Friday, August 14, 2026

मेरे कला और साहित्य के सफर पर एक बातचीत


एक खास बातचीत मेरे कला और लेखन के सफर की, सुरेश परिहार जी के साथ। लाइव वायर न्यूज पर। लिंक दिया हुआ है आप चाहें तो इस प्लेटफॉर्म पर इसे पढ़ सकते हैं। 

https://livewirenews.in/lok-kala-lok-sanskriti-chitrakar-lekhika-interview/ 


1.     
झारखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर चित्रकार, लेखिका और लोकसंस्कृति की शोधकर्ता बनने तक का आपका सफर कैसा रहा? आपके व्यक्तित्व को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले अनुभव कौन-से रहे?

एक शब्द में कहूं, तो शानदार। मेरा जन्म झारखंड के एक छोटे से गांव लुकलुकी में हुआ और बचपन असम के बेहद खूबसूरत शहर उमरांगशो में बीता। वहां के जंगलों में भटकना, पेड़-पौधों को करीब से जानना और प्रकृति को अपने आसपास महसूस करना मेरी बचपन की बहुत खूबसूरत यादों में शामिल है।

तीसरी कक्षा में मैं फिर झारखंड आ गई। गांव के सरकारी स्कूल से ही मेरी प्रारंभिक शिक्षा हुई। दसवीं के बाद गोड्डा महिला कॉलेज से बी.ए. किया और फिर गोड्डा कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम.ए. की पढ़ाई पूरी की। शादी के बाद दिल्ली आ गई। यहां आने के बाद मैंने अपनी पढ़ाई को फिर से अपने तरीके से आगे बढ़ाया। चंडीगढ़ कला केंद्र से पेंटिंग में एम.ए. किया और साथ ही इग्नू से रूरल डेवलपमेंट में डिप्लोमा भी किया।

हालांकि, अगर सच कहूं तो चित्रकार बनने का सफर शायद मेरे बचपन से ही शुरू हो गया था। खाली समय में कागज पर वाटर कलर से चित्र बनाना और उन्हें गत्ते पर चिपकाकर घर की दीवार पर टांग देना मेरा सबसे बड़ा शौक था। घर में भी सब मेरे इस शौक को खूब प्रोत्साहित करते थे, खासकर मेरे दादाजी।

लोक संगीत से मेरा रिश्ता भी बहुत बचपन का है। गांव में जब कोई सारंगी बजाते हुए भिक्षा मांगने आता, तो मैं उसके पीछे-पीछे तब तक चलती रहती, जब तक वह गांव से बाहर नहीं निकल जाता या मेरी मां किसी को भेजकर मुझे वापस नहीं बुला लेती। मुझे सारंगी की धुन और उसके साथ गाया जाने वाला गीत बहुत अच्छा लगता था। एक दृष्टिहीन व्यक्ति थे, उनका नाम अर्जुन था। वे खंजड़ी बजाकर गाते और भीख मांगते थे। उन्हें सुनना भी मुझे बहुत अच्छा लगता था।

दादी के साथ हर लोक पर्व में हिस्सा लेती थी। शादी-ब्याह के मौकों पर होने वाले लोकगीत सुनने चली जाती और घर लौटकर चुपचाप उन्हें अपनी कॉपी में लिख लेती। फिर उन्हें सहेजकर रखती थी। शायद तब मुझे खुद भी नहीं पता था कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं। लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हुई, इन लोकगीतों और लोक संस्कृति के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई।

मुझे लगता है, लोक संस्कृति की ओर मेरा आकर्षण किसी एक दिन या किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह मेरे बचपन में धीरे-धीरे जमा हुए अनुभवों का असर था—गांव, जंगल, लोक पर्व, गीत, संगीत और उन गीतों को जीते हुए लोग। जितना इनके बारे में जानती गई, उतनी ही मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई। आखिरकार यही जिज्ञासा मुझे लोकगीत और लोक संस्कृति के अध्ययन और शोध की ओर ले गई।

 


2.     
आपकी कला में बिहार और झारखंड की लोक संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है. लोक कला को आपने केवल कला के रूप में देखा या उसके पीछे छिपे सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी समझने की कोशिश की?

मेरी कला में बिहार और झारखंड की लोक संस्कृति की गहरी छाप इसलिए है क्योंकि मेरा जन्म ही बिहार के उस हिस्से में हुआ है, जो आज झारखंड कहलाता है। बिहार और झारखंड से मेरा बहुत गहरा लगाव है। यहां के लोगों में जो अपनापन और सहजता है, वह मुझे कहीं और महसूस नहीं होती।

लोक कला और लोक संस्कृति का इतने वर्षों तक अध्ययन करने के बाद मेरी समझ यह बनी है कि इन्हें केवल कला या उत्सव के रूप में नहीं देखा जा सकता। इनके पीछे किसी समाज का पूरा जीवन छिपा होता है—उसकी मान्यताएं, रिश्ते, प्रकृति से उसका संबंध, उसकी रोजमर्रा की जरूरतें और उसकी आर्थिक परिस्थितियां भी। किसी लोक कला को समझना, दरअसल उस समाज को समझना है जिसने उसे जन्म दिया है।

मैंने यह भी महसूस किया है कि लोक संस्कृति हमें उत्सव के साथ-साथ एक तरह का अनुशासन भी सिखाती है। हमारे बहुत से लोक पर्व प्रकृति से जुड़े हुए हैं। वे हमें मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और अपने आसपास की प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। कई लोक उत्सव ऐसे भी हैं, जब समाज कुछ समय के लिए जाति-पांति और दूसरे भेदों को पीछे छोड़कर एक साथ आता है। भले ही यह पूरी तरह संभव न हो, लेकिन अगर किसी पर्व का थोड़ा-सा असर भी लोगों के मन पर पड़ता है, तो मुझे लगता है कि उसकी सार्थकता बनी रहती है।

इसी विश्वास के कारण मैं लोक कला और लोक संस्कृति को सहेजने का काम करती हूं। मेरी कोशिश सिर्फ यह दर्ज करने की नहीं है कि कोई लोकगीत कैसे गाया जाता है या कोई लोकचित्र कैसे बनाया जाता है, बल्कि यह समझने की भी है कि उसके पीछे कौन-सा जीवन है और वह जीवन हमें क्या बताता है। मेरी चिंता यह है कि आने वाली पीढ़ियां अपनी इस विरासत को केवल किताबों या संग्रहालयों में न देखें, बल्कि उसे जानें, समझें और संभव हो तो अपने जीवन में आगे भी निभाएं।

इसी सिलसिले में मैं पिछले करीब 16 वर्षों से ‘लोक रंग’ नाम से एक ब्लॉग भी चला रही हूं, जिसमें लोक कला, लोकगीत, लोक संस्कृति और उनसे जुड़ी कई जानकारियां साझा करती रहती हूं। यह मेरे लिए केवल लेखन का माध्यम नहीं, बल्कि लोक से जुड़ी अपनी स्मृतियों और अनुभवों को सहेजने की एक कोशिश भी है। लोक से जुड़ी बहुत सारी जानकारी मैं वहां साझा करती रहती हूं। अगर किसी को लोक कला और लोक संस्कृति से जुड़ी चीजों के बारे में जानना हो, तो वहां जाकर देख सकते हैं। उसका लिंक दे रही हूं—https://lokrang-india.blogspot.com/

 

3. आपने मंजूषा कला और जादोपेटिया कला पर विशेष अध्ययन किया है. इन दोनों लोककलाओं में आपको ऐसी कौन-सी विशेषताएं मिलीं, जिन्हें आधुनिक कला जगत तक पहुंचाना जरूरी लगता है?

मंजूषा कला अंग जनपद की एक बहुत ही प्राचीन कला है। केवल तीन रंगों—गुलाबी, हरा और पीला—से बनने वाली यह कला एक पूरी लोकगाथा कहती है। भारत की कई लोककलाएं प्रकृति, ऋतुओं या देवी-देवताओं से जुड़ी हुई हैं, लेकिन मंजूषा कला की अपनी एक अलग विशेषता है। यह पूरी तरह एक लोकगाथा के भीतर सांस लेती है। इसका हर रंग, हर रेखा और हर आकृति बिहुला-विषहरी की कथा का एक शब्द है। इसलिए मंजूषा को समझना केवल एक चित्र को समझना नहीं है। यह अंग प्रदेश की लोक चेतना को पढ़ने जैसा है।

दूसरी ओर, जादोपेटिया चित्रकला संथाल परगना और ओडिशा के कुछ हिस्सों में बनाई जाती है। इसमें धूसर रंगों का प्रयोग अधिक दिखाई देता है। इस कला के माध्यम से जन्म और मृत्यु के रहस्यों को समझाने की कोशिश की जाती थी। अच्छे और बुरे कर्मों के परिणाम भी इसमें चित्रित किए जाते हैं। यमराज का दंड इसमें विशेष रूप से दिखाई देता है।

इस कला को बनाने वाले कलाकार ‘जादौ’ कहे जाते थे। किसी की मृत्यु के बाद होने वाले अनुष्ठानों में ये कलाकार अपनी कलाकृतियां लेकर जाते थे और गांव-जवार के लोगों को चित्र दिखाकर कर्मों के बारे में समझाते थे। कई बार यह प्रस्तुति गायन के रूप में भी होती थी। यानी यह केवल चित्रकला नहीं थी, बल्कि चित्र, कथा, संगीत और लोक विश्वासों को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा थी।

मुझे लगता है कि यही इन दोनों कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता है। इनमें चित्र केवल देखने की चीज नहीं है, बल्कि अपने भीतर एक पूरी कथा, स्मृति और जीवन-दर्शन लेकर चलता है। आज जब आधुनिक कला लगातार नए माध्यमों और प्रयोगों की ओर बढ़ रही है, तब इन लोककलाओं की अपनी जड़ों से जुड़ी यह दृष्टि आधुनिक कला के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। इन्हें केवल ‘लोक कला’ कहकर अलग रख देना ठीक नहीं होगा। इनके भीतर ऐसी कथाएं, प्रतीक और जीवन-दृष्टि है, जिनसे आधुनिक कला भी संवाद कर सकती है।

दुर्भाग्य से समय के साथ जादोपेटिया कला का मूल रूप काफी बदल गया है। इसलिए मेरा मानना है कि इन कलाओं को केवल संरक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनके पीछे की कथा, परंपरा और जीवन-दृष्टि को भी समझना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है।

 

4. लोक कला में महात्मा गांधी की मौजूदगी को लेकर आपने शोध किया है। इस शोध के दौरान ऐसी कौन-सी खोज या घटना सामने आई, जिसने आपको सबसे अधिक चौंकाया या प्रभावित किया?

देवी-देवताओं में जैसे गणेश भगवान की आकृति बनाना बहुत आसान है, वैसे ही कलाकारों के बेहतरीन प्रयोगों ने गांधी जी की आकृति को भी लोक कला में बहुत सहज बना दिया है। झारखंड के कई ऐसे गांव आज भी हैं, जहां की बुजुर्ग महिलाओं के लिए ‘नेता’ का मतलब केवल गांधी होता है। उनकी आस्था का आलम यह है कि वे उन्हें ‘गांधी बाबा’ कहकर संबोधित करती हैं। कई लोकगीतों में भी हमें गांधी जी का वर्णन मिलता है।

अगर हम यह कहें कि गांधी जी व्यक्ति से ज्यादा एक विचार बनकर लोक के जीवन में घुल-मिल गए हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोक कला में उनकी मौजूदगी केवल उनके चित्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोगों की स्मृतियों, विश्वास और जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन चुकी है।

शोध के दौरान एक बार झारखंड के लिट्टीपाड़ा इलाके में मुझे एक महिला मिली, जिसने कपड़े पर धागे से गांधी जी का एक पोर्ट्रेट बनाया था। वह उस चित्र को देवताओं के स्थान पर रखती थी। बहुत पुराना होने की वजह से वह जगह-जगह से फट गया था, लेकिन वह उसे बहुत प्यार से अपना ‘गांधी बाबा’ कहकर दिखा रही थी।

उस समय मेरे पास कैमरा नहीं था और मोबाइल भी बटन वाला ही था। बाद में वहां दोबारा जाना नहीं हो पाया। लेकिन उस महिला की तस्वीर और उसके विश्वास की वह स्मृति आज भी मेरे भीतर कहीं बची हुई है। मुझे वह महिला बार-बार याद आती है और उससे भी ज्यादा याद आता है उसका अपने ‘गांधी बाबा’ के प्रति वह विश्वास।

 


5.     
आपकी एक पहचान चित्रकार की है और दूसरी लेखिका की। जब कोई विचार आपके भीतर जन्म लेता है, तो वह पहले शब्दों का रूप लेता है या रंगों और रेखाओं का?

रंग तो मेरी जिंदगी हैं। मेरा स्केचबुक मेरे साथ पूरे घर में घूमता रहता है—कभी सोफे पर, कभी बिस्तर के पास और कभी-कभी सफर में भी मेरे साथ चला जाता है। लोग तो मेरे घर को देखकर हंसते हैं। आलमारियां किताबों से भरी हैं, दीवान में पेंटिंग्स रखी हैं और कपड़ों के लिए जगह नहीं बचती, तो उन्हें पोटली बनाकर रख देती हूं। कह सकती हूं कि मेरे घर में रंगों का कारोबार काफी समृद्ध है।

लेकिन अगर कोई विचार मेरे भीतर जन्म लेता है, तो ज्यादातर समय कलम ही पहले आगे हो जाती है। वह विचारों को पहले कैद कर लेना चाहती है। रंग और रेखाएं बाद में अपना रास्ता खोज लेते हैं। शायद इसलिए मेरे लिए शब्द और रंग अलग-अलग माध्यम नहीं हैं। दोनों मेरे भीतर एक-दूसरे से लगातार बातचीत करते रहते हैं। कभी कोई विचार शब्द बनकर आता है और कभी वही विचार रंग और रेखाओं में अपना रूप खोज लेता है।

 

6. आपने लोक जीवन पर हजार से अधिक लेख लिखे हैं, साथ ही कहानियां, कविताएं और बाल साहित्य भी लिखा है। इतने अलग-अलग माध्यमों में काम करने के पीछे आपकी रचनात्मक बेचैनी क्या है?

इस बेचैनी का पता मुझे आज तक नहीं लग पाया है। पता नहीं मैं कौन-सी भटकती आत्मा हूं, जो हर काम कर लेना चाहती है। शायद मेरे भीतर एक जगह टिककर बैठने की आदत ही नहीं है। शादी के बाद जब मैं अपने पति के साथ दिल्ली आई, तब हमने आर्थिक तंगी का एक बड़ा दौर देखा। लेकिन हम दोनों ने न कभी किसी से कुछ कहा और न हार मानी। जो काम सामने आता और लगता कि उससे कुछ पैसे मिल सकते हैं, हम वही करने लग जाते थे। तब मैने किताबों के कवर भी डिजाइन किए, रेखाचित्र भी बनाए। ट्रांसलेशन का भी काम किया। उसी दौरान मैंने ‘उमंग’ नाम के चिल्ड्रन थिएटर में भी काम किया, जिसे रेखा जैन जी चलाती थीं। वहां रहते हुए रेखा जी के पति और प्रख्यात रंग आलोचक नेमिचंद्र जैन से मेरी मुलाकात होती रहती थी।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा था-“अगर तुम कर सकती हो तो हर काम करो। हमारे काम करने की कोई सीमा नहीं होती।” उनकी यह बात मेरे मन में कहीं रह गई। बाद में मैंने उनकी पत्रिका ‘नटरंग’ में भी करीब एक साल तक काम किया। शायद उस दौर की जद्दोजहद ने ही मुझे रचनात्मक बना दिया। जब जिंदगी में एक ही काम के सहारे चलना संभव नहीं था, तब मैंने अलग-अलग कामों को आजमाया और हर काम से कुछ न कुछ सीखा। धीरे-धीरे लेखन, चित्रकला, लोक संस्कृति, कहानी, कविता और बाल साहित्य—सब मेरे जीवन का हिस्सा बनते चले गए।

आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि शायद यह बेचैनी ही मेरी ताकत है। मैं किसी एक माध्यम में बंधकर रह ही नहीं सकती। कोई विचार जिस रूप में मेरे भीतर आता है, मैं उसे उसी रूप में अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूं।

 

7. संस्कृति मंत्रालय की जूनियर और सीनियर फैलोशिप के दौरान आपने लोकदेवी-देवताओं और बोल-बम यात्रा के सांस्कृतिक अर्थशास्त्र पर काम किया। इन शोधों ने लोक संस्कृति को देखने की आपकी दृष्टि में क्या बदलाव किया?

संस्कृति मंत्रालय से मुझे जूनियर फैलोशिप 2000-01 में मिली थी। विषय था—‘अंग जनपद के लोक देवी-देवताओं का शब्द चित्रण’। लोक देवी-देवताओं के बारे में जानने की मेरी रुचि पहले से ही थी, लेकिन इस फैलोशिप ने मेरे काम को एक दिशा और गति दे दी। मैंने इस शोध को सिर्फ किया नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ उसे जिया भी है। इतने वर्षों के बाद भी मुझे लगता है कि अभी तो बहुत कुछ जानना बाकी है।

सीनियर फैलोशिप मुझे 2015-16 में मिली। इस बार विषय था—‘संसार की सबसे लंबी आस्था यात्रा बोल-बम का अर्थशास्त्र’। इसके तहत मैंने सुलतानगंज के गंगा घाट से लेकर बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर तक होने वाली इस आस्था यात्रा का अध्ययन किया। शुरुआत में कई बार मुझे समझ नहीं आता था कि इतने बड़े मेले और पूरी यात्रा के अर्थशास्त्र को मैं हूबहू कैसे समझ और दर्ज कर पाऊंगी। फिर मुझे लगा कि इसे बाहर खड़े होकर नहीं समझा जा सकता। इसलिए मैंने खुद पदयात्रा करने का फैसला किया। सुलतानगंज में गंगा से जल उठाया और पैदल देवघर तक गई। इस दौरान रास्ते के बाजारों, दुकानों, अस्थायी कारोबार, लोगों की आवाजाही और मेले की पूरी व्यवस्था को बहुत करीब से देखने और समझने का मौका मिला।

इस यात्रा ने मेरी दृष्टि बदल दी। मुझे समझ में आया कि लोक संस्कृति केवल गीत, कला, पूजा और परंपराओं का नाम नहीं है। उसके साथ एक पूरा आर्थिक संसार भी चलता है। एक आस्था यात्रा हजारों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ती है, रास्ते के छोटे-छोटे बाजारों को जीवित करती है और अपने साथ एक अस्थायी अर्थव्यवस्था भी खड़ी कर देती है।  मेरे लिए यह सफर जानकारी जुटाने से कहीं ज्यादा था। यह बहुत दिलचस्प और भीतर तक छू लेने वाला अनुभव था। शायद इसी वजह से मेरे लिए लोक संस्कृति पर शोध करना केवल अध्ययन नहीं, बल्कि उस लोक जीवन के बीच जाकर उसे महसूस करना है।

 

8. आज लोक कला को बाजार, पर्यटन और आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है. आपके अनुसार इससे लोक कलाकारों को वास्तविक लाभ मिल रहा है या उनकी कला के मूल स्वरूप के साथ समझौता भी हो रहा है?

लोककला को हमेशा से बाजार की जरूरत रही है। मुझे बहुत खुशी होती है जब कोई लोक कलाकार सम्मानित होता है या उसकी कोई कलाकृति अच्छे दामों में बिकती है। कलाकार को उसके काम का सम्मान और उचित मूल्य मिलना जरूरी है। आखिर कला के साथ कलाकार का जीवन भी जुड़ा हुआ है।

जहां तक बदलाव की बात है, तो परिस्थितियां बदलेंगी, समाज बदलेगा, तो लोककला में भी बदलाव आएगा ही। मेरे ख्याल से लोककला एक घूमता हुआ आइना है। वह अपने समय और समाज को अपने भीतर दर्ज करती रहती है। मंजूषा को ही लीजिए। अब यह कला सिर्फ बिहुला-विषहरी की कथा तक सीमित नहीं है। आज मंजूषा में समाज के बहुत सारे समकालीन विषयों को चित्रित किया जा रहा है और उन्हें सराहा भी जा रहा है। मैं खुद अपनी पेंटिंग में मंजूषा कला के साथ नए-नए प्रयोग करती रहती हूं। इसलिए मैं बदलाव के खिलाफ नहीं हूं। बदलाव तो कला को जीवित रखने के लिए जरूरी भी है।

लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि बदलाव करते हुए उसका ग्रामर नहीं बिगड़ना चाहिए। मंजूषा के अपने रंग हैं, अपनी रेखाएं हैं, अपनी आकृतियां हैं और अपनी एक दृश्य भाषा है। इसके तीन मूल रंगों—गुलाबी, हरा और पीला—का अपना महत्व है। जब कोई कलाकार मंजूषा में किसी दूसरी लोककला को इस तरह मिला देता है कि उसकी अपनी पहचान ही धुंधली होने लगे, या रंगों की अपनी सीमा का ध्यान नहीं रखता, तो मुझे बहुत बुरा लगता है और चिंता भी होती है। प्रयोग जरूर हों, नए विषय आएं, लेकिन लोककला का अपना व्याकरण और पहचान बची रहनी चाहिए। वरना आने वाले समय में हम यह तो कहेंगे कि लोककला जीवित है, लेकिन यह भूल जाएंगे कि उसकी असली पहचान क्या थी।

9. आपने बच्चों के लिए भी लगातार लेखन और चित्रांकन किया है. आज के डिजिटल दौर में बच्चों को लोककथाओं, लोककलाओं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

बच्चों को लोककला और लोक संस्कृति से जोड़ने के लिए सबसे पहले उन्हें घर में वह माहौल देना होगा। केवल किताबों में लोककथाएं पढ़ा देने या लोककला के चित्र दिखा देने से बात नहीं बनेगी। उन्हें अपनी जड़ों के करीब ले जाना होगा।

जिस तरह आजकल छुट्टियों में लोग घूमने के लिए देश-विदेश जाते हैं, उसी तरह उन्हें अपने गांव भी जाना चाहिए। अपनी धरती, अपनी बोली, अपने लोगों और अपने समाज से बच्चों को जोड़ना चाहिए। उन्हें यह महसूस करने का मौका मिलना चाहिए कि उनकी संस्कृति सिर्फ किताब में लिखी कोई चीज नहीं है, बल्कि उनके आसपास के जीवन का हिस्सा है।

गांवों में अभी भी कहीं न कहीं लोक संस्कृति बची हुई है। वहां लोकगीत हैं, लोकपर्व हैं, लोककथाएं हैं, लोककलाएं हैं और उन्हें जीने वाले लोग हैं। अगर बच्चे इन सबके बीच जाएंगे, बुजुर्गों से उनकी कहानियां सुनेंगे, लोकगीत सुनेंगे और त्योहारों में शामिल होंगे, तो लोक संस्कृति अपने आप उनके भीतर जगह बना लेगी। मुझे लगता है कि बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें अपनी जड़ों से मिलने दिया जाए। डिजिटल दुनिया अपनी जगह है, लेकिन अपनी माटी से जुड़ने का कोई विकल्प नहीं है।

 

10.  आपकी नई किताब ‘जन जन के अन्ना’ और आने वाली पुस्तक ‘घूमता आईना है लोक’ के माध्यम से पाठकों तक आप कौन-सी ऐसी बात पहुंचाना चाहती हैं, जिसे आपके अब तक के रचनात्मक सफर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश कहा जा सके?

 

‘जन जन के अन्ना’ मेरी नई किताब नहीं है। यह कई साल पहले प्रकाशित हो चुकी है। इस किताब में मैंने जन लोकपाल बिल जैसे विषय को भी बहुत सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की थी, ताकि आम पाठक भी उसे आसानी से समझ सके। ‘घूमता आइना है लोक’ पर पिछले काफी समय से काम चल रहा है। यह किताब मेरे लिए थोड़ी अलग और बहुत मेहनत की किताब है। इसे लिखते हुए मुझे लगातार लगता रहा है कि लोक को जितना जानती हूं, उससे कहीं ज्यादा अभी जानना बाकी है। शायद इसी वजह से यह किताब समय ले रही है।

उम्मीद है कि यह किताब इस साल के अंत तक आ जाएगी। मेरी कोशिश है कि इसमें लोक संस्कृति को सिर्फ जानकारी के रूप में न रखा जाए, बल्कि उसके पीछे के जीवन, समाज और उसकी संवेदनाओं को भी पाठकों के सामने लाया जा सके। मैं चाहती हूं कि ‘घूमता आइना है लोक’ आज के पाठकों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी दिलचस्प और जानकारी से भरपूर हो। अगर मेरी किताब पढ़ने के बाद किसी पाठक के मन में अपने लोक, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जानने की जिज्ञासा पैदा होती है, तो मैं उसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानूंगी।

व्यक्तिगत जानकारी—

फिलहाल मैं अपने पति देव प्रकाश चौधरी और बेटे अनहद कश्यप के साथ गाजियाबाद में रहती हूं। मेरे पति एक दैनिक समाचार पत्र में सीनियर रेजिडेंट एडिटर हैं। पत्रकारिता के साथ-साथ वे चित्रकला और कविता में भी सक्रिय हैं। बेटा अनहद कश्यप डिजाइनिंग  की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी कर रहा है। उसका झुकाव बचपन से ही कला की ओर रहा है। वह एक कार डिजायनर है।   

 


MEERA TUM KAHAN HO

 

मीरा तुम कहाँ हो?

-प्रीतिमा वत्स


बात बहुत पुरानी है। शायद तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी। उन दिनों गांव के स्कूल में मैं उसे अक्सर देखा करती थी। हम गर्ल्स स्कूल में पढ़ते और वह काफी दूर चलकर एक मिडिल स्कूल जाया करती थी। रोज एक निश्चित समय पर उसे दूर से जाता हुआ देखने की आदत सी बन गई थी। बहुत मन करता उस आदिवासी लड़की से बात करने का, उसका नाम जानने का और उसके बारे में बहुत सारी बातें जानने का। लेकिन हमें भी क्लास में जाने की जल्दी रहती और वह भी तेज रफ्तार से समय पर अपने जाने की हड़बड़ी में रहती।

एक दिन हम सभी दोस्त दोपहर की टिफिन के बाद मैदान में पकड़म-पकड़ाई खेल रही थी, तभी हमने उस आदिवासी लड़की को पार होते हुए देखा। मैं अचंभित रह गई उसे इस वक्त देखकर। हमारी सहेलियाँ हमें चिढ़ाने लगीं, आ गई तुम्हारी हिरोइन जा बात कर ले। मैं भी जाने किस आवेग में थी कि उसके बिल्कुल पास चली गई और पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है?”

उसने बड़े ही सधे अंदाज में कहा- “मीरा”।

तुम इस वक्त कहाँ जा रही हो? अभी तो स्कूल की छुट्टी भी नहीं हुई है। उसने कहा, “मैं अपने घर जा रही हूँ। आज घर पर खाना नहीं बना था और मुझे अभी बहुत तेज भूख लगी है”।

“तुम्हार घर कहाँ है?”

उसने पास के एक गांव का नाम बताया- “जमजोड़ी।”

लेकिन वह तो बहुत दूर है।

कोई बात नहीं मैं आधे घंटे में खाना खाकर आ जाऊँगी। यह कहकर वह तेजी से चली गई।

वह उधर गई और इधर हम सब सहेलियाँ अपने खेल में लग गईं, क्योंकि मध्यान्ह भोजन का समय अभी बचा हुआ था। उस दिन के बाद तो वह मेरी सहेली ही बन गई थी, और धीरे-धीरे सबसे प्यारी सहेली बन गई।

हम अक्सर एक दूसरे को देखते, हाथ हिलाकर मुस्कुराते और कभी समय होता तो थोड़ी बहुत बातें भी करते। उसका साँवला रंग, एकदम साफ-सुथरे और करीने से पहने हुए कपड़े और बेहद सरल स्वाभाव मुझे बहुत भाता था।

बातों-बातों में पता चला था कि उसकी माँ सौतेली है और वह उसे बहुत परेशान करती है।

खूब काम करवाती है, और मारती भी है।

बावजूद इसके वह बहुत हीं होशियार और पढ़ाई में तेज थी। उसे सरकार की तरफ से स्टाइपेन भी मिलता था।

हमारी जिन्दगी में यह पहली आदिवासी लड़की थी, जो पढ़ने का इतना चाव रखती थी।

एक दिन मीरा बहुत दुखी थी, पूछने पर बताया कि “अब मैं आगे नहीं पढ़ पाऊँगी। घर का काम करके बहुत थक जाती हूँ”।

तब मैंने उसे सुझाया था कि क्यों नहीं तुम भी हमारे स्कूल में हीं दाखिला ले लेती हो। रोज तुम्हारा आधा घंटा जाने और आधा घंटा आने का समय बच जाया करेगा। वह बोली, “क्या तुम हमारी मदद करोगी?” मैंने कहा क्यो नहीं, चल तुझे अपने हेडमास्टर साहब(प्रिंसिपल) से मिलवा देती हूँ। चूंकि मैं अपने स्कूल की एक होनहार छात्रा मानी जाती थी, इसलिए सभी शिक्षक मुझे जानते थे और उनका नरम रवैया रहता था, मेरे प्रति। उसी वक्त मैं मीरा को लेकर हेडमास्टर साहब के कमरे में गई। और उसकी परेशानी बताई। सर दाखिला लेने के लिए राजी हो गए। मैंने और मीरा ने मिलकर एक एप्लीकेशन दाखिले के लिए लिखकर जमा करा दिया। उसके बाद फिर एक एप्लीकेशन दूसरे स्कूल से टीसी लेने के लिए लिखा। एक दो दिन की भागा-दौड़ी के बाद उसका दाखिला हमारे हीं स्कूल में हो गया।

मीरा के घरवालों को काफी दिन बाद पता चली कि उसने स्कूल बदल लिया है। वैसे मीरा के पिता को छोड़कर उसके परिवार में किसी को कुछ खास फर्क नहीं पड़ता था इससे। दो दिन मीरा के पिता उससे नाराज रहे, फिर सब सामान्य हो गया। उसके पिता को समझ आ गया कि यह स्कूल उसके लिए ज्यादा अच्छा है।

अब हम ज्यादातर समय साथ हीं रहते। उसके पास बहुत सारे हुनर थे, जो मुझे आकर्षित करते थे। पढ़ाई में जो दिक्कत उसे आती वह मैं दूर कर दिया करती थी। अक्सर दोपहर को टिफिन जल्दी निपटाकर हम कभी चटाई बनाना सीखते, कभी मूंज की डलिया, टोकरी बनाते तो कभी, फूस के झाड़ू बनाते। हमारी सारी सहेलियाँ हमारे इस काम से खफा रहती। वो कहती और कोई काम नहीं बचा तो चूड़े-चमारों वाले काम करती है। इसके घर में शिकायत लगा देंगे। पर मैं इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती।

एक दिन हमारी एक छोटी सी चटाई पूरी हो गई तो उसे लेकर खुशी से मम्मी को दिखाने घर आई। मम्मी तो अचंभित थी, यह देखकर कि इसने चटाई बनाना कब सीखा। हमारे घरों में तो ऐसा माहौल ही नहीं है। यह तो नीची जाति के लोग हीं ज्यादा बनाते हैं। उन्हें अच्छा लगा यह जानकर कि इसके हाथों में कुछ तो कला है। लेकिन हमारी पढ़ाई को लेकर चिंतित हो गईं कि कहीं इसका मन पढ़ाई से हट ना जाए।

फिर मैंने अपनी नयी सहेली मीरा के बारे में सब कुछ बताया कि वो कितना मेहनत करती है। पढ़ाई में भी कितनी अच्छी है। माँ को अच्छा लगा उसके बारे में जानकर। उन्होने बाद में सिर्फ इतना कहा कि क्या करोगी ये सब सीखकर। हमारे समाज में इसे अच्छा नहीं मानते हैं लोग। यह काम अलग समुदाय के लोग करते हैं।

हमारे ऊपर इसका असर नहीं होना था सो नहीं हुआ। हम पहले की तरह साथ में पढ़ते और साथ में यह सब काम भी करते रहते। छोटी सी झाड़ू,छोटी सी चटाई काफी दिनों तक मैंने अपने किताब वाले बक्से में छिपाकर रखा था।

आठवीं कक्षा में हमने साथ-साथ हाईस्कूल में दाखिला लिया और दसवीं तक हमारी पढ़ाई बे रोक-टोक चलती रही। दसवीं के बोर्ड के लिए हमें कुछ दिनों के लिए स्कूल से छुट्टी दी गई। छुट्टियाँ खत्म होने के बाद जब मैं स्कूल गई तो मीरा नहीं मिली।

मैंने सोचा शायद बीमार हो आ जाएगी दो-एक दिन बाद। लेकिन दिन बीतते गए यहाँ तक कि परीक्षा का समय भी आ गया फिर भी वह नहीं आई। मैंने अपने हिसाब से बहुत कोशिश की उसे खोजने की, लेकिन उसका पता नहीं लग पाया। मीरा के गांव जाने की इजाजत मुझे मम्मी की तरफ से नहीं मिली। मेरी माँ बहुत ही अनुशासन पसंद और कड़क स्वाभाव की थीं, उस समय। शायद इसलिए भी कि अकेले दम पर चार बच्चों की जिम्मेदारी थी, उनके ऊपर। मेरे पिताजी हमारे आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के जुगाड़ में ज्यादातर शहर में हीं रहते थे।

बोर्ड की परीक्षा में भी शामिल होने के लिए वह नहीं आई। धीरे-धीरे मैं अपनी आगे की पढ़ाई में व्यस्त होने लगी लेकिन मीरा को भूल नहीं पा रही थी, हर वक्त मन में यही चल रहा होता कि कहीं से आ जाए वह और जोर से हंसकर कहे, देख मैं आ गई। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरा दाखिला पास के शहर में एक कॉलेज में करा दिया गया। मैं आगे की पढ़ाई में मशरूफ हो गई। एक दिन मैं अपने बड़े भाई के साथ रिक्शे में गाँव से शहर की तरफ जा रही थी। तो किसी ने मुझे आवाज लगाई। मैंने ध्यान नहीं दिया, मुझे लगा मेरा वहम है। उसने मुझे फिर से तेज स्वर में आवाज लगाई, मैं चिहूंक गई कि अरे ये तो मीरा की आवाज है। पीछे मुड़कर देखा तो मीरा बहुत तेजी से मेरे रिक्शा के पीछे-पीछे चली आ रही थी।

मैं इतनी खुश हो गई कि रिक्शे के लगभग कूदकर उसके पास गई और उसके गले से लिपट गई। काफी देर तक हम दोनों रोते रहे। फिर उसके बारे में पूछा तो वह और रोने लगी। उसे बहुत मलाल था पढ़ाई छूटने का। संथालों की परंपरा के अनुसार किसी लड़के ने पनघट पर उसका हाथ पकड़ लिया था, और वह उसकी पत्नी मान ली गई थी। यह उसकी सौतेली माँ की साजिश के तहत हुआ था। अब उसके तीन बच्चे थे, जो उस समय उसे घेरे हुए खड़े थे। काफी देर तक हम चुपचाप खड़े रोते रहे।

उसके बाद फिर मीरा मुझे कहीं नहीं मिली। आज भी मुझे उसकी बहुत याद आती है। कभी लगता है, शायद किसी सोशल साइट पर किसी दिन मिल जाएगी। फिर ध्यान आता है, वह तो तकनीक की दुनिया से काफी दूर है। ऐसी दुनिया में जहाँ खाना,पीना,बच्चे पालना, घर सम्भालने के अलावा औरतों की दुनिया ही नहीं है। पर मन बार-बार खोजता है कि, “मीरा तुम कहाँ हो?”

प्रीतिमा वत्स 

इस कहानी को इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है।

https://livewirenews.in/meera-tum-kahan-ho-adhoori-dosti-ki-kahani/

Thursday, May 7, 2026

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं, उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं, उतनी ही स्मृतियां। संतालों के साथ साथ यहां उन गैर संताल समुदायों की भी एक बड़ी दुनिया रही है, जिन्हें संताल समाज अपने ढंग से "दिकू" कहकर पुकारता रहा। लेकिन इस संबोधन के भीतर भी सदियों का साथ बसा हुआ है। खेत साझा रहे, मौसम साझा रहे, और धीरे धीरे कई लोक विश्वास भी एक दूसरे में घुलते चले गए।


उन्हीं लोक स्मृतियों में एक नाम है — बनसत्तो माई।

गांवों की लड़कियां जब साग तोड़ने जंगल या खेतों की ओर जाती थीं, तो रास्ते में कहीं मिट्टी का एक छोटा सा ढेर जमा कर उसे बनसत्तो माई का रूप दे देती थीं। फिर पहला साग उसी पर चढ़ाया जाता था। साथ में यह गाती भी....

हे हे बनसत्तो माय, हमरो खोइछो दिहो भराय।।

यह पूजा किसी बड़े विधान की तरह नहीं होती थी। न कोई पुरोहित, न कोई शास्त्र। बस कुछ हरी पत्तियां, थोड़ी मिट्टी और मन में बसा एक सीधा भरोसा।

मान्यता थी कि बनसत्तो माई की पूजा करने से साग ज्यादा टूटेगा और कम समय लगेगा। सुनने में यह बात बहुत छोटी लग सकती है, पर दरअसल यह पूरे लोक जीवन की थकान और उम्मीद से जुड़ी हुई बात थी। जंगल दूर होते थे, काम बहुत होता था, और दिन छोटे पड़ जाते थे। ऐसे में यह विश्वास लड़कियों के श्रम को हल्का करता था। जैसे कोई अदृश्य हाथ उनके साथ साथ चल रहा हो।

ध्यान से देखें तो यह केवल पूजा नहीं थी, श्रम और प्रकृति के बीच का एक संवाद था। साग तोड़ना भी यहां एक सांस्कृतिक क्रिया थी। जंगल से कुछ लेने से पहले उसे प्रणाम करना जरूरी था। मिट्टी का वह छोटा सा ढेर दरअसल धरती के प्रति कृतज्ञता का सबसे सरल रूप था।

अब वह दृश्य धीरे धीरे गायब हो रहा है। जंगल सिकुड़ गए हैं, साग बाजार में बिकने लगा है, और लड़कियों के हाथों की वह मिट्टी सूखती जा रही है। फिर भी लगता है कि संथाल परगना की हवा में बनसत्तो माई अब भी कहीं बची हुई हैं। शायद किसी पगडंडी के किनारे, किसी बूढ़ी स्मृति में, या किसी बच्ची के हाथ में लगी मिट्टी की गंध में।

लोक का इतिहास किताबों में कम मिलता है। वह लोगों की आदतों में बचा रहता है। बनसत्तो माई भी वैसी ही एक बची हुई आदत हैं — जो बताती है कि इस इलाके में जंगल या खेत केवल पेड़ों या फसलों की जगह का नाम नहीं था, वह हमारे और आपके  भरोसे का भी दूसरा नाम था।

- प्रीतिमा वत्स

 

Saturday, March 28, 2026

बाल बजरंग बली और बचपन की वह देहरी



मेरे ससुराल के आंगन में हनुमान जी का एक छोटा सा, अत्यंत प्रिय मंदिर है। इस देवालय के अस्तित्व में आने की कथा बड़ी ही रोचक और कौतुकपूर्ण है।

जब मैं इस घर में वधू बनकर आई थी, तब मेरी पूज्या सासु मां ने इस मंदिर के निर्माण का वृत्तांत सुनाया था। मेरे ससुर जी जमालपुर महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और सासु मां निकट के ग्राम में प्रधानाध्यापिका थीं। घर पर दादी की छत्रछाया में बच्चों का संसार पलता था।

घटना तब की है जब घर के नवनिर्माण का कार्य चल रहा था। देव और उनकी अनुजा ज्योति किरण (जो अब डॉक्टर ज्योति किरण हैं और कानपुर के महाविद्यालय में प्राध्यापिका हैं) उस समय बहुत छोटे थे। विद्यालय से लौटकर दोनों बाल मन बड़ी तन्मयता से राजमिस्त्री को काम करते देखा करते थे। कारीगरों को देख उनके भीतर भी सृजन की अभिलाषा जागी। दोनों भाई-बहन ने परस्पर मंत्रणा की और एक नन्हे निर्माण की नींव पड़ गई।

खेल-खेल में ही दोनों ने थोडा-थोडा सीमेंट, मसाला, ईंट और छड के टुकड़े एकत्र करना प्रारंभ कर दिया। देखते ही देखते उनकी मेहनत से एक तीन मंजिला मंदिर आकार लेने लगा। मां ने यह सब देखा, पर विशेष ध्यान नहीं दिया; उन्हें लगा कि बाल सुलभ क्रीड़ा है, बच्चे स्वयं ही इसे बाद में विसर्जित कर देंगे।

किंतु जब बाबूजी अवकाश में घर आए, तो उन दोनों नन्हे वास्तुकारों का कौशल देखकर वे मुग्ध हो गए। उन्होंने स्वयं मिस्त्री से कहकर उस मंदिर का गुंबद बनवाया और प्रभु की एक सुंदर मूर्ति भी ले आए। घर के समस्त बालकों ने मिलकर उत्साह पूर्वक मूर्ति की स्थापना की। मां और बाबूजी ने स्नेहवश कहा था— "तुम बच्चों ने इसे बनाया है, अतः सेवा और अर्चना का उत्तरदायित्व भी तुम्हारा ही होगा।"

देव और ज्योति के साथ मोहल्ले के अन्य बालक भी बड़े उत्साह से विद्यालय जाने से पूर्व वहां पूजा करते थे। वह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, अपितु बच्चों के उल्लास का भी माध्यम था।

ग्रीष्मकालीन अवकाश हो, दुर्गा पूजा हो या कोई पारिवारिक उत्सव, जब पूरा कुनबा एकत्र होता, तो वहां एक अनुपम दृश्य होता था। मित्तू, डिक्कू, चिंटू, मीनू, बिट्टू, पीयूष, आयुष, वर्षा, पूजा, नन्हें और पड़ोस के रिंकू, पप्पू, रवि, राजेश, मुकेश, राकेश, मिटुश, पिंटू, लालबाबू जैसे अनगिनत बच्चे जुट जाते। इस आयोजन में घर के सहायक पूरन जी के बच्चे फुलेंदर, कविता और मधुसूदन भी अभिन्न अंग होते थे।

सबको एकत्र कर देव एक गोष्ठी करते, जिसमें पूजन की योजना बनती। बच्चे अपनी माताओं से धन मांगकर लाते और देव को सौंपते। यदि धनराशि कम पड़ती, तो दादी से एक बड़ी राशि की वसूली की जाती। बच्चों के प्रिय 'लाल चाचा' (देव) के आदेश का सब निष्ठा से पालन करते। पूजन सामग्री की सूची बनती और प्रचुर मात्रा में मिष्ठान एवं बताशे मंगवाए जाते।

भक्ति और हर्ष के साथ पूजन संपन्न होता। पूजा के पश्चात लाल चाचा का यह निर्देश रहता कि सबको प्रसाद अल्प मात्रा में ही देना है। शेष संपूर्ण प्रसाद देव और उनकी वानर सेना बड़े चाव से मिलकर समाप्त करती थी। यह महोत्सव लगभग सप्ताह भर चलता और घर का प्रत्येक सदस्य इसमें आनंदपूर्वक सम्मिलित होता। मां ने श्रद्धावश इन हनुमान जी का नाम ही 'बाल हनुमान' रख दिया था।

आज भी जब हम छुट्टियों में घर जाते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह मंदिर और उसके समीप खड़ा विशाल मौलिश्री का वृक्ष हमारी प्रतीक्षा में पलकें बिछाए बैठे हैं। वे हमारे संपूर्ण परिवार पर शुभाशीष की वर्षा करते हैं। रामनवमी के अवसर पर वहां अत्यंत प्रेम से पूजन होता है। हमारी अनुपस्थिति में भी पड़ोस के परिजन बड़े स्नेह से मंदिर का श्रृंगार और पूजा करते हैं.

हमारे बाल बजरंग बली की जय हो!

Sunday, May 25, 2025

Lok Astha ka prateek Lukluki Gaon ka Saali Puja.

www.gaonjunction.com/lokrang/gramyug/sali-puja-of-lukluki-one-day-when-the-whole-village-becomes-a-devotee-of-maa-kali?fbclid=IwY2xjawKft1xleHRuA2FlbQIxMABicmlkETFrQUlzajkyUWNwNnZpNzdhAR77AZIWYmsIXFbnWpJkpUlYdR-HfTKofdHp8mTnPSU-Qzb74h0B5LIyiq7zkQ_aem_EreeCD95RL5118ocNStOAQ



Saturday, January 21, 2023

Aangan me Tulsi Chaura (एंगना मॅ तुलसी चौरा)

दुनिया के सब आपाधापी सॅ थकी क जबS दिन दुपहरिया घोर जाय छेलियै त एंगना मॅ तुलसी के लहलहैलो पौधा देखी क जी जुड़ाय जाय छेलै। जहिया सॅ महानगर मॅ रहैलS ऐलो छीं, हौ रंग लहलहैलो तुलसी देखय लS तरसै छीं। महानगर के एतना व्यस्त जीवन आरो ज्यादातर लोगो के मरुऐलो चेहरा देखी क बड़ी हताशा होय छै। यहाँ त तुलसी के पौधा भी बालकोनी के एक कोना मॅ पड़लो एक चुरू पानी के इन्तजार करतॅ रहै छै। हौ तुलसी जे खुद नाय खुश रहैलS पारी रहलो छै वॅ दोसरा क केना खुशी दै ल पारतै। करीब-करीब हर फ्लैट मॅ तुलसी के यहा हाल छै। तुलसी चौरा के त रिवाजे खतम होय गेलो छै यहाँ, कैन्हे कि नाय त आंगन छै नाय बरामदा जे आदमी एक टा चौरा बनाय ल पारतै। मजबूरी मॅ कन्हौं कोनो कोना मॅ एक गमला राखी क तुलसी लगाय लै छै लोगS। यहाँ केरो है हालत देखी क बार-बार गामों केरो तुलसी चौरा याद आबी जाय छै। कतना जीवन्त लागय छै हौ घोर जहाँ एंगना के ईशान कोण मॅ तुलसी चौरा रहै छै, आरो वै चौरा मॅ तुलसी के पौधा हलहलैतS रहै छै। एन्हों लागै छै कि घरो के हर सदस्य पर आपनों दुलार लुटाय रहलो छै। हमरा आय भी हौ दिन याद छै जबS हमरो माय करीब एक महीना कहीं बाहर रही क घोर ऐलो छेलै तॅ तुलसी के मुरझैलो पौधा देखी कॅ केतना उदास होय गेलो छेलै। कहियो गोस्सा नाय करै वाली माय हौ दिन करीब-करीब घरो के हर सदस्य पर नाराज होलो छेलै। दु-तीन दिन बाद जबS तुलसी हरियैलै तभी माय के चेहरा पर मुस्कान ऐलो छेलै। होकरो बादो स घरो के सब लोग कॅ है ताकीद करी देलो गेलै कि चाहे कुछ होय जाय तुलसी के ध्यान हमेशा राखलो जैतै। सांझ बेरा मॅ जेन्है तुलसी मॅ दीप जलै छेलै ऐन्हो लागै छेलै कि सच मॅ तुलसी माता चौरा मॅ आबी क बैठली छै। धर्म, आस्था आरो परंपरा के हिसाबो सॅ त तुलसी चौरा के स्थान महत्वपूर्ण छेबे करैय। आयुर्वेद के हिसाब सॅ भी तुलसी के पौधा के बहुत महत्व छै। आयुर्वेद के हिसाब स तुलसी आरो पीपल हीं ऐन्हों पौधा आरो पेड़ छै जे दिन-रात ऑक्सीजन छोड़ै छै। पीपल एतना बड़ो होय जाय छै कि आंगन मॅ लगाना मुश्किल छै। तुलसी के पौधा हर मौसम आरो हर तरह के मिट्टी मॅ आसानी सॅ लागी जाय छै। छोटो जगह मॅ भी हेकरा आसानी सॅ लगैलो जाय ल सकै छो। तुलसी के पौधा सॅ लैकS पत्ता, फूल, बीज सब बहुत गुणकारी मानलो जाय छै। यै वास्तॅ भी हर घर वास्तॅ तुलसी के पौधा एक जरूरी पौधा होय जाय छै। कुछ साल पहिने तक त बैसाख के महीना मॅ तुलसी के रक्षा वास्तॅ एक मिट्टी के घड़ा पौधा के उपरो पर लटकाय देलो जाय छेलै, जेकरा सॅ बूंद-बूंद पानी टपकतॅ रहै छेलै। घरो के हर सदस्य नहाय कॅ एक लोटा जल घड़ा मॅ जरूर डालै छेलै। ऐकरो दू फायदा त सीधा नजर आबै छै। एक त यही बहाना घरो के सब आदमी समय पर नाही लै छेलै आरो साथॅ-साथॅ तुलसी के पौधा भी धूप आरो गर्मी सॅ बचलो रहै छेलै। दुपहरिया मॅ जबॅ लू बरसै छै तबॅ है घड़ा के चलते एंगना मॅ थोड़ो त राहत जरूर महसूस होय छेलै। पहेलको जमाना मॅ जब घरो के कोय बूढ़ो-बुजुर्ग मरनास्न्न होय छेलै त हुनका तुलसी चौरा ल हीं लेटैलो जाय छेलै। यै उम्मीद सॅ कि शुद्ध हवा सॅ शायद कुछ देर आरो प्राण बची जाय, या शुद्ध हवा के संपर्क मॅ शरीर सॅ प्राण निकलै मॅ ज्यादा कष्ट नाय होतै। रोजी-रोटी के तलाश मॅ महानगर म रहना त मजबूरी होय गेलो छै। लेकिन आभियों तब गांव जाय छियै आरो आंगन मॅ तुलसी के लहलहैलो पौधा देखै छियै तS मोन गदगद होय जाय छै। सांझ के बेरा मॅ जब घरो के करीब-करीब सब लोग आंगन मॅ बैठी क गपशप करै छै आरो तुलसी के चौरा मॅ दीप जलै छै त एन्हों लागय छै कि तुलसी माय के आशीर्वाद पूरा परिवार पर बरसी रहलो छै। -प्रीतिमा वत्स

Tuesday, November 1, 2022

JANANIYE HATHON MA CHAI LOK KE Dor (Angika)

Angika ma aalekh - 

जनानिये हाथों मं छै लोक केरो डोर

आज के बदललो परिवेश मं यदि हम्म मोटो तौर पर एक नजर डालै छिये त एहनो लागय छै कि ‘हाय रे बाप है त पूरा तरह सं विज्ञान युग होय गेलै।’ आरो वैज्ञानिक युग मं त हर चीज कॅ प्रमाण के कसौटी पर खरा उतरै ल लागय छै जे कि लोक जीवन मं संभव नाय छै। लोक जीवन त मोटा-मोटी एक मौखिक आरो वाचिक परंपरा पर आधारित छै। आरो एक पीढ़ी सं दोसरो पीढ़ी मं सुनी बुझी कं विरासत नाकी आगूं बढ़लो जाय छै। है त होल्हों किताबी बात, हेकरा सं एकदम उलटा एक सच योहो छै कि आभियो जौं तोहों गांवो घरो के रोजको जिनगी मं हुलकभौ त पता चलथौं कि लोक जीवन त एकदमें नाय बदललो छै। है आपनो मजबूत जड़ो के साथं एकदम लहलहाय आरो फली-फूली रहलो छै। लोक जीवन आरो लोक संस्कृति के है मजबूती के कारण जानै के कोशिश करभौ त जनानिये हाथों म तोरा हेकरो डोर नजर ऐथों।

हर परंपरा हर संस्कृति क ओना त जीयै छै समाज के हर तबका के हर आदमी,बूढ़ो,बच्चा। सभै के आपनो-आपनो भागीदारी रहै छै, जेकरा सभैं नं आपनो-आपनो हिसाबों सं निभाय के कोशिश करै छै। लेकिन मुख्य भूमिका त जनानी ही निभाय रहलो छै। हेकरो कई कारण होय ल पारैय छौ। रोजी-रोटी के खोज मं मरदाना सिनी त गांव जबार सं बाहर चलो जाय छेलै आरो गामों मं रही जाय छेलै जनानी आरो बच्चा त परंपरा त जनानिये निभैतियै नी। एक कारण हेकरो आरो नजर आबै छै कि शुरू सं हीं ज्यादातर घरेलू काम काज के जिम्मेदारी जनानी के हीं हाथों मं रहै छै। मरदाना घरेलू कामों मं ज्यादा नाय पड़ैल चाहे छै, भरसक यहू वास्तं सब जिम्मेदारी निभैते-निभैते जनानी सं अनजाने हीं एतना महत्वपूर्ण काम होय गेलै।

 लोक परंपरा आरो लोक विरासर के एक पीढ़ी सं दोसरो पीढ़ी मं हस्तांतरित होय के क्रम मं कहियो- काल परिस्थिति आरो माहौल के अनुसार कुछ लोक देवी-देवता या परंपरा के छवि कुछ मद्धिम पड़ी जाय छै। कै बार कोय नया देवी-देवता के पूजा आरो नैम धरम सामना मं आबी जाय छै। 33 हजार करोड़ देवी-देवता के मान्यता वाला लोक संसार मं है त संभव नाय छै नि की सब देवी-देवता के पूजा-पाठ आरो मान्यता हर समय समान रूपो सं ही होय ल पारैय। यही वास्तं शायद बेरा बखत के हिसाबो सं सब लोक देवी-देवता के पूजा पाठ आरो महत्ता कम बेसी होतं रहै छै।

समय के साथं-साथं जग्घा पर भी बहुत कुछ निर्भर होय छै। कोय इलाका मं बनदेवी माय के पूजा ज्यादा होय छै, कोय इलाका मं सती बिहुला माय के त कोय इलाका मं कोयला माय के। यहा रंग अलग-अलग इलाका मं कुछ खास लोक देवी-देवता के पूजा प्रचलित छै।

लेकिन पूजा चाहे कोय इलाका मं हुअ, भिनसरियां उठी क कार्तिक नहाना हुअ या सांझ के बाती दिखाना हुअ, पूजा के थाल ज्यादातर जनानीये हाथों मं नजर ऐथों। दक्खिन भारत मं भी यहा हाल देखलिऐ। सूर्योदय सं पहिनै उठी क पूरा घोर साफ-सुथरा करी क घरो के आगूं रंगोली जनानिये बनाय छै करीब-करीब सब घरो मं। राजस्थान के गामों घरो मं आभियो कोस-कोस भर दूर सं भिनसरियैं उठी क पियै के पानी लानना जनानीये के काम छै। जरूरत के साथं-साथं है वहां के परंपरा आरो संस्कृति के एक हिस्सा भी होय गेलो छै।

लाख पंडित पुरोहित रहै लेकिन गामो घरो मं आभियो कोय नेम धरम के बात पूछना हुअ त कोय बूढ़ो-बिरधो काकी या दादी के बात हीं पहिनै मानलो जाय छै। लोक साहित्य के एक बहुत बड़ो ज्ञानी पुरूख राजेन्द्र धस्माना जी न एक जगह कहनं छै कि, “साहित्य के असली जोड़ लोक मं छै आरो लोक स्त्री के उपस्थिति के बिना अधूरा छै। यै वास्तं साहित्य मं स्त्री के उपस्थिति क खोजै वाला क भी लोक साहित्य मं स्त्री क पहिने देखना चाहियो।” है त बिल्कुल सच बात छै कि परंपरा स लैक मानवीय रिश्ता तक सब स्त्री के जन्मजात गुण के तरह छै। जनानी के अति उदार स्वाभाव आरो सुख-दुख क बहुत करीब सं झेलै के कारण हीं सांस्कृतिक चेतना भी हुनका मं ज्यादा होय छै। भरसक यहा कारण छै कि जनानी लोक जीवन के अगुआई करै मं ज्यादा निपुण साबित होय छै। यही वास्तं लोक कथा, पहेली, फेकड़ा, लोकगीत आरो तमाम मौखिक सांस्कृतिक धरोहर क आत्मसात करै म आरो होकरा आगूं बढाय मं जनानी के हमेशा महत्वपूर्ण योगदान रहलो छै।

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 -प्रीतिमा वत्स

 

Tuesday, July 20, 2021

सूर्य को समर्पित एक अंगिका लोक गीत

 सोना के खड़ाम चढ़ी अइलै सुरुज देव,

खाड़ भेलैय मड़वा अँगनमा, हाथे सोवरणों केरो साट हो।

यही साटे मारवो रे भगता, हमरो भोजनमा देने जाहो हे।

कर जोरी ठाड़ो भेलै भगता जे सभे भगता,

तोहरो भोजनमा हो सूरुजदेव हलसी क दियबो,

हमरो आशिष देने जाह हो।

बाढ़ियो संतति, बाढ़ियो संपत्ति, बाढ़ियो कुल परिवार हो।

सूर्य को समर्पित इस अंगिका लोकगीत में यह वर्णन किया गया है कि सोने के खड़ाऊँ पहन कर सोने के रथ पर सवार सूर्य देव अपने भक्तों के पास आते हैं। दर्शन देने के उपरान्त भोजन की मांग करते हैं। भक्त जो उनके दर्शन पाकर हीं निहाल हो रहे हैं, कहते हैं कि हे प्रभू आपका भोजन तो हम खुश होकर देंगे। यह तो हमारे लिए सौभाग्य की बात है, आप कृपा करके हम भक्तों को आशीर्वाद देते जाइए।

सूर्य देव उन्हें आशीर्वाद देते हैं – तुम्हारी सम्पत्ति का विस्तार हो.......

तुम्हारे संतति (वंश) का विस्तार हो............

तुम्हारे कुल और परिवार का विस्तार हो..................।

(यह गीत हर शुभ अवसर पर खासकर शादी, उपनयन, मुंडन आदि पर सबसे पहले गाया जाता है।)

मूल अंगिका गायिका- दुर्गा देवी.

अनुवाद- प्रीतिमा वत्स


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Sunday, November 1, 2020

लोक देवी विषहरी (FOLK GODDESSES VISHAHRI)























प्रकृति की खूबसूरत गोद में बसा हुआ लोक जीवन प्रकृति से जितनी खुशी पाता है। उसी अनुपात में संघर्ष और परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। हर साल कई सौ आदमी सर्पदंश से मारे जाते हैं या इसकी भयानक पीड़ा को झेलते हैं। आज भी हमारे देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में जड़ी-बूटी और देवी देवताओं की पूजा के सहारे लोग इस त्रासदी से निपटने की कोशिश करते हैं। सर्पदंश से बचने के लिए ग्रामवासी भैरव देव, नाग देवता, देवी विषहरी, मनसा देवी आदि लोक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।

लोक देवी-देवताओं की पूजा और जड़ी-बूटियों के सहारे कितनी कामयाबी मिलती है यह तो विवाद का विषय है, लेकिन लोक में यह नुस्खा बहुत ही लोकप्रिय और सर्वमान्य है।

आज हम यहाँ पर विषहरी देवी के बारे में विस्तार से वर्णन करेंगे-

विषहरी बड़ दुलरी, विषहरी बड़ दुलरी।

कहाँ शोभे बाजू-बंदा कहाँ टिकुली-2

कहाँ शोभे विषहरी माय के लाल चुनरी

कहाँ शोभे विषहरी माय के लाल चुनरी,

विषहरी बड़ दुलरी, विषहरी बड़ दुलरी।

जैसा कि नाम से हीं स्पष्ट हो रहा है, विष का हरण करने वाली देवी हैं विषहरी। लोक में देवी विषहरी की पूजा बड़े ही धूमधाम के साथ किया जाता है। सर्परूप में होने के बावजूद विषहरी देवी की पूजा सर्पदंश की पीड़ा से मुक्ति के लिए की जाती है। बिहार और झारखंड में प्रायः हर गांव के मुहाने पर इनका मंदिर होता है। ग्राम देवता की सलाना पूजा के साथ इनकी भी पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि गांव के मुहाने पर इनकी उपस्थिति से गांव आपद-विपद से मुक्त रहता है। महामारी और प्राकृतिक आपदा से यह गांव वासियों की रक्षा करती हैं। गांव के लोग इनकी अराधना अपने हर शुभ कार्य के पहले करते हैं। शादी-ब्याह, उपनयन, मुंडन आदि में इनकी पूजा का विशेष विधान रहता है। इनकी पूजा का विधान भी कुछ अलग सा हीं है। इन्हें गाय का कच्चा दूध चढाया जाता है। साथ में कागज से बना एक खास तरह का मंजुषानुमा झांपी या मड़री चढ़ाया जाता है। सलाना पूजा के समय चावल को पीसकर गुड़ के साथ मिलाकर एक खास तरह का पीठा बनाया जाता है, जो इन्हें भोग लगता है। तब इनका आँचल भी बदला जाता है। घी में सिंदूर को मिलाकर इनका श्रृंगार किया जाता है। यह पूजा नियत भगत की पत्नी या उसी परिवार की कोई महिला करती है। पूजा में उपयोग किया गया  सिंदूर का घोल प्रसाद के रूप में वहाँ उपस्थित सभी सुहागन महिलाओं को भी पहनाया जाता है। साथ में कई तरह से देवी की स्तुति की जाती है, जिसे मनान गीत कहा जाता है-

पाँचो बहिनी कुमारी हे विषहरी

खेल चार चौमास हे विषहरी

वहाँ से चली भेली हे विषहरी

कणुआ घर आवास हे विषहरी।

कणुआ के बेटा उत्पाती हे विषहरी

लावा छीटी परैलखौं हे विषहरी-2

पांचो बहिनी कुमारी हे विषहरी

खेल चार चौमास हे विषहरी-2

देवी विषहरी की पूजा का महत्व सती बिहुला की पूजा में भी किया गया है।

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-प्रीतिमा वत्स


Mai aur meri kala yatra.