Friday, August 14, 2026

मेरे कला और साहित्य के सफर पर एक बातचीत


एक खास बातचीत मेरे कला और लेखन के सफर की, सुरेश परिहार जी के साथ। लाइव वायर न्यूज पर। लिंक दिया हुआ है आप चाहें तो इस प्लेटफॉर्म पर इसे पढ़ सकते हैं। 

https://livewirenews.in/lok-kala-lok-sanskriti-chitrakar-lekhika-interview/ 


1.     
झारखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर चित्रकारलेखिका और लोकसंस्कृति की शोधकर्ता बनने तक का आपका सफर कैसा रहाआपके व्यक्तित्व को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले अनुभव कौन-से रहे?

एक शब्द में कहूं, तो शानदार। मेरा जन्म झारखंड के एक छोटे से गांव लुकलुकी में हुआ और बचपन असम के बेहद खूबसूरत शहर उमरांगशो में बीता। वहां के जंगलों में भटकना, पेड़-पौधों को करीब से जानना और प्रकृति को अपने आसपास महसूस करना मेरी बचपन की बहुत खूबसूरत यादों में शामिल है।

तीसरी कक्षा में मैं फिर झारखंड आ गई। गांव के सरकारी स्कूल से ही मेरी प्रारंभिक शिक्षा हुई। दसवीं के बाद गोड्डा महिला कॉलेज से बी.ए. किया और फिर गोड्डा कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम.ए. की पढ़ाई पूरी की। शादी के बाद दिल्ली आ गई। यहां आने के बाद मैंने अपनी पढ़ाई को फिर से अपने तरीके से आगे बढ़ाया। चंडीगढ़ कला केंद्र से पेंटिंग में एम.ए. किया और साथ ही इग्नू से रूरल डेवलपमेंट में डिप्लोमा भी किया।

हालांकि, अगर सच कहूं तो चित्रकार बनने का सफर शायद मेरे बचपन से ही शुरू हो गया था। खाली समय में कागज पर वाटर कलर से चित्र बनाना और उन्हें गत्ते पर चिपकाकर घर की दीवार पर टांग देना मेरा सबसे बड़ा शौक था। घर में भी सब मेरे इस शौक को खूब प्रोत्साहित करते थे, खासकर मेरे दादाजी।

लोक संगीत से मेरा रिश्ता भी बहुत बचपन का है। गांव में जब कोई सारंगी बजाते हुए भिक्षा मांगने आता, तो मैं उसके पीछे-पीछे तब तक चलती रहती, जब तक वह गांव से बाहर नहीं निकल जाता या मेरी मां किसी को भेजकर मुझे वापस नहीं बुला लेती। मुझे सारंगी की धुन और उसके साथ गाया जाने वाला गीत बहुत अच्छा लगता था। एक दृष्टिहीन व्यक्ति थे, उनका नाम अर्जुन था। वे खंजड़ी बजाकर गाते और भीख मांगते थे। उन्हें सुनना भी मुझे बहुत अच्छा लगता था।

दादी के साथ हर लोक पर्व में हिस्सा लेती थी। शादी-ब्याह के मौकों पर होने वाले लोकगीत सुनने चली जाती और घर लौटकर चुपचाप उन्हें अपनी कॉपी में लिख लेती। फिर उन्हें सहेजकर रखती थी। शायद तब मुझे खुद भी नहीं पता था कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं। लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हुई, इन लोकगीतों और लोक संस्कृति के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई।

मुझे लगता है, लोक संस्कृति की ओर मेरा आकर्षण किसी एक दिन या किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह मेरे बचपन में धीरे-धीरे जमा हुए अनुभवों का असर था—गांव, जंगल, लोक पर्व, गीत, संगीत और उन गीतों को जीते हुए लोग। जितना इनके बारे में जानती गई, उतनी ही मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई। आखिरकार यही जिज्ञासा मुझे लोकगीत और लोक संस्कृति के अध्ययन और शोध की ओर ले गई।

 


2.     
आपकी कला में बिहार और झारखंड की लोक संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है. लोक कला को आपने केवल कला के रूप में देखा या उसके पीछे छिपे सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी समझने की कोशिश की?

मेरी कला में बिहार और झारखंड की लोक संस्कृति की गहरी छाप इसलिए है क्योंकि मेरा जन्म ही बिहार के उस हिस्से में हुआ है, जो आज झारखंड कहलाता है। बिहार और झारखंड से मेरा बहुत गहरा लगाव है। यहां के लोगों में जो अपनापन और सहजता है, वह मुझे कहीं और महसूस नहीं होती।

लोक कला और लोक संस्कृति का इतने वर्षों तक अध्ययन करने के बाद मेरी समझ यह बनी है कि इन्हें केवल कला या उत्सव के रूप में नहीं देखा जा सकता। इनके पीछे किसी समाज का पूरा जीवन छिपा होता है—उसकी मान्यताएं, रिश्ते, प्रकृति से उसका संबंध, उसकी रोजमर्रा की जरूरतें और उसकी आर्थिक परिस्थितियां भी। किसी लोक कला को समझना, दरअसल उस समाज को समझना है जिसने उसे जन्म दिया है।

मैंने यह भी महसूस किया है कि लोक संस्कृति हमें उत्सव के साथ-साथ एक तरह का अनुशासन भी सिखाती है। हमारे बहुत से लोक पर्व प्रकृति से जुड़े हुए हैं। वे हमें मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और अपने आसपास की प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। कई लोक उत्सव ऐसे भी हैं, जब समाज कुछ समय के लिए जाति-पांति और दूसरे भेदों को पीछे छोड़कर एक साथ आता है। भले ही यह पूरी तरह संभव न हो, लेकिन अगर किसी पर्व का थोड़ा-सा असर भी लोगों के मन पर पड़ता है, तो मुझे लगता है कि उसकी सार्थकता बनी रहती है।

इसी विश्वास के कारण मैं लोक कला और लोक संस्कृति को सहेजने का काम करती हूं। मेरी कोशिश सिर्फ यह दर्ज करने की नहीं है कि कोई लोकगीत कैसे गाया जाता है या कोई लोकचित्र कैसे बनाया जाता है, बल्कि यह समझने की भी है कि उसके पीछे कौन-सा जीवन है और वह जीवन हमें क्या बताता है। मेरी चिंता यह है कि आने वाली पीढ़ियां अपनी इस विरासत को केवल किताबों या संग्रहालयों में न देखें, बल्कि उसे जानें, समझें और संभव हो तो अपने जीवन में आगे भी निभाएं।

इसी सिलसिले में मैं पिछले करीब 16 वर्षों से ‘लोक रंग’ नाम से एक ब्लॉग भी चला रही हूं, जिसमें लोक कला, लोकगीत, लोक संस्कृति और उनसे जुड़ी कई जानकारियां साझा करती रहती हूं। यह मेरे लिए केवल लेखन का माध्यम नहीं, बल्कि लोक से जुड़ी अपनी स्मृतियों और अनुभवों को सहेजने की एक कोशिश भी है। लोक से जुड़ी बहुत सारी जानकारी मैं वहां साझा करती रहती हूं। अगर किसी को लोक कला और लोक संस्कृति से जुड़ी चीजों के बारे में जानना हो, तो वहां जाकर देख सकते हैं। उसका लिंक दे रही हूं—https://lokrang-india.blogspot.com/

 

3. आपने मंजूषा कला और जादोपेटिया कला पर विशेष अध्ययन किया है. इन दोनों लोककलाओं में आपको ऐसी कौन-सी विशेषताएं मिलींजिन्हें आधुनिक कला जगत तक पहुंचाना जरूरी लगता है?

मंजूषा कला अंग जनपद की एक बहुत ही प्राचीन कला है। केवल तीन रंगों—गुलाबी, हरा और पीला—से बनने वाली यह कला एक पूरी लोकगाथा कहती है। भारत की कई लोककलाएं प्रकृति, ऋतुओं या देवी-देवताओं से जुड़ी हुई हैं, लेकिन मंजूषा कला की अपनी एक अलग विशेषता है। यह पूरी तरह एक लोकगाथा के भीतर सांस लेती है। इसका हर रंग, हर रेखा और हर आकृति बिहुला-विषहरी की कथा का एक शब्द है। इसलिए मंजूषा को समझना केवल एक चित्र को समझना नहीं है। यह अंग प्रदेश की लोक चेतना को पढ़ने जैसा है।

दूसरी ओर, जादोपेटिया चित्रकला संथाल परगना और ओडिशा के कुछ हिस्सों में बनाई जाती है। इसमें धूसर रंगों का प्रयोग अधिक दिखाई देता है। इस कला के माध्यम से जन्म और मृत्यु के रहस्यों को समझाने की कोशिश की जाती थी। अच्छे और बुरे कर्मों के परिणाम भी इसमें चित्रित किए जाते हैं। यमराज का दंड इसमें विशेष रूप से दिखाई देता है।

इस कला को बनाने वाले कलाकार ‘जादौ’ कहे जाते थे। किसी की मृत्यु के बाद होने वाले अनुष्ठानों में ये कलाकार अपनी कलाकृतियां लेकर जाते थे और गांव-जवार के लोगों को चित्र दिखाकर कर्मों के बारे में समझाते थे। कई बार यह प्रस्तुति गायन के रूप में भी होती थी। यानी यह केवल चित्रकला नहीं थी, बल्कि चित्र, कथा, संगीत और लोक विश्वासों को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा थी।

मुझे लगता है कि यही इन दोनों कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता है। इनमें चित्र केवल देखने की चीज नहीं है, बल्कि अपने भीतर एक पूरी कथा, स्मृति और जीवन-दर्शन लेकर चलता है। आज जब आधुनिक कला लगातार नए माध्यमों और प्रयोगों की ओर बढ़ रही है, तब इन लोककलाओं की अपनी जड़ों से जुड़ी यह दृष्टि आधुनिक कला के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। इन्हें केवल ‘लोक कला’ कहकर अलग रख देना ठीक नहीं होगा। इनके भीतर ऐसी कथाएं, प्रतीक और जीवन-दृष्टि है, जिनसे आधुनिक कला भी संवाद कर सकती है।

दुर्भाग्य से समय के साथ जादोपेटिया कला का मूल रूप काफी बदल गया है। इसलिए मेरा मानना है कि इन कलाओं को केवल संरक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनके पीछे की कथा, परंपरा और जीवन-दृष्टि को भी समझना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है।

 

4. लोक कला में महात्मा गांधी की मौजूदगी को लेकर आपने शोध किया है। इस शोध के दौरान ऐसी कौन-सी खोज या घटना सामने आईजिसने आपको सबसे अधिक चौंकाया या प्रभावित किया?

देवी-देवताओं में जैसे गणेश भगवान की आकृति बनाना बहुत आसान है, वैसे ही कलाकारों के बेहतरीन प्रयोगों ने गांधी जी की आकृति को भी लोक कला में बहुत सहज बना दिया है। झारखंड के कई ऐसे गांव आज भी हैं, जहां की बुजुर्ग महिलाओं के लिए ‘नेता’ का मतलब केवल गांधी होता है। उनकी आस्था का आलम यह है कि वे उन्हें ‘गांधी बाबा’ कहकर संबोधित करती हैं। कई लोकगीतों में भी हमें गांधी जी का वर्णन मिलता है।

अगर हम यह कहें कि गांधी जी व्यक्ति से ज्यादा एक विचार बनकर लोक के जीवन में घुल-मिल गए हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोक कला में उनकी मौजूदगी केवल उनके चित्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोगों की स्मृतियों, विश्वास और जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन चुकी है।

शोध के दौरान एक बार झारखंड के लिट्टीपाड़ा इलाके में मुझे एक महिला मिली, जिसने कपड़े पर धागे से गांधी जी का एक पोर्ट्रेट बनाया था। वह उस चित्र को देवताओं के स्थान पर रखती थी। बहुत पुराना होने की वजह से वह जगह-जगह से फट गया था, लेकिन वह उसे बहुत प्यार से अपना ‘गांधी बाबा’ कहकर दिखा रही थी।

उस समय मेरे पास कैमरा नहीं था और मोबाइल भी बटन वाला ही था। बाद में वहां दोबारा जाना नहीं हो पाया। लेकिन उस महिला की तस्वीर और उसके विश्वास की वह स्मृति आज भी मेरे भीतर कहीं बची हुई है। मुझे वह महिला बार-बार याद आती है और उससे भी ज्यादा याद आता है उसका अपने ‘गांधी बाबा’ के प्रति वह विश्वास।

 


5.     
आपकी एक पहचान चित्रकार की है और दूसरी लेखिका की। जब कोई विचार आपके भीतर जन्म लेता हैतो वह पहले शब्दों का रूप लेता है या रंगों और रेखाओं का?

रंग तो मेरी जिंदगी हैं। मेरा स्केचबुक मेरे साथ पूरे घर में घूमता रहता है—कभी सोफे पर, कभी बिस्तर के पास और कभी-कभी सफर में भी मेरे साथ चला जाता है। लोग तो मेरे घर को देखकर हंसते हैं। आलमारियां किताबों से भरी हैं, दीवान में पेंटिंग्स रखी हैं और कपड़ों के लिए जगह नहीं बचती, तो उन्हें पोटली बनाकर रख देती हूं। कह सकती हूं कि मेरे घर में रंगों का कारोबार काफी समृद्ध है।

लेकिन अगर कोई विचार मेरे भीतर जन्म लेता है, तो ज्यादातर समय कलम ही पहले आगे हो जाती है। वह विचारों को पहले कैद कर लेना चाहती है। रंग और रेखाएं बाद में अपना रास्ता खोज लेते हैं। शायद इसलिए मेरे लिए शब्द और रंग अलग-अलग माध्यम नहीं हैं। दोनों मेरे भीतर एक-दूसरे से लगातार बातचीत करते रहते हैं। कभी कोई विचार शब्द बनकर आता है और कभी वही विचार रंग और रेखाओं में अपना रूप खोज लेता है।

 

6. आपने लोक जीवन पर हजार से अधिक लेख लिखे हैंसाथ ही कहानियांकविताएं और बाल साहित्य भी लिखा है। इतने अलग-अलग माध्यमों में काम करने के पीछे आपकी रचनात्मक बेचैनी क्या है?

इस बेचैनी का पता मुझे आज तक नहीं लग पाया है। पता नहीं मैं कौन-सी भटकती आत्मा हूं, जो हर काम कर लेना चाहती है। शायद मेरे भीतर एक जगह टिककर बैठने की आदत ही नहीं है। शादी के बाद जब मैं अपने पति के साथ दिल्ली आई, तब हमने आर्थिक तंगी का एक बड़ा दौर देखा। लेकिन हम दोनों ने न कभी किसी से कुछ कहा और न हार मानी। जो काम सामने आता और लगता कि उससे कुछ पैसे मिल सकते हैं, हम वही करने लग जाते थे। तब मैने किताबों के कवर भी डिजाइन किए, रेखाचित्र भी बनाए। ट्रांसलेशन का भी काम किया। उसी दौरान मैंने ‘उमंग’ नाम के चिल्ड्रन थिएटर में भी काम किया, जिसे रेखा जैन जी चलाती थीं। वहां रहते हुए रेखा जी के पति और प्रख्यात रंग आलोचक नेमिचंद्र जैन से मेरी मुलाकात होती रहती थी।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा था-“अगर तुम कर सकती हो तो हर काम करो। हमारे काम करने की कोई सीमा नहीं होती।” उनकी यह बात मेरे मन में कहीं रह गई। बाद में मैंने उनकी पत्रिका ‘नटरंग’ में भी करीब एक साल तक काम किया। शायद उस दौर की जद्दोजहद ने ही मुझे रचनात्मक बना दिया। जब जिंदगी में एक ही काम के सहारे चलना संभव नहीं था, तब मैंने अलग-अलग कामों को आजमाया और हर काम से कुछ न कुछ सीखा। धीरे-धीरे लेखन, चित्रकला, लोक संस्कृति, कहानी, कविता और बाल साहित्य—सब मेरे जीवन का हिस्सा बनते चले गए।

आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि शायद यह बेचैनी ही मेरी ताकत है। मैं किसी एक माध्यम में बंधकर रह ही नहीं सकती। कोई विचार जिस रूप में मेरे भीतर आता है, मैं उसे उसी रूप में अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूं।

 

7. संस्कृति मंत्रालय की जूनियर और सीनियर फैलोशिप के दौरान आपने लोकदेवी-देवताओं और बोल-बम यात्रा के सांस्कृतिक अर्थशास्त्र पर काम किया। इन शोधों ने लोक संस्कृति को देखने की आपकी दृष्टि में क्या बदलाव किया?

संस्कृति मंत्रालय से मुझे जूनियर फैलोशिप 2000-01 में मिली थी। विषय था—‘अंग जनपद के लोक देवी-देवताओं का शब्द चित्रण’। लोक देवी-देवताओं के बारे में जानने की मेरी रुचि पहले से ही थी, लेकिन इस फैलोशिप ने मेरे काम को एक दिशा और गति दे दी। मैंने इस शोध को सिर्फ किया नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ उसे जिया भी है। इतने वर्षों के बाद भी मुझे लगता है कि अभी तो बहुत कुछ जानना बाकी है।

सीनियर फैलोशिप मुझे 2015-16 में मिली। इस बार विषय था—‘संसार की सबसे लंबी आस्था यात्रा बोल-बम का अर्थशास्त्र’। इसके तहत मैंने सुलतानगंज के गंगा घाट से लेकर बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर तक होने वाली इस आस्था यात्रा का अध्ययन किया। शुरुआत में कई बार मुझे समझ नहीं आता था कि इतने बड़े मेले और पूरी यात्रा के अर्थशास्त्र को मैं हूबहू कैसे समझ और दर्ज कर पाऊंगी। फिर मुझे लगा कि इसे बाहर खड़े होकर नहीं समझा जा सकता। इसलिए मैंने खुद पदयात्रा करने का फैसला किया। सुलतानगंज में गंगा से जल उठाया और पैदल देवघर तक गई। इस दौरान रास्ते के बाजारों, दुकानों, अस्थायी कारोबार, लोगों की आवाजाही और मेले की पूरी व्यवस्था को बहुत करीब से देखने और समझने का मौका मिला।

इस यात्रा ने मेरी दृष्टि बदल दी। मुझे समझ में आया कि लोक संस्कृति केवल गीत, कला, पूजा और परंपराओं का नाम नहीं है। उसके साथ एक पूरा आर्थिक संसार भी चलता है। एक आस्था यात्रा हजारों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ती है, रास्ते के छोटे-छोटे बाजारों को जीवित करती है और अपने साथ एक अस्थायी अर्थव्यवस्था भी खड़ी कर देती है।  मेरे लिए यह सफर जानकारी जुटाने से कहीं ज्यादा था। यह बहुत दिलचस्प और भीतर तक छू लेने वाला अनुभव था। शायद इसी वजह से मेरे लिए लोक संस्कृति पर शोध करना केवल अध्ययन नहीं, बल्कि उस लोक जीवन के बीच जाकर उसे महसूस करना है।

 

8. आज लोक कला को बाजारपर्यटन और आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है. आपके अनुसार इससे लोक कलाकारों को वास्तविक लाभ मिल रहा है या उनकी कला के मूल स्वरूप के साथ समझौता भी हो रहा है?

लोककला को हमेशा से बाजार की जरूरत रही है। मुझे बहुत खुशी होती है जब कोई लोक कलाकार सम्मानित होता है या उसकी कोई कलाकृति अच्छे दामों में बिकती है। कलाकार को उसके काम का सम्मान और उचित मूल्य मिलना जरूरी है। आखिर कला के साथ कलाकार का जीवन भी जुड़ा हुआ है।

जहां तक बदलाव की बात है, तो परिस्थितियां बदलेंगी, समाज बदलेगा, तो लोककला में भी बदलाव आएगा ही। मेरे ख्याल से लोककला एक घूमता हुआ आइना है। वह अपने समय और समाज को अपने भीतर दर्ज करती रहती है। मंजूषा को ही लीजिए। अब यह कला सिर्फ बिहुला-विषहरी की कथा तक सीमित नहीं है। आज मंजूषा में समाज के बहुत सारे समकालीन विषयों को चित्रित किया जा रहा है और उन्हें सराहा भी जा रहा है। मैं खुद अपनी पेंटिंग में मंजूषा कला के साथ नए-नए प्रयोग करती रहती हूं। इसलिए मैं बदलाव के खिलाफ नहीं हूं। बदलाव तो कला को जीवित रखने के लिए जरूरी भी है।

लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि बदलाव करते हुए उसका ग्रामर नहीं बिगड़ना चाहिए। मंजूषा के अपने रंग हैं, अपनी रेखाएं हैं, अपनी आकृतियां हैं और अपनी एक दृश्य भाषा है। इसके तीन मूल रंगों—गुलाबी, हरा और पीला—का अपना महत्व है। जब कोई कलाकार मंजूषा में किसी दूसरी लोककला को इस तरह मिला देता है कि उसकी अपनी पहचान ही धुंधली होने लगे, या रंगों की अपनी सीमा का ध्यान नहीं रखता, तो मुझे बहुत बुरा लगता है और चिंता भी होती है। प्रयोग जरूर हों, नए विषय आएं, लेकिन लोककला का अपना व्याकरण और पहचान बची रहनी चाहिए। वरना आने वाले समय में हम यह तो कहेंगे कि लोककला जीवित है, लेकिन यह भूल जाएंगे कि उसकी असली पहचान क्या थी।

9. आपने बच्चों के लिए भी लगातार लेखन और चित्रांकन किया है. आज के डिजिटल दौर में बच्चों को लोककथाओंलोककलाओं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

बच्चों को लोककला और लोक संस्कृति से जोड़ने के लिए सबसे पहले उन्हें घर में वह माहौल देना होगा। केवल किताबों में लोककथाएं पढ़ा देने या लोककला के चित्र दिखा देने से बात नहीं बनेगी। उन्हें अपनी जड़ों के करीब ले जाना होगा।

जिस तरह आजकल छुट्टियों में लोग घूमने के लिए देश-विदेश जाते हैं, उसी तरह उन्हें अपने गांव भी जाना चाहिए। अपनी धरती, अपनी बोली, अपने लोगों और अपने समाज से बच्चों को जोड़ना चाहिए। उन्हें यह महसूस करने का मौका मिलना चाहिए कि उनकी संस्कृति सिर्फ किताब में लिखी कोई चीज नहीं है, बल्कि उनके आसपास के जीवन का हिस्सा है।

गांवों में अभी भी कहीं न कहीं लोक संस्कृति बची हुई है। वहां लोकगीत हैं, लोकपर्व हैं, लोककथाएं हैं, लोककलाएं हैं और उन्हें जीने वाले लोग हैं। अगर बच्चे इन सबके बीच जाएंगे, बुजुर्गों से उनकी कहानियां सुनेंगे, लोकगीत सुनेंगे और त्योहारों में शामिल होंगे, तो लोक संस्कृति अपने आप उनके भीतर जगह बना लेगी। मुझे लगता है कि बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें अपनी जड़ों से मिलने दिया जाए। डिजिटल दुनिया अपनी जगह है, लेकिन अपनी माटी से जुड़ने का कोई विकल्प नहीं है।

 

10.  आपकी नई किताब ‘जन जन के अन्ना’ और आने वाली पुस्तक ‘घूमता आईना है लोक’ के माध्यम से पाठकों तक आप कौन-सी ऐसी बात पहुंचाना चाहती हैंजिसे आपके अब तक के रचनात्मक सफर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश कहा जा सके?

 

जन जन के अन्ना’ मेरी नई किताब नहीं है। यह कई साल पहले प्रकाशित हो चुकी है। इस किताब में मैंने जन लोकपाल बिल जैसे विषय को भी बहुत सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की थी, ताकि आम पाठक भी उसे आसानी से समझ सके। ‘घूमता आइना है लोक’ पर पिछले काफी समय से काम चल रहा है। यह किताब मेरे लिए थोड़ी अलग और बहुत मेहनत की किताब है। इसे लिखते हुए मुझे लगातार लगता रहा है कि लोक को जितना जानती हूं, उससे कहीं ज्यादा अभी जानना बाकी है। शायद इसी वजह से यह किताब समय ले रही है।

उम्मीद है कि यह किताब इस साल के अंत तक आ जाएगी। मेरी कोशिश है कि इसमें लोक संस्कृति को सिर्फ जानकारी के रूप में न रखा जाए, बल्कि उसके पीछे के जीवन, समाज और उसकी संवेदनाओं को भी पाठकों के सामने लाया जा सके। मैं चाहती हूं कि ‘घूमता आइना है लोक’ आज के पाठकों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी दिलचस्प और जानकारी से भरपूर हो। अगर मेरी किताब पढ़ने के बाद किसी पाठक के मन में अपने लोक, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जानने की जिज्ञासा पैदा होती है, तो मैं उसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानूंगी।

व्यक्तिगत जानकारी—

फिलहाल मैं अपने पति देव प्रकाश चौधरी और बेटे अनहद कश्यप के साथ गाजियाबाद में रहती हूं। मेरे पति एक दैनिक समाचार पत्र में सीनियर रेजिडेंट एडिटर हैं। पत्रकारिता के साथ-साथ वे चित्रकला और कविता में भी सक्रिय हैं। बेटा अनहद कश्यप डिजाइनिंग  की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी कर रहा है। उसका झुकाव बचपन से ही कला की ओर रहा है। वह एक कार डिजायनर है।   

 


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