Tuesday, July 20, 2021

सूर्य को समर्पित एक अंगिका लोक गीत

 सोना के खड़ाम चढ़ी अइलै सुरुज देव,

खाड़ भेलैय मड़वा अँगनमा, हाथे सोवरणों केरो साट हो।

यही साटे मारवो रे भगता, हमरो भोजनमा देने जाहो हे।

कर जोरी ठाड़ो भेलै भगता जे सभे भगता,

तोहरो भोजनमा हो सूरुजदेव हलसी क दियबो,

हमरो आशिष देने जाह हो।

बाढ़ियो संतति, बाढ़ियो संपत्ति, बाढ़ियो कुल परिवार हो।

सूर्य को समर्पित इस अंगिका लोकगीत में यह वर्णन किया गया है कि सोने के खड़ाऊँ पहन कर सोने के रथ पर सवार सूर्य देव अपने भक्तों के पास आते हैं। दर्शन देने के उपरान्त भोजन की मांग करते हैं। भक्त जो उनके दर्शन पाकर हीं निहाल हो रहे हैं, कहते हैं कि हे प्रभू आपका भोजन तो हम खुश होकर देंगे। यह तो हमारे लिए सौभाग्य की बात है, आप कृपा करके हम भक्तों को आशीर्वाद देते जाइए।

सूर्य देव उन्हें आशीर्वाद देते हैं – तुम्हारी सम्पत्ति का विस्तार हो.......

तुम्हारे संतति (वंश) का विस्तार हो............

तुम्हारे कुल और परिवार का विस्तार हो..................।

(यह गीत हर शुभ अवसर पर खासकर शादी, उपनयन, मुंडन आदि पर सबसे पहले गाया जाता है।)

मूल अंगिका गायिका- दुर्गा देवी.

अनुवाद- प्रीतिमा वत्स


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Sunday, November 1, 2020

लोक देवी विषहरी (FOLK GODDESSES VISHAHRI)























प्रकृति की खूबसूरत गोद में बसा हुआ लोक जीवन प्रकृति से जितनी खुशी पाता है। उसी अनुपात में संघर्ष और परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। हर साल कई सौ आदमी सर्पदंश से मारे जाते हैं या इसकी भयानक पीड़ा को झेलते हैं। आज भी हमारे देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में जड़ी-बूटी और देवी देवताओं की पूजा के सहारे लोग इस त्रासदी से निपटने की कोशिश करते हैं। सर्पदंश से बचने के लिए ग्रामवासी भैरव देव, नाग देवता, देवी विषहरी, मनसा देवी आदि लोक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।

लोक देवी-देवताओं की पूजा और जड़ी-बूटियों के सहारे कितनी कामयाबी मिलती है यह तो विवाद का विषय है, लेकिन लोक में यह नुस्खा बहुत ही लोकप्रिय और सर्वमान्य है।

आज हम यहाँ पर विषहरी देवी के बारे में विस्तार से वर्णन करेंगे-

विषहरी बड़ दुलरी, विषहरी बड़ दुलरी।

कहाँ शोभे बाजू-बंदा कहाँ टिकुली-2

कहाँ शोभे विषहरी माय के लाल चुनरी

कहाँ शोभे विषहरी माय के लाल चुनरी,

विषहरी बड़ दुलरी, विषहरी बड़ दुलरी।

जैसा कि नाम से हीं स्पष्ट हो रहा है, विष का हरण करने वाली देवी हैं विषहरी। लोक में देवी विषहरी की पूजा बड़े ही धूमधाम के साथ किया जाता है। सर्परूप में होने के बावजूद विषहरी देवी की पूजा सर्पदंश की पीड़ा से मुक्ति के लिए की जाती है। बिहार और झारखंड में प्रायः हर गांव के मुहाने पर इनका मंदिर होता है। ग्राम देवता की सलाना पूजा के साथ इनकी भी पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि गांव के मुहाने पर इनकी उपस्थिति से गांव आपद-विपद से मुक्त रहता है। महामारी और प्राकृतिक आपदा से यह गांव वासियों की रक्षा करती हैं। गांव के लोग इनकी अराधना अपने हर शुभ कार्य के पहले करते हैं। शादी-ब्याह, उपनयन, मुंडन आदि में इनकी पूजा का विशेष विधान रहता है। इनकी पूजा का विधान भी कुछ अलग सा हीं है। इन्हें गाय का कच्चा दूध चढाया जाता है। साथ में कागज से बना एक खास तरह का मंजुषानुमा झांपी या मड़री चढ़ाया जाता है। सलाना पूजा के समय चावल को पीसकर गुड़ के साथ मिलाकर एक खास तरह का पीठा बनाया जाता है, जो इन्हें भोग लगता है। तब इनका आँचल भी बदला जाता है। घी में सिंदूर को मिलाकर इनका श्रृंगार किया जाता है। यह पूजा नियत भगत की पत्नी या उसी परिवार की कोई महिला करती है। पूजा में उपयोग किया गया  सिंदूर का घोल प्रसाद के रूप में वहाँ उपस्थित सभी सुहागन महिलाओं को भी पहनाया जाता है। साथ में कई तरह से देवी की स्तुति की जाती है, जिसे मनान गीत कहा जाता है-

पाँचो बहिनी कुमारी हे विषहरी

खेल चार चौमास हे विषहरी

वहाँ से चली भेली हे विषहरी

कणुआ घर आवास हे विषहरी।

कणुआ के बेटा उत्पाती हे विषहरी

लावा छीटी परैलखौं हे विषहरी-2

पांचो बहिनी कुमारी हे विषहरी

खेल चार चौमास हे विषहरी-2

देवी विषहरी की पूजा का महत्व सती बिहुला की पूजा में भी किया गया है।

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-प्रीतिमा वत्स


Monday, October 19, 2020

देवी गीत (Goddess song)

 

आजू रे सुदिन दिन

मैया अएथिन अँगना-2

जौ हम जनिता मैया अएथिन

दुध से निपौती अँगना।

मैया अएथिन अँगना,

महामाया देवी अएथिन अँगना।

आजू रे सुदिन....................।

किए माँ को बईसन दियबै,

किये रे ओठगनवा।

आजू रे सुदिन............।

कलशा माँ को बईसन दियबै,

पिंडी रे ओठगनवा।

आजू रे सुदिन..........

किये माँ को पहिरन दियबै

किये रे ओढनवा,

आजू रे सुदिन......

पटोरी माँ को पहिरन दियबै

चुनरी रे ओढनवा,

आजू रे सुदिन...........

किये माँ को भोजन दियबै

किये रे ओठ रंगना,

खीर माँ को भोजन दियबै

पान रे ओठ रंगना

आजू रे सुदिन ...............

किये माँ के सिंगारी में

किये रे सुमिरनवा।

सिंदूर माँ के सिंगारी में,

चंडी पाठ से सुमिरनवा।

आजु रे सुदिन दिन

मैया अएथिन अँगना।-2

यह एक अँगिका लोक गीत है. इसमें माँ दुर्गा के आगमन से भक्तों में होनेवाली खुशी को दर्शाया गया है-

आज का दिन बहुत हीं शुभ है, आज माँ हमारे आँगन में आनेवाली हैं। यदि हमें पहले से पता होता कि माँ हमारे घर आएँगी तो मैं दूध से अपने आँगन को लीप कर रखती। माँ को कहाँ पर बैठने दूं और टेक लगाने के लिए क्या दूँगी, माँ को कलश का आसन बैठने के लिए और पिंडी टेक लगाने के लिए दूँगी। माँ को क्या पहनने के लिए और क्या ओढ़ने के लिए दूँ। माँ को साड़ी पहनने के लिए और चुनरी ओढ़ने के लिए दूँगी। माँ को भोजन में क्या दूँ और होठों को रंगने के लिए क्या दूँ। माँ को खीर भोजन के लिए और पान होठों को रंगने के लिए दूँगी। किससे माँ का श्रृंगार करूँ और कैसे माँ का सुमिरन करूँ। सिंदूर से माँ का श्रृंगार करूँगी और चंडी पाठ से उनका सुमिरन करूँगी। आज का दिन बहुत हीं शुभ है देवी माँ हमारे आँगन में आ रही हैं।

-प्रीतिमा वत्स

 (फोटोग्राफ- गूगल से साभार)

 

 

 

Saturday, October 10, 2020

विवाह गीत

विवाह गीत


राम जी के मौरिया सुहावन लागे

अति मनभावन लागै हो......

माई हे मैं ना जानूँ

पटेवा के गुथै गुण, राम जी के पहेरै गुण हे....

माई हे मैं ना जानूँ

दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे......

राम जी के जोड़वा सुहावन लागे,

अति मनभावन लागै हो.....

माई हे मैं ना जानूँ

दरजी के सियै गुण, राम जी के पहेरै गुण हे.....

माई हे मैं ना जानूँ

दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे..........

राम जी के धोतिया सुहावन लागे,

अति मनभावन लागै हो........

माई है मैं ना जानूँ,

मड़बड़िया के बेचै गुण, राम जी के पहेरै गुण हे.......

माई हे मैं ना जानूँ

दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे......

राम जी के जूतवा सुहावन लागै

अति मनभावन लागै हो............

माई है मैं ना जानूँ

मोचिया के गढ़ै गुण, राम जी के पहेरै गुण हो....

माई हे मैं ना जानूँ

दशरथ जी के कुल गुण, कौशल्या जी के गर्भ गुण हे......

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यह एक विवाह गीत है। इसे बेटे के विवाह में गाया जाता है। इस गीत में दुल्हा बने राम जी पगड़ी, जोड़ा, धोती, जूते आदि का वर्णन किया गया है। कहा गया है कि राम जी के शरीर पर ये चीजें बहुत ही सुहावन और मनभावन लग रहा है। पता नहीं ये राम जी के पहनने का अंदाज है या बनाने वाले के हाथ की कला का कमाल है। पता नहीं यह दशरथ जी के कुल के संस्कारों के कारण है या कौशल्या जी के गर्भ की महिमा है।

-प्रीतिमा वत्स

(फोटोग्राफ नेट से साभार)

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...