Saturday, January 21, 2023
Aangan me Tulsi Chaura (एंगना मॅ तुलसी चौरा)
Tuesday, November 1, 2022
JANANIYE HATHON MA CHAI LOK KE Dor (Angika)
Angika ma aalekh -
जनानिये हाथों मं छै लोक केरो डोर
आज के बदललो परिवेश मं यदि हम्म मोटो तौर पर एक नजर डालै छिये त एहनो
लागय छै कि ‘हाय रे बाप है त पूरा तरह सं विज्ञान युग होय गेलै।’ आरो वैज्ञानिक युग मं त हर चीज कॅ प्रमाण के कसौटी पर खरा उतरै ल
लागय छै जे कि लोक जीवन मं संभव नाय छै। लोक जीवन त मोटा-मोटी एक मौखिक आरो वाचिक
परंपरा पर आधारित छै। आरो एक पीढ़ी सं दोसरो पीढ़ी मं सुनी बुझी कं विरासत नाकी आगूं
बढ़लो जाय छै। है त होल्हों किताबी बात, हेकरा सं एकदम उलटा एक सच योहो छै कि
आभियो जौं तोहों गांवो घरो के रोजको जिनगी मं हुलकभौ त पता चलथौं कि लोक जीवन त
एकदमें नाय बदललो छै। है आपनो मजबूत जड़ो के साथं एकदम लहलहाय आरो फली-फूली रहलो
छै। लोक जीवन आरो लोक संस्कृति के है मजबूती के कारण जानै के कोशिश करभौ त जनानिये
हाथों म तोरा हेकरो डोर नजर ऐथों।
हर परंपरा हर संस्कृति क ओना त जीयै छै समाज के हर तबका के हर
आदमी,बूढ़ो,बच्चा। सभै के आपनो-आपनो भागीदारी रहै छै, जेकरा सभैं नं आपनो-आपनो
हिसाबों सं निभाय के कोशिश करै छै। लेकिन मुख्य भूमिका त जनानी ही निभाय रहलो छै। हेकरो
कई कारण होय ल पारैय छौ। रोजी-रोटी के खोज मं मरदाना सिनी त गांव जबार सं बाहर चलो
जाय छेलै आरो गामों मं रही जाय छेलै जनानी आरो बच्चा त परंपरा त जनानिये निभैतियै
नी। एक कारण हेकरो आरो नजर आबै छै कि शुरू सं हीं ज्यादातर घरेलू काम काज के
जिम्मेदारी जनानी के हीं हाथों मं रहै छै। मरदाना घरेलू कामों मं ज्यादा नाय पड़ैल
चाहे छै, भरसक यहू वास्तं सब जिम्मेदारी निभैते-निभैते जनानी सं अनजाने हीं एतना
महत्वपूर्ण काम होय गेलै।
लोक परंपरा आरो लोक विरासर
के एक पीढ़ी सं दोसरो पीढ़ी मं हस्तांतरित होय के क्रम मं कहियो- काल परिस्थिति
आरो माहौल के अनुसार कुछ लोक देवी-देवता या परंपरा के छवि कुछ मद्धिम पड़ी जाय छै।
कै बार कोय नया देवी-देवता के पूजा आरो नैम धरम सामना मं आबी जाय छै। 33 हजार
करोड़ देवी-देवता के मान्यता वाला लोक संसार मं है त संभव नाय छै नि की सब
देवी-देवता के पूजा-पाठ आरो मान्यता हर समय समान रूपो सं ही होय ल पारैय। यही
वास्तं शायद बेरा बखत के हिसाबो सं सब लोक देवी-देवता के पूजा पाठ आरो महत्ता कम
बेसी होतं रहै छै।
समय के साथं-साथं जग्घा पर भी बहुत कुछ निर्भर होय छै। कोय इलाका मं
बनदेवी माय के पूजा ज्यादा होय छै, कोय इलाका मं सती बिहुला माय के त कोय इलाका मं
कोयला माय के। यहा रंग अलग-अलग इलाका मं कुछ खास लोक देवी-देवता के पूजा प्रचलित
छै।
लेकिन पूजा चाहे कोय इलाका मं हुअ, भिनसरियां उठी क कार्तिक नहाना हुअ या सांझ के बाती दिखाना हुअ, पूजा के थाल ज्यादातर जनानीये हाथों मं नजर ऐथों। दक्खिन भारत मं भी यहा हाल देखलिऐ। सूर्योदय सं पहिनै उठी क पूरा घोर साफ-सुथरा करी क घरो के आगूं रंगोली जनानिये बनाय छै करीब-करीब सब घरो मं। राजस्थान के गामों घरो मं आभियो कोस-कोस भर दूर सं भिनसरियैं उठी क पियै के पानी लानना जनानीये के काम छै। जरूरत के साथं-साथं है वहां के परंपरा आरो संस्कृति के एक हिस्सा भी होय गेलो छै।
लाख पंडित पुरोहित रहै लेकिन गामो घरो मं आभियो कोय नेम धरम के बात पूछना हुअ त कोय बूढ़ो-बिरधो काकी या दादी के बात हीं पहिनै मानलो जाय छै। लोक साहित्य के एक बहुत बड़ो ज्ञानी पुरूख राजेन्द्र धस्माना जी न एक जगह कहनं छै कि, “साहित्य के असली जोड़ लोक मं छै आरो लोक स्त्री के उपस्थिति के बिना अधूरा छै। यै वास्तं साहित्य मं स्त्री के उपस्थिति क खोजै वाला क भी लोक साहित्य मं स्त्री क पहिने देखना चाहियो।” है त बिल्कुल सच बात छै कि परंपरा स लैक मानवीय रिश्ता तक सब स्त्री के जन्मजात गुण के तरह छै। जनानी के अति उदार स्वाभाव आरो सुख-दुख क बहुत करीब सं झेलै के कारण हीं सांस्कृतिक चेतना भी हुनका मं ज्यादा होय छै। भरसक यहा कारण छै कि जनानी लोक जीवन के अगुआई करै मं ज्यादा निपुण साबित होय छै। यही वास्तं लोक कथा, पहेली, फेकड़ा, लोकगीत आरो तमाम मौखिक सांस्कृतिक धरोहर क आत्मसात करै म आरो होकरा आगूं बढाय मं जनानी के हमेशा महत्वपूर्ण योगदान रहलो छै।
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Wednesday, October 26, 2022
Sunday, March 6, 2022
Tuesday, December 28, 2021
Tuesday, July 20, 2021
सूर्य को समर्पित एक अंगिका लोक गीत
खाड़ भेलैय मड़वा
अँगनमा, हाथे सोवरणों केरो साट हो।
यही साटे मारवो रे
भगता, हमरो भोजनमा देने जाहो हे।
कर जोरी ठाड़ो भेलै
भगता जे सभे भगता,
तोहरो भोजनमा हो
सूरुजदेव हलसी क दियबो,
हमरो आशिष देने जाह
हो।
बाढ़ियो संतति, बाढ़ियो
संपत्ति, बाढ़ियो कुल परिवार हो।
सूर्य को समर्पित इस
अंगिका लोकगीत में यह वर्णन किया गया है कि सोने के खड़ाऊँ पहन कर सोने के रथ पर
सवार सूर्य देव अपने भक्तों के पास आते हैं। दर्शन देने के उपरान्त भोजन की मांग
करते हैं। भक्त जो उनके दर्शन पाकर हीं निहाल हो रहे हैं, कहते हैं कि हे प्रभू
आपका भोजन तो हम खुश होकर देंगे। यह तो हमारे लिए सौभाग्य की बात है, आप कृपा करके
हम भक्तों को आशीर्वाद देते जाइए।
सूर्य देव उन्हें
आशीर्वाद देते हैं – तुम्हारी सम्पत्ति का विस्तार हो.......
तुम्हारे संतति
(वंश) का विस्तार हो............
तुम्हारे कुल और
परिवार का विस्तार हो..................।
(यह गीत हर शुभ अवसर
पर खासकर शादी, उपनयन, मुंडन आदि पर सबसे पहले गाया जाता है।)
मूल अंगिका गायिका-
दुर्गा देवी.
अनुवाद- प्रीतिमा वत्स
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Sunday, November 1, 2020
लोक देवी विषहरी (FOLK GODDESSES VISHAHRI)
लोक देवी-देवताओं की
पूजा और जड़ी-बूटियों के सहारे कितनी कामयाबी मिलती है यह तो विवाद का विषय है,
लेकिन लोक में यह नुस्खा बहुत ही लोकप्रिय और सर्वमान्य है।
आज हम यहाँ पर
विषहरी देवी के बारे में विस्तार से वर्णन करेंगे-
विषहरी बड़ दुलरी,
विषहरी बड़ दुलरी।
कहाँ शोभे बाजू-बंदा
कहाँ टिकुली-2
कहाँ शोभे विषहरी
माय के लाल चुनरी
कहाँ शोभे विषहरी
माय के लाल चुनरी,
विषहरी बड़ दुलरी,
विषहरी बड़ दुलरी।
जैसा कि नाम से हीं
स्पष्ट हो रहा है, विष का हरण करने वाली देवी हैं विषहरी। लोक में देवी विषहरी की
पूजा बड़े ही धूमधाम के साथ किया जाता है। सर्परूप में होने के बावजूद विषहरी देवी
की पूजा सर्पदंश की पीड़ा से मुक्ति के लिए की जाती है। बिहार और झारखंड में
प्रायः हर गांव के मुहाने पर इनका मंदिर होता है। ग्राम देवता की सलाना पूजा के
साथ इनकी भी पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि गांव के मुहाने पर इनकी उपस्थिति से
गांव आपद-विपद से मुक्त रहता है। महामारी और प्राकृतिक आपदा से यह गांव वासियों की
रक्षा करती हैं। गांव के लोग इनकी अराधना अपने हर शुभ कार्य के पहले करते हैं।
शादी-ब्याह, उपनयन, मुंडन आदि में इनकी पूजा का विशेष विधान रहता है। इनकी पूजा का
विधान भी कुछ अलग सा हीं है। इन्हें गाय का कच्चा दूध चढाया जाता है। साथ में कागज
से बना एक खास तरह का मंजुषानुमा झांपी या मड़री चढ़ाया जाता है। सलाना पूजा के
समय चावल को पीसकर गुड़ के साथ मिलाकर एक खास तरह का पीठा बनाया जाता है, जो
इन्हें भोग लगता है। तब इनका आँचल भी बदला जाता है। घी में सिंदूर को मिलाकर इनका
श्रृंगार किया जाता है। यह पूजा नियत भगत की पत्नी या उसी परिवार की कोई महिला
करती है। पूजा में उपयोग किया गया सिंदूर
का घोल प्रसाद के रूप में वहाँ उपस्थित सभी सुहागन महिलाओं को भी पहनाया जाता है।
साथ में कई तरह से देवी की स्तुति की जाती है, जिसे मनान गीत कहा जाता है-
खेल चार चौमास हे
विषहरी
वहाँ से चली भेली हे
विषहरी
कणुआ घर आवास हे
विषहरी।
कणुआ के बेटा
उत्पाती हे विषहरी
लावा छीटी परैलखौं
हे विषहरी-2
पांचो बहिनी कुमारी
हे विषहरी
खेल चार चौमास हे
विषहरी-2
देवी विषहरी की पूजा
का महत्व सती बिहुला की पूजा में भी किया गया है।
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-प्रीतिमा
वत्स
Monday, October 19, 2020
देवी गीत (Goddess song)
आजू रे सुदिन दिन
मैया अएथिन अँगना-2
जौ हम जनिता मैया
अएथिन
दुध से निपौती अँगना।
मैया अएथिन अँगना,
महामाया देवी अएथिन
अँगना।
आजू रे
सुदिन....................।
किए माँ को बईसन
दियबै,
किये रे ओठगनवा।
आजू रे सुदिन............।
कलशा माँ को बईसन
दियबै,
पिंडी रे ओठगनवा।
आजू रे
सुदिन..........
किये माँ को पहिरन
दियबै
किये रे ओढनवा,
आजू रे सुदिन......
पटोरी माँ को पहिरन
दियबै
चुनरी रे ओढनवा,
आजू रे
सुदिन...........
किये माँ को भोजन
दियबै
किये रे ओठ रंगना,
खीर माँ को भोजन
दियबै
पान रे ओठ रंगना
आजू रे सुदिन
...............
किये माँ के सिंगारी
में
किये रे सुमिरनवा।
सिंदूर माँ के सिंगारी
में,
चंडी पाठ से
सुमिरनवा।
आजु रे सुदिन दिन
मैया अएथिन अँगना।-2
यह एक अँगिका लोक गीत
है. इसमें माँ दुर्गा के आगमन से भक्तों में होनेवाली खुशी को दर्शाया गया है-
आज का दिन बहुत हीं
शुभ है, आज माँ हमारे आँगन में आनेवाली हैं। यदि हमें पहले से पता होता कि माँ
हमारे घर आएँगी तो मैं दूध से अपने आँगन को लीप कर रखती। माँ को कहाँ पर बैठने दूं
और टेक लगाने के लिए क्या दूँगी, माँ को कलश का आसन बैठने के लिए और पिंडी टेक
लगाने के लिए दूँगी। माँ को क्या पहनने के लिए और क्या ओढ़ने के लिए दूँ। माँ को
साड़ी पहनने के लिए और चुनरी ओढ़ने के लिए दूँगी। माँ को भोजन में क्या दूँ और
होठों को रंगने के लिए क्या दूँ। माँ को खीर भोजन के लिए और पान होठों को रंगने के
लिए दूँगी। किससे माँ का श्रृंगार करूँ और कैसे माँ का सुमिरन करूँ। सिंदूर से माँ
का श्रृंगार करूँगी और चंडी पाठ से उनका सुमिरन करूँगी। आज का दिन बहुत हीं शुभ है
देवी माँ हमारे आँगन में आ रही हैं।
-प्रीतिमा वत्स
Saturday, October 10, 2020
विवाह गीत
विवाह गीत
अति मनभावन लागै हो......
माई हे मैं ना जानूँ
पटेवा के गुथै गुण, राम जी के पहेरै गुण हे....
माई हे मैं ना जानूँ
दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे......
राम जी के जोड़वा सुहावन लागे,
अति मनभावन लागै हो.....
माई हे मैं ना जानूँ
दरजी के सियै गुण, राम जी के पहेरै गुण हे.....
माई हे मैं ना जानूँ
दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे..........
राम जी के धोतिया सुहावन लागे,
अति मनभावन लागै हो........
माई है मैं ना जानूँ,
मड़बड़िया के बेचै गुण, राम जी के पहेरै गुण हे.......
माई हे मैं ना जानूँ
दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे......
राम जी के जूतवा सुहावन लागै
अति मनभावन लागै हो............
माई है मैं ना जानूँ
मोचिया के गढ़ै गुण, राम जी के पहेरै गुण हो....
माई हे मैं ना जानूँ
दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे......
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यह एक विवाह गीत है। इसे बेटे के विवाह में गाया जाता है। इस गीत में दुल्हा बने राम जी पगड़ी, जोड़ा, धोती, जूते आदि का वर्णन किया गया है। कहा गया है कि राम जी के शरीर पर ये चीजें बहुत ही सुहावन और मनभावन लग रहा है। पता नहीं ये राम जी के पहनने का अंदाज है या बनाने वाले के हाथ की कला का कमाल है। पता नहीं यह दशरथ जी के कुल के संस्कारों के कारण है या कौशल्या जी के गर्भ की महिमा है।
-प्रीतिमा वत्स
(फोटोग्राफ नेट से साभार)
Thursday, July 30, 2020
Sunday, June 7, 2020
बनी रहेगी उष्मा जादोपेटियाँ कला की
-प्रीतिमा वत्स
सौन्दर्य से लगाव मनुष्य की एक जन्मजात प्रवृति है। यही कारण है कि मनुष्य के सांस्कृतिक विकास की प्रत्येक कड़ी उसके सौन्दर्य बोध का भी निश्चित रूप से परिचय देती है। सभी जगह मानव समुदाय में चित्रांकन की परंपरा किसी न किसी रूप में रही है। कालक्रम में चित्रकला ने कई रूप ले लिए या फिर कई वर्गों में विभक्त कर दिया- शास्त्रीय कला, लोक कला, आदिवासी कला। शास्त्रीय कला जिसे नागर कला भी कह सकते हैं। यह काफी समृद्ध और संभ्रान्त समाज की अभिव्यक्ति बन गयी। शेष कला यानी लोक कला और आदिवासी कला लोगों के दिमाग की कला कहकर उपेक्षा की जाने लगी।
आदिवासी कला की ताकत तथा जीवनी शक्ति को पहली बार पिकासो तथा यूरोप के कई चित्रकारों ने उजागर किया। पिकासो की चर्चित पेंटिंग ती गीतिकार को जिसने भी देखा उसने यही महसूस किया कि रंगों की भाषा में लोक धड़क रहा है। कलाकार विलियम रूबीन ने भी लोक कला से बहुत लगाव महसूस किया।
अभिव्यक्ति के स्तर पर यह आदिवासी चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करते, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। बाद के भी कई कलाकारों ने यह महसूस किया कि आदिवासी कला साधारण नहीं है। यह कला जटिल धारणाओं की लघुकारक रूप में चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। पूरी दुनिया में अफ्रीका के बाद सबसे अधिक आदिवासी भारत में हीं रहते हैं और देश में आदिवासी प्रदेशों में झारखंड तथा बिहार का नाम प्रमुख रूप से आता है। यहाँ सबसे ज्यादा संथाल आबादी रहती है। तमाम विस्थापन और पलायन के बावजूद इनकी जनसंख्या 20 लाख से ऊपर है।संथाल आदिवासियों की एक सुदीर्घ और समृद्ध कला परंपरा है। इनके सांस्कृतिक उपक्रमों,आस्थाओं,मिथकों,अलंकरणों और सज्जाकारी में गजब का मानवीय बोध दिखता है। इन्हीं कलाओं में एक है जादोपेटियाँ चित्रकला। आदिकाल से हीं संथालों की संस्कृति में जादोपेटियाँ चित्रकला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस शैली के चित्रकार को समाज में जादौ के नाम से पुकारा जाता है। लोक कला की यह शैली बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में भी पाई जाती है। विभिन्न प्रान्तों में यह पद्धति अलग-अलग नामों जैसे जादू-पट, यम-पट, पटकथा और पटचित्र के नाम से जानी जाती है। चित्रकार पुराने कपड़े और बेल के गोंद की सहायता से पट बनाता है। जिसकी लंबाई 5 से 10 फूट तक होती है। कुछ लोग कागज पर भी इस प्रकार के चित्र बनाते हैं। जादोपेटियाँ चित्रकला में पशु-पक्षियों तथा मनुष्य जीवन के विभिन्न पक्षों का जो चित्रण हुआ है और जो हो रहा है, वह प्रकृति, मनुष्य और पशु के रिश्ते के बारे में बहुत कुछ कहता है। जहाँ तक अभिव्यक्ति के स्तर का प्रश्न है तो इनकी सहजता और प्रवाह महसूस की जा सकती है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करती, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। आदिवासी जीवन में हर व्यक्ति एक विशेष किस्म का कलाकार होता है और इन कलाकारों का जीवन आम लोगों से भिन्न नहीं देखा जा सकता। कला इनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है। सुबह के समय मुर्गे का बोलना, बरसात में मोर का नाचना और सुंदर स्त्री के प्रति पुरूष का सहज ढंग से आकर्षित होना, खेतों में स्त्रियों का काम करना, जंगली फूलों का अपने जूड़े में लगाना, किशोरों का अपने मवेशियों को ले जाना, मछली मारना एवं इस तरह के ढेर सारे स्वाभाविक एवं प्राकृतिक संदर्भ जनजाति चित्रकलाओं में देखने को मिलते हैं।
इन चित्रों में यथासंभव प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। जला हुआ चावल, आँवला और जामुन की छाल,फूलों, पत्तियों, महुआ, हल्दी आदि को पीसकर रंग तैयार किया जाता है। लोक कला में प्रायः चटख रंगों का प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों के विषय- महाभारत, रामायण, कृष्णलीला,सृष्टि का निर्माण, यमराज का दंड आदि होते हैं। इस शैली के चित्रकार जादौ इन चित्रों को लेकर गाँव-गाँव घूमते हैं और लोगों को दिखाते हैं।
अभी भी कहीं-कहीं आदिवासी समाज में जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो इन कलाकारों को बुलाया जाता है। ये कलाकार उनके घर जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। लोगों को रामायण, महाभारत की कहानियों के साथ-साथ यह भी बताते हैं कि गलत काम करने पर यमराज कठोरता से दंड देते हैं। परंतु हाल के वर्षों में इनकी माँग नहीं के बराबर रह गई है।
कहते हैं कि लोक परिवेश की उपज होती है लोक कला। परिवेश बदलते हैं तो सहज ढंग से बदल जाती है लोककला। तेजी से भाग रही दुनिया और उपभोक्तावादी संस्कृति के तीव्र विस्फोट के बीच संथालों का परिवेश, उनका समाज और उनकी जीवनशैली भी काफी बदल चुकी है।यह बदलाव उनकी कला में भी दिखाई पड़ता है। पहले जहाँ इन कलाओं में प्राकृतिक रंगो का प्रयोग होता था अब रासायनिक रंगों का प्रयोग बढ़ गया है। रंगों के साथ-साथ रेखाओं का भी गणित बदल गया है। दीवारों तथा कपड़े के पट से उतरकर यह कला अब कैनवास पर सजने लगी है। संथाल परगना के जादौपेटियाँ पर लंबे समय से काम कर रहे चित्रकार देव प्रकाश इस कला को लेकर बहुत उत्साहित हैं। हालांकि वे मानते हैं कि कुछ जादौ अपने पारंपरिक काम को छोड़कर दूसरे पेशे की ओर चले गए हैं लेकिन इसका लाभ भी इस कला को मिला है। देव प्रकाश कहते हैं कि लोक कला में यदि कुछ चीजें जुड़ती हैं तो कुछ छूट भी जाती हैं। रोजगार की तलाश में महानगरों और शहरों में घूम चुके जादौ जब अपने गाँव आते हैं और फिर कभी अपनी पट पर इस कला को उकेरते हैं तो उस कला का रंग कुछ नया होता है। देव प्रकाश इस बात के पक्षधर हैं कि संरक्षण के नाम पर इस कला को सिर्फ संग्रहालय की शोभा ना बनाया जाए।
लेकिन कुछ भी हो जाए लोक की कभी मन नहीं सकती है। यह कला कभी मात्र संग्रहालय की शोभा बनकर नहीं रह सकती है। लोक कला अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जो आदि काल से चली आ रही है और अभी भी समाज के हर कोने में किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान है। यह धरोहर की तरह एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से बिना कहे, बिना किसी तामझाम के मिलती रहती है।
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-प्रीतिमा वत्स
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Sunday, March 17, 2019
गंगा नदी का आदि से अनंत तक आस्था का सफर
सदियों से तुम्हारे
कष्टों को हरती आ रही हूँ, तुम्हें जीवन देती आ रही हूँ । कई बार खुश हुई कई बार
बहुत कष्ट उठाना पड़ा। खुशियाँ बाँटती रही, तुम्हारी फैलाई हुई गंदगी को अपने-आप
में समेटती रही लेकिन अब मुझे भी तुम्हारी जरूरत है।Monday, March 4, 2019
तुम फेंको एक कदम्ब का फूल
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पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था,...
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उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों म...
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झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जात...


















