Sunday, June 7, 2020

बनी रहेगी उष्मा जादोपेटियाँ कला की


-प्रीतिमा वत्स
सौन्दर्य से लगाव मनुष्य की एक जन्मजात प्रवृति है। यही कारण है कि मनुष्य के सांस्कृतिक विकास की प्रत्येक कड़ी उसके सौन्दर्य बोध का भी निश्चित रूप से परिचय देती है। सभी जगह मानव समुदाय में चित्रांकन की परंपरा किसी न किसी रूप में रही है। कालक्रम में चित्रकला ने कई रूप ले लिए या फिर कई वर्गों में विभक्त कर दिया- शास्त्रीय कला, लोक कला, आदिवासी कला। शास्त्रीय कला जिसे नागर कला भी कह सकते हैं। यह काफी समृद्ध और संभ्रान्त समाज की अभिव्यक्ति बन गयी। शेष कला यानी लोक कला और आदिवासी कला लोगों के दिमाग की कला कहकर उपेक्षा की जाने लगी।
आदिवासी कला की ताकत तथा जीवनी शक्ति को पहली बार पिकासो तथा यूरोप के कई चित्रकारों ने उजागर किया। पिकासो की चर्चित पेंटिंग ती गीतिकार को जिसने भी देखा उसने यही महसूस किया कि रंगों की भाषा में लोक धड़क रहा है। कलाकार विलियम रूबीन ने भी लोक कला से बहुत लगाव महसूस किया।
अभिव्यक्ति के स्तर पर यह आदिवासी चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करते, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। बाद के भी कई कलाकारों ने यह महसूस किया कि आदिवासी कला साधारण नहीं है। यह कला जटिल धारणाओं की लघुकारक रूप में चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। पूरी दुनिया में अफ्रीका के बाद सबसे अधिक आदिवासी भारत में हीं रहते हैं और देश में आदिवासी प्रदेशों में झारखंड तथा बिहार का नाम प्रमुख रूप से आता है। यहाँ सबसे ज्यादा संथाल आबादी रहती है। तमाम विस्थापन और पलायन के बावजूद इनकी जनसंख्या 20 लाख से ऊपर है।संथाल आदिवासियों की एक सुदीर्घ और समृद्ध कला परंपरा है। इनके सांस्कृतिक उपक्रमों,आस्थाओं,मिथकों,अलंकरणों और सज्जाकारी में गजब का मानवीय बोध दिखता है। इन्हीं कलाओं में एक है जादोपेटियाँ चित्रकला। आदिकाल से हीं संथालों की संस्कृति में जादोपेटियाँ चित्रकला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस शैली के चित्रकार को समाज में जादौ के नाम से पुकारा जाता है। लोक कला की यह शैली बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में भी पाई जाती है। विभिन्न प्रान्तों में यह पद्धति अलग-अलग नामों जैसे जादू-पट, यम-पट, पटकथा और पटचित्र के नाम से जानी जाती है। चित्रकार पुराने कपड़े और बेल के गोंद की सहायता से पट बनाता है। जिसकी लंबाई 5 से 10 फूट तक होती है। कुछ लोग कागज पर भी इस प्रकार के चित्र बनाते हैं। जादोपेटियाँ चित्रकला में पशु-पक्षियों तथा मनुष्य जीवन के विभिन्न पक्षों का जो चित्रण हुआ है और जो हो रहा है, वह प्रकृति, मनुष्य और पशु के रिश्ते के बारे में बहुत कुछ कहता है। जहाँ तक अभिव्यक्ति के स्तर का प्रश्न है तो इनकी सहजता और प्रवाह महसूस की जा सकती है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करती, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। आदिवासी जीवन में हर व्यक्ति एक विशेष किस्म का कलाकार होता है और इन कलाकारों का जीवन आम लोगों से भिन्न नहीं देखा जा सकता। कला इनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है। सुबह के समय मुर्गे का बोलना, बरसात में मोर का नाचना और सुंदर स्त्री के प्रति पुरूष का सहज ढंग से आकर्षित होना, खेतों में स्त्रियों का काम करना, जंगली फूलों का अपने जूड़े में लगाना, किशोरों का अपने मवेशियों को ले जाना, मछली मारना एवं इस तरह के ढेर सारे स्वाभाविक एवं प्राकृतिक संदर्भ जनजाति चित्रकलाओं में देखने को मिलते हैं।
इन चित्रों में यथासंभव प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। जला हुआ चावल, आँवला और जामुन की छाल,फूलों, पत्तियों, महुआ, हल्दी आदि को पीसकर रंग तैयार किया जाता है। लोक कला में प्रायः चटख रंगों का प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों के विषय- महाभारत, रामायण, कृष्णलीला,सृष्टि का निर्माण, यमराज का दंड आदि होते हैं। इस शैली के चित्रकार जादौ इन चित्रों को लेकर गाँव-गाँव घूमते हैं और लोगों को दिखाते हैं।
अभी भी कहीं-कहीं आदिवासी समाज में जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो इन कलाकारों को बुलाया जाता है। ये कलाकार उनके घर जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। लोगों को रामायण, महाभारत की कहानियों के साथ-साथ यह भी बताते हैं कि गलत काम करने पर यमराज कठोरता से दंड देते हैं। परंतु हाल के वर्षों में इनकी माँग नहीं के बराबर रह गई है।
कहते हैं कि लोक परिवेश की उपज होती है लोक कला। परिवेश बदलते हैं तो सहज ढंग से बदल जाती है लोककला। तेजी से भाग रही दुनिया और उपभोक्तावादी संस्कृति के तीव्र विस्फोट के बीच संथालों का परिवेश, उनका समाज और उनकी जीवनशैली भी काफी बदल चुकी है।यह बदलाव उनकी कला में भी दिखाई पड़ता है। पहले जहाँ इन कलाओं में प्राकृतिक रंगो का प्रयोग होता था अब रासायनिक रंगों का प्रयोग बढ़ गया है। रंगों के साथ-साथ रेखाओं का भी गणित बदल गया है। दीवारों तथा कपड़े के पट से उतरकर यह कला अब कैनवास पर सजने लगी है। संथाल परगना के जादौपेटियाँ पर लंबे समय से काम कर रहे चित्रकार देव प्रकाश इस कला को लेकर बहुत उत्साहित हैं। हालांकि वे मानते हैं कि कुछ जादौ अपने पारंपरिक काम को छोड़कर दूसरे पेशे की ओर चले गए हैं लेकिन इसका लाभ भी इस कला को मिला है। देव प्रकाश कहते हैं कि लोक कला में यदि कुछ चीजें जुड़ती हैं तो कुछ छूट भी जाती हैं। रोजगार की तलाश में महानगरों और शहरों में घूम चुके जादौ जब अपने गाँव आते हैं और फिर कभी अपनी पट पर इस कला को उकेरते हैं तो उस कला का रंग कुछ नया होता है। देव प्रकाश इस बात के पक्षधर हैं कि संरक्षण के नाम पर इस कला को सिर्फ संग्रहालय की शोभा ना बनाया जाए।
लेकिन कुछ भी हो जाए लोक की कभी मन नहीं सकती है। यह कला कभी मात्र संग्रहालय की शोभा बनकर नहीं रह सकती है। लोक कला अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जो आदि काल से चली आ रही है और अभी भी समाज के हर कोने में किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान है। यह धरोहर की तरह एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से बिना कहे, बिना किसी तामझाम के मिलती रहती है।
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-प्रीतिमा वत्स
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Sunday, March 17, 2019

गंगा नदी का आदि से अनंत तक आस्था का सफर

बॉक्स - सदियों से हर खुशी और गम में शामिल, सुख-दुख की भागीदार बनी चलती रही, पर अब मैं थक गई हूँ। ध्यान लगाकर सुनो तो शायद मेरी आवाज तुम तक पहुँच जाएगी कि बस अब और नहीं, अब और नहीं।

सदियों से तुम्हारे कष्टों को हरती आ रही हूँ, तुम्हें जीवन देती आ रही हूँ । कई बार खुश हुई कई बार बहुत कष्ट उठाना पड़ा। खुशियाँ बाँटती रही, तुम्हारी फैलाई हुई गंदगी को अपने-आप में समेटती रही लेकिन अब मुझे भी तुम्हारी जरूरत है।
कितनी भक्ति के साथ भगीरथ ने मुझे इस धरती पर तुम्हारे कल्याण के लिए बुलाया था। साक्षात शिव ने मुझे हिमालय के पास भेजा। हिमालय ने एक आदर्श पिता की तरह अपने कोमल बाँहों का सहारा देकर मुझे अपनी शरण में लिया। अत्यंत सफेद अमृत के समान जल लेकर मैं बहती हुई धरती पर आई। कई युगों को देखा, कभी खुश हुई कभी मेरा हृदय दग्ध भी हुआ।
अलकनंदा नाम से धरती पर आई, फिर भागीरथी, जब मैं गोमुख से प्रकट हुई तब गंगा कहलाई। गोमुख से कई धाराओं में निकलकर मैं देव प्रयाग में एक हो गई। जब मैं टिहरी पहुँची और तुमने मुझे जबर्दस्ती बाँधने की कोशिश की तब मुझे बहुत तकलीफ हुई, पर्यावरण की रक्षा करने वाले अपने सपूत सुन्दरलाल बहुगुणा को बहुत याद किया। जब मैं यमुना और सरस्वती से मिली तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, वह संगम स्थल प्रयाग कहलाया।
राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई, प्रख्यात कवि भर्तृहरि ने जहाँ मेरे तट पर तप किया वह हरि की पौढ़ी कहलाया जो स्वर्ग के सोपान की तरह है। जब मैं कुरू की राजधानी हस्तिनापुर पहुँची, यहाँ राजा शान्तनु और पुत्र भीष्म को स्मरण करती हुई बहुत काल तक बही, किन्तु हस्तिनापुर की दुर्दशा को देखकर ऐसी दुखी हुई कि वहाँ से दूर हो गई और अपनी एक धारा बूढ़ी गंगा से मिलकर गढमुक्तेश्वर पहुँच गई। तत्पश्चात मैं महारानी लक्ष्मीबाई,बीरबाल मनु,जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए सैन्य संचालन करते हुए अपने प्राण अर्पण कर दिये थे उन्हें अपने आँचल में समेटने के लिए मैं बिठूर आई। निरंतर कारखानों के निकलने वाले कूड़े-कचरे से भरे हुए धन से पूर्ण परंतु शोभाहीन कानपूर शहर आकर मैं बहुत दुखी हुई। चमड़े की गंध और गंदगी जब बर्दाश्त नहीं हुई तो अपनी वेदना को व्यक्त करने प्रयाग चली गई। पुष्यमित्र शुंग ने जब यहाँ यज्ञ किया तब जाकर यह तीरथ प्रयाग कहलाया था।
जब मैं आह्लादित होकर यमुना से मिलने जा रही थी, तभी सरस्वती भी गुप्त रूप से वहाँ आ पहुँची और हम तीनों का मिलन संगम कहलाया। अनेक धाराओं का यह मिलन स्थल एक ओर जहाँ भारतीय एकता को पुष्ट करता है वहीं दूसरी ओर त्रिवेणी तट अनेक संस्कृतियों का संगम राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता का संवाहक है। माघ के महीने में मकर संक्रांति के पवित्र अवसर पर संगम में हर बारह वर्ष में कुम्भ और छह वर्ष में अर्धकुम्भ पर्व के अवसर पर मानवों का विशाल संगम होता है जो मुझे अत्यंत प्रिय है। यहाँ एक ओर वेद का ज्ञानमय स्वर सुनाई देता है तो दूसरी ओर द्वैत-अद्वैत के सिद्धान्तों पर चर्चा होती है। कहीं कृष्ण भक्ति शाखा का मिलन रामभक्ति शाखा के साथ होता है। बुद्धं शरणं गच्छामि का उद्धोष तथा अहिंसावादी जैनों की कोमल वाणी, सिक्खों की गुरूवाणी और पैगम्बर मुहम्मद का वचन सभी का संगम इस तीर्थ में है। जब मैं शिव की नगरी काशी पहुँची तो भक्ति से ओत-प्रोत हो गई। शिव ने अपने त्रिशुल का सहारा दिया और मेरा वेग धीमा हुआ। वहाँ से मैं शिवाला घाट पहुँची, जहाँ श्मशान में अत्यंत गोपनीय शव साधना में लगे, अपनी लहरों से दीर्घकाल तक नहलाये जाते हुए किनाराम नामक अवधूत अघोरी के देखती रही, जिन्होंने प्रमादी राजा चेतसिंह को भ्रष्टराज्य होने का शाप दिया था। चेतसिंह अंग्रेजों के द्वारा पराजित हुआ और महल छोड़कर भाग खड़ा हुआ। सचमुच नरसंहार का बड़ा भयानक दृश्य था वह। शिवाला से हनुमान घाट गई जहाँ थोड़ी शांति मिली तो मणिकर्णिका के तट पर मोक्षदायिनी बनकर पहुँची। यहीं पर सत्यनिष्ठ, प्रतापी, पवित्र, धार्मिक, दानशील राजा हरिश्चन्द्र ने चाण्डाल कर्म स्वीकार किया था। इसके बाद मैं केदार घाट पर पहुँची। इस तट पर स्थित भगवान शिव का मंदिर काफी ऊँचाई पर है और मैं नीचे से सिर्फ निहार सकती हूँ उन्हें। शायद यह इस पृथ्वी पर प्रीति की रीति है। अतः गौरीकुण्ड में अपने प्रीतिदायक जल को छोड़कर आगे बढ़ जाती हूँ और कई घाटों को पार करती हुई पंचगंगा घाट पहुँचती हूँ यहाँ पर धूतपापा, किरणा, गंगा, जमुना,सरस्वती पाँच धाराओं का संगम स्थल है। उसके बाद गायघाट, प्रह्लादघाट, ओंकारेश्वर, कालेश्वर, भूतभारेश्वर आदि अनेक शिवलिंगों के दर्शन करती हुई राजघाट पहुँचती हूँ। यहीं पर स्थित गाँधी संस्थान को स्मृति चिह्न के रूप में देखती हुई सोचती हूँ कि स्वतंत्रता के लिए सोचनेवाले उस महात्मा का क्या भारतीय आज उचित आदर कर रहे हैं? पहले जहाँ इस तट पर आकर मैं गर्व से भर जाती थी वहीं आज कीचड़ से भरी लुप्त शरीर वाली, संगम स्थल में गन्दगी फैलाती वरणा को देखकर आज के भोग विलासी साक्षर राक्षसों को बार-बार छोड़ देने का मन करता है। वहाँ से चलकर जब मैं गाजीपुर पहुँचती हूँ तो गंगी नाम की एक छोटी सी नदी मेरा स्वागत करती है और मुझमें मिलकर अपने आप को धन्य समझती है। कर्मनाशा जैसी अमंगलकारी को भी अपने-आप में मिलाकर निर्मल बना देती हूँ। बिहार के मैदानी इलाकों को, वहाँ पर फैली हरियाली को देखकर मन खुश हो जाता है। जहाँ ज्ञान प्राप्त होने से गौतम बुद्ध हो गए, जहाँ महावीर तीर्थंकर ने जन्म लिया, गुरू गोविन्द सिंह ने जन्म लिया, अनेकों प्रतापी राजाओं ने राज्य किया। सोन, घाघरा आदि कई नदियों को अपने आप में समेटती हुई मैं पाटलिपुत्र पहुँची। यहाँ के क्रूर और विद्रोही राजा अजात-शत्रु को देखकर बहुत दुखी हुई मैं। जिसने अपने पिता बिम्बिसार को कारागार में डाल दिया था, लेकिन अजात-शत्रु का पुत्र उदयभद्र बड़ा ही दयालु राजा था। उसी ने पाटलिपुत्र नाम के खूबसूरत शहर को बसाया और अपनी राजधानी बनाई। यहीं पर मैंने अशोक महान को भिक्षु अशोक बनते हुए भी देखा। विक्रमादित्य के सुन्दर शासनकाल को भी देखा और हूंणों के आक्रमण से परेशान कार्तिकेय के शासनकाल को भी। कार्तिकेय और स्कंद गुप्त जैसे सपूतों को आज भी याद करती हैं मेरी धाराएँ। बाद में शेरशाह ने इस राज्य का नाम बदल कर पटना रख दिया। वहाँ से गया होते हुए फल्गु और पुनपुन को साथ लेती हुई वैशाली गणराज्य पहुँचती हूँ। नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश की साक्षी भी तो मैं हीं हूँ। वहाँ से चलकर मैं गिरिव्रज पहूँची, जो आजकल राजगीर के नाम से जाना जाता है। मगध राजाओं की यह राजधानी आज भी पुरातत्ववेत्ताओं और दर्शकों के द्वारा देखी जाती है। खण्डहरों में स्थित वह आज भी अपने अतीत के गौरव गाथा को कहती हुई सी नजर आती है। दूर से ही दरभंगा को देखकर, मिथिला को प्रणाम करती हुई जब मैं अंगदेश में प्रवेश करती हूँ तो मुंगेर जिले में बूढ़ी गंडक मेरा स्वागत करती हुई सी लगती हैं और मुझमें समाहित हो जाती है। यहाँ जह्नु ऋषि के आश्रम को देखकर खुश हो जाती हूँ, यहीं पर मेरा नाम जाह्नवी पड़ा था। अपने पिता के घर में थोड़ी देर विश्राम कर फिर आगे बढ़ जाती हूँ। आगे बढ़कर भागलपुर नामक शहर में जाती हूँ, जो खानों से युक्त, धन से उन्नत, सुख-सुविधा सम्पन्न और उद्योग के कल-कारखानों से युक्त है। यहाँ पर ताण्डव मचाती हुई कोसी नदी को अपने आप में समा लेती हूँ और आगे बढ़ जाती हूँ राजमहल की पहाड़ियों से होते हुए मैं बंगाल में प्रवेश कर जाती हूँ और सागर को देखकर मिलन के लिए अपने-आप को रोक नहीं पाती और सागर में समा जाती हूँ। उपहार के रूप में सागर को उपजाऊ मिट्टी ला लाकर देती रहती हूँ जिससे कि एक प्यारे से डेल्टा का जन्म हुआ है जो सुन्दरवन कहलाता है।
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Monday, March 4, 2019

तुम फेंको एक कदम्ब का फूल

आज के बदलते परिवेश में जब हम अपनी परंपरा, साहित्य या संस्कृति की बात करते हैं तो लोकजगत हमें अपनी ओर खींचता है। और यदि हमआदिवासी लोक में झाँकें तो हमें यह खिंचाव कुछ ज्यादा हीं अपनेपन की उष्मा से भरा मिलता है।
संताल जनजाति का कोई लिखित इतिहास नहीं है पर इनके बीच प्रचलित रीति-रिवाजों, लोक मान्यताओं और साहित्य में परंपरागत ढंग से इनके ऐतिहासिक तथ्य सुरक्षित हैं। संताल जनजाति मुख्य रूप से झारखंड की प्रमुख जनजातियों में एक है। वैसे ये बिहार, पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,असम,मेघालय और पड़ोसी देश नेपाल के कुछ हिस्सों में आबाद हैं।
जीविकोपार्जन के विकल्प तलाशने और शहर की तरफ रुख करने की वजह से इनके दैनिक जीवन में काफी बदलाव आया है। लेकिन इस समाज में परंपरा का प्रवाह आज भी अपनी मौलिक ऊर्जा के साथ हीं विद्यमान है। संताली लोक समाज लड़कियों की शादी से विदाई को लेकर बहुत ही ज्यादा संवेदनशील और परंपरावादी होते हैं।
"पिताजी!
हो रहा है उदित
सुबह की स्वर्णिम सूर्य।
जाना है कितनी दूर आपको
चढ़ाने तिलक मेरे दूल्हे को?"
"नहीं है बहुत दूर बेटी
पहुँच जाएँगे हम
दुपहर तक,
अयोध्या गढ़ ही तो जाना है हमें।"
आज भी संताली समाज में नारियों का सम्मान उनका सबसे बड़ा उत्तरदायित्व होता है। गरीबी में जिंदगी जीते हैं, चाहे आधे तन पर ही कपड़ा पहनते हैं पर कभी किसी नारी का अपमान नहीं होने देते हैं अपने इलाके में। परंपरागत तरीके से अपनी बेटी के लिए दूल्हा तलाश करना, सम्मान के साथ उनकी विदाई करना वे अपना कर्तव्य समझते हैं।
"मना करता आ रहा हूँ
बहुत दिनों से मैं,
पर मानती नहीं हो
कि पहना मत करो इतनी लंबी साड़ी तुम,
जो लोटती है
पैर के तलवे तक तुम्हारे!"
"क्यों नहीं पहनूँगी साड़ी मैं
जो लोटती है
पैर के तलवा तक
बुना है इसे पिताजी ने मेरे
मेरी माँ के
काते हुए धागों से!"
अपूर्व प्राकृतिक सम्पदा के बीच भी बेहद कठिन जीवन जीने वाले  संतालों को गीत-संगीत विरासत में मिले हैं। तभी तो इनके बीच यह कहावत प्रचलित है कि "रोड़ाक् गी राड़ाक, ताड़ामाक् गी हिलावाक्।" अर्थात् हमारी वाणी ही संगीत है और हमारी चाल ही नृत्य है।
गली की अंतिम छोर में
है एक वट वृक्ष,
डाल से उसकी
जड़ तो फूटा,
पर निकला नहीं
कोपल निकलते-निकलते।
गाँव के युवक भी
कुछ इसी तरह-
करते तो हैं प्रेम
पर रख नहीं पाते
कसमें खाने के बाद!
संताली जनजातियों में विवाह एक बहुत हीं महत्वपूर्ण सामाजिक प्रथा है, इनमें समगोत्रीय विवाह वर्जित है तथा ममेरी या फुफेरी बहनों के साथ भी विवाह की मनाही है, जबकि उरांव, मुण्डा या हो जनजातियों में ऐसी वर्जना नहीं है। इसलिए कई बार विवाह लड़की की पसंद के खिलाफ भी हो जाता है जिसे नियति मानकर कुबूल करना ही पड़ता है-
हो रहा है-
स्वर्णिम सूर्योदय,
और चढ़ रही हूँ मैं
सुहाग-डलिया पर
सिंदुर-दान के लिए।
यदि है ममता मेरे लिए
दिल में तुम्हारे,
तो फेंको मुझपर
-कदम्ब का एक फूल!
समझूँगी तभी मैं
कि किया था तुमने कभी प्यार मुझसे!
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-प्रीतिमा वत्स
(गीत ''सोने की सिकड़ी रूपा की नथिया" नामक किताब से लिया गया है।)

Monday, August 27, 2018

मेहंदी परंपरा से श्रृंगार तक


सदियों से मेहंदी हमारे समाज में महिलाओं के श्रृंगार का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इसकी महत्ता तो इतनी है कि मेहंदी के बिना महिलाओं का श्रृंगार ही अधूरा माना जाता है। शादी हो या कोई तीज त्योहार भारतीय महिलाएं मेहंदी लगाना नहीं भूलती हैं। चाहे वो किसी शहर में रहती हों, गाँव में रहती हैं या विदेशों में। मेहंदी तो रचती ही है। पूरे देश में जहाँ मेहंदी सिर्फ श्रृंगार का एक साधन है वहीं ग्रामीण परिवेश में महिलाएं इसे परंपराओं के साथ-साथ संभावनाओं से जोड़कर भी देखती हैं। यूँ तो मेहंदी सालों भर लगाते हैं लोग पर कुछ महीनों में इसका कुछ ज्यादा ही महत्व माना जाता है। जैसे सावन की मेहंदी पति के नाम की मानी जाती है, भादो की मेहंदी भाई तथा माइके की खुशहाली के लिए लगाई जाती है। आश्विन के महीने में नवरात्रों के टाइम में लगाई जाने वाली मेहंदी को हर आकांक्षा पूरी करनेवाली मानी जाती है। भारतीय लोग परंपरा में कार्तिक के महीने में मेहंदी के लगाने का विधान नहीं है। इसे स्वास्थय और भाग्य दोनों के लिए हानीकारक माना जाता है। पुराने जमाने में ऐसा शायद इसलिए होता होगा क्योंकि उस समय लोग खेती-बारी पर ही निर्भर रहते थे और कार्तिक के महीने में घर में अनाज-पानी की दिक्कत होती थी। लोग बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा करते थे। ऐसे में मेहंदी लगाकर महिलाएँ खुशी नहीं मनाती होंगी। कालान्तर में यही विचार परंपरा का अंग बन गई। सावन में मेहंदी लगाना बहुत शुभ माना जाता है, ऐसी मान्यता है कि तीज के पावन अवसर पर मेहंदी लगाने से पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत होता है। वहीं मेहंदी के बारे में एक और मान्यता है कि जिसके हाथ की मेहंदी जितनी गहरी होती है, उसको उतना ही अपने पति और ससुराल का प्रेम मिलता है।

भादो के महीने में भी लोक में मेहंदी लगाना अनिवार्य माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जिन महिलाओं या लड़कियों के भाई है उन्हें भादो के महीने में मेहंदी जरूर लगाना चाहिए। इससे भाई की बाधाएं दूर होती हैं, वह स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीता है साथ हीं बहनों के अरमान भी पूरे होते हैं, जो वे अपने भाईयों से संजो कर रखती हैं। प्राचीन काल में खासकर आदिवासी समाज में जब भाई किसी मुसीबत में हो या घर से बाहर हो, उसकी कोई खोज-खबर नहीं मिल रही हो तो बहने भगवान से पूजा-अर्चना करने के साथ-साथ भादो के महीने में हाथों में मेहंदी भी लगाती थीं। उनका यह मानना था कि मेहंदी के सूखने में जितनी देर लगेगी मेरे भाई की परेशानी भी उतनी देर में ठीक हो जाएगी। आज भी बिहार तथा झारखंड के कुछ हिस्सों में ये परंपरा देखने को मिल जाती है। यह परंपरा शायद इस बात को ध्यान में रखकर बनी होगी कि भादो को महीने में अक्सर बारिश होती रहती है और पुरूष घर से बाहर जंगल आदि में जाते थे, पहले यातायात के साधनों की कमी के चलते अक्सर वे बारिश में बाहर फंस जाते थे और घर आने में कई दिन भी लग जाते थे। घर में बच्चों का दिल बहलाने के लिए माँ मेहंदी लगा देती होंगी हाथों पर और कहती होंगी कि जबतक मेहंदी सूखेगी तुम्हारा भाई भी आ जाएगा। यही बहाना धीरे-धीरे एक परंपरा के रूप में बदल गई होगी।

आश्विन महीने का देवी पक्ष बहुत हीं शुभ होता है। हिन्दू समाज यह मान्यता है कि देवी इन दिनों धरती पर आती हैं और हमारे बीच रहती हैं। अतः इस दौरान लगाई जानेवाली मेहंदी भी काफी खास और शुभ फलदायी मानी जाती है।
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-प्रीतिमा वत्स
सभी चित्र नेट से साभार


Monday, July 30, 2018

सावन के महीने में नाग-नागिन की पूजा



सावन के महीने में शिव जी की पूजा का विधान तो समस्त भारत में है। साथ हीं बिहार, झारखंड समेत देश के कई हिस्से में शिव के साथ-साथ नाग-नागिन की भी पूजा की पूजा बड़े विधि-विधान के साथ की जाती है। यह पूजा खासकर वो औरतें जिनकी शादी नयी-नयी हुई है। यह पूजा पूरे 15 दिनों तक चलता है। इस 15 दिनों में पूजा करने वाली स्त्री बगैर नमक का भोजन करती हैं, तथा जमीन पर सोती है। इस पूजा को मधुश्रावणी की पूजा भी कहते हैं।यह पूजा खासकर ब्राह्मण समाज में ही प्रचलित है। इस पूजा में नाग-नागिन की मिट्टी की मूर्ति बनाई जाती है। कई बार लोग चाँदी के भी बनवा लेते हैं। इन्हें सावन के पंचमी तिथि को स्थापित किया जाता है। खूब सारे फल और पकवान, अक्षत, दुर्वा, फूल, बेलपत्र, धूप, दीप आदि से इनकी पूजा की जाती है। पूजा के समय मोहल्ले की औरतें भी देखने आती हैं और गीत गाती हैं। शुरुआत गणेश वन्दना से करते हैं। शिवजी और पार्वती जी के गीत के साथ-साथ नाग-नागिन के गीत, विषहरी के गीत,गौरी पूजा के गीत आदि गाए जाते हैं।-
सावन की पूजा में गाया जानेवाला एक गीत इस प्रकार है-

आवल सखि हे परम सुहागन सावन के महीनमा।
आवल सखि हे, परम सुहागन सावन के महीनमा।।
भरि-भरि लोटा हम जल भरि लायब, पूजब नाग-नगिनियाँ।।
आवल सखि हे परम सुहागन सावन के महीनमा।
भरि-भरि डाला हम फूल तोड़ी लायब, पूजब नाग-नगिनियाँ।।
आवल सखि हे परम सुहागन सावन के महीनमा।
भरि-भरि थार हम भोग लगाइब, पूजब नाग-नगिनियाँ।।
आवल सखि हे परम सुहागन सावन के महीनमा.........
............जारी....।।

-प्रीतिमा वत्स
-फोटोग्राफ्स नेट से साभार


Friday, June 22, 2018

मधुबनी कला, कल और आज


कभी बिहार के दरभंगा, मधुबनी और नेपाल के कुछ हिस्सों की कच्ची दीवारों पर बनने वाली मधुबनी कला आज अपने देश के हर कोने-कोने में फैल चुका है। अपने देश ही नहीं विदेशों में भी इस कला ने पूरे सम्मान के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है।
मधुबनी कला में पहले जहाँ सिर्फ कच्चे रंगों और पीसे हुए चावल का इस्तेमाल होता था वहीं अब यह रंग के हर एक फार्म में देखने को मिलता है। चाहे वह जलरंग हो, एक्रीलिक हो, ग्लास रंग हो या तैल रंग। बहुत पहले ही दीवारों से उतरकर यह कला सजावट के सामानों, बर्तनों से लेकर परिधानों और कुशन,चादर से लेकर कालीन तक पर फैल चुका है।
मधुबनी कला के इस विस्तार का कारण है उसका उत्सवधर्मी होना। चटख रंगों में बनाया जानेवाला मधुबनी कला अपने-आप में एक रोमांचर इतिहास समेटे हुए है। कहते हैं राजा जनक ने अपनी पुत्रियों के विवाह में नगर की औरतों से महल की दीवारों पर खूब कलाकारी करवाई थी, जो प्राकृतिक रंग और अरिपन से बने हुए थे। इन चित्रों में घोड़े, हाथी, कहार, विवाह की वेदी, मंडप, वर-वधु, चिड़ियाँ, मोर, देवी-देवता आदि बनाए गए थे।यह एक खास शैली में बनाई गई थी।जो बाद में चलकर मधुबनी कला के नाम से विख्यात हुई।
प्रारंभिक चरण में मधुबनी कला सिर्फ उच्च कुल की महिलाएँ ही बनाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह कला इतनी लोकप्रिय हो गई कि जाति,धर्म और स्थान की सीमाओं को लाँघती चली गई।
कई पड़ावों से गुजरने के बाद इसके पारंपरिक आकारों में थोड़ी भिन्नता तो आई है परंतु अभी भी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ फूल-फल रही है और लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।
-प्रीतिमा वत्स

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...