Thursday, July 30, 2020
Sunday, June 7, 2020
बनी रहेगी उष्मा जादोपेटियाँ कला की
-प्रीतिमा वत्स
सौन्दर्य से लगाव मनुष्य की एक जन्मजात प्रवृति है। यही कारण है कि मनुष्य के सांस्कृतिक विकास की प्रत्येक कड़ी उसके सौन्दर्य बोध का भी निश्चित रूप से परिचय देती है। सभी जगह मानव समुदाय में चित्रांकन की परंपरा किसी न किसी रूप में रही है। कालक्रम में चित्रकला ने कई रूप ले लिए या फिर कई वर्गों में विभक्त कर दिया- शास्त्रीय कला, लोक कला, आदिवासी कला। शास्त्रीय कला जिसे नागर कला भी कह सकते हैं। यह काफी समृद्ध और संभ्रान्त समाज की अभिव्यक्ति बन गयी। शेष कला यानी लोक कला और आदिवासी कला लोगों के दिमाग की कला कहकर उपेक्षा की जाने लगी।
आदिवासी कला की ताकत तथा जीवनी शक्ति को पहली बार पिकासो तथा यूरोप के कई चित्रकारों ने उजागर किया। पिकासो की चर्चित पेंटिंग ती गीतिकार को जिसने भी देखा उसने यही महसूस किया कि रंगों की भाषा में लोक धड़क रहा है। कलाकार विलियम रूबीन ने भी लोक कला से बहुत लगाव महसूस किया।
अभिव्यक्ति के स्तर पर यह आदिवासी चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करते, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। बाद के भी कई कलाकारों ने यह महसूस किया कि आदिवासी कला साधारण नहीं है। यह कला जटिल धारणाओं की लघुकारक रूप में चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। पूरी दुनिया में अफ्रीका के बाद सबसे अधिक आदिवासी भारत में हीं रहते हैं और देश में आदिवासी प्रदेशों में झारखंड तथा बिहार का नाम प्रमुख रूप से आता है। यहाँ सबसे ज्यादा संथाल आबादी रहती है। तमाम विस्थापन और पलायन के बावजूद इनकी जनसंख्या 20 लाख से ऊपर है।संथाल आदिवासियों की एक सुदीर्घ और समृद्ध कला परंपरा है। इनके सांस्कृतिक उपक्रमों,आस्थाओं,मिथकों,अलंकरणों और सज्जाकारी में गजब का मानवीय बोध दिखता है। इन्हीं कलाओं में एक है जादोपेटियाँ चित्रकला। आदिकाल से हीं संथालों की संस्कृति में जादोपेटियाँ चित्रकला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस शैली के चित्रकार को समाज में जादौ के नाम से पुकारा जाता है। लोक कला की यह शैली बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में भी पाई जाती है। विभिन्न प्रान्तों में यह पद्धति अलग-अलग नामों जैसे जादू-पट, यम-पट, पटकथा और पटचित्र के नाम से जानी जाती है। चित्रकार पुराने कपड़े और बेल के गोंद की सहायता से पट बनाता है। जिसकी लंबाई 5 से 10 फूट तक होती है। कुछ लोग कागज पर भी इस प्रकार के चित्र बनाते हैं। जादोपेटियाँ चित्रकला में पशु-पक्षियों तथा मनुष्य जीवन के विभिन्न पक्षों का जो चित्रण हुआ है और जो हो रहा है, वह प्रकृति, मनुष्य और पशु के रिश्ते के बारे में बहुत कुछ कहता है। जहाँ तक अभिव्यक्ति के स्तर का प्रश्न है तो इनकी सहजता और प्रवाह महसूस की जा सकती है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करती, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। आदिवासी जीवन में हर व्यक्ति एक विशेष किस्म का कलाकार होता है और इन कलाकारों का जीवन आम लोगों से भिन्न नहीं देखा जा सकता। कला इनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है। सुबह के समय मुर्गे का बोलना, बरसात में मोर का नाचना और सुंदर स्त्री के प्रति पुरूष का सहज ढंग से आकर्षित होना, खेतों में स्त्रियों का काम करना, जंगली फूलों का अपने जूड़े में लगाना, किशोरों का अपने मवेशियों को ले जाना, मछली मारना एवं इस तरह के ढेर सारे स्वाभाविक एवं प्राकृतिक संदर्भ जनजाति चित्रकलाओं में देखने को मिलते हैं।
इन चित्रों में यथासंभव प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। जला हुआ चावल, आँवला और जामुन की छाल,फूलों, पत्तियों, महुआ, हल्दी आदि को पीसकर रंग तैयार किया जाता है। लोक कला में प्रायः चटख रंगों का प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों के विषय- महाभारत, रामायण, कृष्णलीला,सृष्टि का निर्माण, यमराज का दंड आदि होते हैं। इस शैली के चित्रकार जादौ इन चित्रों को लेकर गाँव-गाँव घूमते हैं और लोगों को दिखाते हैं।
अभी भी कहीं-कहीं आदिवासी समाज में जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो इन कलाकारों को बुलाया जाता है। ये कलाकार उनके घर जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। लोगों को रामायण, महाभारत की कहानियों के साथ-साथ यह भी बताते हैं कि गलत काम करने पर यमराज कठोरता से दंड देते हैं। परंतु हाल के वर्षों में इनकी माँग नहीं के बराबर रह गई है।
कहते हैं कि लोक परिवेश की उपज होती है लोक कला। परिवेश बदलते हैं तो सहज ढंग से बदल जाती है लोककला। तेजी से भाग रही दुनिया और उपभोक्तावादी संस्कृति के तीव्र विस्फोट के बीच संथालों का परिवेश, उनका समाज और उनकी जीवनशैली भी काफी बदल चुकी है।यह बदलाव उनकी कला में भी दिखाई पड़ता है। पहले जहाँ इन कलाओं में प्राकृतिक रंगो का प्रयोग होता था अब रासायनिक रंगों का प्रयोग बढ़ गया है। रंगों के साथ-साथ रेखाओं का भी गणित बदल गया है। दीवारों तथा कपड़े के पट से उतरकर यह कला अब कैनवास पर सजने लगी है। संथाल परगना के जादौपेटियाँ पर लंबे समय से काम कर रहे चित्रकार देव प्रकाश इस कला को लेकर बहुत उत्साहित हैं। हालांकि वे मानते हैं कि कुछ जादौ अपने पारंपरिक काम को छोड़कर दूसरे पेशे की ओर चले गए हैं लेकिन इसका लाभ भी इस कला को मिला है। देव प्रकाश कहते हैं कि लोक कला में यदि कुछ चीजें जुड़ती हैं तो कुछ छूट भी जाती हैं। रोजगार की तलाश में महानगरों और शहरों में घूम चुके जादौ जब अपने गाँव आते हैं और फिर कभी अपनी पट पर इस कला को उकेरते हैं तो उस कला का रंग कुछ नया होता है। देव प्रकाश इस बात के पक्षधर हैं कि संरक्षण के नाम पर इस कला को सिर्फ संग्रहालय की शोभा ना बनाया जाए।
लेकिन कुछ भी हो जाए लोक की कभी मन नहीं सकती है। यह कला कभी मात्र संग्रहालय की शोभा बनकर नहीं रह सकती है। लोक कला अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जो आदि काल से चली आ रही है और अभी भी समाज के हर कोने में किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान है। यह धरोहर की तरह एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से बिना कहे, बिना किसी तामझाम के मिलती रहती है।
..............................
-प्रीतिमा वत्स
...............
Sunday, March 17, 2019
गंगा नदी का आदि से अनंत तक आस्था का सफर
बॉक्स - सदियों से हर खुशी और गम में शामिल, सुख-दुख की भागीदार बनी चलती रही, पर अब मैं थक गई हूँ। ध्यान लगाकर सुनो तो शायद मेरी आवाज तुम तक पहुँच जाएगी कि बस अब और नहीं, अब और नहीं।
सदियों से तुम्हारे
कष्टों को हरती आ रही हूँ, तुम्हें जीवन देती आ रही हूँ । कई बार खुश हुई कई बार
बहुत कष्ट उठाना पड़ा। खुशियाँ बाँटती रही, तुम्हारी फैलाई हुई गंदगी को अपने-आप
में समेटती रही लेकिन अब मुझे भी तुम्हारी जरूरत है।
कितनी भक्ति के साथ
भगीरथ ने मुझे इस धरती पर तुम्हारे कल्याण के लिए बुलाया था। साक्षात शिव ने मुझे
हिमालय के पास भेजा। हिमालय ने एक आदर्श पिता की तरह अपने कोमल बाँहों का सहारा
देकर मुझे अपनी शरण में लिया। अत्यंत सफेद अमृत के समान जल लेकर मैं बहती हुई धरती
पर आई। कई युगों को देखा, कभी खुश हुई कभी मेरा हृदय दग्ध भी हुआ।
अलकनंदा नाम से धरती
पर आई, फिर भागीरथी, जब मैं गोमुख से प्रकट हुई तब गंगा कहलाई। गोमुख से कई धाराओं
में निकलकर मैं देव प्रयाग में एक हो गई। जब मैं टिहरी पहुँची और तुमने मुझे
जबर्दस्ती बाँधने की कोशिश की तब मुझे बहुत तकलीफ हुई, पर्यावरण की रक्षा करने वाले
अपने सपूत सुन्दरलाल बहुगुणा को बहुत याद किया। जब मैं यमुना और सरस्वती से मिली
तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, वह संगम स्थल प्रयाग कहलाया।
राजा विक्रमादित्य
के बड़े भाई, प्रख्यात कवि भर्तृहरि ने जहाँ मेरे तट पर तप किया वह हरि की पौढ़ी
कहलाया जो स्वर्ग के सोपान की तरह है। जब मैं कुरू की राजधानी हस्तिनापुर पहुँची,
यहाँ राजा शान्तनु और पुत्र भीष्म को स्मरण करती हुई बहुत काल तक बही, किन्तु
हस्तिनापुर की दुर्दशा को देखकर ऐसी दुखी हुई कि वहाँ से दूर हो गई और अपनी एक
धारा बूढ़ी गंगा से मिलकर गढमुक्तेश्वर पहुँच गई। तत्पश्चात मैं महारानी
लक्ष्मीबाई,बीरबाल मनु,जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए सैन्य संचालन करते हुए अपने
प्राण अर्पण कर दिये थे उन्हें अपने आँचल में समेटने के लिए मैं बिठूर आई। निरंतर
कारखानों के निकलने वाले कूड़े-कचरे से भरे हुए धन से पूर्ण परंतु शोभाहीन कानपूर
शहर आकर मैं बहुत दुखी हुई। चमड़े की गंध और गंदगी जब बर्दाश्त नहीं हुई तो अपनी
वेदना को व्यक्त करने प्रयाग चली गई। पुष्यमित्र शुंग ने जब यहाँ यज्ञ किया तब
जाकर यह तीरथ प्रयाग कहलाया था।
जब मैं आह्लादित
होकर यमुना से मिलने जा रही थी, तभी सरस्वती भी गुप्त रूप से वहाँ आ पहुँची और हम
तीनों का मिलन संगम कहलाया। अनेक धाराओं का यह मिलन स्थल एक ओर जहाँ भारतीय एकता
को पुष्ट करता है वहीं दूसरी ओर त्रिवेणी तट अनेक संस्कृतियों का संगम राष्ट्रीय
एकता एवं अखंडता का संवाहक है। माघ के महीने में मकर संक्रांति के पवित्र अवसर पर
संगम में हर बारह वर्ष में कुम्भ और छह वर्ष में अर्धकुम्भ पर्व के अवसर पर मानवों
का विशाल संगम होता है जो मुझे अत्यंत प्रिय है। यहाँ एक ओर वेद का ज्ञानमय स्वर
सुनाई देता है तो दूसरी ओर द्वैत-अद्वैत के सिद्धान्तों पर चर्चा होती है। कहीं
कृष्ण भक्ति शाखा का मिलन रामभक्ति शाखा के साथ होता है। बुद्धं शरणं गच्छामि का
उद्धोष तथा अहिंसावादी जैनों की कोमल वाणी, सिक्खों की गुरूवाणी और पैगम्बर
मुहम्मद का वचन सभी का संगम इस तीर्थ में है। जब मैं शिव की नगरी काशी पहुँची तो
भक्ति से ओत-प्रोत हो गई। शिव ने अपने त्रिशुल का सहारा दिया और मेरा वेग धीमा
हुआ। वहाँ से मैं शिवाला घाट पहुँची, जहाँ श्मशान में अत्यंत गोपनीय शव साधना में
लगे, अपनी लहरों से दीर्घकाल तक नहलाये जाते हुए किनाराम नामक अवधूत अघोरी के
देखती रही, जिन्होंने प्रमादी राजा चेतसिंह को भ्रष्टराज्य होने का शाप दिया था।
चेतसिंह अंग्रेजों के द्वारा पराजित हुआ और महल छोड़कर भाग खड़ा हुआ। सचमुच नरसंहार
का बड़ा भयानक दृश्य था वह। शिवाला से हनुमान घाट गई जहाँ थोड़ी शांति मिली तो
मणिकर्णिका के तट पर मोक्षदायिनी बनकर पहुँची। यहीं पर सत्यनिष्ठ, प्रतापी,
पवित्र, धार्मिक, दानशील राजा हरिश्चन्द्र ने चाण्डाल कर्म स्वीकार किया था। इसके
बाद मैं केदार घाट पर पहुँची। इस तट पर स्थित भगवान शिव का मंदिर काफी ऊँचाई पर है
और मैं नीचे से सिर्फ निहार सकती हूँ उन्हें। शायद यह इस पृथ्वी पर प्रीति की रीति
है। अतः गौरीकुण्ड में अपने प्रीतिदायक जल को छोड़कर आगे बढ़ जाती हूँ और कई घाटों
को पार करती हुई पंचगंगा घाट पहुँचती हूँ यहाँ पर धूतपापा, किरणा, गंगा, जमुना,सरस्वती
पाँच धाराओं का संगम स्थल है। उसके बाद गायघाट, प्रह्लादघाट, ओंकारेश्वर,
कालेश्वर, भूतभारेश्वर आदि अनेक शिवलिंगों के दर्शन करती हुई राजघाट पहुँचती हूँ।
यहीं पर स्थित गाँधी संस्थान को स्मृति चिह्न के रूप में देखती हुई सोचती हूँ कि
स्वतंत्रता के लिए सोचनेवाले उस महात्मा का क्या भारतीय आज उचित आदर कर रहे हैं? पहले जहाँ इस तट पर आकर मैं गर्व से भर जाती थी वहीं आज कीचड़ से भरी
लुप्त शरीर वाली, संगम स्थल में गन्दगी फैलाती वरणा को देखकर आज के भोग विलासी
साक्षर राक्षसों को बार-बार छोड़ देने का मन करता है। वहाँ से चलकर जब मैं गाजीपुर
पहुँचती हूँ तो गंगी नाम की एक छोटी सी नदी मेरा स्वागत करती है और मुझमें मिलकर
अपने आप को धन्य समझती है। कर्मनाशा जैसी अमंगलकारी को भी अपने-आप में मिलाकर
निर्मल बना देती हूँ। बिहार के मैदानी इलाकों को, वहाँ पर फैली हरियाली को देखकर
मन खुश हो जाता है। जहाँ ज्ञान प्राप्त होने से गौतम बुद्ध हो गए, जहाँ महावीर
तीर्थंकर ने जन्म लिया, गुरू गोविन्द सिंह ने जन्म लिया, अनेकों प्रतापी राजाओं ने
राज्य किया। सोन, घाघरा आदि कई नदियों को अपने आप में समेटती हुई मैं पाटलिपुत्र
पहुँची। यहाँ के क्रूर और विद्रोही राजा अजात-शत्रु को देखकर बहुत दुखी हुई मैं।
जिसने अपने पिता बिम्बिसार को कारागार में डाल दिया था, लेकिन अजात-शत्रु का पुत्र
उदयभद्र बड़ा ही दयालु राजा था। उसी ने पाटलिपुत्र नाम के खूबसूरत शहर को बसाया और
अपनी राजधानी बनाई। यहीं पर मैंने अशोक महान को भिक्षु अशोक बनते हुए भी देखा।
विक्रमादित्य के सुन्दर शासनकाल को भी देखा और हूंणों के आक्रमण से परेशान
कार्तिकेय के शासनकाल को भी। कार्तिकेय और स्कंद गुप्त जैसे सपूतों को आज भी याद
करती हैं मेरी धाराएँ। बाद में शेरशाह ने इस राज्य का नाम बदल कर पटना रख दिया।
वहाँ से गया होते हुए फल्गु और पुनपुन को साथ लेती हुई वैशाली गणराज्य पहुँचती
हूँ। नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश की साक्षी भी तो मैं हीं हूँ। वहाँ से चलकर
मैं गिरिव्रज पहूँची, जो आजकल राजगीर के नाम से जाना जाता है। मगध राजाओं की यह
राजधानी आज भी पुरातत्ववेत्ताओं और दर्शकों के द्वारा देखी जाती है। खण्डहरों में
स्थित वह आज भी अपने अतीत के गौरव गाथा को कहती हुई सी नजर आती है। दूर से ही
दरभंगा को देखकर, मिथिला को प्रणाम करती हुई जब मैं अंगदेश में प्रवेश करती हूँ तो
मुंगेर जिले में बूढ़ी गंडक मेरा स्वागत करती हुई सी लगती हैं और मुझमें समाहित हो
जाती है। यहाँ जह्नु ऋषि के आश्रम को देखकर खुश हो जाती हूँ, यहीं पर मेरा नाम
जाह्नवी पड़ा था। अपने पिता के घर में थोड़ी देर विश्राम कर फिर आगे बढ़ जाती हूँ।
आगे बढ़कर भागलपुर नामक शहर में जाती हूँ, जो खानों से युक्त, धन से उन्नत, सुख-सुविधा
सम्पन्न और उद्योग के कल-कारखानों से युक्त है। यहाँ पर ताण्डव मचाती हुई कोसी नदी
को अपने आप में समा लेती हूँ और आगे बढ़ जाती हूँ राजमहल की पहाड़ियों से होते हुए
मैं बंगाल में प्रवेश कर जाती हूँ और सागर को देखकर मिलन के लिए अपने-आप को रोक
नहीं पाती और सागर में समा जाती हूँ। उपहार के रूप में सागर को उपजाऊ मिट्टी ला
लाकर देती रहती हूँ जिससे कि एक प्यारे से डेल्टा का जन्म हुआ है जो सुन्दरवन
कहलाता है।
..............................
Monday, March 4, 2019
तुम फेंको एक कदम्ब का फूल
आज के बदलते
परिवेश में जब हम अपनी परंपरा, साहित्य या संस्कृति की बात करते
हैं तो लोकजगत हमें अपनी ओर खींचता है। और यदि हमआदिवासी लोक में झाँकें तो हमें यह
खिंचाव कुछ ज्यादा हीं अपनेपन की उष्मा से भरा मिलता है।
संताल जनजाति
का कोई लिखित इतिहास नहीं है पर इनके बीच प्रचलित रीति-रिवाजों, लोक मान्यताओं और साहित्य में परंपरागत ढंग से इनके ऐतिहासिक तथ्य सुरक्षित
हैं। संताल जनजाति मुख्य रूप से झारखंड की प्रमुख जनजातियों में एक है। वैसे ये बिहार,
पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,असम,मेघालय और पड़ोसी देश नेपाल के कुछ हिस्सों में आबाद हैं।
जीविकोपार्जन
के विकल्प तलाशने और शहर की तरफ रुख करने की वजह से इनके दैनिक जीवन में काफी बदलाव
आया है। लेकिन इस समाज में परंपरा का प्रवाह आज भी अपनी मौलिक ऊर्जा के साथ हीं विद्यमान
है। संताली लोक समाज लड़कियों की शादी से विदाई को लेकर बहुत ही ज्यादा संवेदनशील और
परंपरावादी होते हैं।
"पिताजी!
हो रहा है उदित
सुबह की स्वर्णिम
सूर्य।
जाना है कितनी
दूर आपको
चढ़ाने तिलक
मेरे दूल्हे को?"
"नहीं है
बहुत दूर बेटी
पहुँच जाएँगे
हम
दुपहर तक,
अयोध्या गढ़
ही तो जाना है हमें।"
आज भी संताली
समाज में नारियों का सम्मान उनका सबसे बड़ा उत्तरदायित्व होता है। गरीबी में जिंदगी
जीते हैं,
चाहे आधे तन पर ही कपड़ा पहनते हैं पर कभी किसी नारी का अपमान नहीं होने
देते हैं अपने इलाके में। परंपरागत तरीके से अपनी बेटी के लिए दूल्हा तलाश करना,
सम्मान के साथ उनकी विदाई करना वे अपना कर्तव्य समझते हैं।
"मना करता
आ रहा हूँ
बहुत दिनों
से मैं,
पर मानती नहीं
हो
कि पहना मत
करो इतनी लंबी साड़ी तुम,
जो लोटती है
पैर के तलवे
तक तुम्हारे!"
"क्यों नहीं
पहनूँगी साड़ी मैं
जो लोटती है
पैर के तलवा
तक
बुना है इसे
पिताजी ने मेरे
मेरी माँ के
काते हुए धागों
से!"
अपूर्व प्राकृतिक
सम्पदा के बीच भी बेहद कठिन जीवन जीने वाले
संतालों को गीत-संगीत विरासत में मिले हैं। तभी तो इनके बीच यह कहावत प्रचलित
है कि "रोड़ाक् गी राड़ाक, ताड़ामाक् गी हिलावाक्।" अर्थात् हमारी वाणी ही संगीत है और हमारी चाल ही नृत्य है।
गली की अंतिम
छोर में
है एक वट वृक्ष,
डाल से उसकी
जड़ तो फूटा,
पर निकला नहीं
कोपल निकलते-निकलते।
गाँव के युवक
भी
कुछ इसी तरह-
करते तो हैं
प्रेम
पर रख नहीं
पाते
कसमें खाने
के बाद!
संताली जनजातियों
में विवाह एक बहुत हीं महत्वपूर्ण सामाजिक प्रथा है, इनमें समगोत्रीय
विवाह वर्जित है तथा ममेरी या फुफेरी बहनों के साथ भी विवाह की मनाही है, जबकि उरांव, मुण्डा या हो जनजातियों में ऐसी वर्जना नहीं
है। इसलिए कई बार विवाह लड़की की पसंद के खिलाफ भी हो जाता है जिसे नियति मानकर कुबूल
करना ही पड़ता है-
हो रहा है-
स्वर्णिम सूर्योदय,
और चढ़ रही
हूँ मैं
सुहाग-डलिया
पर
सिंदुर-दान
के लिए।
यदि है ममता
मेरे लिए
दिल में तुम्हारे,
तो फेंको मुझपर
-कदम्ब का एक
फूल!
समझूँगी तभी
मैं
कि किया था
तुमने कभी प्यार मुझसे!
....................................
-प्रीतिमा वत्स
(गीत ''सोने की सिकड़ी रूपा की नथिया" नामक किताब से लिया
गया है।)
Thursday, November 1, 2018
Monday, August 27, 2018
मेहंदी परंपरा से श्रृंगार तक
सदियों से मेहंदी
हमारे समाज में महिलाओं के श्रृंगार का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इसकी महत्ता
तो इतनी है कि मेहंदी के बिना महिलाओं का श्रृंगार ही अधूरा माना जाता है। शादी हो
या कोई तीज त्योहार भारतीय महिलाएं मेहंदी लगाना नहीं भूलती हैं। चाहे वो किसी शहर
में रहती हों, गाँव में रहती हैं या विदेशों में। मेहंदी तो रचती
ही है। पूरे देश में जहाँ मेहंदी सिर्फ श्रृंगार का एक साधन है वहीं ग्रामीण परिवेश
में महिलाएं इसे परंपराओं के साथ-साथ संभावनाओं से जोड़कर भी देखती हैं। यूँ तो मेहंदी
सालों भर लगाते हैं लोग पर कुछ महीनों में इसका कुछ ज्यादा ही महत्व माना जाता है।
जैसे सावन की मेहंदी पति के नाम की मानी जाती है, भादो की मेहंदी
भाई तथा माइके की खुशहाली के लिए लगाई जाती है। आश्विन के महीने में नवरात्रों के टाइम
में लगाई जाने वाली मेहंदी को हर आकांक्षा पूरी करनेवाली मानी जाती है। भारतीय लोग
परंपरा में कार्तिक के महीने में मेहंदी के लगाने का विधान नहीं है। इसे स्वास्थय और
भाग्य दोनों के लिए हानीकारक माना जाता है। पुराने जमाने में ऐसा शायद इसलिए होता होगा
क्योंकि उस समय लोग खेती-बारी पर ही निर्भर रहते थे और कार्तिक के महीने में घर में
अनाज-पानी की दिक्कत होती थी। लोग बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा करते थे। ऐसे में मेहंदी
लगाकर महिलाएँ खुशी नहीं मनाती होंगी। कालान्तर में यही विचार परंपरा का अंग बन गई।
सावन में मेहंदी लगाना बहुत शुभ माना जाता है, ऐसी मान्यता है
कि तीज के पावन अवसर पर मेहंदी लगाने से पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत होता है। वहीं मेहंदी
के बारे में एक और मान्यता है कि जिसके हाथ की मेहंदी जितनी गहरी होती है, उसको उतना ही अपने पति और ससुराल का प्रेम मिलता है।
भादो के महीने
में भी लोक में मेहंदी लगाना अनिवार्य माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जिन महिलाओं
या लड़कियों के भाई है उन्हें भादो के महीने में मेहंदी जरूर लगाना चाहिए। इससे भाई
की बाधाएं दूर होती हैं, वह स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीता है साथ हीं बहनों के अरमान
भी पूरे होते हैं, जो वे अपने भाईयों से संजो कर रखती हैं। प्राचीन काल में खासकर आदिवासी
समाज में जब भाई किसी मुसीबत में हो या घर से बाहर हो, उसकी कोई खोज-खबर नहीं मिल रही
हो तो बहने भगवान से पूजा-अर्चना करने के साथ-साथ भादो के महीने में हाथों में मेहंदी
भी लगाती थीं। उनका यह मानना था कि मेहंदी के सूखने में जितनी देर लगेगी मेरे भाई की
परेशानी भी उतनी देर में ठीक हो जाएगी। आज भी बिहार तथा झारखंड के कुछ हिस्सों में
ये परंपरा देखने को मिल जाती है। यह परंपरा शायद इस बात को ध्यान में रखकर बनी होगी
कि भादो को महीने में अक्सर बारिश होती रहती है और पुरूष घर से बाहर जंगल आदि में जाते
थे, पहले यातायात के साधनों की कमी के चलते अक्सर वे बारिश में बाहर फंस जाते थे और
घर आने में कई दिन भी लग जाते थे। घर में बच्चों का दिल बहलाने के लिए माँ मेहंदी लगा
देती होंगी हाथों पर और कहती होंगी कि जबतक मेहंदी सूखेगी तुम्हारा भाई भी आ जाएगा।
यही बहाना धीरे-धीरे एक परंपरा के रूप में बदल गई होगी।
आश्विन महीने
का देवी पक्ष बहुत हीं शुभ होता है। हिन्दू समाज यह मान्यता है कि देवी इन दिनों धरती
पर आती हैं और हमारे बीच रहती हैं। अतः इस दौरान लगाई जानेवाली मेहंदी भी काफी खास
और शुभ फलदायी मानी जाती है।
...................
-प्रीतिमा वत्स
सभी चित्र नेट से साभार
Monday, July 30, 2018
सावन के महीने में नाग-नागिन की पूजा
सावन के महीने में
शिव जी की पूजा का विधान तो समस्त भारत में है। साथ हीं बिहार, झारखंड समेत देश के
कई हिस्से में शिव के साथ-साथ नाग-नागिन की भी पूजा की पूजा बड़े विधि-विधान के
साथ की जाती है। यह पूजा खासकर वो औरतें जिनकी शादी नयी-नयी हुई है। यह पूजा पूरे
15 दिनों तक चलता है। इस 15 दिनों में पूजा करने वाली स्त्री बगैर नमक का भोजन
करती हैं, तथा जमीन पर सोती है। इस पूजा को मधुश्रावणी की पूजा भी कहते हैं।यह
पूजा खासकर ब्राह्मण समाज में ही प्रचलित है। इस पूजा में नाग-नागिन की मिट्टी की
मूर्ति बनाई जाती है। कई बार लोग चाँदी के भी बनवा लेते हैं। इन्हें सावन के पंचमी
तिथि को स्थापित किया जाता है। खूब सारे फल और पकवान, अक्षत, दुर्वा, फूल, बेलपत्र,
धूप, दीप आदि से इनकी पूजा की जाती है। पूजा के समय मोहल्ले की औरतें भी देखने आती
हैं और गीत गाती हैं। शुरुआत गणेश वन्दना से करते हैं। शिवजी और पार्वती जी के गीत
के साथ-साथ नाग-नागिन के गीत, विषहरी के गीत,गौरी पूजा के गीत आदि गाए जाते हैं।-
सावन की पूजा में
गाया जानेवाला एक गीत इस प्रकार है-
आवल सखि हे परम
सुहागन सावन के महीनमा।
आवल सखि हे, परम
सुहागन सावन के महीनमा।।
भरि-भरि लोटा हम जल
भरि लायब, पूजब नाग-नगिनियाँ।।
आवल सखि हे परम
सुहागन सावन के महीनमा।
भरि-भरि डाला हम फूल
तोड़ी लायब, पूजब नाग-नगिनियाँ।।
आवल सखि हे परम
सुहागन सावन के महीनमा।
भरि-भरि थार हम भोग
लगाइब, पूजब नाग-नगिनियाँ।।
आवल सखि हे परम
सुहागन सावन के महीनमा.........
............जारी....।।
-प्रीतिमा वत्स
-फोटोग्राफ्स नेट से साभार
-फोटोग्राफ्स नेट से साभार
Friday, June 22, 2018
मधुबनी कला, कल और आज
कभी बिहार के दरभंगा, मधुबनी और नेपाल के कुछ हिस्सों की कच्ची दीवारों पर बनने वाली मधुबनी कला आज अपने देश के हर कोने-कोने में फैल चुका है। अपने देश ही नहीं विदेशों में भी इस कला ने पूरे सम्मान के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है।
मधुबनी कला में पहले जहाँ सिर्फ कच्चे रंगों और पीसे हुए चावल का इस्तेमाल होता था वहीं अब यह रंग के हर एक फार्म में देखने को मिलता है। चाहे वह जलरंग हो, एक्रीलिक हो, ग्लास रंग हो या तैल रंग। बहुत पहले ही दीवारों से उतरकर यह कला सजावट के सामानों, बर्तनों से लेकर परिधानों और कुशन,चादर से लेकर कालीन तक पर फैल चुका है।
मधुबनी कला के इस विस्तार का कारण है उसका उत्सवधर्मी होना। चटख रंगों में बनाया जानेवाला मधुबनी कला अपने-आप में एक रोमांचर इतिहास समेटे हुए है। कहते हैं राजा जनक ने अपनी पुत्रियों के विवाह में नगर की औरतों से महल की दीवारों पर खूब कलाकारी करवाई थी, जो प्राकृतिक रंग और अरिपन से बने हुए थे। इन चित्रों में घोड़े, हाथी, कहार, विवाह की वेदी, मंडप, वर-वधु, चिड़ियाँ, मोर, देवी-देवता आदि बनाए गए थे।यह एक खास शैली में बनाई गई थी।जो बाद में चलकर मधुबनी कला के नाम से विख्यात हुई।प्रारंभिक चरण में मधुबनी कला सिर्फ उच्च कुल की महिलाएँ ही बनाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह कला इतनी लोकप्रिय हो गई कि जाति,धर्म और स्थान की सीमाओं को लाँघती चली गई।
कई पड़ावों से गुजरने के बाद इसके पारंपरिक आकारों में थोड़ी भिन्नता तो आई है परंतु अभी भी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ फूल-फल रही है और लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।
-प्रीतिमा वत्स
Wednesday, November 15, 2017
महिमा कालभैरव अष्टमी का
मार्गशीर्ष के कृष्ण
पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी कहा जाता है। कालभैरव जी के जन्मदिवस के रूप में यह तिथि मनाई जाती है। देवताओं की
तरह पूजे जानेवाले कालभैरव जी रुद्र के गण हैं, इनकी प्रकृति अत्यंत उग्र तथा
क्रोधी है। इनका वाहन कुत्ता है तथा इनके हाथ में त्रिशूल, खड्ग तथा दण्ड रहता है।
ये यात्रा तथा युद्धभूमि में सदा उपस्थित रहते हैं। इसलिए आदमी अपने वाहन खरीदने
पर भी इनकी पूजा करते हैं। इनका एक नाम दंडपाणि भी है। शैव मतानुयायियों में भैरव-पूजा
का विशेष महत्व माना जाता है। किसी शुभ कार्य में विघ्नों के विनाश तथा रोग-दोष की
शान्ति के लिए भैरव का व्रत किया जाता है। कालभैरव के कई अवतार माने जाते हैं,
काशी में काल भैरव, बटुक भैरव, आनन्द भैरव, आश भैरव आदि। काशी, मथुरा, दिल्ली, उज्जैन सहित करीब-करीब पूरे देश में इनके मंदिर बने हुए हैं, जहाँ लोग
श्रद्धा पूर्वक इतवार और मंगल के दिन जाते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। अपने नए
सफर की शुरूआत करनी हो या वाहन पूजा करनी हो अथवा शरीर से किसी प्रकार के जहर का
शमन कराना हो, लोग इनकी पूजा जरूर करते हैं।
काल भैरव अष्टमी पर लोक में एक कथा भी
प्रचलित है- एक बार ब्रह्मा जी, विष्णु भगवान, शंकर जी तथा इन्द्र भगवान में
परस्पर यह स्पर्धा हुई कि इनमें कौन श्रेष्ठ है। सबलोग अपने को दूसरे से बढ़कर
बताने को तुले हुए थे। यही नहीं ब्रह्मा जी शिव की तथा शिव जी ब्रह्मा की निन्दा
करने लगे। शिव जी ब्रह्मा की अपमानजनक बातें सुनकर बहुत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने
कालभैरव को पैदा किया और उन्हें आज्ञा दी कि ब्रह्मा का एक मुख काट डालो। भैरव ने
वैसा ही किया। पंचमुख ब्रह्मा का एक मुख काटकर उन्हें चतुर्मुख बना दिया। ऐसा माना
जाता है कि तभी से सभी देवी-देवता भैरव जी से डरते हैं। ये केवल शंकर जी के
आज्ञाकारी गण माने जाते हैं। क्रोधी होते हुए भी ये अपने भक्तों की पुकार तुरत
सुनते हैं, तथा शुभ फलदायी होते हैं।
..............................
-प्रीतिमा वत्स
Wednesday, November 8, 2017
शिव मानते ही नहीं
(इस लोकगीत
में शिव को मनाने की बात कही जा रही है। किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि मतवाले भोलेनाथ
की पूजा किस प्रकार की जाए कि वह मान जाएँ।)
किए लाए शिव
के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
बेली-चमेली
शिव के मनहूँ न भावे -2
आक-धथूरा कहाँ
पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव
के मनाईब हो शिव मानत नाहीं।
पाट-पीताम्बर
शिव के मनहूँ न भावे-2
मृगा के छाल
कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव
के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
मेवा ओ मिश्री
शिव के मनहूँ न भावे-2
भांग के गोला
कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव
के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
गौरा औ संझा
शिव के मनहूँ न भावे-2
वन के जोगिनी
कहाँ पाईब हो शिव मानत नाहीं।
किए लाए शिव
के मनाईब हो शिव मानत नाहीं ।-2
................
अर्थ-
शिव जी को कैसे
मनाएं,
वो मानते ही नहीं।
बेली चमेली
के फूल शिव के मन को नहीं भाते,
आक और धथूरा
कहाँ से लाऊँ । शिव मानते ही नहीं।
शिव जी को कैसे
मनाएं,
वो मानते ही नहीं।
अच्छे-अच्छे
वस्त्र,
पाट-पीताम्बर उनके मन को नहीं भाते,
मृग के छाल
मैं कहाँ से लाऊँ। शिव मानते हीं नहीं।
शिव जी को कैसे
मनाएं,
वो मानते ही नहीं।
मेवा और मिश्री
शिव जी के मन को ही नहीं भाते,
भांग का गोला
मैं कहाँ से लाऊँ। शिव मानते ही नहीं।
शिव जी को कैसे
मनाएं,
वो मानते ही नहीं।
गौरी माँ और
संध्या देवी में उनका मन नहीं रम रहा,
वन की योगिनी
मैं कहाँ से लाऊँ। शिव मानते ही नहीं।
शिव जी को कैसे
मनाएं,
वो मानते ही नहीं।
Friday, September 15, 2017
कितने अपने थे वे आँगन
इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर
बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से
विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई
चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।
बहुत कुछ जुड़ा है आँगन की यादों से। वो आँगन जो जगह
के अभाव में सिमटता चला जा रहा है। जब भी अपने गाँव जाती हूँ और वो बड़ा सा आँगन देखती
हूँ जो अब छोटे-छोटे हिस्सों में बँटता हुआ लगभग खत्म हो चुका है,जिसके चारों ओर
से मकान बने हुए थे, तो बचपन की बहुत सारी मीठी-मीठी यादें भी ताजा हो जाती हैं। घर
के आधे से ज्यादा काम तो अकेले आँगन में ही होता था। कितना सुहावना लगता था जब माँ
आँगन के एक कोने में बैठकर चावल चुन रही होती और जाने कहाँ से दो चिड़ियाँ के
बच्चे आकर उन फेंके हुए दानों को खाने लगती। माँ भी खुश हो जाती थीं उन चिड़ियों
को देखकर। हम सभी भाई-बहनों ने भी तो इसी आँगन के चारों तरफ के दालानों को
पकड़-पकड़कर चलना सीखा था। पकड़म-पकड़ाई खेलना हो या लँगड़ी टाँग। कबड्डी खेलना हो
या ऊँच-नीच का पापड़ा। हर खेल के लिए सबसे अच्छी जगह ये आँगन ही था।
इसी आँगन में चलना
सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए
और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो
यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है
उसकी महत्ता।
कुछ दशक पहले तक जब
घर बनाए जाते थे तो हर चीज के साथ घर में आँगन की भी जगह छोड़ी जाती थी। वास्तुशास्त्र
के हिसाब से घर को बीचोंबीच आँगन की जगह छोड़ी जाती थी। ऐसा माना जाता था कि घर के
बीचों-बीच वास्तुदेवता विश्राम करते हैं और उन्हें खुली जगह बहुत पसंद है। उनकी
खुशी से ही घर में सुख-शान्ति बनी रहती है। सुपरिचित वास्तुशास्त्री और ज्योतिषाचार्य पूनम
वेदी का कहना है कि “घर के आँगन में वास्तुदेवता की छाती होती है। यह
पूरे घर का हृदयस्थल माना जाता है। जिस तरह हम अपने दिल में सबको जगह देते हैं और
घर के सब लोग एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उसी तरह आँगन भी घर के हर व्यक्ति को एक
दूसरे से जोड़े रखने का काम करता है।
आज हमारे आँगन की
तरह हमारे दिलों में भी दूसरे व्यक्तियों के लिए जगह खत्म होती चली जा रही है”
वास्तुदेवता की उपस्थिति बहस का विषय हो सकती है, लेकिन हर घर में तुलसी के बिरवे के साथ सजता हुआ आँगन कितना उपयोगी होता है,यह हम बचपन से ही देखते आ रहे हैं।
वास्तुदेवता की उपस्थिति बहस का विषय हो सकती है, लेकिन हर घर में तुलसी के बिरवे के साथ सजता हुआ आँगन कितना उपयोगी होता है,यह हम बचपन से ही देखते आ रहे हैं।
जब हमारे दादाजी का
देहांत हुआ था तो इसी तुलसी के बिरवे के पास आँगन में उनके पार्थिव शरीर की रखा
गया था। पूरे गाँव के लोग आए थे तब हमारे आँगन में।
जब भी हमारे घर में
कोई मन-मुटाव होता, घर के सभी लोग इसी आँगन में आकर लड़ाई-झगड़े करते। एक-दूसरे को
भला-बुरा कहते। लेकिन अपनी-अपनी भड़ास निकालने के बाद एक दूसरे का चेहरा देखते हुए
कब उनका गुस्सा शान्त हो जाता पता भी नहीं चलता। फिर माँ और चाची मिलकर चाय और
पकौड़े से सबको शान्त करतीं थीं। कुछ ही देर बाद सभी हल्के मन से अपने-अपने काम
में लग जाते।
परंतु समय हमेशा ऐसा
नहीं रहा। पहले आँगन में दीवारें खिंची। फिर धीरे-धीरे आँगन नाम की चीज हीं खत्म
होती चली गईं।आज तो माहौल ऐसा हो गया है कि एक ही परिवार में आदमी एक दूसरे से कई
दिनों तक नहीं मिल पाते। समय की कमी के साथ इसका एक कारण आँगन का न होना भी है।
जरा सी बात पर यदि कुछ मन-मुटाव हो जाता है तो एक-दूसरे से मिलकर हम उसे दूर नहीं
करते बल्कि अपने-अपने घरों में बैठे कुढ़ते रहते हैं और मन-मुटाव बढ़ता चला जाता
है।
जब काफी दिनों तक
माहौल सुधरता नहीं है और बात बिगड़ती चली जाती है तो बहुत याद आता है वह आँगन।
....................................
..................
-प्रीतिमा वत्स
Sunday, August 6, 2017
कृष्ण ने लाज रख ली द्रौपदी के रक्षासूत्र की
इन्द्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया था। सम्पूर्ण आर्यावर्त के सभी जाने-माने राजा इस यज्ञ में आमंत्रित थे। अतिथि सत्कार के बाद अग्रिम पूजा की बारी आई। सबकी सहमति से युधिष्ठिर श्री कृष्ण की अग्रिम पूजा करने आगे बढ़े, ज्योहिं उन्होंने सोने के परात में प्रभु के चरण धोने के लिए रखे। पीछे से चेदि राजा शिशुपाल बहुत ही असभ्य तरीके से गरजता हुआ खड़ा हो गया और श्री कृष्ण के अग्रिम पूजा का विरोध करने लगा। पूरी सभा ने शिशुपाल को समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माना,और कृष्ण का अपमान करता रहा। कृष्ण चुपचाप सुन रहे थे और मन ही मन उसके सौ गलतियों के पूरा होने की प्रतिक्षा कर रहे थे, क्योंकि कृष्ण ने शिशुपाल की माँ को उसके किए सौ गलतियों के लिए माफ करने का वचन दिया था। जिस समय शिशुपाल की सौ गलतियाँ पूरी हो गई, कृष्ण ने कहा , बस शिशुपाल अब और नहीं। तुम्हारी गलतियाँ माफी की पराकाष्ठा पार कर चुकी हैं। क्रोध से काँपते कृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र नाचने लगा। देखते ही देखते चक्र हाथ से निकला और शिशुपाल के सर को धड़ से अलग करता हुआ पुनः कृष्ण की अंगुलियों में समा गया। उसी समय कृष्ण की अंगुली पर द्रौपदी को खून नजर आया। वह घबरा गईं और अपना दुपट्टा फाड़कर कृष्ण की अंगुली पर बाँध दिया।
कृष्ण ने बड़े प्यार
से द्रौपदी से कहा, हे कृष्णा मेरी प्यारी बहन आज तुम्हारे प्यार का ऋणी हो गया
मैं तो। समय आने पर मैं तुम्हारे इस रक्षासूत्र के एक-एक धागे की कीमत अदा कर
दूंगा। जिसे युगों-युगों तक संसार याद रखेगा और आदर्श मानेगा।
उस वक्त किसी की समझ
में कुछ नहीं आया लेकिन द्रौपदी चीरहरण के समय कृष्ण ने जो किया वह तो सर्वविदित
है।
-प्रीतिमा वत्स
Monday, July 17, 2017
लोक में शिव पूजा ( LOK MAIN SHIV POOJA)
सृष्टि के प्रत्येक कण की उत्पत्ति तथा समाप्ति जिस शक्ति से होती है वह शिव हैं। अर्थात जो वस्तु सृष्टि के पूर्व हो वही जगत् का कारण है, और जो जगत् का कारण है, वही शिव है। 108 नामों से जाने-जानेवाले शिव सभी देवी-देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं तभी तो इनका एक नाम महादेव भी है।
पवित्र ग्रंथ बाईबिल में भी शिव का वर्णन मिलता है, ईसा मसीह ने अपना पिता कहकर जिन्हें संबोधित किया है, वह शिव जी ही है। वैसे तो शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है, लेकिन उनके विग्रह में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। इनके मस्तक पर एक ओर चंद्रमा है तो गले में सर्प का हार है। वे अर्धनारीश्वर कहे जाते हैं,गृहस्थ हैं फिर भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी रुद्र हैं सृष्टि के विनाश का कारण बनते हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है।
हालाँकि लोक की आस्था 33 करोड़ देवी- देवताओं में है। लेकिन शिव का नाम वहाँ भी सबसे लोकप्रिय है। उनकी लोकप्रियता के, उनके सृष्टि के निर्माण के तथा उनके प्रलयंकारी रूप के अनेक किस्से लोक में प्रचलित हैं जो कई बार पुराणों की कथाओं से भी मेल खाते हैं। उन्हीं कथाओं में एक है -
जब इस धरती का निर्माण हुआ तब यहाँ कोई प्राणी नहीं थे तो
ब्रह्मा जी ने सबसे पहले शिव जी से इस धरती पर प्राणियों की उत्पत्ति करने के लिए कहा । पहले तो शिव जी ने हाँ कर दिया लेकिन प्राणियों में विभिन्न दोषों को देख वे जल में मग्न हो गये तथा चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा जी उनके तप पूरा होने की प्रतीक्षा करते रहे। बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी जब ब्रह्मा जी ने शिव जी को जल में ही पाया तथा सृष्टि का विकास नहीं देखा तो मानसिक बल से प्रजापति को उत्पन्न किया। उस विराट पुरुष ने कहा- 'यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।'
ब्रह्मा जी ने प्रजापति को बताया कि इस संसार में श्रेष्ठ तो केवल शिव हीं हैं लेकिन वह तो चिरकाल से जल में ही डूबे हुए हैं, अतः वह सृष्टि का निर्माण करें। ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रजापति ने चार तरह के प्राणियों का निर्माण किया। सृष्टि होते ही प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से दौड़ी। तब प्रजापति ने ब्रह्मा जी से अपनी संतान के भूख के निवारण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने इस धरती पर तरह-तरह के अनाज, फल, औषधि, जल आदि का निर्माण किया। हिंसक पशुओं के लिए, दुर्बल पशुओं के लिए,पक्षियों आदि के आहार की व्यवस्था की। धीरे-धीरे एक आहार श्रृंखला का निर्माण हो गया। लेकिन इससे भी बात नहीं बनी तो सभी देव आपस में मंत्रणा करने लगे, सूर्यदेव ने एक तरकीब निकाली, 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात बना दी। साथ ही यह व्यवस्था कर दी गई कि रात को कोई भोजन नहीं और सभी विश्राम करेंगे। इससे सृष्टि में थोड़ी सी स्थिरता आई।
शिव जी जब अपनी तपस्या समाप्त कर जल से निकले तो पृथ्वी पर समस्त जीवों को निर्मित देखकर क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा ने पूछा- 'प्रभु इतने समय जल में रहकर आपने क्या किया, और लिंग उत्पन्न कर इस प्रकार क्यों फेंक दिया?'
शिव जी ने कहा- 'मैं इस पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले जीवों की नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान पहले चाहता था, जिस कारण तपस्या कर रहा था। परंतु प्राणियों का निर्माण तो हो चुका है, अतः इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही।' ब्रह्मा उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाये। सत युग बीत जाने पर देवताओं ने भगवान का भजन करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया । परंतु शिव का क्रोध शांत न होकर तीनों लोकों में प्रलय लाने को आतुर हो गया।
जब देवताओं को भागने का कोई रास्ता नहीं बचा तब उन्होंने वाणी का सहारा लिया। वाणी ने महादेव के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, अत: धनुष उछलकर पृथ्वी पर जा गिरा।
तब सब देवी - देवता हाथ जोड़कर शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने उन सब पर कृपा कर अपना कोप समुद्र में छोड़ दिया । समुद्र में उठने वाला ज्वार शिव जी के क्रोध का हीं अंश माना जाता है।
तब से सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति की उपासना का महीना माना जाता है। पूरे महीने लोग अपनी आस्था और विश्वास के आधार पर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। लोक में यह मान्यता है कि शिव की पूजा किसी भी तरह से की जा सकती है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं इनकी पूजा में।
........................
- प्रीतिमा वत्स
पवित्र ग्रंथ बाईबिल में भी शिव का वर्णन मिलता है, ईसा मसीह ने अपना पिता कहकर जिन्हें संबोधित किया है, वह शिव जी ही है। वैसे तो शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है, लेकिन उनके विग्रह में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। इनके मस्तक पर एक ओर चंद्रमा है तो गले में सर्प का हार है। वे अर्धनारीश्वर कहे जाते हैं,गृहस्थ हैं फिर भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी रुद्र हैं सृष्टि के विनाश का कारण बनते हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है।
हालाँकि लोक की आस्था 33 करोड़ देवी- देवताओं में है। लेकिन शिव का नाम वहाँ भी सबसे लोकप्रिय है। उनकी लोकप्रियता के, उनके सृष्टि के निर्माण के तथा उनके प्रलयंकारी रूप के अनेक किस्से लोक में प्रचलित हैं जो कई बार पुराणों की कथाओं से भी मेल खाते हैं। उन्हीं कथाओं में एक है -
जब इस धरती का निर्माण हुआ तब यहाँ कोई प्राणी नहीं थे तो
ब्रह्मा जी ने सबसे पहले शिव जी से इस धरती पर प्राणियों की उत्पत्ति करने के लिए कहा । पहले तो शिव जी ने हाँ कर दिया लेकिन प्राणियों में विभिन्न दोषों को देख वे जल में मग्न हो गये तथा चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा जी उनके तप पूरा होने की प्रतीक्षा करते रहे। बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी जब ब्रह्मा जी ने शिव जी को जल में ही पाया तथा सृष्टि का विकास नहीं देखा तो मानसिक बल से प्रजापति को उत्पन्न किया। उस विराट पुरुष ने कहा- 'यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।'
ब्रह्मा जी ने प्रजापति को बताया कि इस संसार में श्रेष्ठ तो केवल शिव हीं हैं लेकिन वह तो चिरकाल से जल में ही डूबे हुए हैं, अतः वह सृष्टि का निर्माण करें। ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रजापति ने चार तरह के प्राणियों का निर्माण किया। सृष्टि होते ही प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से दौड़ी। तब प्रजापति ने ब्रह्मा जी से अपनी संतान के भूख के निवारण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने इस धरती पर तरह-तरह के अनाज, फल, औषधि, जल आदि का निर्माण किया। हिंसक पशुओं के लिए, दुर्बल पशुओं के लिए,पक्षियों आदि के आहार की व्यवस्था की। धीरे-धीरे एक आहार श्रृंखला का निर्माण हो गया। लेकिन इससे भी बात नहीं बनी तो सभी देव आपस में मंत्रणा करने लगे, सूर्यदेव ने एक तरकीब निकाली, 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात बना दी। साथ ही यह व्यवस्था कर दी गई कि रात को कोई भोजन नहीं और सभी विश्राम करेंगे। इससे सृष्टि में थोड़ी सी स्थिरता आई।
शिव जी जब अपनी तपस्या समाप्त कर जल से निकले तो पृथ्वी पर समस्त जीवों को निर्मित देखकर क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा ने पूछा- 'प्रभु इतने समय जल में रहकर आपने क्या किया, और लिंग उत्पन्न कर इस प्रकार क्यों फेंक दिया?'
शिव जी ने कहा- 'मैं इस पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले जीवों की नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान पहले चाहता था, जिस कारण तपस्या कर रहा था। परंतु प्राणियों का निर्माण तो हो चुका है, अतः इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही।' ब्रह्मा उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाये। सत युग बीत जाने पर देवताओं ने भगवान का भजन करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया । परंतु शिव का क्रोध शांत न होकर तीनों लोकों में प्रलय लाने को आतुर हो गया।
जब देवताओं को भागने का कोई रास्ता नहीं बचा तब उन्होंने वाणी का सहारा लिया। वाणी ने महादेव के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, अत: धनुष उछलकर पृथ्वी पर जा गिरा।
तब सब देवी - देवता हाथ जोड़कर शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने उन सब पर कृपा कर अपना कोप समुद्र में छोड़ दिया । समुद्र में उठने वाला ज्वार शिव जी के क्रोध का हीं अंश माना जाता है।
तब से सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति की उपासना का महीना माना जाता है। पूरे महीने लोग अपनी आस्था और विश्वास के आधार पर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। लोक में यह मान्यता है कि शिव की पूजा किसी भी तरह से की जा सकती है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं इनकी पूजा में।
........................
- प्रीतिमा वत्स
Friday, July 7, 2017
गुरू पूर्णिमा GURU PURNIMA
विद्या दान के द्वारा हमारे जीवन को सब प्रकार से सार्थक और सुगम करने वाले गुरू का स्थान हिन्दू धर्म में पिता तथा माता से भी बढ़कर आदरणीय तथा पूज्य है। गुरू को ब्रह्मा,विष्णु और महेश्वर से समान देवता समझ कर पूजा करने की पद्धति हिन्दू धर्म की अपनी विशेषता है। 'आचार्य देवो भवः'। आचार्य मनु के अनुसार- विद्या हमारी माता है और आचार्य हमारे पिता हैं।
गुरू तो संपत्ति का ऐसा भंडार हैं जो अपनी ज्ञान रूपी संपत्ति को अपने शिष्यों पर ताउम्र लुटाते रहते हैं। अपने शिष्य से गुरू कुछ भी बचाकर अपने पास नहीं रखना चाहते है। जिस दिन कोई शिष्य सही अर्थों में विद्वान हो जाता है,उसके गुरू की सबसे बड़ी जीत होती है।
गुरू पुर्णिमा उसी गुरू की पूजा करने की पावन तिथि है जो वर्ष में केवल एक बार आती है। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा को गुरू की पूजा का विशेष महत्व है। यों तो हमें प्रतिदिन गुरू की पूजा करनी चाहिए किन्तु इस पूर्णिमा के दिन गुरू के मानव-शरीर में ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, और शंकरत्व की समन्वित शक्ति का समावेश होता है।
गुरू की पूजा का विधान भी कठिन नहीं है। प्राचीन काल में स्नानादि से निवृत होकर शुद्द मन से गुरू की सेवा,आराधना, तथा यथायोग्य उन्हें कुछ दान का विधान था।
लेकिन आज के इस भौतिक वादी युग में जहां हर रिश्ते की परिभाषा ही बदलती जा रही है। गुरू शिष्य की रिश्ता भी अछूता नहीं रहा है। अन्य सम्बन्धों की भांति यह भी अब अर्थ से जुड़ा सम्बन्ध हो गया है। गुरू शिष्य को इसलिए पढ़ाता है क्योंकि उन्हें जीविकोपार्जन के लिए वेतन मिलता है और शिष्य इसलिए गुरू की प्रतिष्ठा नहीं करता कि उसे पूरी फीस देनी पड़ती है अनेक प्रकार की कठिनाईयां उठानी पड़ती है। लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। शिष्य गुरू के आश्रम में प्रवेश करते हीं सारी चिंताओं से मुक्त होकर गुरू का आश्रित हो जाता था। अब उसके शिक्षा से लेकर खान-पान और वस्त्रादि की चिंता गुरू की होती थी। गुरू अपने शिष्यों पर पुत्रवत स्नेह रखकर उनके सर्वतोन्मुखी कल्याण की चिंता करता था। उनके आश्रम में अमीरी-गरीबी का कोई भेद-भाव नहीं था। किन्तु आश्रम और शिष्यों की चिंता गुरू की व्यक्तिनिष्ठ नहीं थी। एक आचार्य का आश्रम समाज की चेतना का केन्द्रबिन्दु था। बड़े-बड़े राजा- महराजा से लेकर सेठ साहुकार तक इस बात की प्रतिक्षा करते रहते कि गुरू उन्हें भी अपने आश्रम तथा शिष्यों की सेवा का कुछ अवसर देंगे।
लेकिन आज के दौर में ऐसा कतई नहीं है। अब तो गुरू और शिष्य का रिश्ता भी करीब-करीब वैसा ही हो गया है, जैसे कि एक व्यापारी और खरीददार का होता है। पैसे दो और ज्ञान का पैकेज खरीदो। जितना पैसा दोगे पैकेज उतना अच्छा माना जाएगा। अच्छे अंकों से पास हो जाओगे तो अच्छी नौकरी मिलेगी,और अच्छी नौकरी मिलेगी तभी समाज में प्रतिष्ठा पा सकोगे।
इस आपाधापी में आगे निकलने की होड़ इतनी बढ़ गई है कि रिश्तों की मर्यादा को हम भूलते चले जा रहे हैं। गुरू-शिष्य के पवित्र रिश्ते को भी बाजार में खरीद-फरोख्त की चीज बना दी गई है, जिसपर हमारे पूरे समाज को आज विचार करने की जरूरत है। इस मर्यादा को पुनः कायम करने की जरूरत है।
- प्रीतिमा वत्स
Thursday, November 3, 2016
शक्ति साधना ऐसे भी SHAKTI SADHNA AISE BHI
आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
विश्व में बहुत सी जातियां हैं। ढेर सारे संप्रदाय हैं।कई धर्म हैं। विभिन्न भाषाएं हैं। बहुत से धार्मिक ग्रंथ हैं। इतना ही नहीं हर धर्म-संप्रदाय और जातियों में पूज्यनीय भावनाओं के आधार पर देवी-देवताओं की कल्पना की गयी है। ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, गॉड, परमात्मा आदि नामों से ब्रह्म को, खुदा को पुकारा जाता है। किंतु यह जितने नाम हैं वे भाषा के आधार पर दिए गए हैं। यह बहस बहुत पुरानी पड़ गयी कि इस संसार को चलाने वाला कोई है ? इसका उत्तर सभी निकाल चुके हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो इस सृष्टि के कण-कण का ठीक-ठीक समयानुसार चालन करती है। हम उसे गॉड कहें, खुदा कहें, परमात्मा कहें, ज्योति कहें, प्रकाश कहें या ज्ञान कहें।
परंतु इस बात को सभी धर्मों में माना गया है कि कोई तो अदृश्य शक्ति है जो हम सबको पैदा करती है,पोषण करती है और अंत में स्वरुप परिवर्तन कर देती है या विनष्ट कर देती है। भले ही यह शक्ति हमें दिखाई नहीं देती परंतु हमें उसका ज्ञान होता है। हम अपनी उपासना से उस शक्ति को महसूस कर सकते हैं। अपनी ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं।
उसी शक्ति को हम निर्गुण रूप में मानें तो शक्ति और सगुण रूप में मानें तो जगदंबिका अर्थात् जगत जननी हैं।
सर्व देव मयी देवी सर्व देवीमयं जगत।
अतोSहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।
सतयुग,त्रेता और द्वापर से लेकर आज के इस युग में भी देवी अपने भक्तों पर समान रूप से प्रसन्न होती रही हैं। परंतु हर युग की मांग अलग-अलग थी। पहले व्यक्ति, ईश्वर की शरणणागति मांगता था, भक्ति मांगता था और मुक्ति की इच्छा करता था। परंतु आज के युग में भौतिकता, सांसारिकता का मोह फंसा हुआ व्यक्ति जब साधना करता है तो उसकी साधना भी स्वार्थपूर्ण हो गयी है। फिर भी मां भगवती अपने भक्तों के स्वार्थ को पूर्ण करने की कृपा करती हैं जो उन्हें हृदय से पुकारता है उस पर प्रसन्न होकर उसे उसका मनचाहा सुख प्रदान करती हैं। शीघ्र ही सिद्धि देती हैं।
इसीलिए कहा गया है कि कलयुग में मां रूप में देवी की शक्ति की उपासना शीघ्र अभीष्ट फल देती है। क्योंकि आदि शक्ति मां भगवती ही ऐसी एक मात्र पूज्यनीया हैं जो संसार के समस्त सांसारिक सुखों को प्रदान करती हुई अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और अंत में उन्हें मुक्ति भी देती हैं। अतः मानव को चाहिए कि शक्ति स्वरूपा देवी की साधना उपासना करें।
शक्ति साधना कई प्रकार से की जाती रही है। वैदिक शक्ति साधना,तांत्रिक शक्ति साधना और भक्ति मार्गीय शक्ति साधना।
उपरोक्त साधनाओं में सांसारिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को भक्ति मार्ग की साधना को अपनाना चाहिए। साधारण मनुष्य वैदिक तथा तांत्रिक विधि से देवी की न उपासना कर सकता है, न साधना कर सकता है। ये दोनों मार्ग कठिन एवं तपस्या करने के समान है। अतः खुद को मां का बेटा मानकर भक्त मानकर, सेवक, दास, पुजारी मानकर शक्ति उपासना करना चाहिए। शक्ति को यदि शक्ति भी न मानें , केवल मां माने, स्वामिनी माने तो सर्वश्रेष्ठ साधना होगी।
देवी के किसी भी रूप-नाम को या हर रूप-नाम को माता के समान पूजे, मां मानकर उपासना करें तो मानव का पूर्ण कल्याण मां के हाथों निश्चय है। वो अपने भक्तों की सच्ची पुकार की इस कलयुग में भी अनसूना नहीं कर सकती हैं।
जो शक्ति,ब्रह्मा,विष्णु और महेश आदि समस्त देवताओं की मां हैं जिनसे सारी सृष्टि का जन्म हुआ है वही शक्ति हमारी भी मां है और मां कभी अपने बालक का बुरा नहीं सोच सकतीं, वह सदैव अपने बेटों का हित चिंतन ही करेगी। अतः उसी मां की साधना उपासना हमें करनी चाहिए।
-प्रीतिमा वत्स
Subscribe to:
Posts (Atom)
वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया
आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...
-
पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था,...
-
उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों म...
-
झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जात...

















