झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जाते हैं।
एक गांव में एक समृद्ध व्यक्ति के पास धातु के बने हुए कुछ बर्तन थे। गांव के लोग शादी आदि के अवसरों पर यह बर्तन उससे मांग लिया करते थे। एक बार एक आदमी ने ये बर्तन मांगे। वापस करते समय उसने कुछ छोटे बर्तन बढ़ाकर दिए। समृद्ध व्यक्ति ने पूछा कि बर्तन कैसे बढ़ गए। उसने कहा कि मांगकर ले जाने वाले बर्तन में से कुछ गर्भ से थे। उनके छोटे बच्चे हुए हैं। समृद्ध व्यक्ति व्यक्ति को छोटे बर्तनों का लोभ हो गया। उसने बर्तन देने वाले आदमी को ऐसे देखा जैसे उसे कहानी पर विश्वास हो गया हो और उसने बर्तन रख लिए। कुछ दिन बाद वही व्यक्ति फिर से बर्तन मांगने आया। समृद्ध-व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए बर्तन दे दिए। काफी समय तक बर्तन वापस नहीं आए। बर्तनों के स्वामी ने इसका कारण पूछा। मांगने वाले ने कहा कि वह बर्तन नहीं दे सकता, क्योंकि उनकी मृत्यु हो गई है। परंतु बर्तन कैसे मर सकते हैं समृद्ध व्यक्ति ने पूछा। क्यूं ? उत्तर मिला, यदि बर्तन बच्चे दे सकते हैं तो वे मर भी सकते हैं।
अब उस समृद्ध व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह हाथ मलता ही रह गया।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, January 8, 2009
Tuesday, December 30, 2008
आज भी मायके आती हैं टुसु
टुसु का जन्म कब हुआ, कब उसकी शादी हुई, कब ससुराल गई। शायद किसी को भी इसका ठीक-ठीक पता नहीं है लेकिन सदियों से झारखंड,बिहार और बंगाल के कुछ हिस्सों में हर साल एक महीने के लिए टुसु के ससुराल से मायके आने की बात कही जाती है। तथा इसे एक बहुत ही मनोरंजक लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है।
अगहन की समाप्ति के साथ ही घरों में लड़कियाँ अरवा चावल (कच्चे चावल) के आटे और गोबर के गोल-गोल पिण्ड बनाती हैं। तथा घर के एक आले में मिट्टी के बर्तन में इसकी स्थापना कर दी जाती है। ये ही टुसु हैं, इनमें काजल और सिन्दूर लगाया जाता है तथा अनेक तरह से इनकी वन्दना की जाती है। प्रत्येक संध्या को दीप,धूप, अगरबत्ती के द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है तथा लड़कियाँ इसके सामने बैठकर विविध गीत गाती है।
वास्तव में टुसु एक कन्या का नाम है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, उसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। टुसु के गीतों में भी इसका बहुत अच्छा वर्णन मिलता है। विसर्जन से एक दिन पहले विदाई के कारुणिक गीत गाये जाते हैं। ये टुसु के प्रति उनके स्नेह और आदर के द्योतक हैं -
तीस दिनों तक टुसु तुम्हें रखा
तीस दिनों तक तुम्हारी संध्या वंदना की।
अब मैं और कितने दिनों तुम्हें रख पाऊंगी।
इतने दिनों तक टुसु थी, तो घर भरा-भरा था,
आज टुसु चली जायेगी, तो घर सूना-सूना हो जाएगा।
मकर संक्रान्ति के एक पहले-रात्रि जागरण किया जाता है। यह दिन बांउडी के नाम से विख्यात है। रात्रि को आठ प्रकार के अनाज मिट्टी की कड़ाही में डालकर उसे आग पर भूनते हैं। इस भूने हुए अनाज को भूँजा कहा जाता है। यह टुसु को भोग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि टुसु को भूँजा बहुत पसंद है। तथा रातभर गीत गाकर जागकर समय बिताया जाता है। सूर्योदय के पूर्व ही विसर्जन के लिए जाया जाता है। इस पर्व का अंतिम दिन मकर-संक्रांति का दिन होता है। चूंकि यह पर्व पूस में मनाया जाता है इसलिए कई इलाको में इस पर्व को पौष पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
अगहन की समाप्ति के साथ ही घरों में लड़कियाँ अरवा चावल (कच्चे चावल) के आटे और गोबर के गोल-गोल पिण्ड बनाती हैं। तथा घर के एक आले में मिट्टी के बर्तन में इसकी स्थापना कर दी जाती है। ये ही टुसु हैं, इनमें काजल और सिन्दूर लगाया जाता है तथा अनेक तरह से इनकी वन्दना की जाती है। प्रत्येक संध्या को दीप,धूप, अगरबत्ती के द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है तथा लड़कियाँ इसके सामने बैठकर विविध गीत गाती है।
वास्तव में टुसु एक कन्या का नाम है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, उसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। टुसु के गीतों में भी इसका बहुत अच्छा वर्णन मिलता है। विसर्जन से एक दिन पहले विदाई के कारुणिक गीत गाये जाते हैं। ये टुसु के प्रति उनके स्नेह और आदर के द्योतक हैं -
तीस दिनों तक टुसु तुम्हें रखा
तीस दिनों तक तुम्हारी संध्या वंदना की।
अब मैं और कितने दिनों तुम्हें रख पाऊंगी।
इतने दिनों तक टुसु थी, तो घर भरा-भरा था,
आज टुसु चली जायेगी, तो घर सूना-सूना हो जाएगा।
मकर संक्रान्ति के एक पहले-रात्रि जागरण किया जाता है। यह दिन बांउडी के नाम से विख्यात है। रात्रि को आठ प्रकार के अनाज मिट्टी की कड़ाही में डालकर उसे आग पर भूनते हैं। इस भूने हुए अनाज को भूँजा कहा जाता है। यह टुसु को भोग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि टुसु को भूँजा बहुत पसंद है। तथा रातभर गीत गाकर जागकर समय बिताया जाता है। सूर्योदय के पूर्व ही विसर्जन के लिए जाया जाता है। इस पर्व का अंतिम दिन मकर-संक्रांति का दिन होता है। चूंकि यह पर्व पूस में मनाया जाता है इसलिए कई इलाको में इस पर्व को पौष पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
Tuesday, December 23, 2008
उपनयन संस्कार गीत
पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था, सो मैं यहां पर इन गीतों का अनुवाद करने की कोशिश कर रही हूँ-
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......
धरती पर खड़े होकर बालक(जिसका जनेऊ हो रहा है।) जनेऊ माँग रहे है।
इस पृथ्वी के मालिक कौन है जो इन्हें जनेऊ पहनाएंगे।
इस पृथ्वी के मालिक तो सूर्य भगवान हैं,
और वह(सूर्यभगवान) उठकर बोले-
हम हीं इस पृथ्वी के मालिक हैं,इन बालकों को जनेऊ धारण करवाएंगे।
इन्हें सम्पूर्ण ब्राह्मण होने का आशिर्वाद देंगे।
2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।
राजा दशरथ के चारो पुत्र उपनयन मंडप पर विराजमान हैं
वे मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
मुंज की डोरी,मृग की छाला कहां शोभायमान है,
साथ हीं पीले रंग का जनेऊ कहां सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हाथ में मूंज की डोरी, कमर में मृग की छाला।
शरीर पर पीले रंग का जनेऊ, मंडप पर सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं
-प्रीतिमा वत्स
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......
धरती पर खड़े होकर बालक(जिसका जनेऊ हो रहा है।) जनेऊ माँग रहे है।
इस पृथ्वी के मालिक कौन है जो इन्हें जनेऊ पहनाएंगे।
इस पृथ्वी के मालिक तो सूर्य भगवान हैं,
और वह(सूर्यभगवान) उठकर बोले-
हम हीं इस पृथ्वी के मालिक हैं,इन बालकों को जनेऊ धारण करवाएंगे।
इन्हें सम्पूर्ण ब्राह्मण होने का आशिर्वाद देंगे।
2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।
राजा दशरथ के चारो पुत्र उपनयन मंडप पर विराजमान हैं
वे मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
मुंज की डोरी,मृग की छाला कहां शोभायमान है,
साथ हीं पीले रंग का जनेऊ कहां सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हाथ में मूंज की डोरी, कमर में मृग की छाला।
शरीर पर पीले रंग का जनेऊ, मंडप पर सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं
-प्रीतिमा वत्स
Monday, December 15, 2008
यज्ञोपवीत अथवा उपनयन संस्कार

बालक जब किशोरावस्था में प्रवेश करने लगता है तो उसे जनेऊ के माध्यम से संस्कारित किया जाता है। इसे यज्ञोपवीत तथा उपनयन संस्कार भी कहा जाता है। यह प्रथा ज्यादातर बिहार तथा झारखंड के ब्राह्मण तथा राजपूत जातियों में प्रचलित है। इस मौके पर महिलाएँ लोकगीत भी गाती हैं।
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......
2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।
-प्रीतिमा वत्स
Sunday, December 7, 2008
क्यों पाला मुझे इतने जतन से माँ

कुछ आदिवासी (संथाली) संस्कार गीतों के अनुवादः
सौहर
"ओ मेरी माँ
क्यों रो रही हो तुम
दरवाजे पर,छाती पकड़कर !"
"क्यों न रोऊँ मैं, मेरी बेटी
पाला है बड़े यतन से
बड़े लाड़-प्यार से मैंने तुम्हें।"
"कटोरे के सुसुम गर्म पानी,
और अँगीठी की गर्म ताप से
की है मैंने परवरिश तुम्हारी।
क्या देने पराए घर तुझे
किए हैं मैंने इतने यतन?"
सौहर
पिताजी!
थी जब मैं छोटी
तो आए थे कुटुम्ब
-शादी के लिए मेरी,
पर कर दिया था आपने इन्कार!
बाबा, अब हो गई हूँ बड़ी मैं
कहाँ हैं मेरे बाराती, कहाँ हैं मेरे कुटुम्ब
बोलो अब क्या करूँ मैं?
पुआल की मोटी रस्सी की तरह
बना के रख दो 'खोचर' मुझे!
-प्रीतिमा वत्स
Monday, December 1, 2008
लोककथा लछमी जगार की

बहुत पुराने समय की बात है, ऊपरपुर में मेंगराजा और मेंगिन रानी राज्य करते थे। मेंगिन रानी ने हठ किया कि बह मंजपुर देखना चाहती है। तब मेंगराजा के कहने पर अजगलभिमा ने मंजपुर जाकर उनके रहने के लिए वहाँ एक झोपड़ी बनवा दी। वे दोनों मंजपुर में आकर रहने लगे। उनके कोई संतान नहीं थी। मेंगिन रानी ने कई जतन किये किन्तु उन्हें संतान की प्रप्ति नहीं हुई। तब उसने मेंगराजा को अपने काका माहादेव के पास फल माँगने को भेजा। मेंगराजा कैलासपुर से आम का फल लेकर लौटे और उसे रोप दिया। समय आने पर वह फल अंकुरित होकर पौधा, और फिर पेड़ बना। उसमें फल लगे। मेंगराजा ने वह फल मेंगिन रानी को दिया। उस फल को खाने से मेंगिन रानी को पुत्री की प्राप्ति हुई। उसका नाम रखा गया, माहालखी। माहादेव का एक छोटा भाई था। उसका नाम था नरायन। वह बालिखंडपुर में रहता था। उसकी इक्कीस रानियाँ थीं। किन्तु इसके बावजूद वह माहालखी से विवाह करना चाहता था। उसने अपने भाई और भौजी से मिलने का बहाना बनाया और कैलासपुर आ गया। वहाँ से वह बेसरा (बाज पक्षी) लेकर आखेट के बहाने माहालखी की खोज में चला । उसका बेसरा छूट कर माहालखी के पास चला गया। वह बेसरा के बिना ही कैलासपुर लौटा। पारबती ने बेसरा के बारे में पूछा तो नरायन ने सारी घटना बतला दी और माहालखी के विवाह की जिद करने लगा। इस पर उसके भाई माहादेव ने पारबती से कहा कि उसकी बात मान लें और माहालखी के उसका विवाह करा दिया जाए। इस तरह उसका विवाह माहालखी के करवा दिया गया। विवाह के बाद वह माहालखी को लेकर बालिखंडपुर जाना चाहता था किन्तु पारबती ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया। तब वह अकेला ही बालिखंडपुर चला गया। किन्तु वहाँ उसका मन नहीं लगता था। तब वह एक रात कैलासपुर पहुँचा और माहालखी को उठा ले गया। वहाँ उसकी राधा-तुलसा- उडद,मूँग, चना, बडरा सरकों, तिल, राहेड़, कोसरा, सावाँ, वदई आदि इक्कीस रानियाँ माहालखी को तरह-तरह के कष्ट देने लगीं। सही बात से अनजान नरायन ने एक दिन माहालखी को बहुत पीटा। यहाँ तक कि उस पर लात भी उठाया। तब माहालखी अपमानित और दुखी होकर बालिखंडपुर छोड़कर इन्दरपुर चली गयी। उसके साथ-साथ नरायन राजा की सारी सम्पत्ति भी चली गयी। नरायन राजा अपनी रानियों के साथ भूखों दिन बिताने लगा। तब रानियों ने थक-हार कर कहा कि माहालखी के चले जाने के कारण ही उनके घर से धन-धान्य भी चला गया है। इसलिए वह माहालखी को खोज कर लाए। तब नरायन राजा माहालखी की खोज में भटकने लगा। बड़ी मुश्किल से इन्दरपुर में वह उसे देख सका। वहाँ किसी तरह उससे उसकी भेंट हुई। तब माहालखी ने रानियों द्वारा उस पर किए गए अत्याचारों की कथा सुनायी। नरायन राजा पछताने लगा और किसी तरह माहालखी को मनाकर बालिखंडपुर ले आया। उसके साथ ही धन-धान्य भी बालिखंडपुर लौट आए। इसी जगार के भीतर माहादेव द्वारा खेती करने और धान उपजाने की कथा भी आती है। इस कथा के अनुसार पहले धरती पर धान नहीं था। पारबती के कहने पर माहादेव ने खेती की और धान का उत्पादन किया। वही धान कैलासपुर से धरती पर आया और लोगों का भोजन बना।
इसा दिन की याद में लछमी जगार में खेतों से धान की बालियाँ लाकर नारियल के उसका विवाह रचाया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
Saturday, November 29, 2008
लक्ष्मी उर्फ लछमी जगार

धान की फसल कटनी शुरु होने के साथ-साथ हीं अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग लोकपर्व शुरु हो जाता है। बिहार झारखंड में जहाँ यह पर्व नवान्न के रूप में मनाया जाता है बस्तर के ग्रामीण इलाके में भी यह पर्व मनाया जाता है,लेकिन एक बदले अंदाज में जिसे हम लछमी जगार के नाम से जानते हैं।
अगहन के महीने में लछमी जगार मनाया जाता है। चारों तरफ कच्चे धान की खुशबू के बीच बड़ी हंसी खुशी के माहौल में यह पर्व मनाया जाता है।
यह पर्व गुड़ी में मनाया जाता है। गुड़ी की साफ-सफाई कर उसके दीवार पर देवी-देवताओं तथा जानवरों के चित्र बनाये जाते हैं। इसे गढ़ लिखना कहते हैं। उसके बाद जमीन पर चावल के आटे से बहुत ही कलात्मक ढंग से चित्रकारी की जाती है, इसे चौक पूरना या बाना लिखना भी कहते हैं।
लछमी जगार का मतलब अन्न लक्ष्मी को जगाना या जागरण करना। कुछ लोग इस शब्द का सम्बन्ध यज्ञ से भी जोड़ते हैं। लगातार आठ-दस दिनों तक सारी रात जागकर लछमी-नारायण की कथा कही- सुनी जाती है। कहीं-कहीं तो यह कथा पंद्रह दिनों तक भी चलती रहती है।
लछमी जगार की कथा प्रायः महिलाएँ ही सुनाती हैं। इन्हें गुरुमायँ कहते हैं। यह कथा गीत के रूप में गा कर सुनायी जाती है। गुरुमायँ यह कथा धनकुल नामक वाद्य बजाते हुए सुनाती हैं।
लछमी जगार के पहले दिन खेतों से धान की बालियाँ लाकर नारियल से उसका विवाह रचाया जाता है, क्योंकि नारियल को भगवान नारायण का रूप माना जाता है। और फिर बड़े ही धूमधाम से शुरु होती है कथा वाचन की प्रक्रिया।
इस व्रत की एक अत्यंत ही रोचक लोककथा भी है जो मैं अभी सहेज नहीं पाई हूँ, इसलिए जल्दी हीं अगले पोस्ट में डालुंगी।
-प्रीतिमा वत्स
Wednesday, November 26, 2008
गमछा नहीं, तो नाच नहीं

फरुआही नृत्य कारी वह लोक विधा है जिसमें नर्तक का अंग प्रत्यंग नाचता है और काफी श्रम साध्य होता है। इसके दर्शक भी कम नहीं हैं पर टीवी व सीडी के बढ़ते चलन ने इसका मान कम कर दिया है।
न मेकअप का खर्चा न सजने-संवरने का झंझट। सिर्फ धोती और गंजी पहन कमर में एक गमछा कसा और शुरु हो जाते हैं फरुआह कलाकार। कमीज पहनी है तो बड़ी अच्छी बात है नहीं पहनी है तो कोई बात नहीं। अपने गमछे से नर्तक कभी महिला का स्वांग करते हैं तो कभी कमर में बांधकर अपने नृत्य को गति देते हैं। बहरहाल गमछा इस नृत्य का प्रमुख हिस्सा है। इसको अलग कर कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर सकता शायद। या यूं कहें कि गमछा नहीं तो नृत्य नहीं, शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस नृत्य के लिए ज्यादा वाद्य यंत्रों का भी प्रयोग नहीं किया जाता है। नृत्य के लिये टिमकी (तासा), नगाड़ा व झाल का ही प्रयोग किया जाता है। स्वयं प्रशिक्षित कलाकार होने के बावजूद फरुआही कलाकारों के नृत्य में कला में शास्त्रीय व लोक नृत्य का अद्भुत संयोग मिलता है।
इस विधा को देखने से लगता है कि इसका चलन वीरगाथा काल में सैनिकों के मनोरंजन को ध्यान में रखकर शुरू किया गया और आज भी वह जीवंत है। शायद इसलिए यह नृत्य महिलाएं नहीं बल्कि केवल पुरुष हीं करते हैं। पिछले दिनों राप्तीनगर के हरिसेवकपुर दुर्गामंदिर पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ एवं रघुनन्दन मारुतिनन्दन महायज्ञ के प्रथम दिन आहूत फरुआह चन्द्रिका प्रसाद की टीम ने लोगों को बरबस अपनी ओर खींचा। टीम के आधा दर्जन नर्तकों ने लगभग 4 घण्टे तक लोगों को बांधे रखा। टीम के नर्तक धर्मेन्द्र, रूदल, जीतेन्द्र, अंजनी, छेदी व चिनिगी ने फरुआही नृत्य की बेहतर प्रस्तुति कर आज के दौर में अपनी सार्थकता साबित की। उनके साथ झाल व टिमकी-नगाड़ा के अलावा कोई वाद्य यंत्र प्रयुक्त नहीं किया गया। नृत्य के साथ भोजपुरी गीत प्रस्तुत कर रहे टीम के मुखिया चद्रिका ने कहा कि फरुआही की बची-खुची टीमें भोजपुरी संस्कृति में ही मर खप रही हैं पर इन्हें पूछनेवाला कोई नहीं रहा। चन्दि्रका प्रसाद ने कहा कि फरुआही नृत्य कारी वह लोक विधा है जिसमें नर्तक का अंग प्रत्यंग नाचता है और काफी श्रम साध्य होता है। इसके दर्शक भी कम नहीं हैं पर टीवी व सीडी के बढ़ते चलन ने इसका मान कम कर दिया है। उन्होंने कहा कि पहले गांव में शादी ब्याह के समय लोग इसे ले जाते थे पर अब ऐसा नहीं। बदलते परिवेश व मनोरंजन के आधुनिक संसाधनों ने काफी हद तक लोक विधाओं को मारा है। कला की इज्जत करने वाले व कलाकारों की टीम में शामिल लोगों ने भी अपना कैरियर फिल्म व कैसेट में बनाना शुरू कर दिया है। शहर से लेकर कस्बों तक नयी नाट्य संस्थाएं बन रही हैं और लोक कलाकार छंटते चले जा रहे हैं।
लेकिन कुछ भी हो जाए,आधुनिकता की कैसी भी बयार क्यों न बहे लोक की उष्मा तो बनी ही रहेगी।
-प्रीतिमा वत्स
Monday, November 24, 2008
कागा अभागा नकबेसर ले भागा...
किसने लिखी होगी ये लोक कविता...शायद किसी को नहीं मालुम?.....उस कवि ने भी अपने नाम की चिन्ता न की होगी। तब कोई आलोचक भी नहीं रहा होगा....लेकिन सालों से ये लोक कविता पीढी दर पीढी लोक की हवाओं में गुंजती रही है।
शायद लोक गीत की सबसे बड़ी विशेषता भी यही है कि......अनाम कवि की रचना होते हुए भी हर घर में देती है दस्तक।
आप भी देखिए...कैसे अभागा कागा नकबेसर लेकर भागा है...
नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,
उड उड कागा मोरी बिंदिया पे बैठा...बिंदिया पे बैठा.
अरे मोरे माथे का सब रस ले भागा,नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,
उड उड कागा मोरे नथुनी पे बैठा अरे नथुनी पे बैठा.
मोरे होंठ्वा का सब रस ले भागा,
नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,
उड उड कागा मोरे चोलिया पे बैठ, अरे चोलिया पे बैठा....
अरे जुबना का सब रस ले भागा, अरे जोबना का सब रस ले भागा
नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,
उड उड कागा मोरे करधन पे बैठा अरे करधन पे बैठा,
अरे मेरी जोबना का सब रस ले भागा मोरा
अरे नक्बेसर कागा ले भागा
अरे मोरा सैंयां अभागा ना जागा,
Tuesday, November 11, 2008
सामा-चकेवा में ही नहीं,हर जगह हैं चुगलखोर?

सामा-चकेबा में एक पात्र होता है चुगला। सबसे बड़ा चुगलखोर। यानी पीठ पीछे निंदा करने में माहिर। भाई बहन का अटूट प्यार, ननद-भौजाई की नोंक-झोंक तथा पति-पत्नी का अशेष प्रेम अभिव्यंजित करते लोक पर्व सामा-चकेबा में और भी कई पात्र दिलचस्प हैं।
मिथिला की औरतों के बीच काफी प्रचलित है सामा-चकेबा। कार्तिक शुक्ल पंचमी से शुरु होकर पूर्णिमा तक चलने वाला यह लोक पर्व उत्साह और उल्लास से पूरी तरह सरावोर है। यह पर्व मुख्यतः कुवांरी लड़कियों तथा नवविवाहिताओं में अधिक लोकप्रिय है। इसका सम्बन्ध मुख्य रूप से कृषि से है। इस लोक-नाट्य में भाई बहन का अटूट प्यार, ननद-भौजाई की नोंक-झोंक तथा पति-पत्नी का प्रेम अभिव्यंजित हुआ है। सामा बहन है चकेवा भाई। अन्य पात्र हैः चुगला, सतभइया, वन-तीतर, झाँझी, कुत्ता एवं वृन्दावन। इनमें चुगला सबसे दिलचस्प पात्र है। इसका अभिनय अत्यंत मनोरंजक होता है। चुगला वह व्यक्ति होता है जो किसी की पीठ पीछे निंदा करने में माहिर होता है, अथवा इधर-उधर लगा-बुझाकर अपना उल्लू सीधा करता है। हर समाज में इस तरह के चुगलखोर मिलते हैं। इस लोक-नाट्य का प्रमुख उद्देश्य भाई-बहन के हृदय में विशुद्ध प्रेम-भाव को दर्शाना उसे ताजा करना है। चुगला अपनी चुगलखोरी वृत्ति के कारण उनमें व्यवधान पैदा करता है। यही कारण है कि वहनें चुगला का उपहास करती है। चुगला की मूर्ति ऐसी बनायी जाती है जिससे वह मूर्ख दिखायी दे। उसकी कमर में आर-पार छेद करके सुतली लगा दी जाती है। इसको लड़कियाँ प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके सरकाती रहती हैं, जिसका मतलब उसे दंडित करना होता है। साथ हीं गाती हैं-
चुगला करे चुगलपन बिलइया करे म्याऊँ
ध.....के चुगला के फांसी दीउ
जतय हमार बाबा बइसे ततय चुगला चुगली करे
जनय हमार भइया बइसे तनय चुगला चुगली करे
ध.....के चुगला के फांसी दीउ।।
इसमें सतभइया नाम का एक महत्वपूर्ण पात्र होता है। सतभइया का अर्थ है सात भाई। इस पात्र के माध्यम से किसी विशेष भाई-बहन का गुणगान करके समस्त भाई-बहनों का गुणगान किया जाता है।
खँजन चिड़िया शरद् ऋतु में आती है। इस ऋतु की अग्रदूत मानी जाती है खँजन चिड़िया को इस लोकनाट्य में सर्वाधिक महत्व प्राप्त है। वन-तीतर की कल्पना इसलिए की गई है कि इस लोक-नाट्य का प्रदर्शन नदी किनारे-खेद या वन में होता है। कुत्ता एक पारिवारिक पशु है। झांझी कुत्ते की परिकल्पना का भी यही कारण है। जब कन्याएं, बहुएं सामा-चकेबा का गीत गाती हुई नदी-तालाब या खेतों की ओर जाती हैं तो यह कुत्ता भी उनके साथ अवश्य होता है। वृन्दावन वन विशेष का प्रतीक है। इसका मानवीकरण किया गया है। इसकी आकृति मनुष्य सी बनाई जाती है तथा इसकी देह में सींकीं खोंस दी जाती हैं। कन्याएँ जब गीत गाती हुई अभिनय के हेतु जाती हैं तब सींकी में आग लगाकर गाती हैं-
वृन्दावन में आगि लागल है केओ न बुझावय हे...
हमरो से फलाँ भइया....... से हे बुझावय हे........
इस लोक नाट्य में बहनें अपने भाई के स्वास्थय और समृद्धि की कामना लक्ष्मी माता का आह्वान करके करती हैं । और बदले में इस बात की कामना करती हैं कि जब वह दूर अपने ससुराल से कभी माता-पिता से मिलने के लिए आए तो भाई और भाभी उनका आदर करें, जाते समय कुछ-न-कुछ संदेश अवश्य दें, नहीं तो ससुराल में उसकी बेइज्जती हो जाएगी। इस लोक पर्व में कहीं-कहीं नारियों की समाज में जो वास्तविक स्थिति है वह दर्शाती हैं।
सामा-चकेवा के अभिनय काल में कुवांरी लड़कियाँ चंगेरे में मिट्टी के विभिन्न पात्रों को रखकर, दीप जलाकर अपने-अपने सिर पर रखकर खेतों की ओर नाचती-गाती निकल पड़ती हैं और वहां रखकर अभिनय करती हैं। कृष्ण की बाँसुरी बजाती हुई मूर्ति को केन्द्र में रखकर शेष पात्रों को गोलाकार रख दिया जाता है। इसके उपरान्त लड़कियाँ नाचती-गाती हैं। इस अभिनय में कथोपकथन बहुत स्पष्ट रूप में नहीं होता है बल्कि सामूहिक रूप से गाये जानेवाले गीत संवादयुक्त होते हैं। मिट्टी के बने पात्र कन्याओं के माध्यम से प्रतीक रूप में अभिनय में भाग लेते हैं। खेतों में अभिनय की यह क्रिया सम्पन्न होने का तात्पर्य है- उपज में दृद्धि। अंतिम तिथि को जुते खेत में सामा को नया चूड़ा,दही,गुड़ आदि का भोजन कराया जाता है, उसके बाद उसे विसर्जित कर दिया जाता है। यह नृत्य नाट्य मिथिला के सभी वर्गों में लोकप्रिय है।
-प्रीतिमा वत्स
Monday, November 3, 2008
आक विवाह, आम और महुए से विवाह,कैसे-कैसे विवाह?
उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों में पहले वृक्ष विवाह किया जाता है। इनमें वर का विवाह पहले आम के पेड़ से होता है तथा कन्या का विवाह महुए के पेड़ से होता है। पुष्प विवाह- गुजरात में कुनबी आदिवासियों में पुष्प विवाह की प्रथाएं प्रचलित हैं। यहां लड़की का विवाह पहले पुष्पों से किया जाता है। विवाह योग्य कन्या को यदि उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। फिर विधि विधान से उस गुच्छे को किसी जलाशय में डाल दिया जाता है। इस रिवाज के बाद लड़की को सदा सुहागन माना जाता है। बाद में जब कभी वर मिल जाता है तो लड़की का विवाह कर दिया जाता है। यदि उस लड़की का वर कभी मर भी जाता है तो भी उसे विधवा नहीं माना जाता है क्योंकि सदा सुहागन तो वह पहले ही हो चुकी है।
आम और महुए से विवाहः- गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों में कुरमी जातियों में पहले वृक्ष विवाह किया जाता है। इनमें वर का विवाह पहले आम के पेड़ से होता है तथा कन्या का विवाह महुए के पेड़ से होता है। विवाह के समय लड़के को दृक्ष के समीप खड़ा कर दिया जाता है उसके बाद लड़के तथा वृक्ष को सूत से बांध दिया जाता है। बाद में पत्तों से बनी माला वर के गले में डालकर वर को वृक्ष से मुक्त किया जाता है। वृक्ष से मुक्त होकर वर पेड़ पर सिन्दूर के टीके लगाता है। दूसरी ओर कन्या का विवाह भी महुए के पेड़ के साथ कर दिया जाता है। इसके बाद हीं लड़के -लड़की का विवाह किया जाता है।
इही संस्कार विवाह- पड़ोसी देश नेपाल में नेवार जाति है। नेवार जाति में लड़की का विवाह पहले किसी आदमी से नहीं किया जाता है बल्कि भगवान नारायण की प्रतिमा से होता है। इस विवाह को सुवर्ण विवाह, प्रतिमा विवाह या इही कहा जाता है। इस विवाह में लड़की की उम्र 5 से 8 होती है। यानि युवावस्था आने से पूर्व यह संस्कार पूरा किया जाता है। नेवार जाति में इही संस्कार बड़ा ही पवित्र माना जाता है। और इसको देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं।
आक विवाह- उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ब्राह्मणों का आक से विवाह की प्रथा प्रचलित है। यदि किसी पुरुष की मृत्यु हो जाती है और वह दूसरा विवाह करना चाहता है। तब उसका विवाह पहले आक के पौधों से किया जाता है। लोग वर को निवास स्थान से दूर खेतों के बीच जन्में आक के पौधे के पास ले जाते हैं। पौधे के पास ही विवाह की वेदी बनाई जाती है वहाँ विवाह सम्पन्न होता है। लोगों का ऐसा कहना है कि आक से विवाह होने के थोड़े दिन बाद लड़के का विवाह लड़की से कर दिया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
Saturday, November 1, 2008
अबके बरस में महंगा भइले गेहुँआ

चारों तरफ ढोल -बाजों का आवाजें हैं। लाउडस्पीकर में भोजपूरी भाषा में शारदा सिन्हा की आवाज में,
ले ले अइहो हो भइया गेहूँ के मोटरिया..., आ गइले हो उजे छठ के बरतिया।
अबके बरस में महंगा भइले गेहुँआ......., छोड़ी दही गे बहिना छठ के बरतिया।।
जैसे गीतों से वातावरण गुंजायमान हो रहा है।
हर गली से झुंड में सजे हुए नर-नारी तथा उछलते कूदते बच्चे किसी जलाशय की तरफ चले जा रहे हैं। जी हाँ ............यह छठ पूजा का उत्सव है। जो बिहार,झारखंड तथा उससे सटे हुए कुछ इलाकों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हाल के कुछ वर्षों में इस पर्व की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। लोक पर्व से यह अब एक महापर्व हो चला है।
कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथी को छठ का पर्व मनाया जाता है। बिहार और झारखंड में यह पर्व सदियों से मनाया जाता रहा है। सूर्य भगवान को समर्पित यह व्रत स्त्रियाँ अपने पति व बच्चों की सलामती तथा स्वास्थय की कामना से करती हैं। कुछ इलाके में इस व्रत को पुरूष भी करते हैं । इस व्रत को करने का विधान भी बड़ा रोचक है। प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत होकर व्रती एक दिन-रात का निर्जल व्रत रखते है। संध्या के समय किसी नदी या सरोवर के पास जाकर अस्त होनेवाले सूर्य की विधिवत पूजा करते हैं कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। बांस के सूप में नारियल, सेब, नारंगी आदि फलों के विभिन्न प्रकार के पकवान सूर्य भगवान को चढ़ाए जाते हैं।जलाशय के किनारे गन्ने,केले तथा अदरक के पौधे से गेट सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद व्रती अपने-अपने घर चले आते हैं तथा रातभर जागकर हर पहर उठ-उठकर सूर्य भगवान की प्रार्थना करते हैं। फिर दूसरे दिन सप्तमी को प्रातःकाल सूर्योदय होने पर स्नान करके सूर्य भगवान को नियम पूर्वक अर्ध्य प्रदान करते हैं। और तब पारण करते हैं।
-प्रीतिमा वत्स
Monday, October 27, 2008
क्यों कभी जवान नहीं हुए भगवान कार्तिकेय ?
कथा पुरानी है....जुए से जुड़ी है। जुए के खेल की वजह से पार्वती जी ने शंकर जी को यह शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ हमेशा उनके सिर पर बना रहेगा। नारद जी को शाप दिया कि तुम धूर्तता करते हो, अतः कभी एक स्थान पर दो घड़ी के लिए भी जमकर नही बैठ सकोगे। भगवान् विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा परम शत्रु होगा। रावण को शाप दिया कि तुम्हारा विनाश यही विष्णु करेंगे। कार्तिकेय को शाप दिया कि तुम कभी जवान नहीं होगे।
एक बार शंकर जी ने पार्वती से जुआ खेलने का अभिलाशा की। संयोगवश खेल में शंकर जी अपना सब कुछ हार गए और पार्वती ने उनसे उनका सब सामान हीं नहीं उनका वाहन-नन्दी, व्याध्र चर्म, सर्प आदि सब कुछ ले लिया। शंकर जी को इससे ग्लानि हुई । वे उदास होकर पत्तों के वस्त्र पहन कर गंगा नदी के तट पर चले गए। कार्तिकेय को जब पिता की चिन्ता का पता लगा ते उन्होंने कारण पूछा। शंकर जी ने जब सबकुछ बताया तो वे सब वस्तुएँ वापस लेने के लिए माता के पास वापस आए और जूए के लिए कहा। इस बार पार्वती जी हार गईं और कार्तिकेय जी शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। पार्वती जी को अब चिन्ता होने लगी क्योंकि पराजित भी हुईं और शंकर जी भी चले गए। उसी समय गणेश जी उनके पास पहुँचे। पार्वती जी को गणेश जी विशेष प्रिय थे। अतः पार्वती जी ने अपना दुख उनसे कह दिया। इसबार गणेश जी अपने पिता से जुआ खेलने पहुँचे। वे जीत गए और आकर अपने विजय की सूचना अपनी माता को दी। पार्वती जी प्रसन्न हुईं परंतु बोली तुम्हे अपने पिता को लेकर आना चाहिए था।
गणेश जी पिता की खोज में निकल पड़े। शंकर जी से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। वे कार्तिकेय तथा विष्णु भगवान के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। वे पार्वती जी से बहुत नाराज थे और उनके पास नहीं जाना चाह रहे थे। इसलिए गणेश जी के आने से वे प्रसन्न नहीं हुए। शंकर जी की इच्छा को जानकर उनके भक्त रावण ने बिल्ली का रूप धारणकर गणेश जी के वाहन चूहे को डरा दिया। चूहा गणेश जी को गिराकर अपनी जान लेकर भागा। तब गणेश जी अपना भारी-भरकम शरीर लेकर धीरे-धीरे चलने लगे। इधर शंकर जी की इच्छा से विष्णु भगवान ने पासा का रूप धारण किया। इसी वीच गणेशजी ने शंकर जी के समीप पहुँचकर माता का सन्देश कहा। तब महादेव ने उनसे कहा कि हमने नया पासा बनवाया है, यदि तुमाहारी माँ फिर से खेलने के लिए राजी हों तो मैं चल सकता हूँ। गणेश जी ने जब आश्वासन दिया तब शंकर जी पार्वती जी के पास अपने दल-बल के साथ वापस आए। शंकर जी ने आते हीं पार्वती से खेलने के लिए कहा और अपने नये पासे की चर्चा की। पार्वती जी ने हँस कर कहा आपके पास है क्या चीज जिससे खेला जाएगा। यह सुनकर शंकर जी चुप हो गए। नारद जी अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हे दे दी। इस बार महादेव हर बार जीतने लगे। एक- दो पासे के बाद गणेश जी को उनके कपट का पता चल गया और उन्होने अपनी माँ को यह बात बता दी। पार्वती जी को बहुत क्रोध आ गया । रावण ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन उनका क्रोध शांत नहीं हुआ और उन्होंने शंकर जी को यह शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ हमेशा उनके सिर पर बना रहेगा। नारद जी को शाप दिया कि तुम धूर्तता करते हो, अतः कभी एक स्थान पर दो धड़ी के लिए भी जमकर नही बैठ सकोगे। भगवान् विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा परम शत्रु होगा। रावण को शाप दिया कि तुम्हारा विनाश यही विष्णु करेंगे। कार्तिकेय को शाप दिया कि तुम कभी जवान नहीं होगे।
पार्वती का शाप सुनकर सभी लोग चिन्तित हो उठे। तब नारद जी ने अपनी सरल और हँसने-हँसाने वाली प्रकृति से सवका मनोरंजन किया। वे नाचने-कूदने और गाने-बजाने लगे। नारद की इस सूझ पर पार्वती जी का भी क्रोध दूर हो गया। नारद पर परम प्रसन्न होकर वह उनसे वरदान मांगने को कहने लगी। नारद जी ने कहा वरदान तो मैं तभी लूंगा जब सबको मिलेगा। पार्वती जी सहमत हो गईं। तब शंकर जी ने मांगा कि आज कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा है, अतः आज के दिन जो कोई जूआ मे विजयी हो वह वर्ष भर सदा विजयी रहे। विष्णु भगवान ने कहा कि मैं चाहे कोई छोटा काम करूँ या बड़ा सब पूरा हो। कार्तिकेय ने कहा यदि मुझे बालक ही बना रहना है तो मेरी इच्छा यही है कि मुझे विषय-वासना का संसर्ग न हो और सदा मेरा मन तपस्या और साधना में लीन रहे। रावण ने वेदों की सुविस्तृत व्याख्या का वरदान मांगा और शिवजी की अविचल भक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने सब से प्रथम पूजा प्राप्त करने का वरदान मांगा। सबसे अन्त में नारद ने देवर्षि होने की इच्छा प्रकट की। पार्वती जी ने सबकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया, जिससे सभी प्रसन्न हो गए।
-प्रीतिमा वत्स
एक बार शंकर जी ने पार्वती से जुआ खेलने का अभिलाशा की। संयोगवश खेल में शंकर जी अपना सब कुछ हार गए और पार्वती ने उनसे उनका सब सामान हीं नहीं उनका वाहन-नन्दी, व्याध्र चर्म, सर्प आदि सब कुछ ले लिया। शंकर जी को इससे ग्लानि हुई । वे उदास होकर पत्तों के वस्त्र पहन कर गंगा नदी के तट पर चले गए। कार्तिकेय को जब पिता की चिन्ता का पता लगा ते उन्होंने कारण पूछा। शंकर जी ने जब सबकुछ बताया तो वे सब वस्तुएँ वापस लेने के लिए माता के पास वापस आए और जूए के लिए कहा। इस बार पार्वती जी हार गईं और कार्तिकेय जी शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। पार्वती जी को अब चिन्ता होने लगी क्योंकि पराजित भी हुईं और शंकर जी भी चले गए। उसी समय गणेश जी उनके पास पहुँचे। पार्वती जी को गणेश जी विशेष प्रिय थे। अतः पार्वती जी ने अपना दुख उनसे कह दिया। इसबार गणेश जी अपने पिता से जुआ खेलने पहुँचे। वे जीत गए और आकर अपने विजय की सूचना अपनी माता को दी। पार्वती जी प्रसन्न हुईं परंतु बोली तुम्हे अपने पिता को लेकर आना चाहिए था।
गणेश जी पिता की खोज में निकल पड़े। शंकर जी से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। वे कार्तिकेय तथा विष्णु भगवान के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। वे पार्वती जी से बहुत नाराज थे और उनके पास नहीं जाना चाह रहे थे। इसलिए गणेश जी के आने से वे प्रसन्न नहीं हुए। शंकर जी की इच्छा को जानकर उनके भक्त रावण ने बिल्ली का रूप धारणकर गणेश जी के वाहन चूहे को डरा दिया। चूहा गणेश जी को गिराकर अपनी जान लेकर भागा। तब गणेश जी अपना भारी-भरकम शरीर लेकर धीरे-धीरे चलने लगे। इधर शंकर जी की इच्छा से विष्णु भगवान ने पासा का रूप धारण किया। इसी वीच गणेशजी ने शंकर जी के समीप पहुँचकर माता का सन्देश कहा। तब महादेव ने उनसे कहा कि हमने नया पासा बनवाया है, यदि तुमाहारी माँ फिर से खेलने के लिए राजी हों तो मैं चल सकता हूँ। गणेश जी ने जब आश्वासन दिया तब शंकर जी पार्वती जी के पास अपने दल-बल के साथ वापस आए। शंकर जी ने आते हीं पार्वती से खेलने के लिए कहा और अपने नये पासे की चर्चा की। पार्वती जी ने हँस कर कहा आपके पास है क्या चीज जिससे खेला जाएगा। यह सुनकर शंकर जी चुप हो गए। नारद जी अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हे दे दी। इस बार महादेव हर बार जीतने लगे। एक- दो पासे के बाद गणेश जी को उनके कपट का पता चल गया और उन्होने अपनी माँ को यह बात बता दी। पार्वती जी को बहुत क्रोध आ गया । रावण ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन उनका क्रोध शांत नहीं हुआ और उन्होंने शंकर जी को यह शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ हमेशा उनके सिर पर बना रहेगा। नारद जी को शाप दिया कि तुम धूर्तता करते हो, अतः कभी एक स्थान पर दो धड़ी के लिए भी जमकर नही बैठ सकोगे। भगवान् विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा परम शत्रु होगा। रावण को शाप दिया कि तुम्हारा विनाश यही विष्णु करेंगे। कार्तिकेय को शाप दिया कि तुम कभी जवान नहीं होगे। पार्वती का शाप सुनकर सभी लोग चिन्तित हो उठे। तब नारद जी ने अपनी सरल और हँसने-हँसाने वाली प्रकृति से सवका मनोरंजन किया। वे नाचने-कूदने और गाने-बजाने लगे। नारद की इस सूझ पर पार्वती जी का भी क्रोध दूर हो गया। नारद पर परम प्रसन्न होकर वह उनसे वरदान मांगने को कहने लगी। नारद जी ने कहा वरदान तो मैं तभी लूंगा जब सबको मिलेगा। पार्वती जी सहमत हो गईं। तब शंकर जी ने मांगा कि आज कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा है, अतः आज के दिन जो कोई जूआ मे विजयी हो वह वर्ष भर सदा विजयी रहे। विष्णु भगवान ने कहा कि मैं चाहे कोई छोटा काम करूँ या बड़ा सब पूरा हो। कार्तिकेय ने कहा यदि मुझे बालक ही बना रहना है तो मेरी इच्छा यही है कि मुझे विषय-वासना का संसर्ग न हो और सदा मेरा मन तपस्या और साधना में लीन रहे। रावण ने वेदों की सुविस्तृत व्याख्या का वरदान मांगा और शिवजी की अविचल भक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने सब से प्रथम पूजा प्राप्त करने का वरदान मांगा। सबसे अन्त में नारद ने देवर्षि होने की इच्छा प्रकट की। पार्वती जी ने सबकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया, जिससे सभी प्रसन्न हो गए।
-प्रीतिमा वत्स
Wednesday, September 17, 2008
गरुड़ को भी दया आ गई

पिछले पोस्ट में मैंने जिउतिया व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा के बारे में बताया था। परंतु जिउतिया व्रत की एक पौराणिक कथा भी है। जो मैं अपने इस पोस्ट में बताने जा रही हूँ।
प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक का एक राजा था । बह बहुत धर्मात्मा, परोपकारी, दयालु, न्यायप्रिय तथा प्रजा को पुत्र की भाँति प्यार करने वाला था। एक बार शिकार करने के लिए मलयगिरि पर्वत पर गए। वहाँ उनकी भेंट मलयगिरि की राजकुमारी मलयवती के हो गई,जो कि वहाँ पर पूजा करने के लिए सखियों के साथ आई थी। दोनों एक दूसरे को पसंद आ गए। वहीं पर मलयवती का भाई भी आया हुआ था। मलयवती का पिता बहुत दिनों से जीमूतवाहन से अपनी बेटी का विवाह करने का चिन्ता में था। अतः जब मलयवती के भाई को पता चला कि जीमूतवाहन और मलयवती एक दूसरे को चाहते हैं तो वह बहुत खुश हुआ, और अपने पिता को यह शुभ समाचार देने के लिए चला गया।
इधर मलयगिरि की चोटियों पर घूमते हुए राजा जीमूतवाहन ने दूर से किसी औरत के रोने की आवाज सुनी। उनका दयालु हृदय विह्वल हो उठा। वह उस औरत के समीप पहुँचे। उससे सानुरोध पूछने पर पता चला कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके एकलौते पुत्र शंखचूर्ण को आज गरुड़ के आहार के लिए जाना पड़ेगा। नागों के साथ गरुड़ का जो समझौता हुआ था उसके अनुसार मलयगिरि के शिखर पर रोज एक नाग उनके आहार के लिए पहुँच जाया करता था। शंखचूर्ण की माता की यह विपत्ति सुनकर जीमूतवाहन का हृदय सहानुभूति और करुणा से भर गया, क्योंकि शंखचूर्ण ही उसके बुढ़ापे का एक मात्र सहारा था।
जीमूतवाहन ने शंखचूर्ण का माता को आश्वासन दिया कि- माता आप चिंता न करें मैं स्वयं आपके बेटे के स्थान पर गरुड़ का आहार बनने को तैयार हूँ।
जीमूतवाहन ने यह कहकर शंखचूर्ण के हाथ से उस अवसर के लिए निर्दिष्ट लाल वस्त्र को लेकर पहन लिया और उसकी माता को प्रणाम कर विदाई की आज्ञा माँगी। नाग माता आश्चर्य में डूब गई। उसका हृदय करुणा से और भी बोझिल हो उठा उसने जीमूतवाहन को बहुत कुछ रोकने की कोशिश की, किन्तु वह कहाँ रुक सकता था। उसने तुरंत गरुड़ के आहार के लिए नियत पर्वत शिखर का मार्ग पकड़ा और माँ-बेटे आश्चर्य से उसे जाते हुए देखते रह गए।
उधर समय पर गरुड़ जब अपने भोजन-शिखर पर आया और बड़ी प्रसन्नता से इधर-उधर देखते हुए अपने भोजन पर चोंच लगाई तो उसकी प्रतिध्वनि से संपूर्ण शिखर गूँज उठा। जीमूतवाहन के दृढ़ अंगों पर पड़कर उसकी चोंच को भी बड़ा धक्का लगा। यह भीषण स्वर उसी धक्के से उत्पन्न हुआ था। गरुड़ का सिर चकराने लगा। थोड़ी देर बाद जब गरुड़ को थोड़ा होश आया तब उसने पूछा- आप कौन हैं। मैं आपका परिचय पाने के लिए बेचैन हो रहा हूँ।
जीमूतवाहन अपने वस्त्रों में उसी प्रकार लिपटे हुए बोले , पक्षिराज मैं राजा जीमूतवाहन हूँ, नाग की माता का दुख मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मैं उसकी जगह आपका भोजन बनने के लिए आ गया हूँ, आप निःसंकोच मुझे खाइए।
पक्षिराज जीमूतवाहन के यश और शौर्य के बारे में जानता था,उसने राजा को बड़े सत्कार से उठाया और उनसे अपने अपराधों की क्षमा-याचना करते हुए कोई वरदान माँगने का अनुरोध किया।
गरुड़ की बात सुनकर प्रसन्नत्ता और कृतज्ञता की वाणी में राजा ने कहा- मेरी इच्छा है कि आपने आज तक जितने नागों का भक्षण किया है, उन सबको अपनी संजीवनी विद्या के प्रभाव से जीवित कर दें, जिससे शंखचूर्ण का माता के समान किसी की माता को दुःख का अवसर न मिले।
राजा जीमुतवाहन की इस परोपकारिणी वाणी मे इतनी व्यथा भरी थी कि पक्षिराज गरुड़ विचलित हो गए। उन्होंने गदगद कंठ से राजा को वचन पूरा होने का वरदान दिया और अपनी अमोघ संजीवनी विद्या के प्रभाव से समस्त नागों को जीवित कर दिया।
इसी अवसर पर राजकुमारी मलयवती के पिता तथा भाई भी जीमूतवाहन को ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गए थे । उन लोगों ने बड़ी धूमधाम से मलयवती के साथ जीमूतवाहन का विवाह भी कर दिया।
यह घटना आश्विन महीने के कृष्ण अष्टमी के दिन ही घटित हुई थी, तभी से समस्त स्त्री जाति में इस त्यौहार की महिमा व्याप्त हो गई। तब से लेकर आज तक अपने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना करते हुए स्त्रियाँ बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से इस व्रत को पूरा करती हैँ।
-प्रीतिमा वत्स
Tuesday, September 9, 2008
कर्ण का पुनर्जन्म

आश्विन महीने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन पितृपक्ष के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं।पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है।
अंगराज कुंती पुत्र कर्ण परम दानी था। वह नित्य सवा मन सोना विद्वान, सदाचारी एवं कुलीन ब्राह्मणों को दान करता था, किन्तु सोने के साथ किसी अन्य वस्तु का दान नहीं करता था। जब उसकी मृत्यु हुई तो वह अपने अच्छे कर्मों की वजह से स्वर्ग लोक में पहुँचा। मृत्यु लोक में दिए गए सोने के दान के फलस्वरूप उसे स्वर्ग में एक स्वर्ण निर्मित आलीशान महल रहने को मिला, किन्तु उसके भीतर और कुछ भी नहीं था। कर्ण को यह देखकर बड़ा दुख हुआ, किन्तु अब हो ही क्या सकता था। महल के रक्षकों ने उन्हे बताया कि मनुष्य मृत्यु लोक में जो कुछ दान करता है, वही उसे यहाँ प्राप्त होता है। कर्ण ने देवराज और यमराज से प्रार्थना करके कहा कि एक पक्ष के लिए उन्हे पुनः धरती पर वापस भेजा जाय, जिससे वे अपने छूटे हुए कर्मों को पूरा कर सके। कर्ण की प्रार्थना स्वीकृत हो गई। फिर तो धरती पर आकर कर्ण ने पंद्रह दिनों तक बड़े संयम और सदाचार से विविध प्रकार की वस्तुओं के दान किए, उसके बाद पुनः कर्ण का स्वर्गवास हुआ। इन पंद्रह दिनों के जीवन में वे दान पुण्य करने में इतने अधिक व्यस्त थे कि हजामत भी नहीं करा सके। उनके इस जीवन के अच्छे कर्मों का फल यह हुआ, कि अब की बार उन्हें स्वर्ग में सब प्रकार के सुख मिले।
कहा जाता है कि दानी कर्ण के पुनर्जीवन के ये पंद्रह दिन इसी पितृपक्ष के थे। तभी से पितृपक्ष में संयम, सदाचार एवं दानादि की अपार महिमा बताई गई है।
-प्रीतिमा वत्स
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