Tuesday, September 8, 2026

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

 आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ/जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व

 



प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भुजरिया रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है। कई जगह पर इसे भुजलिया भी कहा जाता है।

यह पर्व श्रावण पूर्णिमा के दूसरे दिन मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से बुंदेल खंड और उसके आस-पास के इलाके में मनाया जाता है। इस पर्व में नाग पंचमी के दिन सुबह उठकर नहा-धोकर बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में मिट्टी की तह लगाकर गेहूं या जौ के दाने बोते हैं। राखी पर्व तक इसे पानी से सींचा जाता है।

लोक की मानें तो इस पर्व का आरंभ राजा आल्हा ऊदल के समय से माना जाता है। यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और अच्छे जीवन यापन की कामना से मनाया जाता है। तकरीबन एक सप्ताह में गेहूँ के पौधे उग जाते हैं। इन नन्हें पौधों को भुजरिया कहा जाता है।

रक्षाबंधन के दूसरे दिन घर की महिलाएं इन पौधों की पूजा करती हैं, लोक गीत भी गाए जाते हैं। इसके बाद महिलाएं पौधे से भरी इन टोकरियों को लेकर गीत गाती हुई किसी नदी या तालाब के पास जाती हैं और इन्हें जल में विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जन के बाद एक दूसरे को शुभकामनाएं दी जाती है।

लोक जीवन में यह कथा प्रचलित है कि जब आल्हा की बहन चंद्रावलि श्रावण माह में ससुराल से पीहर आई तो वीर आल्हा,ऊदल,मलखान सहित सारे नगर वासियों ने भुजरियों से उनका स्वागत किया था। महोबा के इन वीर सपूतों की कहानियां आज भी बुंदेलखंड की धरती पर सुनीं और सुनाई जाती हैं। जब महोबा के राजा परमाल, उनकी बिटिया राजकुमारी चंद्रावलि का अपहरण करने के लिए दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोबा पर चढ़ाई कर दी थी। तो

 बताया जाता है कि महोबा के राजा परमाल, उनकी बिटिया राजकुमारी चंद्रावलि का अपहरण करने के लिए दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोबा पर चढ़ाई कर दी थी।  उस वक्त राजकुमारी अपनी सखियों के साथ तालाब की ओर गई हुई थी। राजकुमारी को पृथ्वीराज से बचाने के लिए राज्य के वीर महोबा के सपूतों आल्हा,ऊदल और मलखान ने वीरता पूर्वक युद्ध किया था। तब इन दो वीरों के साथ में चंद्रावलि के ममेरे भाई अभई भी उरई से आ गए थे। कीरत सागर ताल के पास हुई लड़ाई में अभई को वीरगति प्राप्त हुई। उसमें राजा परमाल का बेटा रंजीत शहीत हो गया था। लेकिन युद्ध राजा परमाल ने आल्हा, ऊदल और मलखान के साथ मिलकर जीत लिया था।

महोबा में इस जीत के बाद से हीं कजलिया का त्योहार मनाया जाता है। लोग एक दूसरे से मिलते हैं, सुख-समृद्धि की कामना करते हैं, नयी ब्याही लड़कियों का मायके में स्वागत होता है, आल्हा,ऊदल की वीरता की कहानी आदर सहित अपने बच्चों को सुनाते हैं और गेहूँ के नन्हे पौधों को जल में प्रवाहित करते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

#pritimavats

#folktale

#folkculture

वीरता और प्रकृति को समर्पित पर्व कजलिया

  आज भी उगाए जाते हैं टोकरियों में गेहूँ / जौ के पौधे और मनाया जाता है कजलिया पर्व   प्रकृति प्रेम और खुशहाली को समर्पित पर्व कजलिया या भु...