Monday, October 27, 2008

क्यों कभी जवान नहीं हुए भगवान कार्तिकेय ?

कथा पुरानी है....जुए से जुड़ी है। जुए के खेल की वजह से पार्वती जी ने शंकर जी को यह शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ हमेशा उनके सिर पर बना रहेगा। नारद जी को शाप दिया कि तुम धूर्तता करते हो, अतः कभी एक स्थान पर दो घड़ी के लिए भी जमकर नही बैठ सकोगे। भगवान् विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा परम शत्रु होगा। रावण को शाप दिया कि तुम्हारा विनाश यही विष्णु करेंगे। कार्तिकेय को शाप दिया कि तुम कभी जवान नहीं होगे।

एक बार शंकर जी ने पार्वती से जुआ खेलने का अभिलाशा की। संयोगवश खेल में शंकर जी अपना सब कुछ हार गए और पार्वती ने उनसे उनका सब सामान हीं नहीं उनका वाहन-नन्दी, व्याध्र चर्म, सर्प आदि सब कुछ ले लिया। शंकर जी को इससे ग्लानि हुई । वे उदास होकर पत्तों के वस्त्र पहन कर गंगा नदी के तट पर चले गए। कार्तिकेय को जब पिता की चिन्ता का पता लगा ते उन्होंने कारण पूछा। शंकर जी ने जब सबकुछ बताया तो वे सब वस्तुएँ वापस लेने के लिए माता के पास वापस आए और जूए के लिए कहा। इस बार पार्वती जी हार गईं और कार्तिकेय जी शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। पार्वती जी को अब चिन्ता होने लगी क्योंकि पराजित भी हुईं और शंकर जी भी चले गए। उसी समय गणेश जी उनके पास पहुँचे। पार्वती जी को गणेश जी विशेष प्रिय थे। अतः पार्वती जी ने अपना दुख उनसे कह दिया। इसबार गणेश जी अपने पिता से जुआ खेलने पहुँचे। वे जीत गए और आकर अपने विजय की सूचना अपनी माता को दी। पार्वती जी प्रसन्न हुईं परंतु बोली तुम्हे अपने पिता को लेकर आना चाहिए था।
गणेश जी पिता की खोज में निकल पड़े। शंकर जी से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। वे कार्तिकेय तथा विष्णु भगवान के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। वे पार्वती जी से बहुत नाराज थे और उनके पास नहीं जाना चाह रहे थे। इसलिए गणेश जी के आने से वे प्रसन्न नहीं हुए। शंकर जी की इच्छा को जानकर उनके भक्त रावण ने बिल्ली का रूप धारणकर गणेश जी के वाहन चूहे को डरा दिया। चूहा गणेश जी को गिराकर अपनी जान लेकर भागा। तब गणेश जी अपना भारी-भरकम शरीर लेकर धीरे-धीरे चलने लगे। इधर शंकर जी की इच्छा से विष्णु भगवान ने पासा का रूप धारण किया। इसी वीच गणेशजी ने शंकर जी के समीप पहुँचकर माता का सन्देश कहा। तब महादेव ने उनसे कहा कि हमने नया पासा बनवाया है, यदि तुमाहारी माँ फिर से खेलने के लिए राजी हों तो मैं चल सकता हूँ। गणेश जी ने जब आश्वासन दिया तब शंकर जी पार्वती जी के पास अपने दल-बल के साथ वापस आए। शंकर जी ने आते हीं पार्वती से खेलने के लिए कहा और अपने नये पासे की चर्चा की। पार्वती जी ने हँस कर कहा आपके पास है क्या चीज जिससे खेला जाएगा। यह सुनकर शंकर जी चुप हो गए। नारद जी अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हे दे दी। इस बार महादेव हर बार जीतने लगे। एक- दो पासे के बाद गणेश जी को उनके कपट का पता चल गया और उन्होने अपनी माँ को यह बात बता दी। पार्वती जी को बहुत क्रोध आ गया । रावण ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन उनका क्रोध शांत नहीं हुआ और उन्होंने शंकर जी को यह शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ हमेशा उनके सिर पर बना रहेगा। नारद जी को शाप दिया कि तुम धूर्तता करते हो, अतः कभी एक स्थान पर दो धड़ी के लिए भी जमकर नही बैठ सकोगे। भगवान् विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा परम शत्रु होगा। रावण को शाप दिया कि तुम्हारा विनाश यही विष्णु करेंगे। कार्तिकेय को शाप दिया कि तुम कभी जवान नहीं होगे।
पार्वती का शाप सुनकर सभी लोग चिन्तित हो उठे। तब नारद जी ने अपनी सरल और हँसने-हँसाने वाली प्रकृति से सवका मनोरंजन किया। वे नाचने-कूदने और गाने-बजाने लगे। नारद की इस सूझ पर पार्वती जी का भी क्रोध दूर हो गया। नारद पर परम प्रसन्न होकर वह उनसे वरदान मांगने को कहने लगी। नारद जी ने कहा वरदान तो मैं तभी लूंगा जब सबको मिलेगा। पार्वती जी सहमत हो गईं। तब शंकर जी ने मांगा कि आज कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा है, अतः आज के दिन जो कोई जूआ मे विजयी हो वह वर्ष भर सदा विजयी रहे। विष्णु भगवान ने कहा कि मैं चाहे कोई छोटा काम करूँ या बड़ा सब पूरा हो। कार्तिकेय ने कहा यदि मुझे बालक ही बना रहना है तो मेरी इच्छा यही है कि मुझे विषय-वासना का संसर्ग न हो और सदा मेरा मन तपस्या और साधना में लीन रहे। रावण ने वेदों की सुविस्तृत व्याख्या का वरदान मांगा और शिवजी की अविचल भक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने सब से प्रथम पूजा प्राप्त करने का वरदान मांगा। सबसे अन्त में नारद ने देवर्षि होने की इच्छा प्रकट की। पार्वती जी ने सबकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया, जिससे सभी प्रसन्न हो गए।

-प्रीतिमा वत्स

Wednesday, September 17, 2008

गरुड़ को भी दया आ गई



पिछले पोस्ट में मैंने जिउतिया व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा के बारे में बताया था। परंतु जिउतिया व्रत की एक पौराणिक कथा भी है। जो मैं अपने इस पोस्ट में बताने जा रही हूँ।

प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक का एक राजा था । बह बहुत धर्मात्मा, परोपकारी, दयालु, न्यायप्रिय तथा प्रजा को पुत्र की भाँति प्यार करने वाला था। एक बार शिकार करने के लिए मलयगिरि पर्वत पर गए। वहाँ उनकी भेंट मलयगिरि की राजकुमारी मलयवती के हो गई,जो कि वहाँ पर पूजा करने के लिए सखियों के साथ आई थी। दोनों एक दूसरे को पसंद आ गए। वहीं पर मलयवती का भाई भी आया हुआ था। मलयवती का पिता बहुत दिनों से जीमूतवाहन से अपनी बेटी का विवाह करने का चिन्ता में था। अतः जब मलयवती के भाई को पता चला कि जीमूतवाहन और मलयवती एक दूसरे को चाहते हैं तो वह बहुत खुश हुआ, और अपने पिता को यह शुभ समाचार देने के लिए चला गया।
इधर मलयगिरि की चोटियों पर घूमते हुए राजा जीमूतवाहन ने दूर से किसी औरत के रोने की आवाज सुनी। उनका दयालु हृदय विह्वल हो उठा। वह उस औरत के समीप पहुँचे। उससे सानुरोध पूछने पर पता चला कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके एकलौते पुत्र शंखचूर्ण को आज गरुड़ के आहार के लिए जाना पड़ेगा। नागों के साथ गरुड़ का जो समझौता हुआ था उसके अनुसार मलयगिरि के शिखर पर रोज एक नाग उनके आहार के लिए पहुँच जाया करता था। शंखचूर्ण की माता की यह विपत्ति सुनकर जीमूतवाहन का हृदय सहानुभूति और करुणा से भर गया, क्योंकि शंखचूर्ण ही उसके बुढ़ापे का एक मात्र सहारा था।
जीमूतवाहन ने शंखचूर्ण का माता को आश्वासन दिया कि- माता आप चिंता न करें मैं स्वयं आपके बेटे के स्थान पर गरुड़ का आहार बनने को तैयार हूँ।
जीमूतवाहन ने यह कहकर शंखचूर्ण के हाथ से उस अवसर के लिए निर्दिष्ट लाल वस्त्र को लेकर पहन लिया और उसकी माता को प्रणाम कर विदाई की आज्ञा माँगी। नाग माता आश्चर्य में डूब गई। उसका हृदय करुणा से और भी बोझिल हो उठा उसने जीमूतवाहन को बहुत कुछ रोकने की कोशिश की, किन्तु वह कहाँ रुक सकता था। उसने तुरंत गरुड़ के आहार के लिए नियत पर्वत शिखर का मार्ग पकड़ा और माँ-बेटे आश्चर्य से उसे जाते हुए देखते रह गए।
उधर समय पर गरुड़ जब अपने भोजन-शिखर पर आया और बड़ी प्रसन्नता से इधर-उधर देखते हुए अपने भोजन पर चोंच लगाई तो उसकी प्रतिध्वनि से संपूर्ण शिखर गूँज उठा। जीमूतवाहन के दृढ़ अंगों पर पड़कर उसकी चोंच को भी बड़ा धक्का लगा। यह भीषण स्वर उसी धक्के से उत्पन्न हुआ था। गरुड़ का सिर चकराने लगा। थोड़ी देर बाद जब गरुड़ को थोड़ा होश आया तब उसने पूछा- आप कौन हैं। मैं आपका परिचय पाने के लिए बेचैन हो रहा हूँ।
जीमूतवाहन अपने वस्त्रों में उसी प्रकार लिपटे हुए बोले , पक्षिराज मैं राजा जीमूतवाहन हूँ, नाग की माता का दुख मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मैं उसकी जगह आपका भोजन बनने के लिए आ गया हूँ, आप निःसंकोच मुझे खाइए।
पक्षिराज जीमूतवाहन के यश और शौर्य के बारे में जानता था,उसने राजा को बड़े सत्कार से उठाया और उनसे अपने अपराधों की क्षमा-याचना करते हुए कोई वरदान माँगने का अनुरोध किया।
गरुड़ की बात सुनकर प्रसन्नत्ता और कृतज्ञता की वाणी में राजा ने कहा- मेरी इच्छा है कि आपने आज तक जितने नागों का भक्षण किया है, उन सबको अपनी संजीवनी विद्या के प्रभाव से जीवित कर दें, जिससे शंखचूर्ण का माता के समान किसी की माता को दुःख का अवसर न मिले।
राजा जीमुतवाहन की इस परोपकारिणी वाणी मे इतनी व्यथा भरी थी कि पक्षिराज गरुड़ विचलित हो गए। उन्होंने गदगद कंठ से राजा को वचन पूरा होने का वरदान दिया और अपनी अमोघ संजीवनी विद्या के प्रभाव से समस्त नागों को जीवित कर दिया।
इसी अवसर पर राजकुमारी मलयवती के पिता तथा भाई भी जीमूतवाहन को ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गए थे । उन लोगों ने बड़ी धूमधाम से मलयवती के साथ जीमूतवाहन का विवाह भी कर दिया।
यह घटना आश्विन महीने के कृष्ण अष्टमी के दिन ही घटित हुई थी, तभी से समस्त स्त्री जाति में इस त्यौहार की महिमा व्याप्त हो गई। तब से लेकर आज तक अपने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना करते हुए स्त्रियाँ बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से इस व्रत को पूरा करती हैँ।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, September 9, 2008

कर्ण का पुनर्जन्म


आश्विन महीने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन पितृपक्ष के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं।पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है।

अंगराज कुंती पुत्र कर्ण परम दानी था। वह नित्य सवा मन सोना विद्वान, सदाचारी एवं कुलीन ब्राह्मणों को दान करता था, किन्तु सोने के साथ किसी अन्य वस्तु का दान नहीं करता था। जब उसकी मृत्यु हुई तो वह अपने अच्छे कर्मों की वजह से स्वर्ग लोक में पहुँचा। मृत्यु लोक में दिए गए सोने के दान के फलस्वरूप उसे स्वर्ग में एक स्वर्ण निर्मित आलीशान महल रहने को मिला, किन्तु उसके भीतर और कुछ भी नहीं था। कर्ण को यह देखकर बड़ा दुख हुआ, किन्तु अब हो ही क्या सकता था। महल के रक्षकों ने उन्हे बताया कि मनुष्य मृत्यु लोक में जो कुछ दान करता है, वही उसे यहाँ प्राप्त होता है। कर्ण ने देवराज और यमराज से प्रार्थना करके कहा कि एक पक्ष के लिए उन्हे पुनः धरती पर वापस भेजा जाय, जिससे वे अपने छूटे हुए कर्मों को पूरा कर सके। कर्ण की प्रार्थना स्वीकृत हो गई। फिर तो धरती पर आकर कर्ण ने पंद्रह दिनों तक बड़े संयम और सदाचार से विविध प्रकार की वस्तुओं के दान किए, उसके बाद पुनः कर्ण का स्वर्गवास हुआ। इन पंद्रह दिनों के जीवन में वे दान पुण्य करने में इतने अधिक व्यस्त थे कि हजामत भी नहीं करा सके। उनके इस जीवन के अच्छे कर्मों का फल यह हुआ, कि अब की बार उन्हें स्वर्ग में सब प्रकार के सुख मिले।

कहा जाता है कि दानी कर्ण के पुनर्जीवन के ये पंद्रह दिन इसी पितृपक्ष के थे। तभी से पितृपक्ष में संयम, सदाचार एवं दानादि की अपार महिमा बताई गई है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, July 4, 2008

भीगने वाले हों, तो ही बरसता है मल्हार

उल्लास की ऊंचाई को दर्शन की गहराई से जोड़कर देखने वाले लोग पूरे जीवन को पानी का बुलबुला मानते हैं और उनके लिए यह संसार एक विशाल सागर हो जाता है। इसी सागर में खिलते हैं जीवन, सजते हैं सुर और यहीं भीगता है मन। मन को भीगोने वाले संगीत के कुछ राग और उन पर आधारित चित्रों की कलात्मक अभिव्यक्ति सचमुच सब कुछ बहा लेना चाहते हैं।

गांवों में बादल की हल्की रेखा दिखी नहीं कि बच्चों की टोली जमा हो जाती है-काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़-धानी दे। बच्चों की खुशी और पुकार से पानी सचमुच बरसता है या नहीं, यह तो नहीं मालूम, पर यह लोक विशवास ही है, जहां से शुरू होता है संगीत का सफर, रागों की रचना और सुनने वालों की महफिल।
इन्हीं महफिलों से रचे जाते हैं रागमाला चित्र। रागमाला चित्रों का सृजन भारत की अन्य कला शैलियों में भी हुआ है तथापि राजस्थानी कला शैली की बात ही निराली है। राजस्थान में बने रागमाला चित्रों के आधार वे संगीत ग्रंथ रहे हैं, जिनमें विभिन्न ऋतुओँ पर आधारित छह प्रमुख रागों तथा उनसे निकला रागिनियों का विवेचन किया गया है। इन संगीत ग्रंथों में हेमंत, शिशिर, बसंत, ग्रीष्म, वर्षा तथा शरद ऋतु की प्रकृति को आधार बनाकर छह प्रमुख रागों जैसे श्री, मालकोस, हिण्डोल, दीपक, मेघ तथा भैरव रागों की रचना की गई है। उक्त प्रमुख रागों के साथ-साथ रागिनियां भी प्रचलन में आईं। जैसे रागश्री के साथ मालश्री, मारुधनाश्री, बसंत तथा आसावरी रागिनियों को प्रस्तुत किया गया। इसी प्रकार राग मालकॉस के साथ गौरी, टोडी, मुणकनी, खम्मायाजी तथा कुमकुम रागिनी, राग हिण्डोल के साथ रामकली, ललित, देसाखा , बिलावल और षटमंजरी प्रचलन में आई। राग दीपक के साथ मल्हार, गूजरी भूपाली, टक तथा देसकार और राग भैरव के साथ भैरवी, मधुमाधवी,भैरागी, सैंधवी एवं बंगाली रागिनियों को भी गायकों ने अपनी मधुर वाणी से प्रचारित किया।
समयांतर से राग-रागिनियों के रूप-स्वरूप और नामकरण में और भी परिवर्तन हुए। रागिनियों के साथ कुछ गायकों और घरानों के नाम जोड़कर भी उन्हें प्रस्तुत किया जाने लगा। जैसे मियां की मल्हार, गुमारू टोडी, गौड़ मल्हार, मियां की टोडी, बिलावल, मालबी, मल्लारिका, त्रिवेणी, सारंग और विभास आदि। उक्त प्राय़ः सभी राग- रागिनियों को आधार बनाकर चित्रकारों ने सुंदर चित्रों का निर्माण किया। धीरे-धीरे अनेक रागिनियों का प्रचलन समाप्त हो गया, किन्तु उन पर बने चित्र आज भी उनके प्रचलन तथा अस्तित्व के प्रमाण हैं। राग मेघ, वर्षा ऋतु का प्रतीक है। इसका अलाप धीमे से शुरु होकर बारिश की वूंदों की तरह तेज होता है और पूरा वातावरण उत्साह से भर जाता है। लगता है सब नाद के तमाशे हैं। बादल की गरज मृदंग की तरह सुनाई पड़ती है। इस मृदंग की संगत में दामिनियां या कि बिजलियां नृत्य करती हैं बादल को मैस्कुलीन माना गया है और बिजली है फेमिनिन। क्रमशः शक्ति और सौंदर्य की प्रतीक। प्रकृति की इस अद्भुत शक्ति और सौंदर्य के मेल से ही तो आती है वर्षा ऋतु। यहां ताजगी है तो बहक जाने की मद्धिम-सी अपील भी। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए कभी आसमान को निहारा है आपने। लगेगा पूरी प्रकृति, पूरा परिवेश बहक गया हो। मानो नृत्य, गीत और संगीत की त्रिवेणी बह रही हो।
किवदंती है कि राग मेघ को जन्म देनेवाले भगवान शिव हैं। तानसेन ने राग मल्हार को एक बार फिर से स्थापित किया। कहते हैं कि वे जव राग मेघ मल्हार गाते थे तो सचमुच वर्षा होती थी। उन्होंने राग मियां का मल्हार की भी स्थापना की। यह नया राग संगीत की नई अभिव्यक्ति है। इस राग को सुनते हुए मुझे इसमें बारिश का ऊर्जावान रूप महसूस होता है। डॉ सुहासिनी घोष मानती हैं कि 'हाल के वर्षों में राग मल्हार को आधार बनाकर कई रागों का जन्म हुआ- गौड़ मल्हार अनूठे रंगों से सजा है तो राग देश, खमाज और बिलावल की बात ही निराली है।' फिर सुरदासी मल्हार के गाने और सुनने का भी अपना अंदाज है। संगीत के महान कलाकार पंडित विनायक राव पटवर्धन जब राग जयंत मल्हार गाते थे, तो ऐसा लगता था मानो 'सुनने वाले और गुनने वाले सभी के मन भीग गए हों।'
सुर का स्रोत असार है। राग और भी हैं, संगीत की दुलिया समृद्ध ही हुई है। यहां से कुछ बिसरा नहीं है। पर प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज की बात भी कम पते की नहीं- सुनने वाले हों तो ही कोई मल्हार मन को भिगोता है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, June 13, 2008

आस्था विश्वास का केंद्र बैद्यनाथ धाम


विश्वकर्मा द्वारा निर्मित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बैद्यनाथ धाम जहाँ एक ओर श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र बना हुआ है वहीं दूसरी ओर इससे असंख्य लोगों को रोजगार भी मिलता है।

द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम न सिर्फ बिहार और झारखंड, बल्कि पूरे देश का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार भगवान शंकर समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु विभिन्न तीर्थ स्थलों में लिंग रूप में निवास करते हैं। बैद्यनाथ शिवलिंग की महत्ता मनोकामना लिंग के रूप में भी है। पद्मपुराण के अनुसार बैद्यनाथ महालिंग की महत्ता भवरोगों को हरनेवाला तथा कल्याणकारी है - 'बैद्यनाथ महालिंग भवरोग हर शिवम'। बैद्यनाथ मंदिर परिसर में कुल 22 मंदिर हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण विश्वकर्मा के द्वारा किया गया है। यहां के शिव मंदिर की ऊँचाई 72 फीट है तथा सम्पूर्ण मंदिर एक ही चट्टान का बना हुआ है। कहते हैं कि काशी और बैद्यनाथधाम में स्वयं भगवान् शंकर मुक्ति देते हैं और जो भी इनका दर्शन करने आते हैं, वे सभी मुक्त हो जाते हैं।
बैद्यनाथ महादेव की प्रसिद्धि रावणेश्वर बैद्यनाथ के नाम से भी है। पौराणिक कथा के अनुसार बैद्यनाथ महालिंग की स्थापना लंकापति रावण के द्वारा की गयी है। एक बार रावण ने अपनी तपस्या से भगवान शंकर को अति प्रसन्न कर लिया। भगवान शंकर ने उसे वर मांगने के लिए कहा- रावण ने अपनी इच्छा जताई कि मैं आपका शिवलिंग अपनी नगरी में स्थापित करना चाहता हूं। शिवजी सोच में पड़ गए, थोड़ी देर बाद बोले ठीक है लेकिन शर्त यह है कि तुम उसे रास्ते में कहीं मत रखना नहीं तो मैं वहीं स्थापित हो जाऊँगा। रावण शिवलिंग को लेकर कैलाशपुरी से लंकापुरी की ओर चल पड़ा इधर देवलोक में खलबली मच गयी कि यदि रावण लंका में शिवलिंग स्थापित करने में सफल हो जाएगा तो अमरत्व को प्राप्त कर लेगा।
अतः देवताओं ने आपस में मिलकर मंत्रणा की। दैवयोग से रावण को जोरों की लघुशंका लगी। विवश होकर उसे शिवलिंग को एक वृद्ध ब्राह्मण के हाथों में थमाकर लघुशंका से निवृत होने के लिए जाना पड़ा। वह वृद्ध ब्राह्मण और कोई नहीं छद्मवेषधारी स्वयं भगवान विष्णु थे। रावण की लघुशंका से नदी बहने लगी लेकिन उसकी लघुशंका समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी। ब्राह्मण वेषधारी भगवान विष्णु ने मौका पाकर शिवलिंग को वहाँ रख दिया और चलते बने।
बाद में रावण ने बहुत प्रयास किया भगवान से अनुनय-विनय किया, पर शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। गुस्से में आकर उसने शिवलिंग पर प्रहार भी किया जिससे शिवलिंग थोड़ा सा टूट गया, वह निशान आज भी मौजूद है। अंत में हारकर रावण को उस स्थान पर ही शिवलिंग की पूजा करनी पड़ी। बाद में बैजू नामक एक आदिवासी ने उस शिवलिंग की भक्ति-आराधना की और उसके नाम पर उस स्थान को बैजूनाथ अर्थात बैद्यनाथ कहा जाने लगा। जिसकी प्रसिद्घि कालांतर में बैद्यनाथधाम के रूप में हुई।
बैद्यनाथ धाम को हार्दपीठ भी कहा जाता है, और उसकी मान्यता शक्तिपीठ के रूप में है। धार्मिक कथा के अनुसार जब राजा दक्ष ने अपने यज्ञ में शिव को आमंत्रित नहीं किया, तो सती बिना शिव की अनुमति लिए मायके पहुँच गयीं और पिता द्वारा शिव का अपमान किये जाने के कारण उन्होंने मृत्यु का वरण कर लिया। सती की मृत्यु की सूचना पाकर शिव उनमत्त हो उठे और उनके शव को कंधे पर लेकर इधर-उधर घुमने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर उन्मत्त शिव को शांत करने के लिए विष्णु भगवान अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित करने लगे। सती के अंग कट-कटकर जिन स्थानों पर गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। सती का खंडित हृदय जिस स्थान पर गिरा, वहीं बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है और वह स्थान हार्दपीठ कहलाता है।
ऐसी लोकमान्यता है कि श्रावण के महीने में साक्षात् भगवान शंकर गौरा पार्वती के साथ बाबा बैद्यनाथ के रूप में देवघर में विद्यमान रहते हैं और भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। बाबा बैद्यनाथ को उत्तरवाहिनी गंगा का जल अत्यंत प्रिय है। अतः श्रावण के महीने में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तगण सुलतानगंज से जल लेकर कांवर में रखते हैं तथा कांवर को कंधे पर उठाकर लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा तीन से चार दिन में पैदल तय करते हैं। कई ऐसे भी भक्तगण हैं जो यह यात्रा 24 घंटों के अंदर दौड़कर तय करते हैं तथा इसे देवघर स्थित बैद्यनाथ महालिंग पर अर्पित करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने की प्रार्थनाएँ करते हैं।
बैद्यनाथ मंदिर का दरवाजा प्रातः 4 बजे खुलता है तथा 3.30 बजे शाम को भगवान के विश्राम हेतु बंद होता है। शाम के 6 बजे प्रार्थना की शुरूआत की जाती है साथ हीं श्रृंगार पूजा की तैयारी भी शुरू की जाती है। अंतिम प्रार्थना का समय 9 बजे रात रखा गया है लेकिन विशेष त्योहारों के मौके पर पूजा की अवधि बढ़ाई भी जाती है। हाल के वर्षों में बैद्यनाथ महालिंग का आकार बहुत छोटा हो गया था, जिससे भीड़ में भक्तों को पूजा करने में काफी परेशानी होती थी इसलिये बगल में एक अन्य लिंग की भी स्थापना की गई है।
श्रावण के महीने में सुलतानगंज से लेकर देवघर तक का रास्ता भक्तों की आवाजाही और भोले बैद्यनाथ की जय, बोलबम आदि के नारों से गुंजायमान रहता है। और यह पूरा क्षेत्र एक विशाल मेले के रूप में तब्दील हो जाता है। सरकार भी इस भीड़ की सुरक्षा एवं सुविधा के लिए तत्पर रहती है। कई स्वयंसेवी धर्मशालाएँ भी कांवरियों के लिए भोजन-पानी,रात को ठहरने की व्यवस्था में जुटी रहती है। इसके अलावा व्यवसायियों की तो चांदी रहती है। इतने विस्तार में एक माह तक चलने वाला यह श्रावणी मेला शायद विश्व का सबसे बड़ा मेला है।

-प्रीतिमा वत्स

Saturday, May 24, 2008

मानव जीवन से जुड़ा पीपल वृक्ष


कोई शनि ग्रह के निवारण के लिए पीपल पूजता है, कोई धन की देवी लक्ष्मी को खुश करने के लिए तो कोई अपने सुहाग की रक्षा के लिए। हमारे धर्मशास्त्र में जहां पीपल वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का निवास माना जाता है वहीं आयुर्वेद में पीपल वृक्ष को सबसे ज्यादा शुद्ध हवा प्रदान करनेवाला तथा कई रोगों के दवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

सम्पूर्ण भारत में समान रूप से पवित्र माना जानेवाला पीपल वृक्ष देश के हर कोने में आसानी से पाया जाता है। जन सामान्य की यह मान्यता है कि इस पेड़ में विष्णु भगवान समेत सभी देवी-देवता निवास करते है। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब दैत्यों ने देवी-देवताओं को स्वर्ग से हराकर उन्हें खदेड़ा था तो सभी देवी-देवताओं ने पीपल पेड़ के बीच में ही शरण लिया था। धन की देवी लक्ष्मी का निवास भी पीपल वृक्ष में माना जाता है। उनकी उपासना करने के लिए लोग शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं। एक अलग मान्यता के अनुसार शनिग्रह से निजात के लिए भी लोग पीपल पेड़ की पूजा शनिवार को सुबह करते हैं, तथा शाम को सरसों तेल के दिये जलाते हैं। ऋगवेद में भी पीपल के पेड़ के महत्व का वर्णन है। वैदिक श्रोतों के आधार पर पीपल की लकड़ी का उपयोग बर्तन बनाने के काम में किया जाता था तथा इसके बचे भाग को आग जलाने में। यह आग बहुत पवित्र माना जाता था। आज भी गांवों में बीमार आदमी की कांपती आंखों तथा हाथों, भयानक सपनों आदि से निजात पाने के लिए पीपल पेड़ की पूजा करके उसके पत्ते को जल में भिगोकर रोगी के शरीर पर छिड़का जाता है।
लोकमान्या के अनुसार महिलाओं में विभिन्न रूपों में पीपल के पेड़ का महत्व है। उत्तरभारत में सोमवती अमावस्या के दिन महिलाएं जल और कच्चा दूध पीपल में डालती हैं, तथा उसके 108 फेरे लेती हैं। उनका मानना है कि इससे उसके घर तथा परिवार में सुख-शान्ति बनी रहेगी। राजस्थान में महिलाएँ इस मान्यता के साथ पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं कि वह वैधव्य के दुख से बची रहेगी। आश्विन महीने के पितृपक्ष में जब पितरों की पूजा होती है तो उसमें भी पीपल के पत्ते तथा इसकी शाखाओं का उपयोग किया जाता है। एक गड्ढा खोदा जाता है जिसमें दूध,जल,तिल तथा शहद के साथ पीपल की शाखाओं को गाड़ा जाता है। यह मान्यता है कि पूर्वजों की आत्मा इस जगह पर आती हैं तथा दान की गई वस्तु को ग्रहण करते हैं।
पीपल पेड़ का आयुर्वेद में भी बहुत महत्व है। इसके तने से निकलनेवाला रस कई तरह के त्वचा के रोगों से मुक्ति दिलाने में बहुत कारगर सिद्ध होता है। पीपल के फल को सुखाकर उसका पाउडर बनाकर रोज सुबह पानी के साथ लेने से अस्थमा की बीमारी दूर हो जाती है। पीपल के छाल का पाउडर नारियल तेल में मिलाकर लगाने से जलने के निशान तथा घाव बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। ऐसा कह सकते हैं कि पीपल का पेड़ मानव जीवन के लिए प्रकृति का एक बहुत अच्छा उपहार है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, May 9, 2008

मंदिरों का गांव मलूटी


पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं।

झारखंड और बंगाल के बार्डर पर, दुमका जिले से 55 किलोमीटर दूर एक गांव है, मलूटी। इस गांव में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सिर्फ मंदिर हीं मंदिर नजर आते हैं। शायद एक छोटी सी जगह में इतने सारे मंदिर एक साथ होने की वजह से हीं इस क्षेत्र का नाम गुप्त काशी रखा गया होगा। इस गांव में कभी 108 मंदिर स्थित थे जिनमें से अधिकांश भगवान् शंकर को समर्पित थे और इनमें भव्य शिवलिंग स्थापित थे। संरक्षण के अभाव के चलते अब इन मंदिरों में सिर्फ 69 मंदिर ही बच पाये हैं।
हरे-भरे वृक्षों के बीच पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के ये मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं। यही कारण है कि ये मंदिर न सिर्फ शिव भक्तों को, वरन् पर्यटकों, पुरा विशेषज्ञों और इतिहास प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। भगवान् भोले शंकर के मंदिरों के अतिरिक्त यहाँ दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदी देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ मौलिक्षा माता का भी मंदिर है जिनकी मान्यता जाग्रत शाक्त देवी के रूप में है।
एक गांव में इतने सारे मंदिरों का होना किसी के लिए भी एक आश्चर्य से कम नहीं है लेकिन यह सत्य है कि मलूटी के राजाओं ने समय समय पर अपनी रानियों के लिए राजप्रासादों की वजाय इन मंदिरों का निर्माण करवाया था। मलूटी राज के प्रथम राजा बसंत राय तथा उनके वंशजों द्वारा सन् 1720 से 1840 के बीच इन मंदिरों को बनवाया गया है। मलूटी के राजाओं का अंत हो जाने के बाद ये मंदिर उपेक्षित होते चले गये। एक छोटे से गाँव में इतने सारे मंदिरों की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रहा। सेना के रिटायर्ड अफसर गोपालदास मुखर्जी एक ऐसे आदमी हैं जो काफी चिंतित और सजग दिखाई देते हैं इन मंदिरों के प्रति। सेना से रिटायर्ड होने के बाद से वे समर्पित भाव से लगे हैं इन मंदिरों की सेवा में। उन्हे उम्मीद है आज न कल सरकार जरूर जागेगी इनकी हिफाजत करने।
जिर्ण-शीर्ण हालत में होते हुए भी आज भी गजब की सुंदरता झांकती है इन मंदिरों से। इन मंदिरों का निर्माण बंगाल की सुप्रसिद्ध 'चाला' रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईंटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक है। मंदिरों की दीवारों पर ज्यादातर राम और कृष्ण लीला के चित्र अंकित हैं। सावन के महीने में यहाँ मेला भी लगता है। कुछ भक्त गण बाहर ,से भी आते हैं मंदिरो में पूजा तथा मेले में शिरकत करने । लेकिन इस गांव के मंदिर में वस्तुतः उजाड़ निहित है । मलूटी में रहनेवाली एक वृद्ध महिला साधना चटर्जी कहती हैं " 1986 में , बिजली आया था। दस दिन बाद , यह चला गया,फिर कभी नहीं आया है।" सूर्यास्त पर , केवल लैंप के प्रकाश में रहने को विवश हैं यहाँ के निवासी। इस कारण पर्यटक भी घबराते हैं यहाँ रात रुकने से।

-प्रीतिमा वत्स

MEERA TUM KAHAN HO

  मीरा तुम कहाँ हो ? - प्रीतिमा वत्स बात बहुत पुरानी है। शायद तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी। उन दिनों गांव के स्कूल में मैं उसे अक्सर देखा...