Thursday, May 7, 2026

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं, उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं, उतनी ही स्मृतियां। संतालों के साथ साथ यहां उन गैर संताल समुदायों की भी एक बड़ी दुनिया रही है, जिन्हें संताल समाज अपने ढंग से "दिकू" कहकर पुकारता रहा। लेकिन इस संबोधन के भीतर भी सदियों का साथ बसा हुआ है। खेत साझा रहे, मौसम साझा रहे, और धीरे धीरे कई लोक विश्वास भी एक दूसरे में घुलते चले गए।


उन्हीं लोक स्मृतियों में एक नाम है — बनसत्तो माई।

गांवों की लड़कियां जब साग तोड़ने जंगल या खेतों की ओर जाती थीं, तो रास्ते में कहीं मिट्टी का एक छोटा सा ढेर जमा कर उसे बनसत्तो माई का रूप दे देती थीं। फिर पहला साग उसी पर चढ़ाया जाता था। साथ में यह गाती भी....

हे हे बनसत्तो माय, हमरो खोइछो दिहो भराय।।

यह पूजा किसी बड़े विधान की तरह नहीं होती थी। न कोई पुरोहित, न कोई शास्त्र। बस कुछ हरी पत्तियां, थोड़ी मिट्टी और मन में बसा एक सीधा भरोसा।

मान्यता थी कि बनसत्तो माई की पूजा करने से साग ज्यादा टूटेगा और कम समय लगेगा। सुनने में यह बात बहुत छोटी लग सकती है, पर दरअसल यह पूरे लोक जीवन की थकान और उम्मीद से जुड़ी हुई बात थी। जंगल दूर होते थे, काम बहुत होता था, और दिन छोटे पड़ जाते थे। ऐसे में यह विश्वास लड़कियों के श्रम को हल्का करता था। जैसे कोई अदृश्य हाथ उनके साथ साथ चल रहा हो।

ध्यान से देखें तो यह केवल पूजा नहीं थी, श्रम और प्रकृति के बीच का एक संवाद था। साग तोड़ना भी यहां एक सांस्कृतिक क्रिया थी। जंगल से कुछ लेने से पहले उसे प्रणाम करना जरूरी था। मिट्टी का वह छोटा सा ढेर दरअसल धरती के प्रति कृतज्ञता का सबसे सरल रूप था।

अब वह दृश्य धीरे धीरे गायब हो रहा है। जंगल सिकुड़ गए हैं, साग बाजार में बिकने लगा है, और लड़कियों के हाथों की वह मिट्टी सूखती जा रही है। फिर भी लगता है कि संथाल परगना की हवा में बनसत्तो माई अब भी कहीं बची हुई हैं। शायद किसी पगडंडी के किनारे, किसी बूढ़ी स्मृति में, या किसी बच्ची के हाथ में लगी मिट्टी की गंध में।

लोक का इतिहास किताबों में कम मिलता है। वह लोगों की आदतों में बचा रहता है। बनसत्तो माई भी वैसी ही एक बची हुई आदत हैं — जो बताती है कि इस इलाके में जंगल या खेत केवल पेड़ों या फसलों की जगह का नाम नहीं था, वह हमारे और आपके  भरोसे का भी दूसरा नाम था।

- प्रीतिमा वत्स

 

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...