Thursday, April 21, 2011

हर जगह मिलते हैं बलेसर के गीत Baleser's songs are available in everywhere



लोकगीतों का हर देश और क्षेत्र में अपनी लंबी परंपरा होती है। जिन भावों में तनिक भी बनावटीपन नहीं, उन्हीं का प्रकाश हमें इन गीतों में मिलता है। लोकगीतों की परंपरा को जीवित रखने के लिए हमें यूरोप से अभी बहुत कुछ सीखना है। यूरोपीय देशों ने अपने लोकगीतों को नष्ट होने से बचाया है। हमारे यहां यह हमेशा से उपेक्षित रहा है। कलाओं के लिए बनी ढेरों अकादमियों का रवैया भी इससे जुड़े कलाकारों के लिए हतोत्साहन का रहा है। सही अर्थों में जो लोक कलाकार या लोक गायक हैं उनकी अब भी उपेक्षा हो रही है। ऐसे ही एक कलाकार हैं भोजपुरी के लोकगायक बालेश्वर जिन्हें भोजपूरिया लोग बलेसरा कहते हैं।
बिहार के गोपालगंज, सिवान, छपरा होते पटना जाने वाली किसी भी वस में बैठिए आप को बालेश्वर के गीत बजते मिलेंगे। लोग इन बसों में बैठते ही बालेश्वर के गीत बजाने की फरमाइश करते हैं। पूरे भोजपूरी क्षेत्र का यही हाल है। इन क्षेत्रों में बालेश्वर के गानों को सुनने के लिए 20-25 हजार की भीड़ आसानी से जमा हो जाती है। बालेश्वर आजमगढ़ के घोसी के बदनापुरा के रहनेवाले हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश पर्व में भाग लेने बालेश्वर दिल्ली आए थे। तब उनसे यह बातचीत हुई । उसके कुछ अंशः
आपने गाना कब शुरु किया?जवाबः यही कोई छह-सात साल की उम्र में। भैंस चराने के लिए गांव से अपने मित्रों के साथ जाया करता था भैंस पर चढ़कर ही मैं खुले आसमान को निहारते हुए गाया करता था। पूरा गाना तो याद नहीं रहता था इसलिए लोकगीतों के दो-तीन लाइनें ही गुनगुनाता था।
लोक गायक के रूप में आपने कब से गाना शुरु किया?जवाबः 1960 तक तो मैं इधर-उधर भटकता रहा। कोी गाने का मौका नहीं देता था। कबसे पहले मुझे झारखंड राय ने चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं में गाने का मौका दिया। विधायक बनने के बाद लखनऊ सचिवालय में उन्होंने नौकरी भी दिला दी। इसके बाद से ही रेडियो और टीवी पर गाने का मौका मिला है।
आपके गीतों का कोई रिकार्ड भी निकला है?जवाबः सबसे पहले मेरा रिकार्ड 1970 में निकला। उसमें वही हमार बलिया बीचो बलमु भुलाइल सजनी, निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के और भागलपूर के पावर पानी, झारा के कठोर। गोरिया छपरा वाली......, जैसे गीत थे। सच पूछिए तो इस रिकार्ड के आने के बाद जितनी मुझे खुशी हुई इतनी शायद ही कभी हुई हो। इसके बाद कई और रिकार्ड निकले जिसमें कजरवा ए धनिया बड़ा निक लागे, अचरा में टांगे लू रुमाल ए धनि सांवर गोरिया और बड़ा दगाबाज रे बनारस का पंडा मुख्य है।
लोकगीत गाने के पीछे क्या प्रेरणा रही?जवाबः भोजपूरी का प्रचार करना मेरा मुख्य उद्देश्य है। मैं चाहता हूं कि देश के कोने-कोने में लोग भोजपूरी संस्कृति को जाने । डिस्को की दौड़ में भारतीय. लोकसंगीत का प्रचार करना और इसका स्तर ऊंचा उठाना भी मैं चाहता हूं।
आप किस लोक कलाकार से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?जवाबः भिखारी ठाकुर और मुकुंदी भांड़ ने मुझे काफी प्रभावित किया। भिखारी ठाकुर ने भोजपूरी लोक संगीत को काफी आगे बढ़ाया । उन्होंने बिदेशिया की भी धुन दी। समाज की कुरीतियों के खिलाफ अंतिम दम तक समाज से लड़े। आरा, छपरा के मजदूर बड़ी संख्या में असम की चाय बगानों और कलकत्ता की जूट मिलों में काम करने जाते हैं। कम वेतन और मलेरिया से पीड़ित होकर या तो वे पीले होकर लौटते या फिर लौटते ही नहीं थे। इस पर भिखारी ठाकुर ने पुरब पुरब बड़ दिन से सुन तानि। पुरब के पनिया खराब रे बिदेसिया गाया। भिखारी ठाकुर की प्रेरणा से ही मैं भी अपनी ताकत भर कुरीतियों से लड़ने की कोशिश कर रहा हूं। दुख यह है कि संगीत नाटक कला जैसे संस्थानों ने इस महान कलाकार की उपेक्षा की। जहां छोटी-छोटी संस्थाओं को संगीत नाटक अकादेमी हजारों रुपए अनुदान देती है वहीं इस लोक कलाकार के नाम से बनी संस्था को कोई पूछने वाला नहीं है। भोजपूरी लोक संगीत के विकास के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है। उसके विकास के लिए खुद कलाकार को ही भागदौड़ करनी पड़ती रही है।
भोजपूरी में आप क्या-क्या गाते हैं?जवाबः बिरहा, लाचारी , सोहर, सोरठी, कहरवा, झूमर, कजरी, होली, कचरी, चैता........... सभी कुछ गाते हैं।
कहां-कहां कार्यक्रम ज्यादा होते हैं?
जवाब आजमगढ़ का रहने वाला हुं और लखनऊ में काम करता हुं। लेकिन लखनऊ में लोक कलाकारों को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना पटना, धनबाद, बोकारो झरिया और कलकत्ता में मिलता है। वे कहते हैं दुनिया वाले हमके कहले बिहारी मितवा।
आजकल भोजपुरी में कौन-कौन से लोकगायक प्रमुख हैं?जवाबः हीरा लाल यादव चैती के प्रमुख गायक हैं। गुल्लू यादव, रामदेव, बेचन राम तथा बबुनंदन का धोबिया नाच प्रसिद्ध है। इनके अलावा आरा के मुन्ना और बलिया के नथुनी सिंह भी प्रमुख लोकगायक है।
आप गीत खुद लिखते हैं या किसी और से लिखा कर गाते हैं?जवाबः मैं कोई गाना किसी दूसरे का लिखा हुआ नहीं गाता। जो भी गाना गाता हूं उसे काफी चिंतन-मनन के बाद तैयार करता हूं। उसे लिखता नहीं बल्कि धुन में बदल देता हूं। लिखित रूप से कोई भी गाना मेरे पास सुरक्षित नहीं है जो है वह सब रिकार्ड में ही है।
क्या भारत महोत्सव के लिए आपको आमंत्रित किया गया था?जवाबः भारत महोत्सव के लिए मुझे किसी ने भी आमंत्रित नहीं किया उ सब बड़ लोग के बात है बाबू हमनी के के पूछि। भोजपुरी के किसी भी लोक कलाकार को उसमें नहीं बुलाया गया सुनते हैं कोई पुपुल जयकर हैं, बनारस रही भी हैं। लेकिन पता नहीं कैसे भोजपुरी को इन लोगों ने भुला दिया। भोजपूरी कलाकारों को ऐसी जगहों पर ले जाए बिना भारतीय संसंकृति की संपूर्ण झांकी दिखाने का दावा झूठा ही होगा।
कुछ दिन पहले अफवाह उड़ी थी कि आपकी हत्या कर दी गई?जवाबः हां ऐसी कोशिश कुछ लोगों ने की थी। वे मेरी लोकप्रियता से नाखुश थे। मेरे गाने के कार्यक्रमों में 15-20 हजार की बीड़ से ये लोग काफी परेशान थे। एक कार्यक्रम के दौरान इन भाड़े के लोगों ने मारपीट करना शुरू कर दी। भगदड़ मच गई। कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। इसके बाद इन लोगों ने ही प्रचार शुरू किया कि मेरी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों के बाद जब मैंने फिर से कार्यक्रम देना शुरू किया तब जाकर लोगों को बात समझ में आई।
जनसत्ता के एक बहुत पुराने अंक (30-7-86) में छपा यह वार्ता मुझे मेरी छोटी सी लाईब्रेरी से मिली है। यह आलेख लोकगायक बालेश्वर से सुभाषचंद्र पांडे जी की बातचीत का अंश है।
प्रस्तुति-प्रीतिमा वत्स

Friday, January 28, 2011

भक्ति गायन की एक परंपरा भगताय BHAGTAYE, tradition of worship song

कभी उनका भी जमाना था। गांव के हर उत्सव, गमी-खुशी में इनकी तूती बोलती थी। जिस समारोह में इनका जत्था न पहुंचा हो, वह समारोह फीका-फीका सा लगता था। लेकिन अब उनकी जिंदगी फीकी-फीकी लगती है।
भगतिया, यानी भगताय या भक्ति के गीत गाने वाले। इसे नारदी-भजन भी कहा जाता है। कभी गांव में विवाह उत्सव , जन्मोत्सव , नामकरण संस्कार या कि श्राद्घ कर्म भगतियों के बिना पूरा नहीं होता था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर याद रखी जाने वाली गायन की यह परंपरा बिहार और झारखंड के सीमा पर के कुछ गांवों में अपने मौलिक और प्राथमिक रूप में मौजूद है। पाश्चात्य संगीत के ताने-बाने का इस परंपरा पर कोई असर नहीं पड़ सका है, तो इसके पीछे लोक की वही उष्मा और संस्कार है, जहां कैसे गाएं या कि कैसे बजाएं कि जगह ‘ऐसे गाएं और ऐसे बजाएं’ की प्रथा है।
झारखंड के गोड्ïडा जिले के एक भगतिया कंचन मंडल नारद जी को संसार का पहला भगतिया मानते है - ‘लोकगायन की इस शैली की शुरूआत नारद जी ने प्रभु की स्तुति से की थी। :-
केशव कल्प कथारंभ-मामनु केषम।
दीनमनुनाथम-कुरुभवसागर पारम्ï॥
भगताय में गाये जाने वाले मैथिली, हिन्दी, ब्रजभाषा, अवधि मिश्रित भक्ति गीत सरल और निश्छल मिलते हैं। इनका कोई स्पष्ट व्याकरण नहीं है। वस्तुत: भगतियों का संगीत शास्त्रीय और लोकसंगीत के बीच की कड़ी है। यह जनसमूह का संगीत है ,जो संस्कार के सैलाब में सराबोर किसी भी व्यक्ति के कंठ से अनायास ही फूट पड़ती है। इसकी सरलता लोगों के अंतर्मन को गहरे छूती है। इनकी गायकी मुख्य रूप से कृष्ण की लीलाओं के गिर्द घूमती है।
पेशे से शिक्षक कंचन मंडल अपने दल के मूलगैन हैं। उनसे इस परंपरा पर कुछ विस्तार से बात होती है तो वे बताते हैं- ‘भगतियों द्वारा गाये जाने वाले पद उनके अपने होते हैं परन्तु ये मुख्य रूप से पीलू, काफी विलावल, भैरवी, भूप, भूपाली और सारंग आदि रागों पर आधारित लगते हैं। उसी तरह भगतिया संगीत का स्वरूप भी बिल्कुल उनका अपना होते हुए शास्त्रीय तालों- कहरवा, रूपक और झपताल के निकट माना जाता है।’
भगतियों के समूह को ‘दल’ कहा जाता है। दल का प्रधान ‘मूलगैन’ कहलाता है। भगतियों के दल का प्रमुख वाद्य यंत्र मृदंग होता है और प्राय: कोई मृदंगिया ही दल का मूलगैन होता। मूलगैन का मुख्य शार्गिद एक नर्तक होता है, जिसे ‘नटुआ’ कहते हैं। गायन पद की शुरुआत करने वाला ‘अगुआ’ कहलाता है और उसके पीछे गाने वाले ‘पक्षक’ कहलाते हैं। साधारणत: इनके गायन के दो रूप हैं। प्रथम अंग में ये बिलंबित स्वर में गाते है अर्थात अगुआ पहले गाता है और पक्षक उसी का अनुकरण करते है। दूसरे अंग द्रुत है। जहां गायन की गति किसी बेगवान घोड़े की तरह हो जाती है। स्वरों का यह गतिशील करिश्मा कुछ मिनटों तक ही चलता है और फिर इसकी समाप्ति एक झटके के साथ हो जाती है। गायन और वादन के बीच सामंजस्य बनाकर नटुआ कभी राधा , कभी मीरा ,कभी जोगन, कभी दही बेचने वाली आदि के रूप बनाकर नाचता रहता है।
मनोरंजक संसाधनों की बहुतायत तथा व्यक्ति के बदलते पसंद के चलते हाल के वर्षों में भले ही इस गायकी का स्वर कुछ फीका पड़ गया लगता है, लेकिन भगताय गाने वाले हर हाल में रहेंगे, क्योंकि गायन की यह परंपरा एक विश्वास पर टिकी है।
-प्रीतिमा वत्स

Thursday, January 27, 2011

अंगिका लोकगीतों में शिवभक्ति Shovbhagti in Angika lokgeet.


भोलाबाबा साजल हे बारात
औघड़दानी साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
बसहा बईल केर पालकी बनावल
भूत-प्रेत संग साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
जब बरियात दुआरी बिच पहुंचल
सखी सब देखनक हे जाई,
दस पांच सखी मिली आरती उतार गेली
नाग छोड़ल फुफ हे कार,
के भोला बाबा साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
मड़वा तोड़ब-लगहर फोड़ब
मेटी देब चारो मुख के दीप,
भोला बाबा साजल हे बारात
खिड़की के ओटे-ओटे गउरी विनती करै
सुनु शिव हमरो रे बचन।
तनि एक हे शिव भेष बदल करूँ।
देखत, नारीयर के लोग।
भोलाबाब साजल रे बारात
मड़वा जोड़ब, लगहर बइसाइब,
नेसी देब चारो मुख के दीप।
भोला बाब साजल रे बारात,
घर स बहार भेली मातु सुनयना
दुलहा देख गेली मातु सुनयना
देखी क नयना रे जुड़ाय
के भोला बाब साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
...............................
अर्थ- अंगिका के इस गीत में भोलेबाबा के बाराती गमन की बात की गई है। बसहा बैल की पालकी पर शिव भस्म भभूति लगाकर बैठे हैं। बारातियों के रूप में भूत-प्रेत सब आगे-पीछे नाचते चले जा रहे है। जैसे ही बाराती दरवाजे पर लगती है, सखियां आरती उतारने के लिए सज संवर कर आती हैं। लेकिन नाग की फुंफकार सुनकर और शिव का ऐसा भयानक रूप देखकर दौड़कर भाग जाती है। शिव जी की योजना है कि जैसे ही मंडप पर पहुंचुंगा, पूरे मंडप को तहस-नहस कर सबको डरा दूंगा और चारमुख वाला दीप भी बुझा दूंगा। लेकिन पार्वती मां की विनती को सुनकर शिव अपना रूप बदल कर आते हैं और देखते हैं कि वहां तो मृत्युलोक के प्राणी सजे-संवरे शादी के उत्सव में घूम रहे हैं। यह देखकर शिव अपना इरादा बदल देते हैं और शांत मुद्रा में आ जाते हैं। मंडप को क्षत-विक्षत करने का विचार छोड़ देते हैं। चारमुख वाला दीपक जगमगा उठता है।
घर से जब माता सुनयना बाहर आती हैं तो अपने दामाद के शांत और सौम्य रूप के देखकर भावविभोर हो जाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स

Thursday, December 23, 2010

अंगिका के देवी गीत

अंग जनपद (वर्तमान भागलपूर) की भाषा अंगिका लोक भजन और लोक गीतों से बहुत ही समृद्ध भाषा है। इन लोक गीतों में देवी के विभिन्न रूपों और श्रृंगारों की चर्चा होती रही है।

पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी, हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै,हे कमल कर वीणा।
आजू करबै देवी स विवाह, हे कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खल-खल हांसै, हे कमल कर वीणा।
आजू करबै असुर संहार, हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन, हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल, हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन, हे कमल कर वीणा।
जोगिनी धावै चारो ओर, हे कमल कर वीणा।
शोणित पीबिये मैया खल-खल हांसे, हे कमल कर वीणा।
शोणित पीबिये मैया जिहवा निकालै, हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार, हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार, हे कमल कर वीणा।
अर्थ- इस देवी गीत में मां भगवती के पांच बहन होने की बात कही गई है। जो पांचो ही कुमारी देवियां हैं जो इस जगत में आदि शक्ति के नाम से पूजी जाती हैं। देवी के सुन्दर और सौम्य रूप को देखकर महिषासुर नामक दानव उनपर आशक्त हो जाता है। वह अपने वाहन महिष(भैसा) पर चढ़कर दौड़ता हुआ आ रहा है। वह यह कहता है कि आज मैं देवी से विवाह जरूर करूंगा। इधर देवी सिह पर सवार हो महिषासुर की नादानी पर खूब हंसती हैं। उन्हें पता है कि उसे उसकी मौत इस तरफ खींचकर ला रही है।मां एक हाथ में खड्ग और दूसरे हाथ में खप्पड़ लेकर तैयार हैं। खप्पड़ से भर-भरकर असुरों का रक्त वह पीती जा रही हैं। योगिनीयां उनके चारोओर नृत्य कर रही हैं। रक्त पीने के बाद वह अपनी जीभ निकालकर हंसती हैं, और कहती हैं कि आज मैं असुरों का संहार और अपने भक्तों का उद्धार कर दूंगी।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, October 5, 2010

आज भी पूजा जाता है कुँआ

कुंए से जितना पानी खींचा जाता है उसकी पानी की झिरें उतनी ही अधिक फूटती जाती हैं तथा उसका जलस्तर बढ़ता जाता है। साथ हीं कुंए का पानी पीने के लिए नदी,तालाब, बावड़ी आदि के पानी से अधिक स्वच्छ, शीतल व स्वास्थ्यप्रद होता है। कुंआ तालाब, बावड़ी आदि से बहुत ही कम लागत और छोटी जगह में बनाया जा सकता है। शायद इसलिए छोटा जलाशय होते हुए भी कुंआ पूजनीय है।
हर प्रथा के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व होता है। जल समस्त प्राणी जगत के लिए अत्यंत आवश्यक है इसके बिना जीबन की क्लपना भी नहीं की जा सकती है। शायद इसलिए कुंआ पूजन की प्रथा भी सदियों से चली आ रही है। शादी हो,मुंडन हो, उपनयन संस्कार हो या जन्म उत्सव । हर जगह पूजा जाता है कुंआ। आधुनिकता की दौड़ में भले ही पीछे छूटते जा रहे हैं हमारे पुराने जीवनोपयोगी साधन। परन्तु परम्पराएं यूं ही शून्य से नहीं उपजी थीं। उसके पीछे तमाम प्रमाण और अच्छाईयां भी छिपी होती थी।
जन्म उत्सव के समय कुंआ पूजन का महत्व कुछ ज्यादा हीं बताया जाता है। प्रसव के बाद प्रसूता को पवित्र करने के लिए कुंआ पूजन कराया जाता है। बिहार तथा झारखण्ड के कुछ इलाकों में यह प्रसव के 12वें दिन कराया जाता है। कहीं 21वें दिन तो कुछ समाज में यह 40वें दिन भी कराया जाता है। बुंदेलखण्ड में यह प्रथा बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है। यह रिवाज तीन चरणों में पूरा होता है। पहले नहान में नीम की पत्तियों के साथ उबले हुए पानी से मां तथा शिशु दोनों के नहलाया जाता है। तब वह अपने सौर घर से आंगन तथा अन्य कमरों में कदम रख सकती है। दूसरे चरण में वह सूर्य भगवान के दर्शन करती है तथा रसोई घर की पूजा कर रसोई का कार्य संभालती है। तीसरी और अंतिम पूजा कुंआ की होती है। इसमें जच्चा हल्दी, चावल रोली आदि से कुंए का पाट पूजती हैं, तथा अपने अन्दर भी कुंए जैसी तमाम विशेषताओं की कामना करती हैं। इसके बाद दो गागर पानी भरकर अपने सिर पर रखकर वापस घर तक आती हैं। जिसके बाद वह पूरी तरह से स्वस्थ और पवित्र मानी जाती हैं। तथा घर के हर कामों में हाथ बंटा सकती हैं।
इन रीति रिवाजों के पीछे भी बड़ा ही मनोवैज्ञानिक कारण होता है। यदि रीति रिवाजों के बन्धन में बांधकर जच्चा-बच्चा को किसी कमरे में न रख दिया जाए ते वह संयुक्त परिवार के भरे-पूरे माहौल में एक दिन भी आराम नहीं कर पाएगी।
शायद इसीलिए यह प्रथा सदियों से चली आ रही है और करीब-करीब पूरे भारत में आदर के साथ इसका पालन भी किया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
(फोटोग्राफ- नेट से साभार)

Friday, August 27, 2010

बुंदेली लोकगीतों में कुंआ पूजन


1.
ऊपर बादर घर्रायें हो,
नीचे गोरी धन पनिया खों निकरी।
जाय जो कइओ उन राजा ससुर सों,
अंगना में कुइया खुदाय हो,
तुमारी बहू पनिया खों निकरीं।
जाय जो कइऔ उन राजा जेठा सों,
अंगना में पाटें जराय हो,
तुमारी बहू पनिया खों निकरी।
जाय जो कइऔ उन वारे देउर सों,
रेशम लेजें भूराय हों
तुमारी बहू पनिया खों निकरी।
अरे ओ जाय जो कइऔ उन राजा ननदोउ सों,
मुतिखन कुड़ारी गढ़ाये हों,
तुमारी सारज पनिया खों निकरीं।
जाय जो कहियो उन राजा पिया सों,
सोने के घड़ा बनवायें हों,
तुमारी धनी पनिया खों निकरीं।

अर्थ- इस गीत में गोरी पानी भरने के लिए कुंए पर जा रही है, आसमान में बादल गरज रहे हैं। वह अपने परिवार के सभी लोगों से विनती करती है कि क्यूं न घर में हीं कुंआ खुदवा दिया जाए जिससे कि वह आराम से पानी भर सके। ससुर जी से कहती है वह कुंआ खुदवा दें, जेठ से कहती है कि वह आंगन में पाट लगवा दें। देवर से कहती है कि वह रेशम की डोरी ला दे।ननदोई से कहती है कि मोती की कुड़री गढ़ा दें। पति से कहती है कि वह मेरे लि सोने की कलश बनवा दें ।

2.
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
कौन की बेटी कौन की बहुरिया
कौन की नारि कहाई तीं।
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
जनक की बेटी दसरथ की बहुरिया
राम की नारि कहाई तीं।
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।

अर्थ- जल भरने के लिए जानकी जी आई थीं। वे सवके मन को बहुत भा गईं थी। वह किनकी बेटी किनकी बहू व किनकी पत्नी थीं। वे राजा जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधु और श्रीराम की पत्नी थीं।
-प्रीतिमा वत्स
(फोटोग्राप्स मैंने नेट से लिया है)

Thursday, August 5, 2010

अंगिका की लोरी


झूल-झूल, नूनू झूले झूल-झूल।
बांस ऊपर पर सुग्गा झूल
अपनी महलियां नूनू झूल।
सुगवा कहे म सरोवर जाउं
नूनू कहे हम ननिहर जाउं।
ननिहर जाउं त की-की खाउं
दहि-चूड़ा मिठैईये खाउं
एक मन करे कि खईयै लौं
एक मन करे कि रुसियै जाउं।
पानी पियत नूनू पोखर जाए
पोखरी के बेंगवा ले लुलुआय
जहिया ऐते नूनू के माय
तहिया देबै जिमा लगाय।।
झूल-झूल नूनू झूले झूल-झूल।

अर्थ- बांस के ऊपर तोता झूल रहा है,
अपने महल में नन्हा बालक झूल रहा है,
तोते का मन है कि वह सरोवर जाए
बालक का मन है कि वह अपने ननिहाल जाए।
ननिहाल जाकर दही चूड़ा और मिठाई खाए।
खाए या रूठ जाए, सोच रहा है।
पानी पीने का मन हो तो पोखर की तरफ ही जाए।
पोखर के मेंढक उसे चिढ़ा रहे हैं
जब बालक की मां आएगी, तब मैं उसे बालक को सौंप दूंगा।।
-प्रीतिमा वत्स

Monday, August 2, 2010

लोकरंग मड़ई में

मड़ई का नया अंक आ चुका है। (मड़ई-2009) मड़ई के संपादक डॉ कालीचरण यादव हैं। जो वर्षों से लोक कला के उत्थान के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं।
मैं डॉ कालीचरण यादव जी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती हूं परन्तु मुझे यह पत्रिका इतनी प्रभावी और मुकम्मल लगती है कि मैं इसे अपने छोटे से ब्लाग के माध्यम से आपलोगों की जानकारी में भी देना चाहती हूं। वैसे लोक और साहित्य की दुनिया में यह पत्रिका काफी चर्चित है। मुझे उम्मीद है कि कालीचरण जी को मेरी यह हिमाकत बुरी नहीं लगेगी।




Sunday, July 25, 2010

गीत रोपनी के


सावन-भादो के महीने में धान की रोपाई खेतों में होती है। यह कार्य मुख्यतः महिलाएं करती हैं। घुटने भर पानी में घंटों रहकर रोपाई का काम बहुत ही कठिन होता है लेकिन महिलाएं इसे सरस बनाती हैं शायद गीतों के माध्यम से। बहुत हीं सरस और मधुर होते हैं ये गीत जो समवेत स्वर में गाये जाते हैं। इन गीतों के कुछ छंद यहां मौजूद हैं-
1 हाथ के लेल गे रेशमा
बांस के चंगेरिया गे
चली भेल कोईरिया फुलवरिया
एक कोस गेले गे रेशमा दूही कोस गेले
तीसरी कोस कोईरिया फुलवरिया गे।
पहेरी लेले गे रेशमा
धानी रंग चुनरिया गे
जली भेल कोईरिया फुलवरिया गे।।
हाथ में बांस की डलिया लिए हुए रेशमा कोयरी (खेतिहर जाति) के फुलवारी की ओर जा रही है। रेशमा एक कोस गई, दूसरा कोस भी पार कर लिया और तिसरे कोस में कोयरी का फुलवारी मिल गया। रेशमा धानी रंग की चुनरी पहनकर कोइरी के फुलवारी की ओर गई है।
2. सातों ही भैया के एके बहनिया अझोला
सातों भैया गेलो बनीजवा रे भैया,बनीजवा रे भैया।
सातों लाए, भौजो लाए सातो रंग चोलिया
से चंदो लाए लाहरी पटोरबा देबै
चंदो लाए गज मोती हरबा रे देबै।
सातों ही भैया के एके बहनिया अझोला।।
सात भाईयों की सिर्फ एक बहन है अझोला। सातों भाई परदेश गए हैं काम करने के लिए। लौटते हुए सभी अपनी-अपनी पत्नियों के लिए सौगात के रूप में सात रंगों वाली चोली लेकर आए हैं, परन्तु अझोला के लिए वे लोग लहंगा-पटोरी(लहंगा-चूनरी) लेकर आए हैं।
3. एके रे कोठरिया में दोनों रे सौतीनियां
दोनों रे सौतीनियां
दोनों मिली करल झगड़ा रे साम्भरिया
किनका क मारल, किनका गरियाएल,
किनका क हृदय लगावल हे साम्भरिया।।

एक ही कमरे में दो सौतनें अपने पति के साथ रहती हैं। दोनों आपस में झगड़ती रहती हैं। पति किसे मारता है और किसे हृदय से लगाता है? यह बड़े उत्सुकता की बात है।
4. उत्तर-दक्खिन स ऐलै चूड़ी दरबा
बैठी ही गेलै चूड़ीदार बीच ही एंगनमा
बैठी ही गेलै चूड़ीदार बीच ही एंगनमा।
मचिया बैठली तोहूं सासू ठकुरैनिया
पसीन करो न सासू, हरे-हरे चूड़िया।।
उत्तर-दक्षिण दिशाओं से चूड़ी बेचनेवाला आया है। वह आंगन में अपने चूड़ियों को बिछाकर बैठ गया है। सासू ठाकुरानी जी मचिया पर बैठी चुड़ीयां देख रही है। बहू सास से कहती है,- कृपया हरे-हरे रंग की चूड़ियां पसंद करो ना सासू जी।
-प्रीतिमा वत्स

फोटोग्राफ- राजेश त्रिपाठी

Friday, May 28, 2010

बिहार के लोक नृत्य


बिहार के लोक नृत्यों की फेहरिस्त काफी लंबी है, उनमें से कुछ के बारे में संक्षिप्त परिचय इस पोस्ट के माध्यम से दे रही हूं। प्रत्येक के बारे में विस्तार से पुनः एक-एक कर लिखूंगी।

1. नारदी-

यह एक कीर्तनिया नाच है। इसमें परंपरागत साज मृदंग एवं झाल का प्रयोग किया जाता है। कीर्तनकार इस नृत्य के दौरान विभिन्न प्रकार के स्वांग किया करते हैं।
2. गंगिया -
गंगा बिहार की प्रमुख ही नहीं, अपितु पतित पावनी भी कहलाती है। इसके स्नान से मानवों का समस्त पाप धुल जाता है। गंगा स्तुति महिलाओं के द्वारा नृत्य के माध्यम से की जाती है जिसे गंगिया नृत्य की संज्ञा दी गयी है।
3. मांझी -
नदियों में नाविकों द्वारा यह गीत नृत्य- मुद्रा में गाया जाता है।
4. घो-घो रानी -
छोटे-छोटे बच्चों का खेल, जिसे लोक शैली में घो-घो रानी कहा जाता है। इस नृत्य में एक लड़की बीच में रहती है तथा चारों तरफ से बांकी लड़कियां गोल घेरा बनाकर गीत गाती हैं, और घूमती हैं।
5. गोढ़िन -
इसमें मछली बेचने वाली तथा ग्राहकों का स्वांग किया जाता है।
6. लौढ़ियारी -
इसमें नायक, जो एक किसान होता है, अपने बथान (गाय-भैंस बांधने की जगह) पर भाव-भंगिमाओं के साथ गाता और नाचता है।
7.धन कटनी -
फसल कट जाने के बाद किसान सपरिवार खुशियां मनाता हुआ गाता और नृत्य करता है। जो धनकटनी नाच के नाम से प्रसिद्ध हो गया है।
8. बोलबै -
यह नृत्य बिहार के भागलपुर तथा उसके आस-पास के इलाकों में प्रचलित रहा है, इसमें पति के परदेश जाते समय का प्रसंग होता है।
9. सामा-चकेबा-
यह नृत्य मिथिला का एक प्रमुख नृत्य है। इसमें औरतें एवं लड़कियां अपने भाइयों के हित के लिए इसे कार्तिक मास में करता हैं।
10. घांटो -
अतिथि देवता होता है, परंतु जब घर में कुछ खाने का न हो तब अतिथि क्या होता है । यह तो शायद सभी जानते हैं। इस नृत्य में ससुराल में रह रही गरीब बहन को जब भाई के आने की सूचना मिलती है तो वह काफी खुश हो जाती है लेकिन खाने का आभाव उसे परेशान कर देता है। सत्कार के चिंता में विरह गीत गाया जाता है तथा बेचैनी भरा थोड़ा नृत्य भी होता है।
11. झिझिया -
यह नृत्य तंत्र-मंत्र तथा डायन से संबंधित है। राजा-रजवाड़े का सीन भी दिखाया जाता है। मिथिला का बहुत ही प्रचलित नृत्य है।
12. इन्नी-विन्नी -
यह अंगिका का प्रमुख नृत्य है। इसमें पति-पत्नी प्रसंग पर महिलाएं नृत्य करती हैं।
13. डोमकछ-
अपने यहां शादी-ब्याह के अवसर पर महिलाएं डोमकक्ष का नृत्य करती हैं। जब बारात दुल्हन के घर की तरफ रवाना हो चुकी होती है और घर पर सिर्फ महिलाएं हीं रह जाती हैं तो वे लोग पुरुषों का वेश बनाकर नृत्य नाटिका करती हैं।
14. देवहर -
देवहर देवी-देवता का प्रतिनिधित्व करता हुआ गीत एवं नृत्य है। यह संपूर्ण बिहार तथा झारखंड में प्रचलित हैं। कहीं-कहीं यह नृत्य भगता नाच के नाम से भी प्रसिद्ध है।
15. बगुलो -
उत्तर बिहार में बगुलो नृत्य बड़ा ही प्रचलित है। इसमें ससुराल से रूठकर जानेवाली एक स्त्री का राह चलते एक दूसरी स्त्री के साथ नोंक-झोंक का बड़ा ही सजीव चित्रण किया जाता है।
16. कजरी -
कजरी सावन के महीने में गाया और खेला जानेवाला एक नृत्य नाटिका है। जो सावन के सुहावने मौसम को और भी सुहावना बना देता है।
17. झरणी -
यह मुहर्रम के अवसर पर झूमते हुए गाये जाने वाला एक प्रकार का नृत्य और गीत है।

18. जट-जटिन -

पंजाब से आयातित यादवों के द्वारा गाया जानेवाला गीत और नृत्य जट-जटिन के नाम से प्रचलित है। यह सामान्यतया इन्द्र भगवान को मनाने के लिए वर्षा ऋतु में किया जाता है।
19. होरी - बसंत के आगमन पर गाया जाता है होरी। यह गीत और नृत्य होली के दिन अपने चरम पर होता है।
20. बसंती-

यह पतझड़ के बाद बसंत ऋतु के आगमन पर गाया जाता है। इन गीतों को प्रायः महिलाएं ही गाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स


Wednesday, May 5, 2010

जंतसार


आज की रेडी टू इट वाली जिन्दगी में भले ही यह अटपटा लगता है, लेकिन कुछ दशक पहले तक गांव की औरतों की जिन्दगी काफी मेहनत मशक्कत करने वाली थी। घर लीपने से लेकर अनाज तैयार करने तक का सारा काम घर की स्त्रियों के जिम्मे हीं होता था। ऐसे में अपनी थकावट दूर करने तथा मन की व्यथा को कुछ हद तक गीतों के माध्यम से निकालती थीं। इन गीतों में अक्सर घरेलू जीवन के संघर्ष तथा सामाजिक समस्याओं का जिक्र होता था। यह बात अलग है कि शारीरिक श्रम उनके स्वास्थ्य के लिए काफी हद तक फायदेमंद ही साबित होता था। चक्की पीसना इन कामों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम था। इसे वह अक्सर दोपहर के समय जब घर के सभी लोग आराम कर रहे होते करती थी। काम के साथ जो गीत वह गाती रहती थीं उन्हें जंतसार कहा जाता है। प्रायः इन गीतों को अकेले हीं गाया जाता था। अब तो इन गीतों को गानेवाले भी विरले हीं मिलते हैं -

1. पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।
एंगना में कुइंया खनाय देहो हो दियोरे
बांटी देहो रेशम के डोर
पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।
चैत बैशाख के धूपवा बड़ी तेज
एंगना में चंदोवा लागय देहो हो दियोरे
जरत नरमियो मोर गोड़
पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।

अर्थ- इस गीत में भाभी अपने देवर से अपनी समस्याओं के बारे में बता रही है। पूरब की हवा बहुत तेज रफ्तार से बहती है और जब पछिया हवा बहती है तो अंधकार छा जाता है। पानी लाने के लिए दूर जाती हूं तो परेशान हो जाती हूं। आंगन में ही आप एक कुआं खुदवा दो और साथ में रेशम की डोरी भी ला दो। चैत-बैशाख के महीने में जब कड़ाके ही धूप पड़ती है तो मेरे पांव गर्मी से छिल जाते हैं।आप आंगन में चंदोवा लगवा दो जिससे कि मैं आराम से घर के सारे काम निबटा सकूं।

2. पनमा जे खैले डोमनिया गे
मिसिया जे लगोले निसिया सुरतिया
डोमिन गे राजा के बेटा लुभावल
जेहूं तोहं राजा-बेटा हे निसिया हे लुभैयले
पनमा काहे खैले डोमनिया गे
मिसिया काहे लगौले निसिया सुरतिया
डोमिन गे राजा के बेटा लुभावल

अर्थ- इस गीत में डोम जाति की एक लड़की की चर्चा की गई है। सांवली सूरत पर काजल लगाकर पान खाकर जब वह निकलती है तो उस नगर का राजकुमार भी उसके सौन्दर्य पर आकर्षित हो जाता है। गीतो के माध्यम से ही डोमिन की बेटी से पूछा जाता है कि तुमने ये कैसा कहर कर दिया । आंखों में काजल लगाकर,पान खाकर क्यों निकली।

3. रैयो खेत में रैया हे
मसूरियो खेत में हेरैले रे ना
सासू बेसरी हे हेरैले ना
एतना हे सुनिये सासू
उठली रिसैली रे ना।
हंसुली खोजी अइहैं न त
कलेवा नाहीं दियवो रे ना।

अर्थ- इस गीत में गाने वाली खुद अपनी आपबीती सुना रही है। सरसों के खेत में सरसों लगा हुआ था, और मसूर के खेत में मसूर। मैं तो बस घास छीलने गई हुई थी। वहीं पर मेरी हंसुली न जाने कहां खो गई। सास ने जब यह बात सुनी तो काफी नाराज हो गई और कहने लगी, जाओ और हंसुली खोजकर लाओ, जब तक हंसुली लेकर नहीं आती तुम्हें खाना नहीं मिलेगा।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, April 23, 2010

है ऐसे मनाया जाता भांजो

पश्चिम बंगाल के ज्यादातर गांवों में बांग्ला भाद्र महीने के आते हीं भांजो नामक फसल की देवी की पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है। यह पर्व फसल के अच्छी पैदावार की कामना से की जाती है। संभवतः भांजो शब्द भाद्र महीने के नाम से निकला है जिस महीने में यह पूजा की जाती है। यह पूजा शुक्ल पक्ष में द्वादशी को की जाती है। इस दिन गांव की कुछ अविवाहित युवतियां गांव से बाहर किसी जगह मिट्टी के पिंड एकत्र करती हैं। इसी प्रकार पड़ोस के गांवों के कुछ युवक भी उसी जगह आते हैं और ये दोनों दल आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। कुछ देर तक वे अपनी-अपनी जगह पर खड़े रहकर नाचते-गाते हैं, जिसके बाद कोई एक दल पीछे हट जाता है। इस पर दूसरा दल कुछ आगे बढ़कर मिट्टी के कुछ पिडों को उठा लेता है और विजय के गीत गाते हुए गांव लौट जाता है। इस दल के लौट जाने के बाद दूसरा दल अपने हिस्से के पिंड एकत्र करता है। यह दो प्रतिस्पर्धी गांवों के बीच लड़ाई का प्रतीक है, जिसमें कोई एक जीतता और दूसरा दल हारता है। किंवदन्ती है कि पुराने जमाने में गांवों के वयस्क पुरुष भी अपने-अपने दलों के साथ इस नकली लड़ाई में भाग लेते थे। कुछ गांवों में युवतियों के दल के साथ गांव के छोटे लड़के भी आते हैं।
युवतियां मिट्टी के पिंडों को गांव के सार्वजनिक पूजा-स्थल पर ले जाती है। वे इसमें से सभी प्रकार के कंकड़-पत्थर निकालकर साफ करती हैं। चूहों के बिलों और परित्यक्त घरों से कुछ और मिट्टी लेकर इसमें मिला दी जाती है। इसके बाद मिट्टी को पीतल या मिट्टी की थालियों में भरकर उसके ऊपर दो तरह की दालों और जौ के बीज, सनई(जूट) का पौधा और सरसों डाल दिया जाता है। इसे शस्य पाता कहा जाता है। कहीं-कहीं पर इसे आंकुर थापना भी कहा जाता है। इसके बाद इन थालियों को किसी पवित्र स्थान पर, अकसर तुलसी या पीपल के पौधे की छाया में रख दिया जाता है। इन युवतियों में से कोई एक प्रतिदिन प्रातः स्नान करके इन बीजों को सींचने का भार उठाती हैं। सिंचाई का यह क्रम पूरे एक सप्ताह तक चलता है, तब तक बीज फूटकर पौधे कुछ हो जाते हैं। आठवें दिन पूजा-स्थल पर बनाए गए मिट्टी के टीले को इस प्रकार ढंका जाता है जिससे वह किसी स्त्री के पुतले-सा दिखाई दे। इस पुतले को फूलों से सजा दिया जाता है। संध्यासमय इन पौधों को टीले के चारों ओर रख दिया जाता है और पुरोहित को बुलाकर उससे पूजा कराई जाती है और युवतियां घेरा बनाकर टीले और थालियों के चारों ओर नाचने लगती हैं। वे नाचते हुए नगाड़े और कांसे के बने अन्य बाजे बजाकर लोकगीत भी गाती हैं। कभी-कभी इन नृत्यांगनाएं संगीत रोककर भांजो के उपर रची अनगढ़ कविताओं का पाठ भी करती हैं। इसके बाद युवतियां अपने-अपने घर लौटती हैं। अगली सुबह वे फिर उसी जगह पर नाचने-गाने के लिए जुटती हैं। कुछ देर तक नाच-गा लेने के बाद वे स्त्री के पुतले और बीजों के फूटने से उगे पौधों को लेकर नाचते-गाते हुए किसी नदी या तालाब के तट पर ले जाती हैं। भांजो से प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि-
इस रास्ते से जाओ, भांजो
इस रास्ते से जाओ,
बेना के वृक्ष में कौड़ी है
उसे देकर दूध खरीदो
पानी के पास पहुंचने पर वे स्त्री के पुतले को पानी में बहा देती हैं। थालियों में रखी मिट्टी फेंक दी जाती हैं, लेकिन पौधों को पानी से साफ करके वे घर लाती हैं। इनमें से कुछ पौधे घरों के छाजन में खोंस दिए जाते हैं और कुछ मवेशियों को खिला दिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि घरों के छाजन में टंगी रहने के कारण पूरा घर अन्न और धन से भरा रहता है और मवेशियों को खिलाने से मवेशी खुशहाल रहते हैं, गाय-भैंस हों तो ज्यादा दूध देती हैं।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 6, 2010

प्रकृति को समर्पित मेरी दो नयी पेंटिंग


20X30inch,Acrylic on canvas,title- beauty of nature,by-Pritima Vats
16X24inch, water colour on paper,title-beauty of nature,by-Pritima Vats

Tuesday, February 16, 2010

मेरी कुछ नयी पेंटिंग

जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंच
जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंच
जादोपेटियन कला में कुछ नया प्रयोग,24X36 इंच

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...