मीरा तुम कहाँ हो?
-प्रीतिमा वत्स
बात बहुत पुरानी है। शायद तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी। उन दिनों गांव के स्कूल में मैं उसे अक्सर देखा करती थी। हम गर्ल्स स्कूल में पढ़ते और वह काफी दूर चलकर एक मिडिल स्कूल जाया करती थी। रोज एक निश्चित समय पर उसे दूर से जाता हुआ देखने की आदत सी बन गई थी। बहुत मन करता उस आदिवासी लड़की से बात करने का, उसका नाम जानने का और उसके बारे में बहुत सारी बातें जानने का। लेकिन हमें भी क्लास में जाने की जल्दी रहती और वह भी तेज रफ्तार से समय पर अपने जाने की हड़बड़ी में रहती।
एक दिन हम सभी दोस्त दोपहर
की टिफिन के बाद मैदान में पकड़म-पकड़ाई खेल रही थी, तभी हमने उस आदिवासी लड़की को
पार होते हुए देखा। मैं अचंभित रह गई उसे इस वक्त देखकर। हमारी सहेलियाँ हमें
चिढ़ाने लगीं, आ गई तुम्हारी हिरोइन जा बात कर ले। मैं भी जाने किस आवेग में थी कि
उसके बिल्कुल पास चली गई और पूछा- “तुम्हारा नाम
क्या है?”
उसने बड़े ही सधे अंदाज में
कहा- “मीरा”।
तुम इस वक्त कहाँ जा रही हो? अभी तो स्कूल की छुट्टी भी नहीं हुई है। उसने कहा, “मैं अपने घर जा रही हूँ। आज घर पर खाना नहीं बना था और मुझे
अभी बहुत तेज भूख लगी है”।
“तुम्हार घर कहाँ है?”
उसने पास के एक गांव का नाम
बताया- “जमजोड़ी।”
लेकिन वह तो बहुत दूर है।
कोई बात नहीं मैं आधे घंटे
में खाना खाकर आ जाऊँगी। यह कहकर वह तेजी से चली गई।
वह उधर गई और इधर हम सब
सहेलियाँ अपने खेल में लग गईं, क्योंकि मध्यान्ह भोजन का समय अभी बचा हुआ था। उस
दिन के बाद तो वह मेरी सहेली ही बन गई थी, और धीरे-धीरे सबसे प्यारी सहेली बन गई।
हम अक्सर एक दूसरे को
देखते, हाथ हिलाकर मुस्कुराते और कभी समय होता तो थोड़ी बहुत बातें भी करते। उसका
साँवला रंग, एकदम साफ-सुथरे और करीने से पहने हुए कपड़े और बेहद सरल स्वाभाव मुझे
बहुत भाता था।
बातों-बातों में पता चला था
कि उसकी माँ सौतेली है और वह उसे बहुत परेशान करती है।
खूब काम करवाती है, और
मारती भी है।
बावजूद इसके वह बहुत हीं
होशियार और पढ़ाई में तेज थी। उसे सरकार की तरफ से स्टाइपेन भी मिलता था।
हमारी जिन्दगी में यह पहली
आदिवासी लड़की थी, जो पढ़ने का इतना चाव रखती थी।
एक दिन मीरा बहुत दुखी थी,
पूछने पर बताया कि “अब मैं आगे नहीं पढ़
पाऊँगी। घर का काम करके बहुत थक जाती हूँ”।
तब मैंने उसे सुझाया था कि
क्यों नहीं तुम भी हमारे स्कूल में हीं दाखिला ले लेती हो। रोज तुम्हारा आधा घंटा
जाने और आधा घंटा आने का समय बच जाया करेगा। वह बोली, “क्या तुम हमारी मदद करोगी?” मैंने कहा क्यो नहीं, चल तुझे अपने हेडमास्टर साहब(प्रिंसिपल) से मिलवा देती
हूँ। चूंकि मैं अपने स्कूल की एक होनहार छात्रा मानी जाती थी, इसलिए सभी शिक्षक
मुझे जानते थे और उनका नरम रवैया रहता था, मेरे प्रति। उसी वक्त मैं मीरा को लेकर
हेडमास्टर साहब के कमरे में गई। और उसकी परेशानी बताई। सर दाखिला लेने के लिए राजी
हो गए। मैंने और मीरा ने मिलकर एक एप्लीकेशन दाखिले के लिए लिखकर जमा करा दिया।
उसके बाद फिर एक एप्लीकेशन दूसरे स्कूल से टीसी लेने के लिए लिखा। एक दो दिन की
भागा-दौड़ी के बाद उसका दाखिला हमारे हीं स्कूल में हो गया।
मीरा के घरवालों को काफी
दिन बाद पता चली कि उसने स्कूल बदल लिया है। वैसे मीरा के पिता को छोड़कर उसके
परिवार में किसी को कुछ खास फर्क नहीं पड़ता था इससे। दो दिन मीरा के पिता उससे
नाराज रहे, फिर सब सामान्य हो गया। उसके पिता को समझ आ गया कि यह स्कूल उसके लिए
ज्यादा अच्छा है।
अब हम ज्यादातर समय साथ हीं
रहते। उसके पास बहुत सारे हुनर थे, जो मुझे आकर्षित करते थे। पढ़ाई में जो दिक्कत
उसे आती वह मैं दूर कर दिया करती थी। अक्सर दोपहर को टिफिन जल्दी निपटाकर हम कभी
चटाई बनाना सीखते, कभी मूंज की डलिया, टोकरी बनाते तो कभी, फूस के झाड़ू बनाते।
हमारी सारी सहेलियाँ हमारे इस काम से खफा रहती। वो कहती और कोई काम नहीं बचा तो
चूड़े-चमारों वाले काम करती है। इसके घर में शिकायत लगा देंगे। पर मैं इन बातों पर
ज्यादा ध्यान नहीं देती।
एक दिन हमारी एक छोटी सी
चटाई पूरी हो गई तो उसे लेकर खुशी से मम्मी को दिखाने घर आई। मम्मी तो अचंभित थी,
यह देखकर कि इसने चटाई बनाना कब सीखा। हमारे घरों में तो ऐसा माहौल ही नहीं है। यह
तो नीची जाति के लोग हीं ज्यादा बनाते हैं। उन्हें अच्छा लगा यह जानकर कि इसके
हाथों में कुछ तो कला है। लेकिन हमारी पढ़ाई को लेकर चिंतित हो गईं कि कहीं इसका
मन पढ़ाई से हट ना जाए।
फिर मैंने अपनी नयी सहेली
मीरा के बारे में सब कुछ बताया कि वो कितना मेहनत करती है। पढ़ाई में भी कितनी
अच्छी है। माँ को अच्छा लगा उसके बारे में जानकर। उन्होने बाद में सिर्फ इतना कहा
कि क्या करोगी ये सब सीखकर। हमारे समाज में इसे अच्छा नहीं मानते हैं लोग। यह काम
अलग समुदाय के लोग करते हैं।
हमारे ऊपर इसका असर नहीं
होना था सो नहीं हुआ। हम पहले की तरह साथ में पढ़ते और साथ में यह सब काम भी करते
रहते। छोटी सी झाड़ू,छोटी सी चटाई काफी दिनों तक मैंने अपने किताब वाले बक्से में
छिपाकर रखा था।
आठवीं कक्षा में हमने
साथ-साथ हाईस्कूल में दाखिला लिया और दसवीं तक हमारी पढ़ाई बे रोक-टोक चलती रही।
दसवीं के बोर्ड के लिए हमें कुछ दिनों के लिए स्कूल से छुट्टी दी गई। छुट्टियाँ
खत्म होने के बाद जब मैं स्कूल गई तो मीरा नहीं मिली।
मैंने सोचा शायद बीमार हो आ
जाएगी दो-एक दिन बाद। लेकिन दिन बीतते गए यहाँ तक कि परीक्षा का समय भी आ गया फिर
भी वह नहीं आई। मैंने अपने हिसाब से बहुत कोशिश की उसे खोजने की, लेकिन उसका पता
नहीं लग पाया। मीरा के गांव जाने की इजाजत मुझे मम्मी की तरफ से नहीं मिली। मेरी
माँ बहुत ही अनुशासन पसंद और कड़क स्वाभाव की थीं, उस समय। शायद इसलिए भी कि अकेले
दम पर चार बच्चों की जिम्मेदारी थी, उनके ऊपर। मेरे पिताजी हमारे आर्थिक जरूरतों
को पूरा करने के जुगाड़ में ज्यादातर शहर में हीं रहते थे।
बोर्ड की परीक्षा में भी
शामिल होने के लिए वह नहीं आई। धीरे-धीरे मैं अपनी आगे की पढ़ाई में व्यस्त होने
लगी लेकिन मीरा को भूल नहीं पा रही थी, हर वक्त मन में यही चल रहा होता कि कहीं से
आ जाए वह और जोर से हंसकर कहे, देख मैं आ गई। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद
मेरा दाखिला पास के शहर में एक कॉलेज में करा दिया गया। मैं आगे की पढ़ाई में
मशरूफ हो गई। एक दिन मैं अपने बड़े भाई के साथ रिक्शे में गाँव से शहर की तरफ जा
रही थी। तो किसी ने मुझे आवाज लगाई। मैंने ध्यान नहीं दिया, मुझे लगा मेरा वहम है।
उसने मुझे फिर से तेज स्वर में आवाज लगाई, मैं चिहूंक गई कि अरे ये तो मीरा की
आवाज है। पीछे मुड़कर देखा तो मीरा बहुत तेजी से मेरे रिक्शा के पीछे-पीछे चली आ
रही थी।
मैं इतनी खुश हो गई कि
रिक्शे के लगभग कूदकर उसके पास गई और उसके गले से लिपट गई। काफी देर तक हम दोनों
रोते रहे। फिर उसके बारे में पूछा तो वह और रोने लगी। उसे बहुत मलाल था पढ़ाई
छूटने का। संथालों की परंपरा के अनुसार किसी लड़के ने पनघट पर उसका हाथ पकड़ लिया
था, और वह उसकी पत्नी मान ली गई थी। यह उसकी सौतेली माँ की साजिश के तहत हुआ था।
अब उसके तीन बच्चे थे, जो उस समय उसे घेरे हुए खड़े थे। काफी देर तक हम चुपचाप
खड़े रोते रहे।
उसके बाद फिर मीरा मुझे
कहीं नहीं मिली। आज भी मुझे उसकी बहुत याद आती है। कभी लगता है, शायद किसी सोशल
साइट पर किसी दिन मिल जाएगी। फिर ध्यान आता है, वह तो तकनीक की दुनिया से काफी दूर
है। ऐसी दुनिया में जहाँ खाना,पीना,बच्चे पालना, घर सम्भालने के अलावा औरतों की
दुनिया ही नहीं है। पर मन बार-बार खोजता है कि, “मीरा तुम कहाँ हो?”
प्रीतिमा वत्स
इस कहानी को इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है।
https://livewirenews.in/meera-tum-kahan-ho-adhoori-dosti-ki-kahani/

No comments:
Post a Comment