन तक चलता है। मंदार पर्वत से लोगों की आस्थाएं कई रूप से जुड़ी हैं। हिंदुओं के लिए यह पर्वत भगवान विष्णु का पवित्र आश्रय स्थल है तो जैन धर्म को मानने वाले लोग प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य से इसे जुड़ा मानते हैं। वहीं आदिवासियों के लिए भी मंदार पर्वत पर लगनेवाला मेला कई उम्मीद लेकर आता है। सोनपुर मेले की समाप्ति के बाद से ही लोग इंतजार करते हैं मंदार पर्वत के पास लगने वाले मेले का। सोनपुर मेले के बाद मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला बौंसी का दूसरा बड़ा मेला माना जाता है।
बौंसी भागलपुर से दक्षिण में रेल और सड़क मार्ग पर स्थित बिहार राज्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मेले का इतिहास काफी पुराना है इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी बड़े पैमाने पर मिलजुल कर मेले का आनंद लेते हैं।
मेले का मुख्य आकर्षण काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित सात सौ फीट ऊंचा मंदार पर्वत है। यह अनेक दंत कथाओं को समेटे बौंसी से करीब दो किलोमीटर उत्तर में स्थित है। समुद्र मंथन की पौराणिक गाथा से जुड़ा होने के कारण इसका विशेष महत्व है। मंदार की चट्टानों पर उत्कीर्ण सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां, गुफाएं, ध्वस्त चैत्य और मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव के मूक साक्षी हैं। विभिन्न पुराणों, ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों में अनेक बार मंदार का नाम आया है स्कंद पुराण में तो मंदार महातम्य नामक एक अलग अध्याय ही है। मंदार वैष्णव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है। प्रसिद्ध वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु ने भी अनेक जगह मंदार पर्वत की चर्चा की है। समुद्र मंथन का आख्यान महाभारत के आदि पर्व के 18वें अध्याय में भी है। महाभारत के मुताबिक भगवान विष्णु की प्रेरणा से मेरू पर्वत पर काफी विचार विमर्श के बाद देवताओं और दानवों ने समुद्र को मथा।
मकर संक्रांति के दिन मंदार पर्वत की तलहट्टी में उपस्थित पापहरणि तालाब का महत्व तो कुछ और है। लोकमान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है। लोग मकर संक्रांति के दिन अवश्य यहां स्नान करते हैं। जगह-जगह जल रही आग का लुत्फ उठाते हैं। उसके बाद भगवान मधुसूदन की पूजा अर्चना करते हैं। दही-चूड़ा और तिल के लड्डू विशेष रूप से खाए जाते हैं।
पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक मंदार पर्वत की अधिकांश मूर्तियां उत्तर गुप्त काल की हैं। उत्तर गुप्त काल में मूर्तिकला की काफी सन्नति हुई थी। मंदार के सर्वोच्च शिखर पर एक मंदिर है, जिसमें एक प्रस्तर पर पद चिह्न अंकित है। बताया जाता है कि ये पद चिह्न भगवान विष्णु के हैं। पर जैन धर्मावलंबी इसे प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के चरण चिह्न बतलाते हैं और पूरे विश्वास और आस्था के साथ दूर-दूर से इनके दर्शन करने आते हैं। एक ही पदचिह्न को दो संप्रदाय के लोग अलग-अलग रूप में मानते हैं लेकिन विवाद कभी नहीं होता है। इस प्रकार यह दो संप्रदाय का संगम भी कहा जा सकता है। इसके अलावा पूरे पर्वत पर यत्र-तत्र अनेक सुंदर मूर्तियां हैं, जिनमें शिव, सिंह वाहिनी दुर्गा, महाकाली, नरसिंह आदि की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। चतुर्भुज विष्णु और भैरव की प्रतिमा अभी भागलपुर संग्रहालय में रखी हुई हैं। फ्रांसिस बुकानन, मार्टिन हंटर और ग्लोब जैसे पाश्चात्य विद्वानों की आत्मा जिन्हें मंदार के सौंदर्य ने कभी प्रभावित किया था, सदियों से प्राकृतिक आपदाएं सहन करती हुई ये मूर्तियां उद्धार के लिए तरसती होंगी । स्थानीय लोगों ने इन प्राचीन मूर्तियों का आकार परिवर्तित कर इच्छा के मुताबिक देवी-देवता के रूप में स्थापित कर लिया है और भक्तों को आकर्षित कर पैसा कमाया जा रहा है। इससे प्राचीन मूर्तियों का अस्तित्व खतरे में है। पर्वत परिभ्रमण के बाद लोग बौंसी मेला की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। बौंसी स्थित भगवान मधुसूदन के मंदिर में साल भर श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है। मकर संक्रांति के दिन यहां से आकर्षक शोभायात्रा निकलती है।
-प्रीतिमा वत्स

Sunday, January 6, 2008

स्वस्तिक का सफर


स्वस्तिक का अर्थ होता है- कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
कभी पूजा की थाली में, कभी दरवाजे पर, वेदों-पुराणों में प्रयुक्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ पवित्र धर्मचिह्न के रूप में प्रयुक्त स्वस्तिक चिह्न आज फैशन की दुनिया में भी शुमार होता जा रहा है। अब यह पूजा की थाली से उठकर घर की दीवारों तथा सुंदरियों के परिधानों में सजने लगा है।
स्वस्तिक चिह्न का डिजाइन इजिप्सन क्रास, चाइनीज ताउ, रोसीक्रूसियंस और क्रिश्चियन क्रास से मिलता जुलता है। विभिन्न आकृतिओं से मिलने वाला यह चिह्न हर युग में अपना अलग-अलग महत्व भी रखता है। सनातन धर्म और जैन धर्म हो या बौद्ध धर्म, हर धर्म और युग में अपनी महत्ता के साथ स्वस्तिक उपस्थित है।
ईसा पूर्व में स्वस्तिक आकृति के दायें और बायें पक्ष से आदमी लापरवाह थे। उस समय इस रहस्यमय आकृति की गंभीरता से लोग बेखबर थे। तब यह धार्मिक रूप से दो सिद्धान्तों के विकास और विनाश को दर्शाता था। स्वस्तिक का महत्व समाज और धर्म दोनों ही स्थानों में है। भारतवर्ष में एक विशाल जनसमूह स्वस्तिक निशान का उपयोग करता है। कोई इसे सजाने के तौर पर तो कोई इसका उपयोग धर्म और आत्मा को जोड़कर करता है। दक्षिण भारत में जहां इसका उपयोग दीवारों और दरवाजों को सजाने में किया जाता है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में इस आकृति को तंत्र-मंत्र से जोड़कर देखा जाता है। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में इस आकृति को एक पवित्र धार्मिक चिह्न के रूप में माना जाता है। स्वस्तिक संस्कृत का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है- कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
वेदों में स्वस्तिक चिह्न के बनावट की व्याख्या विभिन्न अर्थों में की गई है। कभी इसके चारों भागों को समाज के चार वर्ण के रूप में माना गया है। कभी इसकी चारों भुजाओं को विष्णु के चार भुजा के रूप में माना गया है जो विकास और विनाश के बीच संतुलन बनाकर सृष्टि को चला रहे हैं। कई बार स्वस्तिक के निशान हमें भ्रम में भी डाल देते हैं। पौराणिक काल में जहां इसका उपयोग धर्म के प्रतीक चिह्न के रूप में किया जाता था, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाजी पार्टी के लोग स्वस्तिक के निशान को बहुत ही महत्वपूर्ण एवं संभावनाओं से भरा हुआ माध्यम मानते थे। वहीं आज यह स्वस्तिक सुंदरियों के परिधानों और आभूषणों तक पहुंच गया है। अर्थात कई पड़ावों से गुजर चुका है -स्वस्तिक का सफर।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, January 1, 2008

लोक देव हनुमान


हनुमान एक अखिल भारतीय लोक देव हैं। कन्या कुमारी से काश्मीर तक तथा द्वारका से कामाख्या तक उसका देवस्वरूप लोकमान्य हैं। केरल मे शुचीन्द्रम के शिवालय की सन्निधि में उसकी लघुमूर्ति है, तो तमिलनाडु में नामक्कल वैष्णव मन्दिर के सामने उसकी मूर्ति तीन पुरूष लम्बे कद की है। कर्नाटक के लोकना्टय यक्षगान में हनुमान का पात्र महत्वपूर्ण होता है। महाराष्ट्र में गांवों के प्रवेशद्वारों में मारूति प्रतिष्ठित रहता है। नासिक- पंचवटी के राममंन्दिर के सम्मुख हनुमान की पत्थरमूर्ति पर धातु का टोप चढाया हुआ है। किन्तु पास ही टाककी गांव में गोबर तथा मिट्टी का मारुति स्थित है, जिसकी साक्ष्य में समर्थ रामदास ने सत्रहवीं सदी में बरसों तप किया था। मध्यप्रदेश के बस्तर में आदिवासी हनुमान खुले आंगन में भुनी मिट्टी का शिल्प होता है। वहां हिमाचल में घर की पुती दीवार पर हनुमान जी की लेप की मूर्ति पूजनीय रहती है। वाराणसी में तुलसीदासजी का बाल हनुमान भक्तजनों को प्रिय है, वैसे ही उसका पंचमुखीभव्य रूप संकटमोचन होकर प्रार्थनीय है। अंगजनपद के हर घर हर मोड, हर चौराहे पर हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। मीरा के राजस्थान,कृष्णजी की मथुरा, जगन्नाथजी का ओडिया..... विभिन्न कारीगरी में हनुमान साकार करते हैं। मिट्टी,काठ,पत्थर आदि में, अथवा केवल मानसिक रूप में, शक्ति तथा बुद्धि,युक्ति तथा सरलता, भक्ति तथा भक्तसहायता, लघुता तथा विशालता आदि परस्पर विरूद्ध गुणों का भाजन हनुमान माना जाता है।
फिर भी उनका मूर्तरूप, राम कृष्ण जैसे अवतार, शंकर पार्वती जैसे देवता, आदि के समान, मानव का न होकर सपुच्छ वानर का ही रहता है। गाय अथवा नाग अपने प्राणिरूप में पूज्य हैं, उस प्रकार वानर स्वयं पूज्य नहीं होते। फिर भी खेत में ऊधम मचानेवाले वानर को किसी हद तक अभय प्राप्त है, अथवा गांव में मृत वानर के यात्रापूर्वक संस्कार किये जाते हैं- यह मानकर कि वह हनुमान के वंशज हैं। सारांश, वानर नाम प्राणी में देवत्व नहीं, हनुमान नामक देव वानर हैं। हनुमान का रूप वानर का है, किन्तु उसका चरित्र दैवी है। यह भावना इतनी दृढ तथा सर्वगामी है कि, शिल्प चित्र या अन्य कारीगरी की तफतीस कुछ भी हो, वानर का चेहरातथा पूंछ उसमें अवश्य होते हैं।
एक सामान्य वानर को प्राप्त न होने वाला देवत्व हनुमान को कैसे प्राप्त हुआ । भारत भर में इसका उत्तर उसके विलक्षण कर्मों के कारण यही होगा। जन्म लेते ही सूर्य के प्रति उडान, लंकादहन तथा औषधियों के लिए पर्वत उठाकर लाना......... ये दिव्य कर्म करने वाला दैवी वानर यही हनुमान की लोकमानस में प्रतिमा है।

प्रीतिमा वत्स

Sunday, December 23, 2007

लोक देव करमा


सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता में लोक देवी-देवताओं के महत्व को समाज में व्याप्त अनेक पर्व-त्योहारों,इससे जुड़ी किंवदंतियों, कथा-कहानियों, गीतों आदि के माध्यम से बखूबी जाना समझा जा सकता है। अंग-जनपद में बहुत सारे पर्व-त्योहार ऐसे मनाए जाते हैं, जो अन्यत्र कम ही देखने को मिलते हैं। इन पर्व-त्योहारों पर जो कथाएं कही जाती हैं, वह जाति प्रथा से ग्रसित कतई नहीं हैं। इन पर्व-त्योहारों को हर वर्ण के लोग मनाते हैं-


अंग जनपद में यह पर्व आदिवासियों के साथ-साथ अन्य लोग उल्लास के साथ मनाते हैं। पर्व की लोककथा कुछ इस प्रकार है। कर्मा और धर्मा नामक दो भाई थे। दोनों ही बड़े प्रेम से रहते थे, तथा गरीबों की सहायता किया करते थे। कुछ दिन बाद कर्मा की शादी हो गई। कर्मा की पत्नी बहुत ही अधार्मिक तथा बुद्धिहीन स्त्री थी। वह, हर वह काम किया करती थी, जिससे कि लोगों को हानि और क्लेश पहुंचे। यहां तक कि उसने धरती मां को भी नहीं छोड़ा, वह चावल बनाने के बाद मांड जो पसाती वह भी जमीन पर सीधे गिरा देती । इससे कर्मा को बड़ा तकलीफ हुआ। वह धरती मां को घायल और दुखी देखकर काफी दुखी था। गुस्से में वह घर छोड़कर चला गया। उसके जाते ही पूरे इलाके के आदमियों का करम (तकदीर) चला गया। अब वे काफी दुखी और पीड़ित जीवन बिताने लगे।
कुछ दिन बाद जब धर्मा से नहीं रहा गया। इलाके की अकाल और भूखमरी से जब वह व्याकुल हो गया तो अपने भाई कर्मा को खोजने के लिए निकल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद उसे प्यास लगी। पानी की खोज में वह इधर-उधर भटकने लगा। सामने एक नदी दिखाई दिया पर वह सूखी पड़ी थी। नदी ने पास आकर धर्मा से कहा कि जबसे हमारे कर्मा भाई इधर से गए हैं हमारे तो करम ही फूट गए हैं। अब यहां कभी पानी नहीं आता है, यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो हमारे बारे में जरूर कहिएगा। धर्मा आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक आम का वृक्ष मिला, जिसके सब फलों में कीड़े थे। उसने भी धर्मा को कहा कि जबसे कर्मा भाई इधर से गुजरे हैं, इस पेड़ के सारे फल खराब हो गए हैं। यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो इसका निवारण पता कीजिएगा। धर्मा वहां से आगे बढा। कुछ दूर और चलने पर उसे एक वृद्ध व्यक्ति मिला, जिसके सिर का बोझ तब तक नहीं उतरता था, जब तक कि चार-पांच आदमी मिलकर उसे नोच-नोच कर उतारते नहीं थे। उसने भी धर्मा को कर्मा के मिलने पर अपना दुखड़ा सुनाने तथा उसका निवारण पूछने की बात कही। आगे मार्ग में उसे पुनः एक औरत मिली। उसने भी धर्मा को कहा कि यदि कर्मा उसे मिले तो उससे कहे कि जब वह खाना पकाती है तो उसके हाथ से कढ़ाई-बर्तन जल्दी छूटते नहीं हैं, वह हाथ में हीं चिपक जाता है यह समस्या किस तरह से दूर होगी।
चलते-चलते धर्मा एक रेगिस्तान में पहुंच गया। वहां जाकर उसने देखा कि उसका भाई कर्मा धूप और गर्मी से व्याकुल रेत पर पड़ा था। उसके पूरे शरीर पर फफोले पड़े थे। धर्मा ने उसकी यह हालत देखी और काफी दुखी हुआ। उसने कर्मा को घर चलने के लिए कहा तो कर्मा बोला मैं उस घर में कैसे जाऊं। वहां पर मेरी पत्नी है, जो इतनी अधार्मिक और बुद्धिहीना है कि मांड़ तक जमीन पर फेंक देती है। इस पर धर्मा बोला मैं आपको वचन देता हूं कि आज के बाद कोई भी स्त्री मांड जमीन पर नहीं फेंकेगी।
कर्मा अपने भाई धर्मा के साथ घर की ओर चला तो मार्ग में उसे सबसे पहले वह स्त्री मिली। उसे कर्मा ने कहा कि तुमने किसी भूखे ब्राह्मण को खाना नहीं दिया था, इसलिए तुम्हारी यह दशा हुई है। आज के बाद किसी भूखे ब्राह्मण का तिरस्कार मत करना, तेरे कष्ट दूर हो जाएंगे।
अंत में उसे वह नदी मिली जिसमें पानी नहीं था। नदी को देखकर कर्मा ने कहा तुमने किसी प्यासे आदमी को साफ पानी नहीं दिया था, इसलिए अब तुम्हारे पास पानी नहीं है। आगे से तुम कभी अपना गन्दा जल किसी को पीने मत देना, कोई तुम्हारे तट पर पानी पीने आए तो उसे स्वच्छ जल देना, तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे। इस प्रकार कर्मा पूरे रास्ते में सभी को उसके हिस्से का कर्म प्रदान करते हुए अपने घर आया तथा घर में पोखर बनाकर उसमें कर्मडार लगाकर उसकी पूजा की। इलाके के अकाल समाप्त हो गए। खुशहाली लौटी। उसी कर्मा की याद में आज भी लोग कर्मा पर्व मनाते हैं। कर्मा की पूजा में पोखर के किनारे खजूर की डाली लगाकर उसमें फूल खोंसा जाता है। लोक मान्यता है कि जो भी स्त्री कर्मडार की पूजा करेगी और अपने हिस्से का कर्म पाएगी उसके कांटे जैसे स्वाभाव या भाग्य में भी फूल खिल जाएंगे।

-प्रीतिमा वत्स

Saturday, December 8, 2007

बीते वक्त का खुदा हाफिज



वो मिट्टी की हांड़ी.......वो कांसे की थाली ...... अंगीठी की आंच.......भोर की गीतों के स्वर.....हाथ के पंखों पर कटती दोपहरें और कैरोसिन के लैम्पों से जगमगाती रातें.....बदलते जमाने की तेज बयार में कहीं बह गईं। इसी आंधी में गुजरे जमानें के अभ्यस्त हाथ देखते-देखते अकुशल कारीगरों में बदल गए.....क्योंकि नये जमाने की तरक्की पसंद आबादी को बेबाकी भरा बदलाव इस कदर रात आया कि बिगड़ती सेहत की चिंता रूढिवादी सोच में तब्दील हो गई।


लोहे की कड़ाही भी अपने आप को नॉनस्टिक किचन वेयर में तब्दील होने से बचा नहीं पायी। आधुनिक रसोईघर में जितना अजूबा कोयले या लकड़ी की अंगीठी की आंच को देखना लगता था......उतना शायद कड़ाही देखना नहीं। बहुत आकर्षक न होने के बावजूद लोहे की कड़ाही बहुत दिनों तक आधुनिक रसोईघरों में भी अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रही.....इसे एकमात्र ऐसा बर्तन कहा जा सकता है जिसके साथ बदलते जमाने ने सबसे कम छेड़छाड़ की थी, लेकिन वक्त की आंधी में लोहे की कड़ाही भी उड़ गई।
सिर्फ लोहे की कड़ाही हीं क्यों.......वो मिट्टी की हांड़ी.......वो कांसे की थाली...... अंगीठी की आंच......... भोर की गीतों के स्वर..... हाथ के पंखों पर कटती दोपहरें और कैरोसिन के लैम्पों से जगमगाती रातें.....बदलते जमाने की तेज बयार में कहीं बह गईं। इसी आंधी में गुजरे जमानें के अभ्यस्त हाथ देखते-देखते अकुशल कारीगरों में बदल दिये गये। बहुत से लोग जो गुनीजनों की सूची में थे, वे अनपढ़, असभ्य और अप्रशिक्षित माने जाने लगे। नये जमाने ने वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सीख लिया और हम भूल गए कि जिंदगी में श्रम की भी कोई अहमियत होती है।
वो जमाना बीत गया, जब इस्तेमाल से पहले या बाद में रसोईघर में रखे हुए बर्तनों की चमक बता देती थी कि उसपर कितना मेहनत किया गया है। अब जमाना नॉनस्टीक किचन वेयर का है और सफाई के लिए एक से एक उम्दा विकल्प बाजार में मौजूद हैं। लेकिन धातुओं से बने बर्तनों की शुद्धता और फायदे अब वैज्ञानिक आधार पर भी साबित हो चुके हैं। चांदी के बर्तन किसी भी प्रकार के संक्रमण से लड़ने में हमारी सहायता करते हैं। इसलिए प्रतीकात्मक रूप में ही सही आज भी किसी बच्चे के जन्म पर चांदी के बर्तन देने की परंपरा है। जबकि लोहे की कड़ाही में बनी सब्जी खाने से शरीर में आयरन की कमी नहीं होती। रातभर ताम्बे के बर्तन में पानी रखने से उसमें आक्सीडेशन प्रक्रिया उत्पन्न होती है जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है। इसी तरह मौसमी बदलाव से अगर गले में फांस हो जाती है तो उसके लिए रातभर फूल की थाली में रखा पानी पीने की सलाह दी जाती रही है।
आज जहां मिनरल वॉटर ने यूज एंड थ्रो की संसकृति को जन्म दिया है, वहीं पहले यात्रा पर जाते समय मिट्टी की सुराही में पानी लेकर चलने की परंपरा थी। सुराही के छोटे-छोटे छिद्र वाष्पीकरण के जरिए पानी को ठंडा रखते हैं। पानी में मिट्टी की सुगंध बेगानी जगह में भी अपनेपन का एहसास कराती है। आहार विज्ञानी कमलीकृष्ण स्वामी कहती हैं, हमें भोजन पकाने उसे धोने, उसमें नमक-मिर्च लगाने और उसे खाने के परंपरागत भारतीय तरीकों पर लौट जाना चाहिए।
लेकिन क्यों........क्या ये महज अतीत का मोह भर नहीं है । अब हमारे जीवन में पीतल के बर्तनों की जगह मांजने की परेशानी से बचानेवाले बर्तन तो जरूर आ गए, लेकिन साथ हीं हाथों की अंगुलियां नीबू इमली के साथ होनेवाली एक्सरसाइज से भी वंचित हो गई। पैकेट बंद आटा, दाल और चावल समय तो बखूबी बचा रहे हैं। लेकिन साथ हीं शारीरिक श्रम के अभाव में गठिया, मधुमेह,मोटापा अनियमित मासिक धर्म, यूटेरस का खराब होना आदि तमाम तरह की बीमारियां भी महिलाओं को सौगात में मिल रही है। नयी जीवन शैली में हम पैदल चलना छोड़ चुके हैं, शारीरिक परिश्रम करना भूल गए हैं जिससे हमें असमय मधुमेह, हाइब्लडप्रेशर, हाइपरटेंशन, हर्ट-अटैक जैसे अनेक बीमारियों ने हमें घेर लिया है। डॉक्टरों ने भी इन्हे लाइफ स्टाइल डिजिज का नाम दे दिया है। बाबा रामदेव का कहना है कि, स्वस्थ रहना है तो हमें अतीत की ओर मुड़ना ही होगा। चक्की और उखल न पीस सकें तो चक्की पीसनेवाला एक्सरसाइज करना हीं होगा। पिज्जा, बर्गर, कोल्डड्रिंक्स जैसी तमाम चीजों की जगह घर का बना परंपरागत खाना अपनाना ही पड़ेगा। समय से सोना और समय से जागना हीं पड़ेगा।
लेकिन ऐसा मुमकिन है क्या । शहरों की बात छोड़ दीजिए, अब तो गांवों में भी घर की चक्की, चावल निकालने वाला ऊखल आदि किसी कोने में उपेक्षित सा पड़ा रहता है। कुंए पर बनी चकरी अब किसी काम की नहीं है। पंप से पानी बाहर आ रहा है और.....अब किसी पनघट पर कोई बहू अपनी सास की निन्दा करते नहीं मिलती। गांव की औरतें बताती हैं कि गेहूं पीसने और दूध दुहनेवाली बिजली की मशीनें आ जाने से बड़ा आराम हो गया है। मेहनत बच रही है.........समय बच रहा है..........।
तकनीकी क्रांति ने हमारे जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन हमें एक ऐसे चक्र में डाल दिया है, जिसमें हम अपनी सहूलियत के लिए अपने को व्यस्त करते चले जाते हैं.......मशहूर समाज वैज्ञानिक भरत झुनझुनवाला कहते हैं- एक्टीविटी के स्तर में फर्क आया है। व्यस्तताओं का स्वरूप एकदम बदल रहा है। पहले चक्की में आटा पीसा जाता था और बैलगाड़ी में सफर होता था। अब व्यस्तताएँ मानसिक हैं।
और मानसिक व्यस्तताओं से उबरनें के लिए हम और भी व्यस्त होते चले गए। सभ्य बनने की कोशिश में चलने के लिए कार, कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन, झाड़ू की जगह वैक्युम क्लीनर, चक्की की जगह मिक्सी और ऐसे हीं अनगिनत सामान घरों में पहुंच गए। कोई भी ऐसा काम, जिसमें शारीरिक मेहनत की गुंजाइश थी, दोयम दर्जे का मान लिया गया। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि जरूरत की परिभाषा बदल चुकी है। अब बाजार बताता है कि आपके घरों के लिए क्या चाहिए। पैसे नहीं हैं तो उधार ले जाइए और जिस भारत के लोग वर्षों तक रहीम के दोहे, तेते पांव पसारिए जेती लाम्बी सौर को सबसे बड़ा सूत्र मानकर अपने खर्चों को आमदनी की सीमा में रखने की कोशिश करते थे..........और सादगी को जिंदगी का बूनियादी नुस्खा मानते रहे..........वहीं अब रहीम के दोहों को दरकिनार कर ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत जैसे श्लोक को जिंदगी का मूल मंत्र बना दिया गया है........और कहना गलत नहीं होगा कि अब हर भारतीयों के पैर चादर से बाहर हैं। हर कोई अपने-अपने हिस्से का सुख बटोर रहा है...लेकिन इस आपाधापी में बिगड़ती सेहत की चिंता किसी को नहीं है।
-प्रीतिमा वत्स

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...