Sunday, December 23, 2007

लोक देव करमा


सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता में लोक देवी-देवताओं के महत्व को समाज में व्याप्त अनेक पर्व-त्योहारों,इससे जुड़ी किंवदंतियों, कथा-कहानियों, गीतों आदि के माध्यम से बखूबी जाना समझा जा सकता है। अंग-जनपद में बहुत सारे पर्व-त्योहार ऐसे मनाए जाते हैं, जो अन्यत्र कम ही देखने को मिलते हैं। इन पर्व-त्योहारों पर जो कथाएं कही जाती हैं, वह जाति प्रथा से ग्रसित कतई नहीं हैं। इन पर्व-त्योहारों को हर वर्ण के लोग मनाते हैं-


अंग जनपद में यह पर्व आदिवासियों के साथ-साथ अन्य लोग उल्लास के साथ मनाते हैं। पर्व की लोककथा कुछ इस प्रकार है। कर्मा और धर्मा नामक दो भाई थे। दोनों ही बड़े प्रेम से रहते थे, तथा गरीबों की सहायता किया करते थे। कुछ दिन बाद कर्मा की शादी हो गई। कर्मा की पत्नी बहुत ही अधार्मिक तथा बुद्धिहीन स्त्री थी। वह, हर वह काम किया करती थी, जिससे कि लोगों को हानि और क्लेश पहुंचे। यहां तक कि उसने धरती मां को भी नहीं छोड़ा, वह चावल बनाने के बाद मांड जो पसाती वह भी जमीन पर सीधे गिरा देती । इससे कर्मा को बड़ा तकलीफ हुआ। वह धरती मां को घायल और दुखी देखकर काफी दुखी था। गुस्से में वह घर छोड़कर चला गया। उसके जाते ही पूरे इलाके के आदमियों का करम (तकदीर) चला गया। अब वे काफी दुखी और पीड़ित जीवन बिताने लगे।
कुछ दिन बाद जब धर्मा से नहीं रहा गया। इलाके की अकाल और भूखमरी से जब वह व्याकुल हो गया तो अपने भाई कर्मा को खोजने के लिए निकल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद उसे प्यास लगी। पानी की खोज में वह इधर-उधर भटकने लगा। सामने एक नदी दिखाई दिया पर वह सूखी पड़ी थी। नदी ने पास आकर धर्मा से कहा कि जबसे हमारे कर्मा भाई इधर से गए हैं हमारे तो करम ही फूट गए हैं। अब यहां कभी पानी नहीं आता है, यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो हमारे बारे में जरूर कहिएगा। धर्मा आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक आम का वृक्ष मिला, जिसके सब फलों में कीड़े थे। उसने भी धर्मा को कहा कि जबसे कर्मा भाई इधर से गुजरे हैं, इस पेड़ के सारे फल खराब हो गए हैं। यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो इसका निवारण पता कीजिएगा। धर्मा वहां से आगे बढा। कुछ दूर और चलने पर उसे एक वृद्ध व्यक्ति मिला, जिसके सिर का बोझ तब तक नहीं उतरता था, जब तक कि चार-पांच आदमी मिलकर उसे नोच-नोच कर उतारते नहीं थे। उसने भी धर्मा को कर्मा के मिलने पर अपना दुखड़ा सुनाने तथा उसका निवारण पूछने की बात कही। आगे मार्ग में उसे पुनः एक औरत मिली। उसने भी धर्मा को कहा कि यदि कर्मा उसे मिले तो उससे कहे कि जब वह खाना पकाती है तो उसके हाथ से कढ़ाई-बर्तन जल्दी छूटते नहीं हैं, वह हाथ में हीं चिपक जाता है यह समस्या किस तरह से दूर होगी।
चलते-चलते धर्मा एक रेगिस्तान में पहुंच गया। वहां जाकर उसने देखा कि उसका भाई कर्मा धूप और गर्मी से व्याकुल रेत पर पड़ा था। उसके पूरे शरीर पर फफोले पड़े थे। धर्मा ने उसकी यह हालत देखी और काफी दुखी हुआ। उसने कर्मा को घर चलने के लिए कहा तो कर्मा बोला मैं उस घर में कैसे जाऊं। वहां पर मेरी पत्नी है, जो इतनी अधार्मिक और बुद्धिहीना है कि मांड़ तक जमीन पर फेंक देती है। इस पर धर्मा बोला मैं आपको वचन देता हूं कि आज के बाद कोई भी स्त्री मांड जमीन पर नहीं फेंकेगी।
कर्मा अपने भाई धर्मा के साथ घर की ओर चला तो मार्ग में उसे सबसे पहले वह स्त्री मिली। उसे कर्मा ने कहा कि तुमने किसी भूखे ब्राह्मण को खाना नहीं दिया था, इसलिए तुम्हारी यह दशा हुई है। आज के बाद किसी भूखे ब्राह्मण का तिरस्कार मत करना, तेरे कष्ट दूर हो जाएंगे।
अंत में उसे वह नदी मिली जिसमें पानी नहीं था। नदी को देखकर कर्मा ने कहा तुमने किसी प्यासे आदमी को साफ पानी नहीं दिया था, इसलिए अब तुम्हारे पास पानी नहीं है। आगे से तुम कभी अपना गन्दा जल किसी को पीने मत देना, कोई तुम्हारे तट पर पानी पीने आए तो उसे स्वच्छ जल देना, तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे। इस प्रकार कर्मा पूरे रास्ते में सभी को उसके हिस्से का कर्म प्रदान करते हुए अपने घर आया तथा घर में पोखर बनाकर उसमें कर्मडार लगाकर उसकी पूजा की। इलाके के अकाल समाप्त हो गए। खुशहाली लौटी। उसी कर्मा की याद में आज भी लोग कर्मा पर्व मनाते हैं। कर्मा की पूजा में पोखर के किनारे खजूर की डाली लगाकर उसमें फूल खोंसा जाता है। लोक मान्यता है कि जो भी स्त्री कर्मडार की पूजा करेगी और अपने हिस्से का कर्म पाएगी उसके कांटे जैसे स्वाभाव या भाग्य में भी फूल खिल जाएंगे।

-प्रीतिमा वत्स

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