Sunday, March 30, 2008

सुख समृद्धि का प्रतीक शंख


कभी धर्म के लिए तो कभी आयुर्वेद के लिए शंख । कभी सौन्दर्य के लिए शंख तो कभी सुख समृद्धि के लिए शंख। सदियों से आदमी की जिन्दगी से जुड़ा है शंख।

वैसे तो शंख के कई प्रकार हैं, लेकिन दक्षिणावर्ती शंख, साधना मोती शंख और गणेश शंख की महत्ता कुछ अलग ही है। कोई शंख सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, तो कोई वातावरण को स्वच्छ रखता है।
दक्षिणावर्ती शंख- दांयी तरफ की ओर खुला भाग वाला शंख दक्षिणावर्ती शंख के नाम से जाना जाता है। यह थोड़ा दुर्लभ होता है। दक्षिणावर्ती शंख सफेद रंग मे उपलब्ध होता है, जिसपर हल्के भूरे रंग की धारियां होती हैं। यह शंख मां लक्ष्मी का अति प्रिय माना जाता है। दक्षिणावर्ती शंख को साधारणतया लोग अपने पूजाघर या लॉकर में रखते हैं। तथा किसी पर्व-त्योहार या उत्सव में ही निकालते हैं। यह सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार प्रत्येक देवी देवता अपने पास शंख रखते थे, जब कभी वे बहुत खुश होते या किसी युद्ध में विजयी होते तो इसका उपयोग करते थे। यह आम धारणा है कि जिस घर में दक्षिणावर्ती शंख होता है वहां सुख समृद्धि और शकून हमेशा रहता है। यह भी विश्वास है कि जो इसे अपने लॉकर में रखते हैं उन्हें जिंदगी में कभी पैसे की तंगी नहीं होती है। दक्षिणावर्ती शंख को सफेद कपड़े में लपेटकर या सफेद कपड़े के ऊपर रखा जाता है। तांत्रिक शास्त्र में इसका दूसरा ही महत्व है। इनके अनुसार दक्षिणावर्ती शंख धन का प्रतीक नहीं माना जाता है बल्कि यह बातावरण को स्वच्छ रखता है, और बुरी शक्तियां इससे कोसों दूर रहती हैं।
गणेश शंख- गणेश शंख व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा दिमकग में मजबूती लेता है। खुशी, सोहरत, अच्छा स्वास्थ्य के साथ-ताथ आत्मदिश्वास की प्राप्ति भी होती है। गणेश शंख को भगवान गणेश का प्रतिनिधि भी माना जाता है। गणेश शंख की उपयोगिता मुख्यत पूजा में होती है। इसके साधक सत्यवादी होते हैं तथा लंबी आयु पाते हैं। उसके बच्चे भी जन्म से ही रोगों से दूर रहते हैं तथा विषम परिस्थितियों में भी धैर्यवान होते हैं। गणेश शंख व्यवसाय के क्षेत्र में भी सहायक होता है।
फेंगसुई की दृष्टि से गणेश शंख व्यवसाय तथा विदेश यात्रा को प्रभावित करता है। यह शंख बुद्ध के पांव में पाए गए आठ निशानों में से एक है।6 से 8 इंच का एक गणेश शंख लेकर घर या आफिस के किसी कोने मेो रख दें। यदि आपके काम या शोहरत में बृद्धि होने लगी हो तो आप इसे घर के दक्षिणी हिस्से में रख दें। यदि आपका झुकाव पढ़ाई की तरफ हो तो आप इसे पूर्वोत्तर कोने में रखें। गणेश शंख को लोग अपने पूजाघर या लॉकर में रखते हैं, तथा किसी विशेष अवसर पर हीं इसे निकालते हैं।
साधना मोती शंख- मोती शंख साधारणतया गोल आकार का होता है, इसमें एक सफेद धारी होती है जो ऊपर से नीचे तक खिंची होती है। तथा पूरा शंख एक मोती की तरह चमकता रहता है। यह बहुत ही दुर्लभ किस्म का शंख है। इस शंख का उपयोग ज्यादातर ऐसे व्यक्ति करते हैं, जो सन्यास के मार्ग पर चल रहे हैं। इस शंख के माध्यम से उन्हें अपने ध्यान,योग आदि में बहुत सहायता मिलती है। वैसे तो दक्षिणावर्ती शंख साधना के लिए उत्तम माना जाता है। परन्तु मोती शंख और भी महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन यह बहुत दुर्लभ होता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस शंख में मां लक्ष्मी का वास होता है, जो धन और सम्पत्ति की देवी मानी जाती हैं। प्रत्येक परिवार इस शंख को अपने घर में रख सकता है।
आयुर्वेद में मोती शंख बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। रात को शंख में थोड़ा सा पानी डालकर रख दें और सुबह उसे अपनी त्वचा पर लगाएं तो त्वचा की सारी बिमारी दूर हो जाती है। यदि त्बचा पर सफेद दाग है तो शंख में थोड़ा पानी 12 घंटे तक रखें । उसके बाद उसे निकालकर त्वचा पर लगाएं, कुछ दिनों तक इस क्रिया को दोहराने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं। पेट की समस्या हो तो 12 घंटे तक शंख में रखा हुआ पानी सुबह-सुबह एक चम्मच पीयें। इस क्रिया को कुछ दिन तक दोहराने से पेट की सारी समस्या दूर हो जाती है। इस पानी का उपयोग आंखों में करने से आंखों की सास्या भी धीरे-धीरे दूर हो जाती है।
साधना मोती शंख के आर्थिक लाभ भी बहुत सारे हैं-सुबह सुबह शोख में थोडड़ा सा पानी लेकर एक बाल्टी पानी में डाल दें, उस पानी से नहाएं तो यश और भाग्य में वृद्धि होती है। अपने घर आफिस या कार्यक्षेत्र में इस शंख को रखने से आर्थिक परेशानी दूर हो जाती है। साधक धन तथा यश को प्राप्त करता है।
इस प्रकार प्रत्येक शंख अपने-आप में बहुत सारी महत्ता समेटे हुए है, और किसी भी कीमत पर कोई शंख एक दूसरे से का महत्वपूर्ण नहीं है।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, March 18, 2008

रंग है तो जीवन है


हमारा व्यक्तित्व, हमारी दिनचर्या, हमारा रहन-सहन और मिजाज सभी कुछ रंगों से प्रभावित होता है। जीवन में रंग है तो सब कुछ है वरना वह नीरस और बेमानी लगने लगता है।

जीवन में रंगों का अपना एक विशेष महत्व है। व्यक्ति किस रंग के परदे, चादर, तकिए का कवर आदि घर में लगाना पसंद करता है। घर की दीवारों पर कौन से रंग का पेंट पसंद है, आदि दैनिक जीवन से जुड़ी कई बातें हैं जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को बताती है। औरतों के स्वभाव का पता भी एक हद तक रोजमर्रे की जिंदगी में उनके द्वारा उपयोग किए जानेवाले कपड़े, लिपस्टिक,नेलपॉलिश,सैंडिल,कार आदि के कलर से चल जाता है। हल्के रंग के कपड़े,हल्के रंग की लिपस्टिक,नेल पॉलिश आदि व्यवहार करनेवाली औरतें स्वभाव से अक्सर गंभीर होती हैं। लाल,गाढ़ा गुलाबी,नारंगी आदि कलर का उपयोग करनेवाली औरतें जहॉं शोख चुलबुली मानी जाती हैं, वहीं गाढ़ा बैंगनी, नीला आदि कलर का उपयोग करनेवाली औरतें सतही तथा फूहड़ मानी जाती हैं। यह आज की बात नहीं है, वैदिक काल से ही मानव के कुछ विशिष्ट गुणों की पहचान कुछ खास रंगों से होती रही है। केसरिया रंग शौर्य और वीरता का हरा रंग हरियाली के साथ-साथ आर्थिक विकास का और सफेद रंग शांति और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इन तीनों रंगों को भारत के राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया गया है। आदिकाल से शुभ-अशुभ, हर्ष-विषाद, शांति आदि के लिए अलग-अलग रंगों का उपयोग किया जाता है। शादी-ब्याह और दूसरे मांगलिक अवसरों पर लाल रंग प्रयुक्त होता है, क्योंकि यह शुभ माना जाता है। लेकिन मृत्यु आदि के अशुभ समझे जाने वाले मौकों पर काले रंग का प्रयोग होता है। ये रंग हमारे जीवन में इतने रच-बस गए हैं कि इनसे इतर व्यवहार की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। रामायण और महाभारत में भी महारथियों के कपड़ों का रंग बहुत कुछ उनके व्यक्तित्व से मेल खाता हुआ ही बताया गया है। दुनिया के सभी मजहबों का अपना एक प्रतीक रंग है। हिंदू धर्म का प्रतीक रंग भगवा है तो ईसाई मजहब का सफेद और इस्लाम का हरा। वहीं जैन धर्म मानने वाले दो खेमे अपना अलग-अलग रंग पीला और सफेद रंगों को अपना प्रतीक रंग मानते हैं। और तो और धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादियों के लिए यह रंग उतना ही प्रिय और पवित्र माना जाता है, जितना विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए अपना-अपना रंग।
चिकित्सा शास्त्र खासकर प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में भी विभिन्न रंगों की बोतलों में पानी भरकर धूप में कुछ देर रखकर पीने से, अलग-अलग रंग की मिट्टी तक से बीमारियों की चिकित्सा बताई गई है।
जो लोग फलित ज्योतिष शास्त्र में आस्था रखते हैं, वे जानते हैं कि उनके जीवन में रंगों की कितनी अहम भूमिका है। हफ्ते के कौन से दिन किस रंग के कपड़े पहनने से लाभ या हानि होने की संभावना है। अपनी राशि और जन्म तिथि के मूलांक के हिसाब से कौन सा रंग शुभ और अनुकूल है या कौन सा रंग अशुभ या विघ्नकारक है, इसका एहसास उन्हें हमेशा रहता है। ग्रह-नक्षत्रों के विभिन्न रंगों के साथ संबंधों को लेकर दो राय भले ही हो सकती है, लेकिन सड़कों पर चलने वाले स्वचालित वाहनों के रंगों के बारे में हमें कतई भ्रम नहीं रखना चाहिए। विशेषज्ञों के अध्ययन से अब यह साबित हो गया है कि कुछ खास रंगों के वाहनों में दुर्घटना की आशंका ज्यादा रहती है, जबकि कुछ दूसरे खास रंग निरापद माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सड़क पर सुरक्षा की दृष्टि से नीला या पीला रंग सबसे अच्छा माना जाता है और सलेटी सबसे खराब। दुनिया की सबसे महंगी कारें बनानेवाली ,एक अमेरिकी कंपनी द्वारा पिछले दिनों कराए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि सफेद, चमकदार पीले और नारंगी रंग की कारें ज्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि ये रंग आसानी से नजर आ जाते हैं और दुर्घटना की आशंका कम हो जाती है। इसके विपरीत गहरा रंग आसानी से दूसरे वाहन-चालकों को नहीं दिखाई देता है। इसलिए इस रंग के कारण दुर्घटनाग्रस्त होती रहती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि रंगों का पूरा माया संसार अपने चारों तरफ फैला पड़ा है। और आप चाहकर भी इससे नहीं बच सकते। आपको सिर्फ य़ह ही तय करना है कि कब कौन सा रंग आपके व्यक्तित्व, आपके मिजाज, आपकी जीवनशैली और पसंद के ज्यादा अनुकूल है या कौन सा रंग आपको शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा निरापद लगता है। इसलिए अच्छी तरह सोच-समझकर अपने मनपसंद रंग का चयन कीजिए और उस रंग में अपने को रंग लीजिए। वैसे मौसम भी तो रंगों का ही है।
-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, February 20, 2008

लोक जीवन में तुलसी


तुलसा महाराणी....अड़वो दीजै......गड़वो दीजै.....पाट पीतांबर दीजै.........तल जमना के तीर दीजै........घी को कोपौ दीजै.......बैकुंठ को वास दीजै.......राम लछमण को खांध दीजै.........मुख में तुलसी घट में राम.....

जल चढ़ाते समय तुलसी से वांछना की ये परंपरा सदियों पुरानी है। भारतीय लोक संस्कृति में सदियों से वृक्षों,वनस्पतियों तथा सृष्टि के अन्य अंगों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और तुलसी का स्थान सबसे ऊंचा है।
प्रत्येक हिंदू परिवार के घर-आंगन में तुलसी चौरा, गमले या क्यारियों में तुलसी का पौधा अवश्य लहलहाता हुआ मिलेगा। वेदों एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार तुलसी का ना केवल औषधियुक्त पौधे के रूप में मूल्यांकन किया जाता है वरन् विष्णु के देवी प्रतिनिधि के रूप में आदरणीय भी मानी जाती है। विष्णु आयुर्वेद के आचार्य माने जाते हैं। धन्वन्तरि विष्णु के अवतार हैं। तुलसी में अनेक औषधीय गुण हैं। इसलिए तुलसी का विष्णुप्रिया होना स्वाभाविक है। इसी आधार पर तुलसी और विष्णु के विवाह की कल्पना की गई होगी। लेकिन कई आख्यानों में तुलसी को विष्णु की जगह कृष्णप्रिया भी माना जाता है। इटली से वृंदावन आकर भक्ति संगीत पर शोध कर रही सेलीना थीलमान बताती हैं, लोक मान्यता में लोग तुलसी का विवाह विष्णु के साथ ही मानते हैं, पर ब्रजक्षेत्र में श्रीकृष्ण के साथ तुलसी के विवाह का प्रचलन है। कथा है कि तुलसी के पिता ने जब अपनी पुत्री से भावी पति के बारे में पूछा था तो तुलसी ने कुछ लजाते और कुछ सकुचाते हुए श्रीकृष्ण का नाम लिया था, ' हे पिताजी । उगता हुआ सूर्य गर्म होता है, तथा चंद्र एक पखवारे का राजा। ब्रह्मा चार सिर वाले तथा विष्णु चार भुजा वाले हैं और शिव विष के साथ और गणेश सूंड़ वाले हैं। शुक्र एक आंख वाले, बुद्ध बुद्धिहीन, मंगल पीड़ादायक, शनि ग्रहों से घिरे और बृहस्पति शीतल हैं, इसलिए जग को आह्लादित करनेवाले बांसुरी वादक श्रीकृष्ण ही मेरे पति हैं।' अपनी बेटी का यह उत्तर सुनकर वह श्रीकृष्ण के यहां शादी का पैगाम लेकर गए और तुलसी का विवाह श्री कृष्ण के साथ हुआ। उसी दिन से तुलसी कृष्णप्रिया कहलाई। तुलसी के वृंदा नाम पर वृंदावन नाम पड़ा और वृंदावन कृष्ण चरित्र व रासलीलाओं का केंद्र बना।
-प्रीतिमा वत्स

Friday, January 18, 2008

समुद्र मंथन का साक्षी मंदार




इतिहास यहां कविता बनकर गूंजता है। कहते हैं, समुद्र मंथन में देवताओं ने मंदार पर्वत को मथानी बनाया था। सदियों से खड़ा मंदार आज भी लोक की आस्था का पर्वत बना हुआ है।


लोक मान्यता है कि भगवान विष्णु सदैव मंदार पर्वत पर निवास करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह वही पर्वत है, जिसकी मथानी बनाकर कभी देव और दानवों ने समुद्र मंथन किया था। मकर-संक्रांति के अवसर पर यहां एक मेला भी लगता है जो करीब पंद्रह दिन तक चलता है। मंदार पर्वत से लोगों की आस्थाएं कई रूप से जुड़ी हैं। हिंदुओं के लिए यह पर्वत भगवान विष्णु का पवित्र आश्रय स्थल है तो जैन धर्म को मानने वाले लोग प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य से इसे जुड़ा मानते हैं। वहीं आदिवासियों के लिए भी मंदार पर्वत पर लगनेवाला मेला कई उम्मीद लेकर आता है। सोनपुर मेले की समाप्ति के बाद से ही लोग इंतजार करते हैं मंदार पर्वत के पास लगने वाले मेले का। सोनपुर मेले के बाद मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला बौंसी का दूसरा बड़ा मेला माना जाता है।
बौंसी भागलपुर से दक्षिण में रेल और सड़क मार्ग पर स्थित बिहार राज्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मेले का इतिहास काफी पुराना है इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी बड़े पैमाने पर मिलजुल कर मेले का आनंद लेते हैं।
मेले का मुख्य आकर्षण काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित सात सौ फीट ऊंचा मंदार पर्वत है। यह अनेक दंत कथाओं को समेटे बौंसी से करीब दो किलोमीटर उत्तर में स्थित है। समुद्र मंथन की पौराणिक गाथा से जुड़ा होने के कारण इसका विशेष महत्व है। मंदार की चट्टानों पर उत्कीर्ण सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां, गुफाएं, ध्वस्त चैत्य और मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव के मूक साक्षी हैं। विभिन्न पुराणों, ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों में अनेक बार मंदार का नाम आया है स्कंद पुराण में तो मंदार महातम्य नामक एक अलग अध्याय ही है। मंदार वैष्णव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है। प्रसिद्ध वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु ने भी अनेक जगह मंदार पर्वत की चर्चा की है। समुद्र मंथन का आख्यान महाभारत के आदि पर्व के 18वें अध्याय में भी है। महाभारत के मुताबिक भगवान विष्णु की प्रेरणा से मेरू पर्वत पर काफी विचार विमर्श के बाद देवताओं और दानवों ने समुद्र को मथा।
मकर संक्रांति के दिन मंदार पर्वत की तलहट्टी में उपस्थित पापहरणि तालाब का महत्व तो कुछ और है। लोकमान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है। लोग मकर संक्रांति के दिन अवश्य यहां स्नान करते हैं। जगह-जगह जल रही आग का लुत्फ उठाते हैं। उसके बाद भगवान मधुसूदन की पूजा अर्चना करते हैं। दही-चूड़ा और तिल के लड्डू विशेष रूप से खाए जाते हैं।
पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक मंदार पर्वत की अधिकांश मूर्तियां उत्तर गुप्त काल की हैं। उत्तर गुप्त काल में मूर्तिकला की काफी सन्नति हुई थी। मंदार के सर्वोच्च शिखर पर एक मंदिर है, जिसमें एक प्रस्तर पर पद चिह्न अंकित है। बताया जाता है कि ये पद चिह्न भगवान विष्णु के हैं। पर जैन धर्मावलंबी इसे प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के चरण चिह्न बतलाते हैं और पूरे विश्वास और आस्था के साथ दूर-दूर से इनके दर्शन करने आते हैं। एक ही पदचिह्न को दो संप्रदाय के लोग अलग-अलग रूप में मानते हैं लेकिन विवाद कभी नहीं होता है। इस प्रकार यह दो संप्रदाय का संगम भी कहा जा सकता है। इसके अलावा पूरे पर्वत पर यत्र-तत्र अनेक सुंदर मूर्तियां हैं, जिनमें शिव, सिंह वाहिनी दुर्गा, महाकाली, नरसिंह आदि की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। चतुर्भुज विष्णु और भैरव की प्रतिमा अभी भागलपुर संग्रहालय में रखी हुई हैं। फ्रांसिस बुकानन, मार्टिन हंटर और ग्लोब जैसे पाश्चात्य विद्वानों की आत्मा जिन्हें मंदार के सौंदर्य ने कभी प्रभावित किया था, सदियों से प्राकृतिक आपदाएं सहन करती हुई ये मूर्तियां उद्धार के लिए तरसती होंगी । स्थानीय लोगों ने इन प्राचीन मूर्तियों का आकार परिवर्तित कर इच्छा के मुताबिक देवी-देवता के रूप में स्थापित कर लिया है और भक्तों को आकर्षित कर पैसा कमाया जा रहा है। इससे प्राचीन मूर्तियों का अस्तित्व खतरे में है। पर्वत परिभ्रमण के बाद लोग बौंसी मेला की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। बौंसी स्थित भगवान मधुसूदन के मंदिर में साल भर श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है। मकर संक्रांति के दिन यहां से आकर्षक शोभायात्रा निकलती है।
-प्रीतिमा वत्स

Sunday, January 6, 2008

स्वस्तिक का सफर


स्वस्तिक का अर्थ होता है- कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
कभी पूजा की थाली में, कभी दरवाजे पर, वेदों-पुराणों में प्रयुक्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ पवित्र धर्मचिह्न के रूप में प्रयुक्त स्वस्तिक चिह्न आज फैशन की दुनिया में भी शुमार होता जा रहा है। अब यह पूजा की थाली से उठकर घर की दीवारों तथा सुंदरियों के परिधानों में सजने लगा है।
स्वस्तिक चिह्न का डिजाइन इजिप्सन क्रास, चाइनीज ताउ, रोसीक्रूसियंस और क्रिश्चियन क्रास से मिलता जुलता है। विभिन्न आकृतिओं से मिलने वाला यह चिह्न हर युग में अपना अलग-अलग महत्व भी रखता है। सनातन धर्म और जैन धर्म हो या बौद्ध धर्म, हर धर्म और युग में अपनी महत्ता के साथ स्वस्तिक उपस्थित है।
ईसा पूर्व में स्वस्तिक आकृति के दायें और बायें पक्ष से आदमी लापरवाह थे। उस समय इस रहस्यमय आकृति की गंभीरता से लोग बेखबर थे। तब यह धार्मिक रूप से दो सिद्धान्तों के विकास और विनाश को दर्शाता था। स्वस्तिक का महत्व समाज और धर्म दोनों ही स्थानों में है। भारतवर्ष में एक विशाल जनसमूह स्वस्तिक निशान का उपयोग करता है। कोई इसे सजाने के तौर पर तो कोई इसका उपयोग धर्म और आत्मा को जोड़कर करता है। दक्षिण भारत में जहां इसका उपयोग दीवारों और दरवाजों को सजाने में किया जाता है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में इस आकृति को तंत्र-मंत्र से जोड़कर देखा जाता है। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में इस आकृति को एक पवित्र धार्मिक चिह्न के रूप में माना जाता है। स्वस्तिक संस्कृत का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है- कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
वेदों में स्वस्तिक चिह्न के बनावट की व्याख्या विभिन्न अर्थों में की गई है। कभी इसके चारों भागों को समाज के चार वर्ण के रूप में माना गया है। कभी इसकी चारों भुजाओं को विष्णु के चार भुजा के रूप में माना गया है जो विकास और विनाश के बीच संतुलन बनाकर सृष्टि को चला रहे हैं। कई बार स्वस्तिक के निशान हमें भ्रम में भी डाल देते हैं। पौराणिक काल में जहां इसका उपयोग धर्म के प्रतीक चिह्न के रूप में किया जाता था, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाजी पार्टी के लोग स्वस्तिक के निशान को बहुत ही महत्वपूर्ण एवं संभावनाओं से भरा हुआ माध्यम मानते थे। वहीं आज यह स्वस्तिक सुंदरियों के परिधानों और आभूषणों तक पहुंच गया है। अर्थात कई पड़ावों से गुजर चुका है -स्वस्तिक का सफर।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, January 1, 2008

लोक देव हनुमान


हनुमान एक अखिल भारतीय लोक देव हैं। कन्या कुमारी से काश्मीर तक तथा द्वारका से कामाख्या तक उसका देवस्वरूप लोकमान्य हैं। केरल मे शुचीन्द्रम के शिवालय की सन्निधि में उसकी लघुमूर्ति है, तो तमिलनाडु में नामक्कल वैष्णव मन्दिर के सामने उसकी मूर्ति तीन पुरूष लम्बे कद की है। कर्नाटक के लोकना्टय यक्षगान में हनुमान का पात्र महत्वपूर्ण होता है। महाराष्ट्र में गांवों के प्रवेशद्वारों में मारूति प्रतिष्ठित रहता है। नासिक- पंचवटी के राममंन्दिर के सम्मुख हनुमान की पत्थरमूर्ति पर धातु का टोप चढाया हुआ है। किन्तु पास ही टाककी गांव में गोबर तथा मिट्टी का मारुति स्थित है, जिसकी साक्ष्य में समर्थ रामदास ने सत्रहवीं सदी में बरसों तप किया था। मध्यप्रदेश के बस्तर में आदिवासी हनुमान खुले आंगन में भुनी मिट्टी का शिल्प होता है। वहां हिमाचल में घर की पुती दीवार पर हनुमान जी की लेप की मूर्ति पूजनीय रहती है। वाराणसी में तुलसीदासजी का बाल हनुमान भक्तजनों को प्रिय है, वैसे ही उसका पंचमुखीभव्य रूप संकटमोचन होकर प्रार्थनीय है। अंगजनपद के हर घर हर मोड, हर चौराहे पर हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। मीरा के राजस्थान,कृष्णजी की मथुरा, जगन्नाथजी का ओडिया..... विभिन्न कारीगरी में हनुमान साकार करते हैं। मिट्टी,काठ,पत्थर आदि में, अथवा केवल मानसिक रूप में, शक्ति तथा बुद्धि,युक्ति तथा सरलता, भक्ति तथा भक्तसहायता, लघुता तथा विशालता आदि परस्पर विरूद्ध गुणों का भाजन हनुमान माना जाता है।
फिर भी उनका मूर्तरूप, राम कृष्ण जैसे अवतार, शंकर पार्वती जैसे देवता, आदि के समान, मानव का न होकर सपुच्छ वानर का ही रहता है। गाय अथवा नाग अपने प्राणिरूप में पूज्य हैं, उस प्रकार वानर स्वयं पूज्य नहीं होते। फिर भी खेत में ऊधम मचानेवाले वानर को किसी हद तक अभय प्राप्त है, अथवा गांव में मृत वानर के यात्रापूर्वक संस्कार किये जाते हैं- यह मानकर कि वह हनुमान के वंशज हैं। सारांश, वानर नाम प्राणी में देवत्व नहीं, हनुमान नामक देव वानर हैं। हनुमान का रूप वानर का है, किन्तु उसका चरित्र दैवी है। यह भावना इतनी दृढ तथा सर्वगामी है कि, शिल्प चित्र या अन्य कारीगरी की तफतीस कुछ भी हो, वानर का चेहरातथा पूंछ उसमें अवश्य होते हैं।
एक सामान्य वानर को प्राप्त न होने वाला देवत्व हनुमान को कैसे प्राप्त हुआ । भारत भर में इसका उत्तर उसके विलक्षण कर्मों के कारण यही होगा। जन्म लेते ही सूर्य के प्रति उडान, लंकादहन तथा औषधियों के लिए पर्वत उठाकर लाना......... ये दिव्य कर्म करने वाला दैवी वानर यही हनुमान की लोकमानस में प्रतिमा है।

प्रीतिमा वत्स

Sunday, December 23, 2007

लोक देव करमा


सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता में लोक देवी-देवताओं के महत्व को समाज में व्याप्त अनेक पर्व-त्योहारों,इससे जुड़ी किंवदंतियों, कथा-कहानियों, गीतों आदि के माध्यम से बखूबी जाना समझा जा सकता है। अंग-जनपद में बहुत सारे पर्व-त्योहार ऐसे मनाए जाते हैं, जो अन्यत्र कम ही देखने को मिलते हैं। इन पर्व-त्योहारों पर जो कथाएं कही जाती हैं, वह जाति प्रथा से ग्रसित कतई नहीं हैं। इन पर्व-त्योहारों को हर वर्ण के लोग मनाते हैं-


अंग जनपद में यह पर्व आदिवासियों के साथ-साथ अन्य लोग उल्लास के साथ मनाते हैं। पर्व की लोककथा कुछ इस प्रकार है। कर्मा और धर्मा नामक दो भाई थे। दोनों ही बड़े प्रेम से रहते थे, तथा गरीबों की सहायता किया करते थे। कुछ दिन बाद कर्मा की शादी हो गई। कर्मा की पत्नी बहुत ही अधार्मिक तथा बुद्धिहीन स्त्री थी। वह, हर वह काम किया करती थी, जिससे कि लोगों को हानि और क्लेश पहुंचे। यहां तक कि उसने धरती मां को भी नहीं छोड़ा, वह चावल बनाने के बाद मांड जो पसाती वह भी जमीन पर सीधे गिरा देती । इससे कर्मा को बड़ा तकलीफ हुआ। वह धरती मां को घायल और दुखी देखकर काफी दुखी था। गुस्से में वह घर छोड़कर चला गया। उसके जाते ही पूरे इलाके के आदमियों का करम (तकदीर) चला गया। अब वे काफी दुखी और पीड़ित जीवन बिताने लगे।
कुछ दिन बाद जब धर्मा से नहीं रहा गया। इलाके की अकाल और भूखमरी से जब वह व्याकुल हो गया तो अपने भाई कर्मा को खोजने के लिए निकल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद उसे प्यास लगी। पानी की खोज में वह इधर-उधर भटकने लगा। सामने एक नदी दिखाई दिया पर वह सूखी पड़ी थी। नदी ने पास आकर धर्मा से कहा कि जबसे हमारे कर्मा भाई इधर से गए हैं हमारे तो करम ही फूट गए हैं। अब यहां कभी पानी नहीं आता है, यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो हमारे बारे में जरूर कहिएगा। धर्मा आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक आम का वृक्ष मिला, जिसके सब फलों में कीड़े थे। उसने भी धर्मा को कहा कि जबसे कर्मा भाई इधर से गुजरे हैं, इस पेड़ के सारे फल खराब हो गए हैं। यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो इसका निवारण पता कीजिएगा। धर्मा वहां से आगे बढा। कुछ दूर और चलने पर उसे एक वृद्ध व्यक्ति मिला, जिसके सिर का बोझ तब तक नहीं उतरता था, जब तक कि चार-पांच आदमी मिलकर उसे नोच-नोच कर उतारते नहीं थे। उसने भी धर्मा को कर्मा के मिलने पर अपना दुखड़ा सुनाने तथा उसका निवारण पूछने की बात कही। आगे मार्ग में उसे पुनः एक औरत मिली। उसने भी धर्मा को कहा कि यदि कर्मा उसे मिले तो उससे कहे कि जब वह खाना पकाती है तो उसके हाथ से कढ़ाई-बर्तन जल्दी छूटते नहीं हैं, वह हाथ में हीं चिपक जाता है यह समस्या किस तरह से दूर होगी।
चलते-चलते धर्मा एक रेगिस्तान में पहुंच गया। वहां जाकर उसने देखा कि उसका भाई कर्मा धूप और गर्मी से व्याकुल रेत पर पड़ा था। उसके पूरे शरीर पर फफोले पड़े थे। धर्मा ने उसकी यह हालत देखी और काफी दुखी हुआ। उसने कर्मा को घर चलने के लिए कहा तो कर्मा बोला मैं उस घर में कैसे जाऊं। वहां पर मेरी पत्नी है, जो इतनी अधार्मिक और बुद्धिहीना है कि मांड़ तक जमीन पर फेंक देती है। इस पर धर्मा बोला मैं आपको वचन देता हूं कि आज के बाद कोई भी स्त्री मांड जमीन पर नहीं फेंकेगी।
कर्मा अपने भाई धर्मा के साथ घर की ओर चला तो मार्ग में उसे सबसे पहले वह स्त्री मिली। उसे कर्मा ने कहा कि तुमने किसी भूखे ब्राह्मण को खाना नहीं दिया था, इसलिए तुम्हारी यह दशा हुई है। आज के बाद किसी भूखे ब्राह्मण का तिरस्कार मत करना, तेरे कष्ट दूर हो जाएंगे।
अंत में उसे वह नदी मिली जिसमें पानी नहीं था। नदी को देखकर कर्मा ने कहा तुमने किसी प्यासे आदमी को साफ पानी नहीं दिया था, इसलिए अब तुम्हारे पास पानी नहीं है। आगे से तुम कभी अपना गन्दा जल किसी को पीने मत देना, कोई तुम्हारे तट पर पानी पीने आए तो उसे स्वच्छ जल देना, तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे। इस प्रकार कर्मा पूरे रास्ते में सभी को उसके हिस्से का कर्म प्रदान करते हुए अपने घर आया तथा घर में पोखर बनाकर उसमें कर्मडार लगाकर उसकी पूजा की। इलाके के अकाल समाप्त हो गए। खुशहाली लौटी। उसी कर्मा की याद में आज भी लोग कर्मा पर्व मनाते हैं। कर्मा की पूजा में पोखर के किनारे खजूर की डाली लगाकर उसमें फूल खोंसा जाता है। लोक मान्यता है कि जो भी स्त्री कर्मडार की पूजा करेगी और अपने हिस्से का कर्म पाएगी उसके कांटे जैसे स्वाभाव या भाग्य में भी फूल खिल जाएंगे।

-प्रीतिमा वत्स

MEERA TUM KAHAN HO

  मीरा तुम कहाँ हो ? - प्रीतिमा वत्स बात बहुत पुरानी है। शायद तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी। उन दिनों गांव के स्कूल में मैं उसे अक्सर देखा...