Sunday, August 30, 2015

दशरथ मांझी The mountain man Dashrath Manjhi.

फिल्म की अपनी सीमा होती है, इसलिए केतन मेहता ने फिल्म में दिखा दिया कि पहाड़ से गिरकर दशरथ मांझी की पत्नी की मौत हो गयी थी, जबकि सच यह है कि सिर्फ उनका घड़ा फूटा था. फिल्म सड़क बनने के आगे विस्तार नहीं ले पायी. फिल्म में हम दशरथ मांझी के कबीरपंथी रूप को नहीं देख पाये.








बाद के दिनों में दशरथ मांझी कबीरपंथी हो गये थे और वे नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाने लगे थे. इसके अलावा उन्होंने साफ-सफाई को भी लेकर अभियान शुरू किया था. अपने समाज के लोगों से वे लगातार अनुरोध करते थे कि गंदगी के बीच में न रहें. घर के आसपास साफ-सुथरा माहौल बसायें. मगर लोग नहीं माने. ऐसे में वे अपने भाइयों के साथ गेहलोर मुख्य बस्ती से एक-डेढ़ किमी दूर आकर बस गये. जिस टोले को कुछ ही साल पहले दशरथ नगर का नाम दिया गया है.

2012 के दिसंबर में मैं वहां गया था. वहां यह देखकर मैं हैरान रह गया कि जो टोला दशरथ मांझी ने साफ-सफाई की जिद की वजह से बसाया था वह काफी गंदा था. लोग फिर से गंदगी के आसपास रहने लगे थे. उस टोले में भी मुझे कई लोग नशे के आदी मिले. यानि महज पांच साल में लोग दशरथ मांझी की सीख को भूलने लगे थे. हालांकि उनका पुत्र इन व्यसनों से दूर लगता था. मगर उसे उम्मीद रहती है कि दशरथ मांझी के नाम पर सरकार को जितनी सहायता देनी चाहिये थी वह नहीं दी गयी है.
उस टोले में कुछ सरकारी हैंडपंप लगे थे, मगर वाशर खराब होने की वजह से बंद पड़े थे और लोग गंदे कुएं का पानी पीने को विवश हो गये थे. मैंने उनसे पूछा कि आप लोग उस दशरथ मांझी के वंशज हो जिसने पहाड़ तोड़कर रास्ता बना दिया, मगर आप हैंडपंप का वाशर तक नहीं बदल सकते और गंदा पानी पी रहे हो. मुझे लगा कि लोगों को मेरी यह बात पसंद नहीं आयी.  
Report- Pushyamitra, Photographs- Pushyamitra.
Presented by - Pritima vats.

Saturday, August 23, 2014

Experiment with Manjusha painting. (रग मंजूषा कला के)

Manjusha painting is the form that mirrors the myth and feelings of eastern Bihar(India). The Manjusha art is also associated with a religious festival of Ang Janpath- the Bihla Bishari worship and the folk tale related with it. That painting is fairly popular form of art, is an accepted fact. One only has to remind oneself of M.F. Husain and his recent paintings to understand what heights it can achieve. But the rural people of Bihar do not know Husain. The folk painting is the only language of colours and lines that they know.Manjusha painting is the form that mirrors the myth and feelings of eastern Bihar. It has a touch of tribal culture too. Manjusha art forms an integral part of the rich culture heritage og the Ang janapath ( old Bjagalpur Commissionary). This traditional art resembles Madhubani paintion of Mithila,
Zadopatian painting of Santhal pargana, Kolam of Tamil Nadu and Rangoli of Karnataka. Simplicity of form and use of minimum materials are its cornerstones.Like the Madhubani painting, the Manjusha art is also associated with a religious festival of Ang Janath- the Bihla Bishari worship and the folk tale related with it. The main festival is held after the onset of rains in August, at Champamagar, about five kilometres from Bhagalpur railway station. A two- day fair is also held on the occasion. A folk tale is that Chando, a soudagar of Angjanpath was opposed the


worship of Bishari, the Goddess of cobras and he therefore had to face her wrath. His son Bala lakender was bitten by a cobra on the night of his marriage with Bihla. Bihla took her husband away fron Champa for treatment in a newly built boat with a shape of Manjusha, to keep Bala lakender safe from further attacks of the snakes. The walls and canopy of the boat were painted by veteran artist of that time, Lahsan Malli.The beautifuly sketched figures represrnted the prayer to the Goddess. In the painting there were snakes, Bishari, elephant, peacock, sun and moon. The colours used wree pink, green and yellow only. It is said that, since that incident, the tradition of Manjusha paintings has continued to be practised by the Malkhar families of Champanagar.Though the original Manjusha ( boat) was made of metal. the Manjusha built today on the occasion of Bihla-Bishari Puja are made of paper, himp and a frame built of Santhi a light wood. The frame is given a shape of a temple and it rests on eight pillars that form a square shaped room with a door. Then the whole frame is covered with paper on which beautiful paintings depicting the story of Bihla- Bishari are made. The snake is sketched in different painted as symbols for depicting the sky.The folk songs related with Bihla - Bishari van easily be seen to have a ready expression in the Manjusha art paintings. Along with the symbolism and liveliness of the characters. Manjusha art is very rich in colour combination and the original shade of paper used.the Manjusha artist also gives equal attention to the decoration of the art piece with the very effective user of the Mihrabs and borders. These Mihrabs provide an identity to the Manjusha painting. Unfortunately today, the Manjusja art is on its decline. For some time this form of art was practised by a few Malkhar families of Champanagar, but they too seem to have lost interest in it.This unique traditional painting which formed an inseparable part of centuries of Ang culture is now facing threat for want of patrons and onslought of consumerism. There is an urgent need to establish production canters at different spots besides providing financial assistance to the artists. To save Manjusha, it must be made commercially viable.

First ,second and third paintings are traditional manjusha painting.
In tradional Manjusha paintings only three colours-pink,green& yellow used. All paintings are in water colour. Art by- Pritima Vats.

Friday, August 22, 2014

हुनरमंद हाथोंकी हाजिर जबावी HUNARMAND HATHON HI HAZIRJAWABI.


काले कागज पर बना सोने सा चमकता हुआ पुआल का वॉल हेंगिंग देखकर आज भले ही ज्योति गर्व से भर उठती है, लेकिन बिहार के मुंगेर की रहनेवाली ज्योति ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उसके द्वारा बनाये गए पुआल के टुकड़ों से बना वह वॉल हेंगिंग कभी इस कदर पसंद की जाएगी। खाली समय में कुछ नया करने की आदत और कला के प्रति उनके झुकाव ने उनकी कला को एक नया पहचान दिया है।


पुआल से बनायी जानेवाली चित्रकारियां जहां एक ओर काफी खूबसूरत होती है, देश की लोककला और संस्कृति से जोड़ती है, वहीं इसके निर्माण में बहुत कम लागत की जरूरत पड़ती है। पुआल को अच्छी तरह से झाड़ पोंछकर साफ करके उसके बाहरी आवरण को हटा लिया जाता है, जिससे पुआल की सुंदर-सुंदर चमकीली डंठलें निकल आती हैं। इन डंठलों को किसी तेज चाकू या ब्लेड की सहायता से बीचों- बीच फाड़कर सीधा कर लिया जाता है। किसी मोटे किताब के नीचे दबाकर दो या तीन दिनों के लिए इसे रख दिया जाता है। जिससे यह पूरी तरह से सीधा हो जाए। अब मनचाहे आकार में इसे 

काटकर किसी गाढ़े रंग के कागज या कपड़े पर गोंद की सहायता से चिपकाकर सुंदर-सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं। चाहे वह सोने का दौड़ता हुआ हिरण हो, अपने बाग में घूमती हुई राधा हो या बाँसुरी बजाते हुए कृष्ण, इतने आकर्षक लगते हैं ये चित्र कि देखनेवाले का मन मोह लेते हैं। इन चित्रों को और आकर्षक बनाने के लिए कई बार रंगों का भी इस्तेमाल किया जाता है। ये रंग प्राकृतिक भी होते हैं। पुआल के साथ-साथ ताड़,पीपल और खजूर के पत्तों से बना वॉल हेंगिंग और ग्रीटिंग्स,टूटी हुई चूड़ियों से,घर के मसालों तथा दाल,चावलों से बनायी जानेवाली कलाकृतियां, सींकी से बनाया जानेवाला सामान आज न सिर्फ घर की देहरी को पार कर गया है बल्कि
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी एक खास पहचान बना चुका है। हाल केवर्षोंमेंकई ऐसेबदलाव हुए हैंजो हमें हमारी लोककला तथा संस्कृति से जोड़ते हैं। फिर चाहे पांच सितारा होटलों में परोसा जानेवाला केले तथा शकोरे के पत्ते पर कोई देसी व्यंजन हो या इन आलीशान होटलों में लोककलाओं की लगनेवाली प्रदर्शनियां हों। खूब सराहे और बेचे जाते हैं।ज्योति की कला, जहां उससे शौक का एक हिस्सा रही, वहीं इसे अपना रोजगार बनाया है शांति निकेतन के फाइन आर्ट्स स्नातक अम्बर मुखर्जी ने। दिल्ली हाट में अपने हस्तनिर्मित पुआल की वॉलहेंगिंग, ग्रीटिंग्स, मधुबनीमंजूषा,वार्ली पेंटिंग के छोटे-छोटे शोपीस,लकड़ी के बुरादे से बनी हुई पेंटिंग्स आदि के साथ जब अम्बर कोलकाता से दिल्ली आए तो उनकी आंखों में कामयाब होने का एक सपना तो जरूर था लेकिन कामयाबी इस कदर सर चढ़कर बोलेगी यह कभी नहीं सोचा था।आज अम्बर मुखर्जी की कला के खरीददार व्यक्तिगत सम्पर्कों के आधार पर न्यूयार्क तथा लीवरपूल में भी हैं।प्राचीनकाल में हमारे गांव पूर्णतया आत्मनिर्भर थे और बहुत सी जरूरत की चीजें गांववासी खुद प्राकृतिक संसाधनों के सहयोग से बना लिया करते थे। ऐसे में गांव में तरह-तरह की हस्तकलाओंका समुचित विकास भी हुआ।गांव के लोग चटाई,डलिया,पंखा,मौनी,दौरी,ट्रे,पेन स्टैंड आदि चीजें फुर्सत के क्षणों में एक साथ मिल बैठकर बनाया करते थे। इसमें भी औरतों की भागीदारी अधिक होती थी।आज भी बिहार,उत्तरप्रदेश,केरल, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा आदि राज्यों के कई इलाकों में गांव की महिलाएं लोककला में रुचि ले रही हैं। कहीं-कहीं तो यह कुटीर उद्योग केरूप में भी विकसित हुआ है। इन उद्योगों में न सिर्फ रोजमर्रे की जरूरत के सामान मिलते हैं बल्कि सजावट के भी कई सामान मिलते हैं। समय-समय पर छोटे-बड़े शहरों तथा महानगरों में आयोजित हस्तकला मेले में इस तरह के कलाकार भी अपनी-अपनी कृतियोंके साथ उपस्थित होते हैं, और सराहे जाते हैं।घास-फूस से बनाई जानेवाली इन कला को सींकी कला के नाम से जाना जाता है।सींकी एक प्रकार का घास है। सींकी से समान वनाने के लिए पहले इसे गरम पानी तथा रंग के घोल में डालकर सुखा लिया जाता है, फिर तकुए(एक प्रकार का औजार)की सहायता से खर पतवार लगाकर जो चीज बनानी होती है, उसका खाका तैयार किया जाता है। इसके बाद विभिन्न रंगों में रंगे गए 
बेरुआ(मूंज) से उसे बुना जाता है। बुनाई के क्रम में विभिन्न प्रकार की फूल-पत्तियां तथा आकृतियां उकेरी जाती हैं। जो देखने में काफी आकर्षक होती हैं।डलिया,मौनी,दौरी आदि जब बनकर तैयार हो जाते हैं तब उनमें झालर लगायी जाती है। बहुधा झालर लगाने में स्थानीय नदियों से प्राप्त किए गए घोंघे,सीप आदि का इस्तेमाल किया जाता है। कई बार सीप और घोंघे के आभाव में रंग-बिरंगे कपड़ों के कतरन का भी इस्तेमाल किया जाता है। सींकी से थरुहाट (पश्चिमी चम्पारण) की महिलाएं शिव, लक्ष्मी गणेश आदि की मूर्तियां, बच्चों के खिलौने आदि बनाती हैं। उड़ीसा के इलाकों में सींकी कला द्बारा वनाए पशु-पक्षी काफी लोकप्रिय हैं।घरेलू मसालों से बनायी जानेवाली कलाकृति भी कला का बेहतरीन नमूना होता है। इन चीजों से ज्यादातर प्राकृतिक दृश्य,फूल,पत्तियांआदि ही बनाई जाती हैं। कभी-कभी देवी-देवताओं के चित्र भी देखने को मिल जातेहैं।घरेलू सामान से कम खर्च में निर्मित इन बेजोड़ कलाकृतियों की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर ऐसा लगता है मानो गांधी जी का स्वराज का सपना पुनः इस माध्यम से सच होने जा रहा हो। सृजन के इस तरह के नायाब नमूने को देखकर ही उन्होंने कहा था-“ जहां दो मेहनती और हुनरमंद हाथ होंगे, वहां कुछ भी संभव हो सकता है।”
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, July 16, 2014

पण्डवानी और तीजन बाई (PANDWANI AND TEEJAN BAI)

 पण्डवानी लोक की एक ऐसी गायकी है जिसमें महाभारत के पात्र पाण्डवों की गाथा है। महाभारत का यह लोकस्वरुप इतना अदभुत है कि इसे प्रस्तुत करने वाले कलाकार इसे निरंतर परिमार्जित करते रहे हैं। अपने समय को इस लोककाव्य का हिस्सा बनाकर प्रस्तुत करने के कारण ही पण्डवानी बहुत कम समय में ही हर सुनने वाले को अपने से जोड़ लेती है।
नर्मदा और महानदी के बीच बसी आदिवासी संस्कृति में पली-बढ़ी इस वाचिक परंपरा को निभाने का कार्य मुख्य रुप से गोंड जनजाति के लोग करते आये हैं। ऐसा माना जाता है कि गोंड जनजाति की उपजातियों परधानदेवार के लोगों ने पण्डवानी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। परधानों को जहां जजमानों के यहां कथा वाचन के जरिये पण्डवानी पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है, वहीं देवारों को छत्तीसगढ़ में घुमन्तू की तरह घूम-घूम कर पण्डवानी के प्रचार-प्रसार का श्रेय प्राप्त है।
आवश्यकता और समय के साथ पण्डवानी गायन शैली में कुछ-कुछ परिवर्तन होते रहे हैं। आज पण्डवानी की एक नयी शैली सामने आयी है।  इस शैली में कथावाचन और अभिनय दोनों एक दूसरे के पूरक की तरह सामने आते हैं। पण्डवानी की इस रोचक और कुछ अधिक ग्राह्य शैली को रुपक शैली की संज्ञा दी जाए तो गलत न होगा । हालांकि इस शैली के विकास को लेकर वैचारिक मदभेद सामने आते हैं। एक ओर जहां इस शैली के विकास के लिए आन्ध्र प्रदेश की बुर्रा कथा को जिम्मेदार मानते हैं, जिसकी उपस्थिति छत्तीसगढ़ क्षेत्र में वर्षों तक रही है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान पण्डवानी गायक मानते हैं कि समय की मांग के अनुरूप ही उन्होंने पण्डवानी में नाट्य प्रकृति का समावेश किया है।
पण्डवानी गायन शैली को जनजातीय क्षेत्रों से बाहर लाकर जनरुचि की कला के रुप में प्रचारित- प्रसारित करने और उसे विश्व सांस्कृतिक पटल पर स्थापित करने का कार्य जिन्होंने किया है, उनमें तीजन बाई का नाम सबसे आगे है। तीजन बाई को उनकी गायकी और पण्डवानी पर इतना भरोसा है कि, वो कहती हैं- गायन परंपरा, जिस महाभारत महाकाव्य पर आधारित है, वह अमर है। बस इसलिए यह परंपरा हमेशा जीवित रहेगी।
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प्रीतिमा वत्स

फोटोग्राप्स नेट से साभार।



Saturday, July 12, 2014

Puppet art in modern era. बदलते परिवेश में कठपुतली कला

भारत में राजस्थान की कठपुतली कला दुनिया भर में लोक कला के उत्कृष्ट नमूने माने जाते हैं। यहां की कठपुतली का इतिहास काफी पुराना है और यहां की लोक कलाओं और कथाओं से जुड़ा हुआ है परन्तु पिछले कुछ सालों से राज्य में परंपरागत रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के खेल में काफी परिवर्तन हो गया है। पहले जहां यह खेल सड़कों, गलियों में कुछ धार्मिक कहानियों को लेकर हुआ करता था, आज वहीं यह खेल रंग आकार,गति और संगीत के संगम के साथ फ्लड लाइट्स की चाकचौंध रोशनी में बड़े-बड़े मंच पर होने लगा है। धार्मिक तथा लैला-मजनूं आदि की कहानी को छोड़कर अब इन

 कठपुतलियों ने परिवार नियोजन,पौढ़ शिक्षा, राष्ट्रीय एकता के साथ-साथ हास्य व्यंग व मनोरंजन कार्यक्रम दिखाना शुरू कर दिया है। बच्चों के लिए छोटे-छोटे शिक्षाप्रद कहानियां बहुत ही खूबसूरती से कहे जाते हैं। पिछले दिनों इंडिया हैबिटेट सेंटर में 12वें इशरा इंटरनेशनल पपेट फेस्टीवल में दुनिया के कई देशों ने हिस्सा लिया और एक से बढ़कर एक कठपुतली के खेल दिखाए। नए-नए प्रयोगों से हाइटैक हो चुकी कठपुतली ने दर्शकों का काफी मनोरंजन किया। इस कठपुतली उत्सव में एक ओर जहां भारत के परंपरागत कठपुतलियां लोगों का मनोरंजन कर रही थीं, वहीं दूसरी ओर विदेशों से आए हुए कठपुतली कलाकार भी लोगो का मनोरंजन करने में जुड़े हुए थे। स्पेन, यूके, बुल्गारिया,आयरलैंड,इस्राइल,अजरबेजान आदि देशों ने हिस्सा लिया था। स्पेन की एक कठपुतली कला के प्रदर्शन में बताई गई एक कहानी में,
मां बकरी को बाजार जाना है और वह अपने बच्चों को चेतावनी देकर गई है कि वे किसी के लिए दरवाजा न खोलें। फिर भी एक खूंखार भेड़िया घर में घुस जाता है और सारे बच्चों को खा जाता है। लेकिन किसी तरह सबसे छोटा मेमना बच जाता है और वह अपनी मां के साथ सारे बच्चो को भेड़िये के पेट से निकालने में मदद करता है। और वे भेड़िये का पेट उसके सो के उठने से पहले पत्थरों से भर देते हैं। इससे वह भेड़िया नदी में गिर जाता है और सारी बकरियों को भेड़िए से हमेशा के लिए छुट्टी मिल जाती है।
ऐसी बहुत सारी कहानियां बताई गई जो मनोरंजक होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद भी था। लेकिन राजस्थान के कठपुतलियों की सुन्दरता का तो कोई जबाब ही नहीं। पूरण भट्ट के निर्देशन में आकार पपेट थियेटर ग्रुप का फेमिली शो को भी दर्शकों ने काफी सराहा।
लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े और घर के फटे-पुराने कपड़ों में सजा गोटा और सितारे के संयोग से बनी राजस्थान की कठपुतलियां हर किसी को मुग्ध करती हैं। आदिकाल से लेकर आज तक कठपुतली कला में विविध रूपों में परिवर्तन होता आया है। यहां की कठपुतली कला को न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी लोकप्रियता मिली है। परन्तु आजकल इस कला में आधुनिकता का प्रवेश हो जाने के कारण उसके लौकिक स्वरूप में गिरावट आ गई है। यहां कई ऐसे परिवार हैं जो पूरी तरह कटपुतली बनाने और उसका खेल दिखाकर जीविकोपार्जन करते हैं। इनकी कमाई का एकमात्र यही साधन है परन्तु आज कठपुतली के घटते कद्रदानों की वजह से ये परिवार अपने 


पुश्तैनी धंधे को छोड़कर अन्य कामों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। कई लोग मजबूर होकर खेल दिखाने के बजाए कठपरुतली बनाने तक ही अपना काम सीमित कर रहे हैं। कठपुतली से जीविकोपार्जन करनेवाले इन परिवारों मे स्त्रियां और बच्चे कठपुतली की पोशाकें तैयार करने और पुरुष कठपुतली का ढांचा बनाने, रंग करने और खेल दिखाने तथा इन्हें बेचने का काम करते हैं। सारा दिन पूरा परिवार इस काम में तन-मन से लगा रहता है परन्तु आज के बदलते माहौल में उनकी कला और उनकी मेहनत की कद्र घटती जा रही है। हालांकि विदेशों में कठपुतली कला का महत्व इन दिनों बढ़ा है, लेकिन इसका काम यहां बड़े इंपोरियम के विक्रेता ही कमाते हैं। जबकि कठपुतली बनाने वाले कलाकार इसे बहुत ही कम दामों में बेचकर किसी तरह अपनी जिन्दगी बिताते हैं। काठ, चमड़े और कपड़े की कठपुतली को अपने इशारों पर नचाकर लोगों का मनोरंजन करनेवाले कठपुतली के कलाकार इस कला के घटते कद्रदानो की वजह से अपने पेशे को छोड़ने के लिए मजबूर हैं। 
कई कठपुतली वाले इस खेल की दुर्दशा से काफी दुखी हैं। वे कभी वक्त को कोसते हैं तो कभी सरकार को। जब इनका दर्द हद से बढ़ जाता है तो ये कभी-कभी मुकद्दर को भी कोसने लग जाते हैं। कुछ साल पहले तक देश-विदेश में शोहरत के झंडे गाड़ देने वाली कठपुतली कला आज कद्रदानों की आस में है।  

आलेख में प्रयुक्त   चित्र विभिन्न देशों के कठपुतली कला के  हैं। इन्हें पहचानने के लिए में क्रमशः इन देशों के नाम लिख रही हूं-
भारत, बुल्गारिया, स्पेन, यू.के., अजरबेजान, हांगकांग, इस्राइल।
(INDIA, BULGARIA, SPAIN, U.K., AZERBAIJAN, HONG KONG, ISRAEL.)
-प्रीतिमा वत्स 

Saturday, May 10, 2014

mandiron ka gaon maluti.

पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं।

झारखंड और बंगाल के बार्डर पर, दुमका जिले से 55 किलोमीटर दूर एक गांव है, मलूटी। इस गांव में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सिर्फ मंदिर हीं मंदिर नजर आते हैं। शायद एक छोटी सी जगह में इतने सारे मंदिर एक साथ होने की वजह से हीं इस क्षेत्र का नाम गुप्त काशी रखा गया होगा। इस गांव में कभी 108 मंदिर स्थित थे जिनमें से अधिकांश भगवान् शंकर को समर्पित थे और इनमें भव्य शिवलिंग स्थापित थे। संरक्षण के अभाव के चलते अब इन मंदिरों में सिर्फ 69 मंदिर ही बच पाये हैं।
हरे-भरे वृक्षों के बीच पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के ये मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं। यही कारण है कि ये मंदिर न सिर्फ शिव भक्तों को, वरन् पर्यटकों, पुरा विशेषज्ञों और इतिहास प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। भगवान् भोले शंकर के मंदिरों के अतिरिक्त यहाँ दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदी देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ मौलिक्षा माता का भी मंदिर है जिनकी मान्यता जाग्रत शाक्त देवी के रूप में है।
एक गांव में इतने सारे मंदिरों का होना किसी के लिए भी एक आश्चर्य से कम नहीं है लेकिन यह सत्य है कि मलूटी के राजाओं ने समय समय पर अपनी रानियों के लिए राजप्रासादों की वजाय इन मंदिरों का निर्माण करवाया था। मलूटी राज के प्रथम राजा बसंत राय तथा उनके वंशजों द्वारा सन् 1720 से 1840 के बीच इन मंदिरों को बनवाया गया है। मलूटी के राजाओं का अंत हो जाने के बाद ये मंदिर उपेक्षित होते चले गये। एक छोटे से गाँव में इतने सारे मंदिरों की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रहा। सेना के रिटायर्ड अफसर गोपालदास मुखर्जी एक ऐसे आदमी हैं जो काफी चिंतित और सजग दिखाई देते हैं इन मंदिरों के प्रति। सेना से रिटायर्ड होने के बाद से वे समर्पित भाव से लगे हैं इन मंदिरों की सेवा में। उन्हे उम्मीद है आज न कल सरकार जरूर जागेगी इनकी हिफाजत करने।जिर्ण-शीर्ण हालत में होते हुए भी आज भी गजब की सुंदरता झांकती है इन मंदिरों से। इन मंदिरों का निर्माण बंगाल की सुप्रसिद्ध 'चाला' रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईंटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक है। मंदिरों की दीवारों पर ज्यादातर राम और कृष्ण लीला के चित्र अंकित हैं। सावन के महीने में यहाँ मेला भी लगता है। कुछ भक्त गण बाहर ,से भी आते हैं मंदिरो में पूजा तथा मेले में शिरकत करने । लेकिन इस गांव के मंदिर में वस्तुतः उजाड़ निहित है । मलूटी में रहनेवाली एक वृद्ध महिला साधना चटर्जी कहती हैं " 1986 में , बिजली आया था। दस दिन बाद , यह चला गया,फिर कभी नहीं आया है।" सूर्यास्त पर , केवल लैंप के प्रकाश में रहने को विवश हैं यहाँ के निवासी। इस कारण पर्यटक भी घबराते हैं यहाँ रात रुकने से।
-प्रीतिमा वत्स


Monday, April 21, 2014

AB NAA RAHA WO NEEM


नदिया किनारे निमिया रोपल उजे अशह-बिशह निमिया पसरल
ताहि तर खाड़ भेल बेटी सुनयना बेटी हे।
काहे बेटी तोरा मुखहूं मलिन भेल हे।(अंगिका लोकगीत)
लोकगीतों में नीम, शादी के उबटन में शामिल नीम, ससुराल जाती लड़की की यादों में बसा नीम, विरहा के यादो का साथी नीम, आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान रखनेवाला नीम हमारे रोज मर्रा की जिंदगी में  बहुत ही उपयोगी माना जाता है। लोक गीतों में इसकी ठंडी छांव की तुलना तो माता-पिता के प्यार से की जाती रही है। जैसा कि इस राजस्थानी लोकगीत में-
'संजा नीमड़ा नी छाया
वसी माता-पिता की माया
माया तोड़नो पड़से कि
सासर जानो पड़से....!
नन्ही-नन्ही सखियों के संग गोबर से लीपे आँगन में बैठकर संजा के गीत गाते हुए नीम कब अपना-सा लगने लगा, पता ही नहीं चला। कड़वे-कसैले नीम पर रचे मीठे भोले अनगढ़ गीत अनजाने ही आज भी जुबान पर थिरक उठते हैं ।
निमिया के पात तबहि निक लागे, जब नीम कौड़ा होय।
यानी जैसी नीम की ठंडी सुखद छाँव होती है बड़ी प्रिय लगती है, वैसी ही माता-पिता की मोह-माया होती है। इस माया को तोड़ना पड़ता है, तोड़ना पड़ेगा, ससुराल जाना पड़ता है, जाना पड़ेगा।
बचपन की ढेर सारी यादों में बसा नीम। स्कूल से लौटते हुए नीम की सूखी पत्तियों को अपनी कॉपी के पन्नों पर गिरने की कामना लिए घंटों खड़े रहते सब सहपाठी, और जैसे ही कोई पत्ती किसी बच्चे की कॉपी पर गिरता मान लेते कि पढाई में इस बार तो वही अव्वल आएगा। सिर्फ अनुभूति के स्तर पर ही नीम अप्रतिम नहीं है, उसकी औषधीय महत्ता छाल, टहनी, दातुन, पत्तियाँ, निबौरिया, फूल इन सबके रूप में प्रकट होती है। तभी तो यादों के किसी आईने की धूल पोंछते हुए निदा फाजली ने लिखा है -
'सुना है अपने गाँव में
रहा न अब वह नीम
जिसके आगे मांद थे
सारे वेद हकीम।'
सच हीं है जिस घर में नीम का एक पेड़ है। वहां से बहुत सारी बिमारियां तो अपने-आप दूर हो जाती हैं। नीम से जुड़े छोटे-छोटे नुस्खे जिन्हें अपनाकर हम बिमारियों से काफी हद तक छुटकारा पा सकते हैं।
१- नीम का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों के निवारण में सहायक है।
२- नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
३- नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है।
४- नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं, और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
५- नीम मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को दूर रखने में अत्यन्त सहायक है। जिस वातावरण में नीम के पेड़ रहते हैं, वहां मलेरिया नहीं फैलता है।
6- नीम के द्वारा बनाया गया लेप बालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
इसके अलावा भी नीम के बहुत से फायदे हैं, तभी तो इसे संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, ‘श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।’ अंगिका का ये कहावत भी चैत के नीम की महत्ता को अच्छी तरह दर्शाता है-
चैतो के नीम बैशाखो के बेल,
जेठ मास पनियौतो ठेल। 
'करेला और नीम चढ़ा' जैसी कहावत को जन्म देने वाला शायद कभी उसकी छाँव तले सुस्ताया नहीं होगा। कभी उससे गुजरकर आती ठंडी-ठंडी नशीली बयार ने उसे मदहोश नहीं किया होगा। कभी उसके गुलाबी मुलायम पत्तियों को मुंह में रखकर चबाया नही होगा नहीं तो उस कड़वाहट में घुलती हुई बताशे जैसी मिठास को जरूर अनुभव करते।
बॉक्स-
इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य की शक्ति से ही चलता है…..सूर्य की ऊर्जा से जन्मे तमाम जीवों में नीम ने ही उस ऊर्जा को सबसे ज्यादा ग्रहण किया है। इसीलिए इसे रोग-निवारक समझा जाता है – किसी भी बीमारी के लिए नीम रामबाण दवा है। नीम के एक पत्ते में 150 से ज्यादा रासयानिक रूप या प्रबंध होते हैं। इस धरती पर मिलने वाले पत्तों में सबसे जटिल नीम का पत्ता ही है। नीम की केमिस्ट्री सूर्य से उसके लगाव का ही नतीजा है।
-प्रीतिमा वत्स

यह आलेख अमरउजाला अखबार के रुपायन मैग्जिन में प्रकाशित है।  






Monday, August 12, 2013

आदिवासी जीवन और लोककलाओं के खतरे Tribal life and trouble of folk art.


लोक संस्कृति या आदिवासी जीवन में हर व्यक्ति एक विशेष किस्म का कलाकार होता है और इन कलाकारों का जीवन आम लोगों से भिन्न नहीं देखा जा सकता। कला इनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है। ये कलाकार जो कुछ बनाते हैं उसमें उपयोगिता और सौंदर्याभिरुचि दोनों तत्व मौजूद रहते हैं।


जनजाति कला मुख्यतः तीन गुणों से पहचानी जाती है- जीवंतता, प्रमाणिकता और अनामिता। लोक संस्कृति से जुड़े विविध पक्षों को आदिवासी और जनजाति समुदाय सहज कलात्मक समझ के अनुसार रंगों और रेखाओं के माध्यम से प्रकट करता आया है। आदिवासी जीवन में कला दंभ का विषय नहीं, बल्कि आस-पास तथा अनुभूतियों का सृजनात्मक संकलन है। आधुनिक समाज में कलाकार को एक विशिष्ट दर्जा प्राप्त है। जबकि लोक संस्कृति या आदिवासी जीवन में हर व्यक्ति एक विशेष किस्म का कलाकार होता है और इन कलाकारों का जीवन आम लोगों से भिन्न नहीं देखा जा सकता। ये कलाकार जो कुछ बनाते हैं उसमें उपयोगिता और सौंदर्याभिरुचि दोनों तत्व मौजूद रहते हैं। कला यहां दूर से देखने की चीज नही होती। लोग कला को जीते हैं, भोगते हैं। आजादी के बाद के वर्षों में आदिवासी और जनजाति कला ने कुछ तरक्की तो अवश्य की है, पर जो खोया है वह भी कम नहीं है। चाहे वह दक्षिणी बिहार की जादोपेटियन चित्रकला हो, महाराष्ट्र की वार्ली चित्रकला हो, सोनभद्र की जनजाति चित्रकला हो या पिथौड़ा भित्ति चित्रकला हो, इन पचास वर्षों में इनकी आत्मा पर कृतिमता का प्रहार हुआ है। इस प्रहार ने कुछ कलाओं को अच्छी खासी ख्याति दिलाई, लोकिन कुछ लोक कला बहुत पीछे छूट गयी। कई कलाएं जो लुप्त हो गई और कई विकृत हो गयीं।
जनजाति कला सिर्फ अमूल्य धरोहर ही नहीं कही जा सकती, वरन समृद्ध परंपरा सम्पन्न सभ्यता एवं जीवंत संस्कृति के इतिवृत हैं। ये कलाएं वस्तुतः किसी भी समाज के जनमानस का आईना होती है। सदियों से अनाम-अनजाने हाथों में रचे बसे, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सहज परम्परागत ढंग से हस्तांतरित होनेवाली इन कलाओं में लोक मानस के हर्ष-उल्लास, आशा-आकांक्षा, कुंठा-संत्रास आदि मनोभावों की कल्पनायुक्त सरस अभिव्यक्ति मिलती है। महत्वपूर्ण माध्यम नहीं है- सवाल अभिव्यक्ति में आस्था का है। मिट्टी,प्राकृतिक रंगों और सहज कल्पनाओं तथा अवधारणाओं से आदिवासी गांवों की दीवारों पर जो चित्रकारियां नजर आती हैं, उनमें एक तरफ बच्चों की सी मासूमियत दिखती हैं तो दूसरी ओर बूढ़ों का अमुभव संसार भी किसी न किसी रूप में परिलक्षित होता है। भूख, अभाव, भटकाव और बेरोजगारी से जूझते जनजाति कलाकार कला के क्षेत्र में जिस ढंग से सक्रिय है, वह अपने आप में मिसाल है और यह बात इस बात की भी पुष्टि करता है कि मनुष्य केवल पेट के लिए परिश्रम नहीं करता। विज्ञान की भाषा में मनुष्य को होमासेपियन कहा गया है। इसका अर्थ होता है बुद्धिप्रवण जन्तु। ऐसी हालत में केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन की परिधि में मनुष्य बंधा नहीं रह सकता। आदिवासी समुदाय आज पिछड़ा हुआ समझा जाता है। लेकिन उनकी सृजनात्मक चित्रकला तथा विभिन्न कला विधाओं से लगता है कि गरीबी और अन्य समस्याएं कला की गति को नहीं रोक सकती।
जन-जाति चित्रकला में पशु-पक्षियों तथा मनुष्य जीवन के विविध पक्षों का जो चित्रण हुआ है और हो रहा है, वह मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते के बारे में बहुत कुछ कहता है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करती, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। सुबह के समय मुर्गे का बोलना, बरसात में मोर का नाचना और सुंदर स्त्री के प्रति पुरूष का सहज ढंग से आकर्षित होना एवं इस तरह के ढेर सारे स्वाभाविक एवं प्राकृतिक संदर्भ जनजाति चित्रकलाओं में देखने को मिलते हैं। हालांकि, यह भी गौरतलब है कि जनजाति या आदिवासी जनजाति समुदाय को विभिन्न उपजातियों तथा उनकी सास्कृतिक आस्था के आधार पर इन चित्रकलाओं के स्कूल भी मिलते हैं लेकिन हाल के कुछ वर्षों में सरकारी और गैर सरकारी कला संस्थाओं द्वारा इन जनजाति कलाओं के पारंपरिक सकूल और व्याकरण लड़खड़ाये हैं। हालांकि इस बास से इंकार नहीं किया जा सकता कि कलाओं के लिए कई सकारात्मक कदम उठाये गये हैं। गुमनामी में जी रहे जनजाति लोक कलाकारों ने ख्याति पाई, वाजिब सम्मान पाया। कला जनजाति जीवन का हिस्सा थी। कला का आनंद किसी चीज का विकल्प नहीं था। कलात्मक अभिव्यक्तियां विश्लेषण के लिए नहीं होते थे और न हीं कोई कीमत का प्रवधान था। लेकिन कला के संरक्षण के नाम पर किये जा रहे ये कर्म इन कलाओं के प्रदूषण का कारण बन गये। इन जनजाति और लोककलाओं की सहजता नष्ट हो गई। मैं खासकर मधुबनी लोक चित्रकला और संथाल परगना की भित्ति चित्रकला का उदाहरण देना चाहूंगी। बिहार में इन दोनों कलाओं को बचाने के लिए काफी प्रयत्न किए गए। कुछ एक कलाकारों ने विश्व ख्याति प्राप्त की। लेकिन इस ख्याति ने इन दोनों कलाओं को परंपरा से जुदा कर दिया।  मधुबनी पेंटिंग, जो शुरू में अपनी सहजता और नैसर्गिकता के लिए जानी जाती थी, धीरे-धीरे दूरूहता और कृत्रिमता का आभास देने लगी। कला महिलाओं की आय का स्त्रोत तो अवश्य बनी लेकिन जहां पहले प्रकृतिक रंगों और बांस की करची और कपड़े का प्रयोग होता था. आधुनिक कलाकार नये रासायनिक रंग, कागज, कलम और तूलिका का प्रयोग करने लगे। यही हाल संथाल परगना की दीवारों पर की जानेवाली चित्रकारी का हुआ । इस कला को दीवार से हटाकर कैनवास और कागज पर लाकर विचार किया जाने लगा तो इसकी स्वाभाविकता तो नष्ट हुई ही, हल्दी और गौमूत्र की जगह रासायनिक रंग आ गये। संथाल परगना और दक्षिणी छोटानागपुर की एक चर्चित लोककला जादोपेटीयन कुछ वर्षों में समाप्त हो जाएगी,ऐसा कहा जाता है। कारण जो भी रहा हो, बंगाल के यमपट और उड़ीसा के पट चित्र कला से मिलती जुलती जादोपेटीयन चित्रकला के दक्षिणी बिहार में मात्र आठ या दस कलाकार रह गये हैं। युवा कलाकार और कला समीक्षक देव प्रकाश ने इस कला के संवर्धन के लिए कुछ प्रयास किए हैं, इस कला और इससे जुड़े मिथक संसार को किताब के शक्ल में भी लाकर कोशिश की है। वाबजूद इसके ये कलाएं अपने स्वाभाविकता से दूर होती नजर आ रही है।
दरअसल, लोक परंपरा भागीदारी और प्रतिबद्धता की मांग करती है। यह लोगो के दैनिक जीवन का एक हिस्सा है। इसलिए लोककला, जनजाति कला और आदिवासी कला के संरक्षण तथा संवर्धन की चिंता को बहुत सकारात्मक नहीं माना जा सकता। ये कलाएं स्वतंत्र हैं और सृष्टि के साथ समरस होकर जीने का संदेश देती है।
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-प्रीतिमा वत्स


Saturday, July 6, 2013

भीलों का मिथक संसार -पिठौरा चित्रकला Pithora chitra kala.




पिठौरा चित्रकला में दोनों ही लोकों का चित्रण इस खूबी से किया जाता है कि मिथक कब वास्तविक बन जाता है और वास्तविक संसार कब मिथक, पकड़ पाना कठिन है। यही कारण है कि इन भीलों की ये चित्रांकन शैली सम्पूर्ण यथार्थ को अपने में समाये हुए भी फंतासी से परिपूर्ण होते हैं।

गोंड जनजाति के बाद संख्या तथा क्षेत्रफल की दृष्टि भील जनजाति भारत की जनजातियों में सबसे विशाल जनजाति हैं। पश्चिमी मध्यप्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के एक बहुत बड़े हिस्से में यह जनजाति बसी हुई है। भील, भिलाला तथा राठवा, इन तीन प्रमुख उपवर्गों में विभक्त इस जनजाति में अनेक गोत्र पाए जाते हैं।
वर्तमान समय में भीलों का आर्थिक आधार कृषि तथा कृषि मजदूरी करना है। किन्तु इन्हें उन्नत कृषक कदापि नहीं माना जा सकता । आज भी वे वनों से अनेक प्रकार के कंद मूल फल आदि एकत्रित कर स्वयं उपयोग भी करते हैं तथा हाट बाजारों में बेचकर कुछ धन भी कमाते हैं। ये आज भी वन्य प्राणियों का शिकार करते हैं। आजकल बहुत बडी संख्या में भील अहमदाबाद,बड़ौदा,इंदौर,भोपाल, उदयपुर आदि नगरों में भवन निर्माण के कार्यों में मजदूरी करने लगे हैं।
भील जनजाति की आस्थाएं तथा धार्मिक विश्वासों के केन्द्र में उनका मिथकीय संसार ही प्रमुख है। ये आस्थाएं और मिथक मिलकर जब इनकी दीवारों पर आकार लेते हैं तो एक अलग ही दुनिया बन जाती है। इन मिथकों में बावो इंद या इंदी राज, पिठौरा, पिठौरा, रानी धरती, मालवी घोड़ा, राजा भोज आलमनी गद्धी, वालन सीतू राणो, राणी काजल एवं काली कोयल आदि अभिप्राय प्रमुख हैं। ये सभी अभिप्राय घर के भीतरी भाग के उस कक्ष की दीवारों पर बनाए जाते हैं, जिन्हें भील पवित्र स्थान मानते हैं। जिन दीवारों पर यह कला उकेरी जाती है। उसके चारों तरफ एक हाशिया घेरा जाता है। इन हाशियों के अन्दर वाले क्षेत्र को घर का भितरी भाग माना जाता है और इसी क्षेत्र में चित्रों का निर्माण किया जाता है। चित्रों में ऊपरी भाग में एक लहराती हुई मोटी लकीर खींचकर संपूर्ण क्षेत्र को दो भागों में विभाजित किया जाता है। नीचे के भाग में लगभग दो तिहाई एवं ऊपर के भाग में लगभग एक तिहाई क्षेत्र आकाश लोक या देवलोक माना जाता है तथा नीचे का दो तिहाई क्षेत्र भूलोक। दोनों ही क्षेत्रों में चित्रांकन किए जाते हैं। सामान्यता रसोई तथा बरामदे को पृथक करनेवाली भित्ति को पिठौरा मिथकों का चित्रांकन किया जाता है।
भील अपने इन भित्ति चित्रों को पिठौरा कहते हैं। इन चित्रों में निश्चिच तौर पर इह लोक और परलोक जैसे विभाजन तो नहीं होते, किन्तु चित्रांकन की विषय वस्तु तथा उसमें बनाए गए पात्रों से ही यह ज्ञात होता है कि कौन से चित्रांकन इहलोक को और कौन से अलौकिक को दर्शाते हैं। दरअसल दोनों ही लोकों का चित्रण इस खूबी से किया जाता है कि मिथक कब वास्तविक बन जाता है और वास्तविक संसार कब मिथक, पकड़ पाना कठिन है। यही कारण है कि इन भीलों की ये चित्रांकन शैली सम्पूर्ण यथार्थ को अपने में समाये हुए भी फंतासी से परिपूर्ण होते हैं। क्योंकि यथार्थ कब मिथक में और मिथक कब यथार्थ में बदल जाता है इसे किसी नियम से समझना कठिन है।
सामान्यतया पिठौरा चित्रकला में सफेद रंग का प्रयोग किया जाता है। सफेद के साथ हरा,पीला और नीले रंग का प्रयोग किया जाता है। इन भित्तिचित्रों में पिठौरा के साथ-साथ खेत जोतता हुआ भील कृषक गाय एवं बछड़ा, बन्दर, कुआँ-बावली, दही मथकर मक्खन निकालते हुए युगल, ऊँट,राजा रावण,पनिहारिनें, सांप,बिच्छू,सूर्य, चन्द्रमा, बाघ, ताड़का वृक्ष तथा उस पर चढ़कर ताड़ी उतारते हुए एवं ताड़ी पिलाते हुए व्यक्ति, विश्राम हेतु बरगद का वृक्ष, खजूर का वृक्ष , मधुमक्खी का छत्ता एवं उससे टपकता हुआ शहद आदि अभिप्रायों का चित्रण  किया जाता है।
पिठौरा भित्ति चित्रण श्रावण मास में बनाए जाते हैं। पिठौरा बनाने वाला कलाकार चित्रांकन करते समय व्रत रखता है, तथा उसे पूरा करने के पश्चात ही भोजन करता है। जिस परिवार में पिठौरा चित्रांकण किया जाता है, उस परिवार के लड़के एवं कन्याएं भी चित्रांकन पूर्ण होने तक व्रत रखते हैं। चित्रांकन पूर्ण होने पर दूसरे दिन उपवास रखनेवाले लड़कों व कन्याओं को दारू का प्रसाद देते हैं। यह कार्य घर के प्रमुख द्वारा सम्पन्न किया जाता है। चित्रांकन के अवसर पर पूरी रात जागरण किया जाता है, और परंपरागत गीत गाये जाते हैं। दूसरे दिन एक बकरा, एक बकरी तथा पांच मुर्गे बलि चढ़ाए जाते हैं। इस प्रकार पिठौरा अलंकरण एक पूर्ण रूप से भीलों का अनुष्ठानिक एवं धार्मिक आयोजन है।
-प्रीतिमा वत्स

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...