लोक देवी-देवताओं की
पूजा और जड़ी-बूटियों के सहारे कितनी कामयाबी मिलती है यह तो विवाद का विषय है,
लेकिन लोक में यह नुस्खा बहुत ही लोकप्रिय और सर्वमान्य है।
आज हम यहाँ पर
विषहरी देवी के बारे में विस्तार से वर्णन करेंगे-
विषहरी बड़ दुलरी,
विषहरी बड़ दुलरी।
कहाँ शोभे बाजू-बंदा
कहाँ टिकुली-2
कहाँ शोभे विषहरी
माय के लाल चुनरी
कहाँ शोभे विषहरी
माय के लाल चुनरी,
विषहरी बड़ दुलरी,
विषहरी बड़ दुलरी।
जैसा कि नाम से हीं
स्पष्ट हो रहा है, विष का हरण करने वाली देवी हैं विषहरी। लोक में देवी विषहरी की
पूजा बड़े ही धूमधाम के साथ किया जाता है। सर्परूप में होने के बावजूद विषहरी देवी
की पूजा सर्पदंश की पीड़ा से मुक्ति के लिए की जाती है। बिहार और झारखंड में
प्रायः हर गांव के मुहाने पर इनका मंदिर होता है। ग्राम देवता की सलाना पूजा के
साथ इनकी भी पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि गांव के मुहाने पर इनकी उपस्थिति से
गांव आपद-विपद से मुक्त रहता है। महामारी और प्राकृतिक आपदा से यह गांव वासियों की
रक्षा करती हैं। गांव के लोग इनकी अराधना अपने हर शुभ कार्य के पहले करते हैं।
शादी-ब्याह, उपनयन, मुंडन आदि में इनकी पूजा का विशेष विधान रहता है। इनकी पूजा का
विधान भी कुछ अलग सा हीं है। इन्हें गाय का कच्चा दूध चढाया जाता है। साथ में कागज
से बना एक खास तरह का मंजुषानुमा झांपी या मड़री चढ़ाया जाता है। सलाना पूजा के
समय चावल को पीसकर गुड़ के साथ मिलाकर एक खास तरह का पीठा बनाया जाता है, जो
इन्हें भोग लगता है। तब इनका आँचल भी बदला जाता है। घी में सिंदूर को मिलाकर इनका
श्रृंगार किया जाता है। यह पूजा नियत भगत की पत्नी या उसी परिवार की कोई महिला
करती है। पूजा में उपयोग किया गया सिंदूर
का घोल प्रसाद के रूप में वहाँ उपस्थित सभी सुहागन महिलाओं को भी पहनाया जाता है।
साथ में कई तरह से देवी की स्तुति की जाती है, जिसे मनान गीत कहा जाता है-
खेल चार चौमास हे
विषहरी
वहाँ से चली भेली हे
विषहरी
कणुआ घर आवास हे
विषहरी।
कणुआ के बेटा
उत्पाती हे विषहरी
लावा छीटी परैलखौं
हे विषहरी-2
पांचो बहिनी कुमारी
हे विषहरी
खेल चार चौमास हे
विषहरी-2
देवी विषहरी की पूजा
का महत्व सती बिहुला की पूजा में भी किया गया है।
...............................................
-प्रीतिमा
वत्स