Friday, May 28, 2010

बिहार के लोक नृत्य


बिहार के लोक नृत्यों की फेहरिस्त काफी लंबी है, उनमें से कुछ के बारे में संक्षिप्त परिचय इस पोस्ट के माध्यम से दे रही हूं। प्रत्येक के बारे में विस्तार से पुनः एक-एक कर लिखूंगी।

1. नारदी-

यह एक कीर्तनिया नाच है। इसमें परंपरागत साज मृदंग एवं झाल का प्रयोग किया जाता है। कीर्तनकार इस नृत्य के दौरान विभिन्न प्रकार के स्वांग किया करते हैं।
2. गंगिया -
गंगा बिहार की प्रमुख ही नहीं, अपितु पतित पावनी भी कहलाती है। इसके स्नान से मानवों का समस्त पाप धुल जाता है। गंगा स्तुति महिलाओं के द्वारा नृत्य के माध्यम से की जाती है जिसे गंगिया नृत्य की संज्ञा दी गयी है।
3. मांझी -
नदियों में नाविकों द्वारा यह गीत नृत्य- मुद्रा में गाया जाता है।
4. घो-घो रानी -
छोटे-छोटे बच्चों का खेल, जिसे लोक शैली में घो-घो रानी कहा जाता है। इस नृत्य में एक लड़की बीच में रहती है तथा चारों तरफ से बांकी लड़कियां गोल घेरा बनाकर गीत गाती हैं, और घूमती हैं।
5. गोढ़िन -
इसमें मछली बेचने वाली तथा ग्राहकों का स्वांग किया जाता है।
6. लौढ़ियारी -
इसमें नायक, जो एक किसान होता है, अपने बथान (गाय-भैंस बांधने की जगह) पर भाव-भंगिमाओं के साथ गाता और नाचता है।
7.धन कटनी -
फसल कट जाने के बाद किसान सपरिवार खुशियां मनाता हुआ गाता और नृत्य करता है। जो धनकटनी नाच के नाम से प्रसिद्ध हो गया है।
8. बोलबै -
यह नृत्य बिहार के भागलपुर तथा उसके आस-पास के इलाकों में प्रचलित रहा है, इसमें पति के परदेश जाते समय का प्रसंग होता है।
9. सामा-चकेबा-
यह नृत्य मिथिला का एक प्रमुख नृत्य है। इसमें औरतें एवं लड़कियां अपने भाइयों के हित के लिए इसे कार्तिक मास में करता हैं।
10. घांटो -
अतिथि देवता होता है, परंतु जब घर में कुछ खाने का न हो तब अतिथि क्या होता है । यह तो शायद सभी जानते हैं। इस नृत्य में ससुराल में रह रही गरीब बहन को जब भाई के आने की सूचना मिलती है तो वह काफी खुश हो जाती है लेकिन खाने का आभाव उसे परेशान कर देता है। सत्कार के चिंता में विरह गीत गाया जाता है तथा बेचैनी भरा थोड़ा नृत्य भी होता है।
11. झिझिया -
यह नृत्य तंत्र-मंत्र तथा डायन से संबंधित है। राजा-रजवाड़े का सीन भी दिखाया जाता है। मिथिला का बहुत ही प्रचलित नृत्य है।
12. इन्नी-विन्नी -
यह अंगिका का प्रमुख नृत्य है। इसमें पति-पत्नी प्रसंग पर महिलाएं नृत्य करती हैं।
13. डोमकछ-
अपने यहां शादी-ब्याह के अवसर पर महिलाएं डोमकक्ष का नृत्य करती हैं। जब बारात दुल्हन के घर की तरफ रवाना हो चुकी होती है और घर पर सिर्फ महिलाएं हीं रह जाती हैं तो वे लोग पुरुषों का वेश बनाकर नृत्य नाटिका करती हैं।
14. देवहर -
देवहर देवी-देवता का प्रतिनिधित्व करता हुआ गीत एवं नृत्य है। यह संपूर्ण बिहार तथा झारखंड में प्रचलित हैं। कहीं-कहीं यह नृत्य भगता नाच के नाम से भी प्रसिद्ध है।
15. बगुलो -
उत्तर बिहार में बगुलो नृत्य बड़ा ही प्रचलित है। इसमें ससुराल से रूठकर जानेवाली एक स्त्री का राह चलते एक दूसरी स्त्री के साथ नोंक-झोंक का बड़ा ही सजीव चित्रण किया जाता है।
16. कजरी -
कजरी सावन के महीने में गाया और खेला जानेवाला एक नृत्य नाटिका है। जो सावन के सुहावने मौसम को और भी सुहावना बना देता है।
17. झरणी -
यह मुहर्रम के अवसर पर झूमते हुए गाये जाने वाला एक प्रकार का नृत्य और गीत है।

18. जट-जटिन -

पंजाब से आयातित यादवों के द्वारा गाया जानेवाला गीत और नृत्य जट-जटिन के नाम से प्रचलित है। यह सामान्यतया इन्द्र भगवान को मनाने के लिए वर्षा ऋतु में किया जाता है।
19. होरी - बसंत के आगमन पर गाया जाता है होरी। यह गीत और नृत्य होली के दिन अपने चरम पर होता है।
20. बसंती-

यह पतझड़ के बाद बसंत ऋतु के आगमन पर गाया जाता है। इन गीतों को प्रायः महिलाएं ही गाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स


Wednesday, May 5, 2010

जंतसार


आज की रेडी टू इट वाली जिन्दगी में भले ही यह अटपटा लगता है, लेकिन कुछ दशक पहले तक गांव की औरतों की जिन्दगी काफी मेहनत मशक्कत करने वाली थी। घर लीपने से लेकर अनाज तैयार करने तक का सारा काम घर की स्त्रियों के जिम्मे हीं होता था। ऐसे में अपनी थकावट दूर करने तथा मन की व्यथा को कुछ हद तक गीतों के माध्यम से निकालती थीं। इन गीतों में अक्सर घरेलू जीवन के संघर्ष तथा सामाजिक समस्याओं का जिक्र होता था। यह बात अलग है कि शारीरिक श्रम उनके स्वास्थ्य के लिए काफी हद तक फायदेमंद ही साबित होता था। चक्की पीसना इन कामों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम था। इसे वह अक्सर दोपहर के समय जब घर के सभी लोग आराम कर रहे होते करती थी। काम के साथ जो गीत वह गाती रहती थीं उन्हें जंतसार कहा जाता है। प्रायः इन गीतों को अकेले हीं गाया जाता था। अब तो इन गीतों को गानेवाले भी विरले हीं मिलते हैं -

1. पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।
एंगना में कुइंया खनाय देहो हो दियोरे
बांटी देहो रेशम के डोर
पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।
चैत बैशाख के धूपवा बड़ी तेज
एंगना में चंदोवा लागय देहो हो दियोरे
जरत नरमियो मोर गोड़
पूरबा जे बहले हना हनी हे दियोरे
पच्छिया जे बहल अंधकार।।

अर्थ- इस गीत में भाभी अपने देवर से अपनी समस्याओं के बारे में बता रही है। पूरब की हवा बहुत तेज रफ्तार से बहती है और जब पछिया हवा बहती है तो अंधकार छा जाता है। पानी लाने के लिए दूर जाती हूं तो परेशान हो जाती हूं। आंगन में ही आप एक कुआं खुदवा दो और साथ में रेशम की डोरी भी ला दो। चैत-बैशाख के महीने में जब कड़ाके ही धूप पड़ती है तो मेरे पांव गर्मी से छिल जाते हैं।आप आंगन में चंदोवा लगवा दो जिससे कि मैं आराम से घर के सारे काम निबटा सकूं।

2. पनमा जे खैले डोमनिया गे
मिसिया जे लगोले निसिया सुरतिया
डोमिन गे राजा के बेटा लुभावल
जेहूं तोहं राजा-बेटा हे निसिया हे लुभैयले
पनमा काहे खैले डोमनिया गे
मिसिया काहे लगौले निसिया सुरतिया
डोमिन गे राजा के बेटा लुभावल

अर्थ- इस गीत में डोम जाति की एक लड़की की चर्चा की गई है। सांवली सूरत पर काजल लगाकर पान खाकर जब वह निकलती है तो उस नगर का राजकुमार भी उसके सौन्दर्य पर आकर्षित हो जाता है। गीतो के माध्यम से ही डोमिन की बेटी से पूछा जाता है कि तुमने ये कैसा कहर कर दिया । आंखों में काजल लगाकर,पान खाकर क्यों निकली।

3. रैयो खेत में रैया हे
मसूरियो खेत में हेरैले रे ना
सासू बेसरी हे हेरैले ना
एतना हे सुनिये सासू
उठली रिसैली रे ना।
हंसुली खोजी अइहैं न त
कलेवा नाहीं दियवो रे ना।

अर्थ- इस गीत में गाने वाली खुद अपनी आपबीती सुना रही है। सरसों के खेत में सरसों लगा हुआ था, और मसूर के खेत में मसूर। मैं तो बस घास छीलने गई हुई थी। वहीं पर मेरी हंसुली न जाने कहां खो गई। सास ने जब यह बात सुनी तो काफी नाराज हो गई और कहने लगी, जाओ और हंसुली खोजकर लाओ, जब तक हंसुली लेकर नहीं आती तुम्हें खाना नहीं मिलेगा।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, April 23, 2010

है ऐसे मनाया जाता भांजो

पश्चिम बंगाल के ज्यादातर गांवों में बांग्ला भाद्र महीने के आते हीं भांजो नामक फसल की देवी की पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है। यह पर्व फसल के अच्छी पैदावार की कामना से की जाती है। संभवतः भांजो शब्द भाद्र महीने के नाम से निकला है जिस महीने में यह पूजा की जाती है। यह पूजा शुक्ल पक्ष में द्वादशी को की जाती है। इस दिन गांव की कुछ अविवाहित युवतियां गांव से बाहर किसी जगह मिट्टी के पिंड एकत्र करती हैं। इसी प्रकार पड़ोस के गांवों के कुछ युवक भी उसी जगह आते हैं और ये दोनों दल आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। कुछ देर तक वे अपनी-अपनी जगह पर खड़े रहकर नाचते-गाते हैं, जिसके बाद कोई एक दल पीछे हट जाता है। इस पर दूसरा दल कुछ आगे बढ़कर मिट्टी के कुछ पिडों को उठा लेता है और विजय के गीत गाते हुए गांव लौट जाता है। इस दल के लौट जाने के बाद दूसरा दल अपने हिस्से के पिंड एकत्र करता है। यह दो प्रतिस्पर्धी गांवों के बीच लड़ाई का प्रतीक है, जिसमें कोई एक जीतता और दूसरा दल हारता है। किंवदन्ती है कि पुराने जमाने में गांवों के वयस्क पुरुष भी अपने-अपने दलों के साथ इस नकली लड़ाई में भाग लेते थे। कुछ गांवों में युवतियों के दल के साथ गांव के छोटे लड़के भी आते हैं।
युवतियां मिट्टी के पिंडों को गांव के सार्वजनिक पूजा-स्थल पर ले जाती है। वे इसमें से सभी प्रकार के कंकड़-पत्थर निकालकर साफ करती हैं। चूहों के बिलों और परित्यक्त घरों से कुछ और मिट्टी लेकर इसमें मिला दी जाती है। इसके बाद मिट्टी को पीतल या मिट्टी की थालियों में भरकर उसके ऊपर दो तरह की दालों और जौ के बीज, सनई(जूट) का पौधा और सरसों डाल दिया जाता है। इसे शस्य पाता कहा जाता है। कहीं-कहीं पर इसे आंकुर थापना भी कहा जाता है। इसके बाद इन थालियों को किसी पवित्र स्थान पर, अकसर तुलसी या पीपल के पौधे की छाया में रख दिया जाता है। इन युवतियों में से कोई एक प्रतिदिन प्रातः स्नान करके इन बीजों को सींचने का भार उठाती हैं। सिंचाई का यह क्रम पूरे एक सप्ताह तक चलता है, तब तक बीज फूटकर पौधे कुछ हो जाते हैं। आठवें दिन पूजा-स्थल पर बनाए गए मिट्टी के टीले को इस प्रकार ढंका जाता है जिससे वह किसी स्त्री के पुतले-सा दिखाई दे। इस पुतले को फूलों से सजा दिया जाता है। संध्यासमय इन पौधों को टीले के चारों ओर रख दिया जाता है और पुरोहित को बुलाकर उससे पूजा कराई जाती है और युवतियां घेरा बनाकर टीले और थालियों के चारों ओर नाचने लगती हैं। वे नाचते हुए नगाड़े और कांसे के बने अन्य बाजे बजाकर लोकगीत भी गाती हैं। कभी-कभी इन नृत्यांगनाएं संगीत रोककर भांजो के उपर रची अनगढ़ कविताओं का पाठ भी करती हैं। इसके बाद युवतियां अपने-अपने घर लौटती हैं। अगली सुबह वे फिर उसी जगह पर नाचने-गाने के लिए जुटती हैं। कुछ देर तक नाच-गा लेने के बाद वे स्त्री के पुतले और बीजों के फूटने से उगे पौधों को लेकर नाचते-गाते हुए किसी नदी या तालाब के तट पर ले जाती हैं। भांजो से प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि-
इस रास्ते से जाओ, भांजो
इस रास्ते से जाओ,
बेना के वृक्ष में कौड़ी है
उसे देकर दूध खरीदो
पानी के पास पहुंचने पर वे स्त्री के पुतले को पानी में बहा देती हैं। थालियों में रखी मिट्टी फेंक दी जाती हैं, लेकिन पौधों को पानी से साफ करके वे घर लाती हैं। इनमें से कुछ पौधे घरों के छाजन में खोंस दिए जाते हैं और कुछ मवेशियों को खिला दिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि घरों के छाजन में टंगी रहने के कारण पूरा घर अन्न और धन से भरा रहता है और मवेशियों को खिलाने से मवेशी खुशहाल रहते हैं, गाय-भैंस हों तो ज्यादा दूध देती हैं।
-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 6, 2010

प्रकृति को समर्पित मेरी दो नयी पेंटिंग


20X30inch,Acrylic on canvas,title- beauty of nature,by-Pritima Vats
16X24inch, water colour on paper,title-beauty of nature,by-Pritima Vats

Tuesday, February 16, 2010

मेरी कुछ नयी पेंटिंग

जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंच
जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंच
जादोपेटियन कला में कुछ नया प्रयोग,24X36 इंच

Saturday, January 30, 2010

भिटौली की कथा


उत्तराखण्ड के करीब-करीब हर गाँव में भिटौली की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है। पहाड़ों पर चैत के महीने में एक चिड़िया कुई-कुई बोलती है। इसे घुघुती कहते हैं। भिटौली (उपहार) के साथ इसका मोहिल सम्बन्ध है। यह लोक कथा इस प्रकार है, एक गांव में देबुली नाम की लड़की रहती थी। उसका एक भाई था नरिया, देबुली अपने भाई को बहुत प्यार करती थी। एक दिन देबुली के पिता ने देबुली की शादी सात नदी, सात पहाड़ दूर एक गांव में तय कर दी। अपनी शादी की खबर और नरिया का बिछोह देबुली को खलने लगा। वह दिन-रात आंसू बहाती रहती। एक दिन विवाह का मुहूर्त आ ही गया। बारात आ गई। विदा होने पर उसका भाई नरिया यह विदाई सहन नहीं कर सका और खूब रोने लगा। तब दुल्हन बनी देबुली ने नरिया के आँसू पोछते हुए कहा कि रो मत भैया, जब चैत्र का महीना नजदीक आयेगा, उस समय तू मुझसे मिलने आना व भिटौली लाना, भैया मैं ससुराल में तेरी राह देखूंगी। यह सुनकर नरिया ने जैसे-तैसे अपने आंसू रोके और देबुली को विदा किया।
चैत्र का महीना आया। नरिया की माँ ने देबुली के लिए भिटौली तैयार की। एक बड़ी टोकरी में पूरी,सिंगल,मिठाई,फल,अक्षत-पिठ्या(रोली) के अलावा कपड़े-लत्ते रखे। नरिया से कहा- जा रे नरिया मेरी इकलौती प्यारी देबुली को भिटौली देकर आ। वो तेरी राह देखती होगी। भिटौली की आस लगाये होगी और बहुओं की भिटौली आते देखकर रोती होगी। बेटा तू आज ही चला जा और अपनी देबुली दीदी को भिटौली देकर उसकी नाराजगी दूर कर आ।
नरिया ने खुशी-खुशी नये कपड़े कुर्ता, पाजामा, टोपी पहनी। अपनी दीदी के लिए चूड़ी,माला,बिन्दी खरीद कर लाया। सिर पर भिटौली की टोकरी रखकर "चैत को भेटणा दीदी चैत को भेटणा" (मैं आ रहा हूँ) गुनगुनाते रवाना हुआ। जाते-जाते उसे चार पांच दिन लग गये। सात नदी पार, सात पहाड़ पार, सात पट्टी पार उधर उसकी दीदी भाई की राह देखती रही। चलते-चलते नरिया शुक्रवार की रात देबुली के ससुराल पहुंचा। उसने देखा देबुली दीदी सो चुकी है। नरिया ने सोई हुई देबुली के पैर छुए व भिटौली की टोकरी एक ओर रख दी। थका मांदा, भूखा-प्यासा नरिया थोड़ी ही देर में सो गया। सुबह उजाला होने में काफी देर थी। नरिया की नींद खुल गई। उसने देखा देबुली गहरी नींद में सोई हुई है। अचानक उसे ख्याल आया कि आज शनिवार है। शनिवार का दिन शुभ काम के लिए अशुभ होता है। यह उसकी माँ ने समझाया था कि शनिवार का दिन पड़ेगा तो देबुली के घर मत जाना। ये सब सोचते-सोचते नरिया ने निर्णय लिया और अक्षत-पिठ्या निकाल कर देबुली दीदी के पैर छुए, भेटणे की टोकरी वहीं रखकर बिना देबुली को बताए निकल पड़ा घर की ओर। जब काफी दूर निकल गया तब देबुली की नींद खुली। नींद खुलने से पहले वह एक सपना देख रही थी कि उसका भाई आया है भेटणा लेकर और उसके पैर छू रहा है। सपना टूटा देबुली की नींद खुल गई, उसने देखा सचमुच रंग-बिरंगी भेटणे की टोकरी है। वह चौंक गई,पास में भाई को ना देखकर नरिया-नरिया चिल्लाती हुई दूर-दूर तक अपने भाई को देखने गई। पर भाई का कहीं पता न चल सका। बड़े अफसोस के साथ कहने लगी-हाय मेरा भाई। इतनी दूर से आया, मैं सोती रही। भूखा-प्यासा भिटौली लेकर आया, मैं सोती रही। यह सोचती-सोचती देबुली भीतर-ही-भीतर मन को बहलाती आंसू बहाती। देबुली का मन इस आघात को बर्दाश्त नहीं कर पाया। भाई व भिटौली की भेंट का दुःख सम्भाल नहीं सकी देबुली और उसके प्राण निकल गए।
यह भिटौली का त्योहार कुमाऊं क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण है। आज भी इस त्योहार में लड़कियों को सम्मानपूर्वक मायके बुलाकर भिटौली(उपहार) दी जाती है। जो बहन दूर है, आने में असमर्थ है, भाई उसे वहीं भिटौली पहुँचाता है।
-प्रीतिमा वत्स

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...