आज से तीन साल पहले सुनील शर्मा जी हमारे अपार्टमेंट में कुछ पौधे लगा रहे थे। उन्हें पौधे लगाने का जुनून है। तभी उनसे कहकर हमने अपने फ्लैट के ठीक नीचे मेहंदी का एक छोटा-सा पौधा लगवा लिया था। शर्मा जी और सोसाइटी के कुछ जिम्मेदार लोगों की देखभाल से आज वह छोटा-सा पौधा खूब फैलकर घनी झाड़ी बन गया है। इसे बड़ा होते हुए देखकर बहुत सुकून मिलता है।
आज सुबह वॉक करते हुए मेहंदी की कुछ तस्वीरें ले लीं। पूरा सावन बीत गया, लेकिन किसी ने उसकी एक भी पत्ती नहीं तोड़ी। शायद आज के
बच्चों को यह पता भी नहीं होगा कि यह मेंहदी का पौधा है। वैसे भी आज का दौर रेडिमेड चीजों का है।
एक हमारा बचपन था। सावन हो या भादो, मजाल है कि मेंहदी के पौधे में एक भी पत्ती दिख जाए। हमारे गांव
में तब एक ही जगह ऐसी थी, जहां हम
कभी-कभी मेहंदी का पत्ता तोड़ने जाया करते थे-कैलाश पंडी जी
के घर।
जब उनकी पत्नी, खड़हरा वाली
चाची, घर पर होतीं तो किसी बच्चों
को कभी मना नहीं करती थीं। लेकिन जब वह घर में नहीं होतीं तो हम बच्चों के वहां
जाने की मनाही थी। घर के पिछवाड़े में मेहंदी का पौधा था और उसके पीछे ऊंची-ऊंची
मिट्टी की दीवारें थीं। दोपहर में, जब घर के लोग
सोए होते, तब हम बच्चों की एक टोली
वहां पहुंचती। उसमें कुछ लड़के भी होते थे, खासकर मेरा चचेरा चाचा राजाराम, जो उम्र में
मुझसे छोटा था। दीवार फांदकर उस तरफ जाने की कोशिश होती। कभी-कभी हम कामयाब भी हो
जाते।
मेरी भूमिका सिर्फ निगरानी रखने की थी। किसी के आने की आहट मिलते ही सबको आगाह
करना। मेंहदी तोड़कर निकलते ज्यादातर हम उन्हीं के दरवाजे से थे, वह भी डांट खाते हुए। हर बार धमकी मिलती कि तुम लोगों के घर
जाकर शिकायत करेंगे। लेकिन शिकायत कभी नहीं आती थी।
दीवार फांदने के चक्कर में कई बार बच्चों को चोट भी लगती। कई बार दीवार का कुछ हिस्सा भी गिर जाता। बार-बार मिट्टी की दीवार पर चढ़ने की वजह से उसकी ऊंचाई धीरे-धीरे कम हो गई थी और हमारे लिए उसे फांदना आसान होता जा रहा था। एक बार तो दीवार का एक बड़ा हिस्सा ही गिर गया। हम सब डर गए कि आज तो घर पर शिकायत जरूर पहुंचेगी। लेकिन उस दिन खड़हरा वाली चाची हमारी तरफ से घरवालों से लड़ रही थीं। कह रही थीं, “तुम लोग बच्चों को घर में घुसने नहीं दोगे तो ये बेचारे क्या करेंगे? दीवार तो फांदेंगे ही।”
चाची ने हमें डांटा नहीं, उलटे घर जाने
के लिए कहा। सच में, उस दिन चाची पर
बहुत प्यार आया था। बाद में दीवार
की मरम्मत कर दी गई।
उसके बाद बच्चों को यह कहकर डराया जाने लगा कि उस खंड में दो नाग रहते हैं, जो बहुत जहरीले हैं। नतीजा यह हुआ कि हमें मेंहदी तोड़ने में और भी दिक्कत होने लगी। हम भगवान से मनाते कि खड़हरा वाली चाची कभी घर से बाहर न जाएं। लेकिन वह
अक्सर गोड्डा चली जातीं और दस-पंद्रह दिनों बाद ही लौटतीं। हम उनके आने की बाट
जोहते रहते।
उन्हीं दिनों मणि चाचा ने अपने घर के आगे मेहंदी का एक पौधा लगा दिया। जब वह
थोड़ा बड़ा हुआ तो सबके लिए उपलब्ध था। हम जब चाहें, मेंहदी तोड़ सकते थे। कुछ दिन बाद उन्होंने घर के पीछे भी दो-तीन पौधे लगा
दिए। किसी भी बच्चे को कभी भी मेहंदी तोड़ने की छूट थी। बस शर्त इतनी थी कि पौधा
खराब नहीं होना चाहिए।
अब हमें और सुविधा मिल गई थी। मेंहदी उन्हीं के घर से तोड़ते और उन्हीं के घर में पीस भी लेते। अक्सर उनकी पत्नी किसी सहायक को कहकर पिसवा
देती थीं। उनकी पत्नी बच्चों को बहुत
प्यार करती थीं और कभी किसी चीज के लिए मना नहीं करती थीं। बहुत
देर हो जाती तो वही प्यार से याद दिलातीं, “घर नहीं जाओगे? मम्मी परेशान
होगी।”
लेकिन मेहंदी इतनी आसानी से मिलने लगी तो धीरे-धीरे हम सब उसके प्रति उदासीन
होने लगे। खड़हरा वाली चाची के
घर की मेंहदी आज भी याद आती है। वह शायद अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब भी उस घर की दीवार, वह पौधा और मेहंदी की पत्तियां याद आती हैं,
लगता है जैसे चाची वहीं खड़ी मुस्कुरा रही हैं।
मेहंदी का रंग हथेलियों से उतर जाता है, लेकिन बचपन की कुछ स्मृतियों का रंग उम्र भर नहीं उतरता।
प्रीतिमा वत्स


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