Sunday, June 7, 2020

बनी रहेगी उष्मा जादोपेटियाँ कला की


-प्रीतिमा वत्स
सौन्दर्य से लगाव मनुष्य की एक जन्मजात प्रवृति है। यही कारण है कि मनुष्य के सांस्कृतिक विकास की प्रत्येक कड़ी उसके सौन्दर्य बोध का भी निश्चित रूप से परिचय देती है। सभी जगह मानव समुदाय में चित्रांकन की परंपरा किसी न किसी रूप में रही है। कालक्रम में चित्रकला ने कई रूप ले लिए या फिर कई वर्गों में विभक्त कर दिया- शास्त्रीय कला, लोक कला, आदिवासी कला। शास्त्रीय कला जिसे नागर कला भी कह सकते हैं। यह काफी समृद्ध और संभ्रान्त समाज की अभिव्यक्ति बन गयी। शेष कला यानी लोक कला और आदिवासी कला लोगों के दिमाग की कला कहकर उपेक्षा की जाने लगी।
आदिवासी कला की ताकत तथा जीवनी शक्ति को पहली बार पिकासो तथा यूरोप के कई चित्रकारों ने उजागर किया। पिकासो की चर्चित पेंटिंग ती गीतिकार को जिसने भी देखा उसने यही महसूस किया कि रंगों की भाषा में लोक धड़क रहा है। कलाकार विलियम रूबीन ने भी लोक कला से बहुत लगाव महसूस किया।
अभिव्यक्ति के स्तर पर यह आदिवासी चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करते, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। बाद के भी कई कलाकारों ने यह महसूस किया कि आदिवासी कला साधारण नहीं है। यह कला जटिल धारणाओं की लघुकारक रूप में चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। पूरी दुनिया में अफ्रीका के बाद सबसे अधिक आदिवासी भारत में हीं रहते हैं और देश में आदिवासी प्रदेशों में झारखंड तथा बिहार का नाम प्रमुख रूप से आता है। यहाँ सबसे ज्यादा संथाल आबादी रहती है। तमाम विस्थापन और पलायन के बावजूद इनकी जनसंख्या 20 लाख से ऊपर है।संथाल आदिवासियों की एक सुदीर्घ और समृद्ध कला परंपरा है। इनके सांस्कृतिक उपक्रमों,आस्थाओं,मिथकों,अलंकरणों और सज्जाकारी में गजब का मानवीय बोध दिखता है। इन्हीं कलाओं में एक है जादोपेटियाँ चित्रकला। आदिकाल से हीं संथालों की संस्कृति में जादोपेटियाँ चित्रकला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस शैली के चित्रकार को समाज में जादौ के नाम से पुकारा जाता है। लोक कला की यह शैली बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में भी पाई जाती है। विभिन्न प्रान्तों में यह पद्धति अलग-अलग नामों जैसे जादू-पट, यम-पट, पटकथा और पटचित्र के नाम से जानी जाती है। चित्रकार पुराने कपड़े और बेल के गोंद की सहायता से पट बनाता है। जिसकी लंबाई 5 से 10 फूट तक होती है। कुछ लोग कागज पर भी इस प्रकार के चित्र बनाते हैं। जादोपेटियाँ चित्रकला में पशु-पक्षियों तथा मनुष्य जीवन के विभिन्न पक्षों का जो चित्रण हुआ है और जो हो रहा है, वह प्रकृति, मनुष्य और पशु के रिश्ते के बारे में बहुत कुछ कहता है। जहाँ तक अभिव्यक्ति के स्तर का प्रश्न है तो इनकी सहजता और प्रवाह महसूस की जा सकती है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह चित्रकला जिन विषयों को अभिव्यक्त करती है वे कहीं से भी कला की दुरूहता को स्थापित नहीं करती, बल्कि वे कला की सहजता की वकालत करते हैं। आदिवासी जीवन में हर व्यक्ति एक विशेष किस्म का कलाकार होता है और इन कलाकारों का जीवन आम लोगों से भिन्न नहीं देखा जा सकता। कला इनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है। सुबह के समय मुर्गे का बोलना, बरसात में मोर का नाचना और सुंदर स्त्री के प्रति पुरूष का सहज ढंग से आकर्षित होना, खेतों में स्त्रियों का काम करना, जंगली फूलों का अपने जूड़े में लगाना, किशोरों का अपने मवेशियों को ले जाना, मछली मारना एवं इस तरह के ढेर सारे स्वाभाविक एवं प्राकृतिक संदर्भ जनजाति चित्रकलाओं में देखने को मिलते हैं।
इन चित्रों में यथासंभव प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। जला हुआ चावल, आँवला और जामुन की छाल,फूलों, पत्तियों, महुआ, हल्दी आदि को पीसकर रंग तैयार किया जाता है। लोक कला में प्रायः चटख रंगों का प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों के विषय- महाभारत, रामायण, कृष्णलीला,सृष्टि का निर्माण, यमराज का दंड आदि होते हैं। इस शैली के चित्रकार जादौ इन चित्रों को लेकर गाँव-गाँव घूमते हैं और लोगों को दिखाते हैं।
अभी भी कहीं-कहीं आदिवासी समाज में जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो इन कलाकारों को बुलाया जाता है। ये कलाकार उनके घर जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। लोगों को रामायण, महाभारत की कहानियों के साथ-साथ यह भी बताते हैं कि गलत काम करने पर यमराज कठोरता से दंड देते हैं। परंतु हाल के वर्षों में इनकी माँग नहीं के बराबर रह गई है।
कहते हैं कि लोक परिवेश की उपज होती है लोक कला। परिवेश बदलते हैं तो सहज ढंग से बदल जाती है लोककला। तेजी से भाग रही दुनिया और उपभोक्तावादी संस्कृति के तीव्र विस्फोट के बीच संथालों का परिवेश, उनका समाज और उनकी जीवनशैली भी काफी बदल चुकी है।यह बदलाव उनकी कला में भी दिखाई पड़ता है। पहले जहाँ इन कलाओं में प्राकृतिक रंगो का प्रयोग होता था अब रासायनिक रंगों का प्रयोग बढ़ गया है। रंगों के साथ-साथ रेखाओं का भी गणित बदल गया है। दीवारों तथा कपड़े के पट से उतरकर यह कला अब कैनवास पर सजने लगी है। संथाल परगना के जादौपेटियाँ पर लंबे समय से काम कर रहे चित्रकार देव प्रकाश इस कला को लेकर बहुत उत्साहित हैं। हालांकि वे मानते हैं कि कुछ जादौ अपने पारंपरिक काम को छोड़कर दूसरे पेशे की ओर चले गए हैं लेकिन इसका लाभ भी इस कला को मिला है। देव प्रकाश कहते हैं कि लोक कला में यदि कुछ चीजें जुड़ती हैं तो कुछ छूट भी जाती हैं। रोजगार की तलाश में महानगरों और शहरों में घूम चुके जादौ जब अपने गाँव आते हैं और फिर कभी अपनी पट पर इस कला को उकेरते हैं तो उस कला का रंग कुछ नया होता है। देव प्रकाश इस बात के पक्षधर हैं कि संरक्षण के नाम पर इस कला को सिर्फ संग्रहालय की शोभा ना बनाया जाए।
लेकिन कुछ भी हो जाए लोक की कभी मन नहीं सकती है। यह कला कभी मात्र संग्रहालय की शोभा बनकर नहीं रह सकती है। लोक कला अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जो आदि काल से चली आ रही है और अभी भी समाज के हर कोने में किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान है। यह धरोहर की तरह एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से बिना कहे, बिना किसी तामझाम के मिलती रहती है।
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-प्रीतिमा वत्स
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