Tuesday, April 8, 2008

डोमकछ


सुमित्रा ताई अपने बेटे की बारात विदा करके थकहार कर अभी लेटी ही थी कि एक डाकू की कड़कती आवाज से घबरा कर उठ गई। देखा तो मिलट्री की ड्रेस में बड़ी-बड़ी मूंछों वाला एक डाकू उसके सामने खड़ा था और बोल रहा था, ऐ बुढ़िया घर में जो कुछ है, जल्दी से दे दो नहीं तो आज तुमलोगों की खैर नहीं है।
डर के मारे सुमित्रा ताई का बुरा हाल था, मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। तभी पीछे से घर के तमाम औरतों के ठहाके सुनाई दिये। ताई को समझते देर नहीं लगी कि ये औरतें डोमकछ का खेल खेलने लगी हैं। झपटकर ताई ने डाकू की मूंछ पकड़ कर खींच दिया, अरे ये तो कल्याणी बुआ हैं।
इसी के साथ हो गया पूरे जोश के साथ रातभर चलनेवाला डोमकछ ड्रामा शुरू।
बिहार, झारखंड तथा उसके आस-पास के इलाके में डोमकछ शादी समारोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लड़के की शादी के दिन जब घर के सारे मर्द बारात गये होते हैं और घर पर सिर्फ औरतें रहती हैं, रातभर ये महिलाएं गाना, बजाना, मर्दों के कपड़े पहनकर नाचना, कभी मालिन बन जाना कभी शराबी तो कभी हकीम साहब बन इलाज करने लगना इत्यादि के जरिये मौज-मस्ती करती हैं।
मनोरंजन के साथ-साथ घर की पहरेदारी का काम भी आसानी से हो जाता है। लड़की की शादी में यह रस्म उस दिन किया जाता है जब घर के करीब सभी पुरुष लड़के का तिलक करने उसके घर गए होते हैं, और घर में सिर्फ महिलाएं रह जाती हैं।
डोमकछ में मर्दों का प्रवेश वर्जित होता है। यदि कोई मर्द इस बीच घर में प्रवेश कर जाता है या लुकछिप कर भी इस प्रोग्रम को देखने की कोशिश करता है तो उसकी खूब खिंचाई की जाती है। कभी-कभी तो उसे साड़ी पहनकर नाचना भी पड़ता है।
इतना दिलचस्प प्रभावी होने के बावजूद भी अब ये कला धीरे -धीरे खत्म होती नजर आती है। कुछ तो भाई चारे की कमी के कारण ये कला खत्म होती नजर आती है। एक आदमी दूसरे आदमी की खुशी और गम में शामिल होने से कतराते हैं। लॉ एण्ड आर्डर की स्थिति खराब होने की वजह से भी लोग रात को घर से निकलना सुरक्षित नहीं समझते हैं। इसके बाद जो बचा-खुचा दम है वह पाश्चात्य संस्कृति के जबरदस्त प्रभाव की चपेट में आ गया है।
शहरों में रहनेवाली महिलाऍ अब उस तरह से अपने-आप को इन रस्मों में नहीं ढाल पाती हैं। अक्सर वे कटी-कटी इधर-उधर खड़ी नजर आती हैं। पिछले 25 सालों से करीब दो सौ डोमकछ आयोजनों में हिस्सा ले चुकी कल्याणी बुआ कहती हैं, अब वो मजा नहीं रहा डोमकछ में। आजकल की महिलाएं तो ज्यादातर दर्शक बनी रहती हैं। उन्हें कोरस गाना तो दूर ताली बजाने में भी परेशानी होती है।
कुछ वर्ष पूर्व दूरदर्शन पर भी डोमकछ नाटक प्रसारित हो चुका है, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया था।
लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद भारत ही नहीं मॉरिशस, गुएना आदि देशों में भी जहां कहीं भोजपुरी, अंगिका आदि संस्कृति है, शादी-ब्याह के मौके पर कमोवेश डोमकछ नजर आ ही जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

4 comments:

  1. हमारे यहा अभी भी होता है. अच्छी याद दिलाई. वैसे मैंने इसे देखा है. काफी मजेदार. डॉक्टर और मरीज को लेकर डोमकछ हो रहा था

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  2. डोमकछ के बारे में जानना रोचक रहा. ऐसी दिलचस्प प्रथा के बारे में अब तक अनभिग्य था. आभार आपका. ऐसे ही क्षेत्रिय प्रथाओं के बारे में और जानकारी की आशा है.

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  3. "डोम-कछ" हमारे यहाँ भी होता है - जब गाँव के सभी मर्द बरात चले जाते थे टैब रात मी औरतें इस तरह के कई वेश भूषा मी नाचती गाती थी ! अब टूना वह बरात रहा और न ही "डोम-कछ" !
    यादों को ताज़ा कराने के लिए - शुक्रिया !

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  4. बहुत रोचक जानकारियाँ दे रही हैं आप !

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