Saturday, May 24, 2008

मानव जीवन से जुड़ा पीपल वृक्ष


कोई शनि ग्रह के निवारण के लिए पीपल पूजता है, कोई धन की देवी लक्ष्मी को खुश करने के लिए तो कोई अपने सुहाग की रक्षा के लिए। हमारे धर्मशास्त्र में जहां पीपल वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का निवास माना जाता है वहीं आयुर्वेद में पीपल वृक्ष को सबसे ज्यादा शुद्ध हवा प्रदान करनेवाला तथा कई रोगों के दवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

सम्पूर्ण भारत में समान रूप से पवित्र माना जानेवाला पीपल वृक्ष देश के हर कोने में आसानी से पाया जाता है। जन सामान्य की यह मान्यता है कि इस पेड़ में विष्णु भगवान समेत सभी देवी-देवता निवास करते है। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब दैत्यों ने देवी-देवताओं को स्वर्ग से हराकर उन्हें खदेड़ा था तो सभी देवी-देवताओं ने पीपल पेड़ के बीच में ही शरण लिया था। धन की देवी लक्ष्मी का निवास भी पीपल वृक्ष में माना जाता है। उनकी उपासना करने के लिए लोग शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं। एक अलग मान्यता के अनुसार शनिग्रह से निजात के लिए भी लोग पीपल पेड़ की पूजा शनिवार को सुबह करते हैं, तथा शाम को सरसों तेल के दिये जलाते हैं। ऋगवेद में भी पीपल के पेड़ के महत्व का वर्णन है। वैदिक श्रोतों के आधार पर पीपल की लकड़ी का उपयोग बर्तन बनाने के काम में किया जाता था तथा इसके बचे भाग को आग जलाने में। यह आग बहुत पवित्र माना जाता था। आज भी गांवों में बीमार आदमी की कांपती आंखों तथा हाथों, भयानक सपनों आदि से निजात पाने के लिए पीपल पेड़ की पूजा करके उसके पत्ते को जल में भिगोकर रोगी के शरीर पर छिड़का जाता है।
लोकमान्या के अनुसार महिलाओं में विभिन्न रूपों में पीपल के पेड़ का महत्व है। उत्तरभारत में सोमवती अमावस्या के दिन महिलाएं जल और कच्चा दूध पीपल में डालती हैं, तथा उसके 108 फेरे लेती हैं। उनका मानना है कि इससे उसके घर तथा परिवार में सुख-शान्ति बनी रहेगी। राजस्थान में महिलाएँ इस मान्यता के साथ पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं कि वह वैधव्य के दुख से बची रहेगी। आश्विन महीने के पितृपक्ष में जब पितरों की पूजा होती है तो उसमें भी पीपल के पत्ते तथा इसकी शाखाओं का उपयोग किया जाता है। एक गड्ढा खोदा जाता है जिसमें दूध,जल,तिल तथा शहद के साथ पीपल की शाखाओं को गाड़ा जाता है। यह मान्यता है कि पूर्वजों की आत्मा इस जगह पर आती हैं तथा दान की गई वस्तु को ग्रहण करते हैं।
पीपल पेड़ का आयुर्वेद में भी बहुत महत्व है। इसके तने से निकलनेवाला रस कई तरह के त्वचा के रोगों से मुक्ति दिलाने में बहुत कारगर सिद्ध होता है। पीपल के फल को सुखाकर उसका पाउडर बनाकर रोज सुबह पानी के साथ लेने से अस्थमा की बीमारी दूर हो जाती है। पीपल के छाल का पाउडर नारियल तेल में मिलाकर लगाने से जलने के निशान तथा घाव बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। ऐसा कह सकते हैं कि पीपल का पेड़ मानव जीवन के लिए प्रकृति का एक बहुत अच्छा उपहार है।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, May 9, 2008

मंदिरों का गांव मलूटी


पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं।

झारखंड और बंगाल के बार्डर पर, दुमका जिले से 55 किलोमीटर दूर एक गांव है, मलूटी। इस गांव में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सिर्फ मंदिर हीं मंदिर नजर आते हैं। शायद एक छोटी सी जगह में इतने सारे मंदिर एक साथ होने की वजह से हीं इस क्षेत्र का नाम गुप्त काशी रखा गया होगा। इस गांव में कभी 108 मंदिर स्थित थे जिनमें से अधिकांश भगवान् शंकर को समर्पित थे और इनमें भव्य शिवलिंग स्थापित थे। संरक्षण के अभाव के चलते अब इन मंदिरों में सिर्फ 69 मंदिर ही बच पाये हैं।
हरे-भरे वृक्षों के बीच पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के ये मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं। यही कारण है कि ये मंदिर न सिर्फ शिव भक्तों को, वरन् पर्यटकों, पुरा विशेषज्ञों और इतिहास प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। भगवान् भोले शंकर के मंदिरों के अतिरिक्त यहाँ दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदी देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ मौलिक्षा माता का भी मंदिर है जिनकी मान्यता जाग्रत शाक्त देवी के रूप में है।
एक गांव में इतने सारे मंदिरों का होना किसी के लिए भी एक आश्चर्य से कम नहीं है लेकिन यह सत्य है कि मलूटी के राजाओं ने समय समय पर अपनी रानियों के लिए राजप्रासादों की वजाय इन मंदिरों का निर्माण करवाया था। मलूटी राज के प्रथम राजा बसंत राय तथा उनके वंशजों द्वारा सन् 1720 से 1840 के बीच इन मंदिरों को बनवाया गया है। मलूटी के राजाओं का अंत हो जाने के बाद ये मंदिर उपेक्षित होते चले गये। एक छोटे से गाँव में इतने सारे मंदिरों की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रहा। सेना के रिटायर्ड अफसर गोपालदास मुखर्जी एक ऐसे आदमी हैं जो काफी चिंतित और सजग दिखाई देते हैं इन मंदिरों के प्रति। सेना से रिटायर्ड होने के बाद से वे समर्पित भाव से लगे हैं इन मंदिरों की सेवा में। उन्हे उम्मीद है आज न कल सरकार जरूर जागेगी इनकी हिफाजत करने।
जिर्ण-शीर्ण हालत में होते हुए भी आज भी गजब की सुंदरता झांकती है इन मंदिरों से। इन मंदिरों का निर्माण बंगाल की सुप्रसिद्ध 'चाला' रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईंटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक है। मंदिरों की दीवारों पर ज्यादातर राम और कृष्ण लीला के चित्र अंकित हैं। सावन के महीने में यहाँ मेला भी लगता है। कुछ भक्त गण बाहर ,से भी आते हैं मंदिरो में पूजा तथा मेले में शिरकत करने । लेकिन इस गांव के मंदिर में वस्तुतः उजाड़ निहित है । मलूटी में रहनेवाली एक वृद्ध महिला साधना चटर्जी कहती हैं " 1986 में , बिजली आया था। दस दिन बाद , यह चला गया,फिर कभी नहीं आया है।" सूर्यास्त पर , केवल लैंप के प्रकाश में रहने को विवश हैं यहाँ के निवासी। इस कारण पर्यटक भी घबराते हैं यहाँ रात रुकने से।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 22, 2008

लोक देवी शीतला


भयानक होते हुए भी लोकदेवी शीतला अपने भक्तों की पुकार को कभी अस्वीकार नहीं करती। विष का हरण करने वाली देवी विषहरी की तरह चेचक प्रभावी देह की जलन को शीतल करने वाली मातृका शीतला की पूजा-अर्चना बिहार झारखंड के प्रायः सभी इलाकों में समान रूप से प्रचलित है।

मालवा जनपद में शीतला की जगह लालबाई एवं केसरबाई तथा राजस्थान में सेउल माता की अराधना प्रचलित है। अलग-अलग रूपों में ये लोक देवी करीब-करीब भारत के हर कोने में पूजित हैं। सांस्कृतिक परिकल्पना के अनुसार देवी शीतला दिग्वस्त्रा है और गधा उनका वाहन है। इनके हाथों में मार्जनी तथा कलश हैं। देवी के मस्तक पर सूप शोभित है, जो इस लोक मातृका की भयंकरता एवं विभत्सता को रेखांकित करती है। अतः लोक देवी शीतला की उपासना के मूल में भय एवं त्राण की भावनाएं निहित हैं। नागदेवी विषहरी की तरह लोकदेवी शीतला भी पांच बहनें हैं और दोनों का सम्बन्ध नीम वृक्ष से अवश्य है। लोकमान्यता के अनुसार चेचक के रोगियों को नीम की डाली से हवा की जाती है, क्योंकि नीम की पत्तियां ठंडी एवं निरोग मानी जाती हैं । सामान्यतया अग्नि तत्व की प्रधानता के कारण ही शरीर चेचक ग्रस्त हो जाता है। चेचक, गोटी या माता, मैया इसी प्रकार के ताप जन्य रोग हैं, जिनका निवारण शीतला करती है। लोक विश्वास की परम्परा के अनुसार चेचक को शीतला का कोप माना जाता है। यही कारण है कि माताएं आज भी अपनी संततियों की रक्षा के लिये लोकमाता शीतला का पूजन-अर्चन करती रही हैं।
शीतला माता की विशेष पूजा अन्य लोक देवी-देवताओं की तरह श्रावण महीने की शुक्ला सप्तमी के दिन की जाती है। भक्त गण लोकदेवी को प्रसन्न करने के लिये अड़हुल या चम्पा के फूल तथा तितर चढ़ाते हैं। ज्यादातर इनके पुजारी माली और मालिन ही होते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये जाति इन्हें अधिक प्रिय हैं। अतः मालियों में इनके गीत अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित हैं। मैथिली लोक गीतों में कहीं-कहीं इस देवी का वर्णन बुढ़िया माता के रूप में भी मिलता है।
लोक मान्यता के अनुसार आदि भवानी जगदम्बा के प्रति जब लोक में उदासीनता छाने लगती है तो कभी वह ज्वाला देवी के रूप में प्रकट हो जाती है, कभी कोसी माता के रूप में बाढ़ की भयावहता उपस्थित कर देती हैं। कभी शीतला के रूप में अपने प्रभाव क्षेत्र के बालकों-बालिकाओं की काया विकृत कर देती हैं, तो कभी दक्षरूपा गहिल के रूप में नवजात शिशुओं के मन प्राणों पर मृत्यु की छाया बनकर मंडराने लगती है। अतः इन लोकदेवियों के कोप से बचने के लिए इनकी पूजा-अराधना शुरु हुई हो तो कोई आश्चर्य नहीं। दूसरो शब्दों में शीतला की पूजोपासना के मूल में भय भावना प्रमुख है, जबकि वह संतति रक्षिका ही नहीं, संतति दायिनी भी मानी जाती है।

अंगिका लोकगीतों में शीतला माता को मनाने तथा उनसे आशिर्वाद पाने के कुछ गीत आज भी बहुत हीं चर्चित हैः

हरिहर सुगवा रे गुलाबी रंग ठोर
मठ पर कुतल हे शितला मैया निन्द सं निभोर
जेकरा द्वारप शितला मैया अरदसिया छैही हे ठाढ़
सेहो कैसे सुतल हे माता निह्द स निभोर
दहीं दहीं दहीं रे भक्ता पान फूल हे नवेदे
हम जग तारण माता हे होइबो सहाय

नीपिये पोतिये अबला गे मोखा लागी ठाढ़
गे ढरं ढरं खसो गे अबला नयनमा दोनो हो लोर
पत्थल जों सेबतियै शितला मैया
हे पत्थलो जे पसीजत
अरे तोहरा सेबत शितला मैया
तरथियो फोका भेल

शीतल माय के हाथ में गुलाब के छड़ी
हे बेली फूल के छड़ी चम्पा फूल के छड़ी,
मांग सिन्दुर से भरी, मुख पान से भरी, खोइछा धान से भरी,
मैया हे देहू ना अशीष घरवा जाऊं मैं चली।


-प्रीतिमा वत्स

Monday, April 14, 2008

प्यार का नायाब तोहफा है कंघा


हाइटेक जमाने में आज जहां प्यार का इजहार करने, तोहफे देने आदि सबका अंदाज बदल गया है, वहीं उड़ीसा के सुदूर गांवों में ज भी आदिवासी जनजाति अपने परंपरागत तरीके से प्यार का इजहार करते हैं, तथा इनके तोहफों में हाथ के बने कंघे को एक नायाब तोहफा माना जाता है।

उड़ीसा के कई गांवों में आज भी आदिवासी युवक बांस की कंघियां देकर अपनी प्रेमिका से अपने प्यार का इजहार करते हैं। इसे स्वीकार करने का मतलब होता है कि युवति ने उस युवक के प्यार को स्वीकार कर लिया तथा शादी के लिए हामी भर दी है। ये कंघे खरीदकर बाजार से नहीं मंगाए जाते हैं, ब्लकि इसे वही युवक बनाता है जिसे अपनी प्रेमिका को उपहार देना होता है। ये कंघे आदिवासी कला के बेजोड़ नमूने होते हैं।
जनजातिय क्षेत्रों में हस्तकला उनके सामाजिक जरूरत से जुड़ा होता है। उनके द्वारा निर्मित सामानों का उपयोग वे दैनिक जीवन में करते हैं। इन सामानों में खूबसूरत लेम्प, कंघे, डलिया, ग्लास, खिलौने, पंखे, जेवर, खूबसूरत हेयरपिन आदि प्रमुख होते हैं। ये आदिवासी लोग कंघे को बेचा नहीं करते। यह उनकी संस्कृति से जुड़ा हुआ वह हिस्सा होता है, जिसके तार भावनाओं से जुड़े होते हैं। यहां तक कि इन क्षेत्रों में काम करनेवाली स्वयंसेवी संस्थाओं को भी इस बात की इजाजत नहीं होती है कि इन कंघों को खरीदा या बेचा जा सके। मसलन उपहार के तौर पर कभी-कभी कोई किसी को दे सकता है।
उड़ीसा में करीब 62 तरह की आदिवासी जातियां रहती हैं। लेकिन कंघे बनाने की कला मात्र 12 से 15 जातियां हीं जानती हैं। ये कंघे बांस, लकड़ी, बैल तथा भैंस की सिगों तथा लोहे के बने होते हैं। जुआंग, धारुआ, कोया, कोंध, लांजिया, साउरा, संताल आदि जातियां अपने खास अंदाज में कंघियों का निर्माण करती हैं। विभिन्न जातियों द्वारा बनाए गए इन कंघियों के डिजाइन में भी भिन्नता होती है। इस भिन्नता के जरिए आप जाति या कौम का पता लगा सकते हैं। कौम के हिसाब से इन कंघियों के उपयोग में भी थोड़ी बहुत भिन्नता पाई जाती है। लेकिन जो भी हो इसको देनेवाले युवक की भावना और प्यार की कद्र करता है पूरा समुदाय तथा लेनेवाली युवति भी। यदि युवति को युवक पसंद नहीं हो या फिर वह किसी और को पसंद कर चुकी होती है तो आदर सहित वह कंघे को उस युवक को वापस कर देती है।
बोंडा जनजाति कंघियों को अपने पर्सनल उपयोग के लिए बनाते हैं। इस जाति की औरतें कंघियों को गहने की तरह उपयोग करती हैं। घागे में बांधकर वे इसे गले में पहनती हैं, कुछ औरते इसे कंघी करने के बाद अपने जूड़े में लगाकर रखती हैं। केओनिझार जिले के गुप्त गंगा तथा गोनासिका क्षेत्रों में रहनेवाले जुआंग्स जातियां कंघे को लकड़ी,बांस के साथ प्लास्टिक की तारों से खूबसूरती के साथ बनाते हैं। वे इन्हें कट्टा कहते हैं। कुंवारे युवक इसे बड़े जतन से बनाते हैं। वे इसका उपयोग अपनी महबूबा को देने के लिए करते हैं।
सामुहिक नृत्य के दौरान आदिवासी युवक-युवति अपना जीवनसाथी चुनते हैं। जिसमें वे इन उपहारों को एक दूसरे को प्रदान करते हैं। आदिवासी समाज में छह से सात खूबसूरत डिजाइन के कंघे बनाए जाते हैं। आजकल जहां बाजार में एक से एक डिजाइन के प्लास्टिक फाइवर आदि के कंघे बने मिलते हैं वहीं परंपरागत रूप से बने कलात्मक कंघे अवसान की ओर जाते से प्रतीत होते हैं।
साबेरी नदी के तट पर बसनेवाले आदिवासी धारूआ जनजाती के लोग कंघे को बांस की पतली-पतली तिलियां बनाकर उसे सागौन के धागे से खूबसूरती से बांधते हैं तथा विभिन्न आकार और डिजाइन के कंघे तैयार करते हैं। ये अपने कंघे को न तो किसी कीमत पर बेचते हैं, और न ही अनजान आदमियों को जल्दी उपहार में देते हैं। इन लोगों का यह मानना है कि यदि इन कंघे को बेचा गया तो यो अंधे हो जाएंगे। धारूआ जनजाति के लोग कंघे बनाने में सबसे ज्यादा हुनरमंद माने जाते हैं। ये लोग कंघियों को बाल में लगाने वाले हेयरपिन की तरह भी उपयोग करते हैं। तथा इसे ककेनी कहते हैं। भूवनेश्वर से 650 किलोमीटर दूर मलकांगिरि जिले में रहनेवाले कोयास आदिवासी जनजाति के लोग भी बांस की तिलियों तथा सागौन के धागे से कंघे का निर्माण करते है, लेकिन इनके द्वारा बनाए गए कंघे के डिजाइन तथा आकार में भिन्नता पाई जाती है। ये लोग कंघे का निर्माण बड़े पैमाने पर करते हैं तथा इसको बाजार में बेचते भी हैं। कोयास जाति के लोग इन कंघे को इसाद कहते हैं। आदिवासी युवतियां इसका उपयोग गले में पहनने के साथ-साथ कान में भी टॉप्स की तरह पहनती हैं। लेकिन इन कंघों का निर्माण सिर्फ पुरुष हीं करते हैं। कान्धमकला और बेलघर इलाके में रहनेवाले कुटिया कान्दा आदिवासी लोगों के द्वारा बनाए गए कंघे छोटे तथा चिड़ियों के आकार के होते हैं। वे लोग भी इसका उपयोग अपनी प्रेमिका को उपहार देने के लिए हीं करते हैं। इस जनजाति के लोग कंघे को नकई सिरेनी कहते हैं। अधेड़ तथा बूढी स्त्रियां भी इन कंघों का उपयोग डेकोरेटिव थिंग्स की तरह करती हैं। डोंगोरिया जाति के लोग जानवरों के सिंगों से कंघे का निर्माण करते हैं। तथा इसे ककुआ कहते हैं। आदिवासी युवको द्वारा निर्मित ये कंघे उनकी कला का बेजोड़ नमूना है। कला के साथ-साथ उनकी कोमल भावनाएं भी इसमें पिरोई हुई होती हैं। जो ये अपनी प्रेमिका को अपने दिल के साथ-साथ देते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, April 8, 2008

डोमकछ


सुमित्रा ताई अपने बेटे की बारात विदा करके थकहार कर अभी लेटी ही थी कि एक डाकू की कड़कती आवाज से घबरा कर उठ गई। देखा तो मिलट्री की ड्रेस में बड़ी-बड़ी मूंछों वाला एक डाकू उसके सामने खड़ा था और बोल रहा था, ऐ बुढ़िया घर में जो कुछ है, जल्दी से दे दो नहीं तो आज तुमलोगों की खैर नहीं है।
डर के मारे सुमित्रा ताई का बुरा हाल था, मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। तभी पीछे से घर के तमाम औरतों के ठहाके सुनाई दिये। ताई को समझते देर नहीं लगी कि ये औरतें डोमकछ का खेल खेलने लगी हैं। झपटकर ताई ने डाकू की मूंछ पकड़ कर खींच दिया, अरे ये तो कल्याणी बुआ हैं।
इसी के साथ हो गया पूरे जोश के साथ रातभर चलनेवाला डोमकछ ड्रामा शुरू।
बिहार, झारखंड तथा उसके आस-पास के इलाके में डोमकछ शादी समारोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लड़के की शादी के दिन जब घर के सारे मर्द बारात गये होते हैं और घर पर सिर्फ औरतें रहती हैं, रातभर ये महिलाएं गाना, बजाना, मर्दों के कपड़े पहनकर नाचना, कभी मालिन बन जाना कभी शराबी तो कभी हकीम साहब बन इलाज करने लगना इत्यादि के जरिये मौज-मस्ती करती हैं।
मनोरंजन के साथ-साथ घर की पहरेदारी का काम भी आसानी से हो जाता है। लड़की की शादी में यह रस्म उस दिन किया जाता है जब घर के करीब सभी पुरुष लड़के का तिलक करने उसके घर गए होते हैं, और घर में सिर्फ महिलाएं रह जाती हैं।
डोमकछ में मर्दों का प्रवेश वर्जित होता है। यदि कोई मर्द इस बीच घर में प्रवेश कर जाता है या लुकछिप कर भी इस प्रोग्रम को देखने की कोशिश करता है तो उसकी खूब खिंचाई की जाती है। कभी-कभी तो उसे साड़ी पहनकर नाचना भी पड़ता है।
इतना दिलचस्प प्रभावी होने के बावजूद भी अब ये कला धीरे -धीरे खत्म होती नजर आती है। कुछ तो भाई चारे की कमी के कारण ये कला खत्म होती नजर आती है। एक आदमी दूसरे आदमी की खुशी और गम में शामिल होने से कतराते हैं। लॉ एण्ड आर्डर की स्थिति खराब होने की वजह से भी लोग रात को घर से निकलना सुरक्षित नहीं समझते हैं। इसके बाद जो बचा-खुचा दम है वह पाश्चात्य संस्कृति के जबरदस्त प्रभाव की चपेट में आ गया है।
शहरों में रहनेवाली महिलाऍ अब उस तरह से अपने-आप को इन रस्मों में नहीं ढाल पाती हैं। अक्सर वे कटी-कटी इधर-उधर खड़ी नजर आती हैं। पिछले 25 सालों से करीब दो सौ डोमकछ आयोजनों में हिस्सा ले चुकी कल्याणी बुआ कहती हैं, अब वो मजा नहीं रहा डोमकछ में। आजकल की महिलाएं तो ज्यादातर दर्शक बनी रहती हैं। उन्हें कोरस गाना तो दूर ताली बजाने में भी परेशानी होती है।
कुछ वर्ष पूर्व दूरदर्शन पर भी डोमकछ नाटक प्रसारित हो चुका है, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया था।
लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद भारत ही नहीं मॉरिशस, गुएना आदि देशों में भी जहां कहीं भोजपुरी, अंगिका आदि संस्कृति है, शादी-ब्याह के मौके पर कमोवेश डोमकछ नजर आ ही जाता है।

-प्रीतिमा वत्स

Sunday, March 30, 2008

सुख समृद्धि का प्रतीक शंख


कभी धर्म के लिए तो कभी आयुर्वेद के लिए शंख । कभी सौन्दर्य के लिए शंख तो कभी सुख समृद्धि के लिए शंख। सदियों से आदमी की जिन्दगी से जुड़ा है शंख।

वैसे तो शंख के कई प्रकार हैं, लेकिन दक्षिणावर्ती शंख, साधना मोती शंख और गणेश शंख की महत्ता कुछ अलग ही है। कोई शंख सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, तो कोई वातावरण को स्वच्छ रखता है।
दक्षिणावर्ती शंख- दांयी तरफ की ओर खुला भाग वाला शंख दक्षिणावर्ती शंख के नाम से जाना जाता है। यह थोड़ा दुर्लभ होता है। दक्षिणावर्ती शंख सफेद रंग मे उपलब्ध होता है, जिसपर हल्के भूरे रंग की धारियां होती हैं। यह शंख मां लक्ष्मी का अति प्रिय माना जाता है। दक्षिणावर्ती शंख को साधारणतया लोग अपने पूजाघर या लॉकर में रखते हैं। तथा किसी पर्व-त्योहार या उत्सव में ही निकालते हैं। यह सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार प्रत्येक देवी देवता अपने पास शंख रखते थे, जब कभी वे बहुत खुश होते या किसी युद्ध में विजयी होते तो इसका उपयोग करते थे। यह आम धारणा है कि जिस घर में दक्षिणावर्ती शंख होता है वहां सुख समृद्धि और शकून हमेशा रहता है। यह भी विश्वास है कि जो इसे अपने लॉकर में रखते हैं उन्हें जिंदगी में कभी पैसे की तंगी नहीं होती है। दक्षिणावर्ती शंख को सफेद कपड़े में लपेटकर या सफेद कपड़े के ऊपर रखा जाता है। तांत्रिक शास्त्र में इसका दूसरा ही महत्व है। इनके अनुसार दक्षिणावर्ती शंख धन का प्रतीक नहीं माना जाता है बल्कि यह बातावरण को स्वच्छ रखता है, और बुरी शक्तियां इससे कोसों दूर रहती हैं।
गणेश शंख- गणेश शंख व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा दिमकग में मजबूती लेता है। खुशी, सोहरत, अच्छा स्वास्थ्य के साथ-ताथ आत्मदिश्वास की प्राप्ति भी होती है। गणेश शंख को भगवान गणेश का प्रतिनिधि भी माना जाता है। गणेश शंख की उपयोगिता मुख्यत पूजा में होती है। इसके साधक सत्यवादी होते हैं तथा लंबी आयु पाते हैं। उसके बच्चे भी जन्म से ही रोगों से दूर रहते हैं तथा विषम परिस्थितियों में भी धैर्यवान होते हैं। गणेश शंख व्यवसाय के क्षेत्र में भी सहायक होता है।
फेंगसुई की दृष्टि से गणेश शंख व्यवसाय तथा विदेश यात्रा को प्रभावित करता है। यह शंख बुद्ध के पांव में पाए गए आठ निशानों में से एक है।6 से 8 इंच का एक गणेश शंख लेकर घर या आफिस के किसी कोने मेो रख दें। यदि आपके काम या शोहरत में बृद्धि होने लगी हो तो आप इसे घर के दक्षिणी हिस्से में रख दें। यदि आपका झुकाव पढ़ाई की तरफ हो तो आप इसे पूर्वोत्तर कोने में रखें। गणेश शंख को लोग अपने पूजाघर या लॉकर में रखते हैं, तथा किसी विशेष अवसर पर हीं इसे निकालते हैं।
साधना मोती शंख- मोती शंख साधारणतया गोल आकार का होता है, इसमें एक सफेद धारी होती है जो ऊपर से नीचे तक खिंची होती है। तथा पूरा शंख एक मोती की तरह चमकता रहता है। यह बहुत ही दुर्लभ किस्म का शंख है। इस शंख का उपयोग ज्यादातर ऐसे व्यक्ति करते हैं, जो सन्यास के मार्ग पर चल रहे हैं। इस शंख के माध्यम से उन्हें अपने ध्यान,योग आदि में बहुत सहायता मिलती है। वैसे तो दक्षिणावर्ती शंख साधना के लिए उत्तम माना जाता है। परन्तु मोती शंख और भी महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन यह बहुत दुर्लभ होता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस शंख में मां लक्ष्मी का वास होता है, जो धन और सम्पत्ति की देवी मानी जाती हैं। प्रत्येक परिवार इस शंख को अपने घर में रख सकता है।
आयुर्वेद में मोती शंख बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। रात को शंख में थोड़ा सा पानी डालकर रख दें और सुबह उसे अपनी त्वचा पर लगाएं तो त्वचा की सारी बिमारी दूर हो जाती है। यदि त्बचा पर सफेद दाग है तो शंख में थोड़ा पानी 12 घंटे तक रखें । उसके बाद उसे निकालकर त्वचा पर लगाएं, कुछ दिनों तक इस क्रिया को दोहराने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं। पेट की समस्या हो तो 12 घंटे तक शंख में रखा हुआ पानी सुबह-सुबह एक चम्मच पीयें। इस क्रिया को कुछ दिन तक दोहराने से पेट की सारी समस्या दूर हो जाती है। इस पानी का उपयोग आंखों में करने से आंखों की सास्या भी धीरे-धीरे दूर हो जाती है।
साधना मोती शंख के आर्थिक लाभ भी बहुत सारे हैं-सुबह सुबह शोख में थोडड़ा सा पानी लेकर एक बाल्टी पानी में डाल दें, उस पानी से नहाएं तो यश और भाग्य में वृद्धि होती है। अपने घर आफिस या कार्यक्षेत्र में इस शंख को रखने से आर्थिक परेशानी दूर हो जाती है। साधक धन तथा यश को प्राप्त करता है।
इस प्रकार प्रत्येक शंख अपने-आप में बहुत सारी महत्ता समेटे हुए है, और किसी भी कीमत पर कोई शंख एक दूसरे से का महत्वपूर्ण नहीं है।

-प्रीतिमा वत्स

Tuesday, March 18, 2008

रंग है तो जीवन है


हमारा व्यक्तित्व, हमारी दिनचर्या, हमारा रहन-सहन और मिजाज सभी कुछ रंगों से प्रभावित होता है। जीवन में रंग है तो सब कुछ है वरना वह नीरस और बेमानी लगने लगता है।

जीवन में रंगों का अपना एक विशेष महत्व है। व्यक्ति किस रंग के परदे, चादर, तकिए का कवर आदि घर में लगाना पसंद करता है। घर की दीवारों पर कौन से रंग का पेंट पसंद है, आदि दैनिक जीवन से जुड़ी कई बातें हैं जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को बताती है। औरतों के स्वभाव का पता भी एक हद तक रोजमर्रे की जिंदगी में उनके द्वारा उपयोग किए जानेवाले कपड़े, लिपस्टिक,नेलपॉलिश,सैंडिल,कार आदि के कलर से चल जाता है। हल्के रंग के कपड़े,हल्के रंग की लिपस्टिक,नेल पॉलिश आदि व्यवहार करनेवाली औरतें स्वभाव से अक्सर गंभीर होती हैं। लाल,गाढ़ा गुलाबी,नारंगी आदि कलर का उपयोग करनेवाली औरतें जहॉं शोख चुलबुली मानी जाती हैं, वहीं गाढ़ा बैंगनी, नीला आदि कलर का उपयोग करनेवाली औरतें सतही तथा फूहड़ मानी जाती हैं। यह आज की बात नहीं है, वैदिक काल से ही मानव के कुछ विशिष्ट गुणों की पहचान कुछ खास रंगों से होती रही है। केसरिया रंग शौर्य और वीरता का हरा रंग हरियाली के साथ-साथ आर्थिक विकास का और सफेद रंग शांति और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इन तीनों रंगों को भारत के राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया गया है। आदिकाल से शुभ-अशुभ, हर्ष-विषाद, शांति आदि के लिए अलग-अलग रंगों का उपयोग किया जाता है। शादी-ब्याह और दूसरे मांगलिक अवसरों पर लाल रंग प्रयुक्त होता है, क्योंकि यह शुभ माना जाता है। लेकिन मृत्यु आदि के अशुभ समझे जाने वाले मौकों पर काले रंग का प्रयोग होता है। ये रंग हमारे जीवन में इतने रच-बस गए हैं कि इनसे इतर व्यवहार की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। रामायण और महाभारत में भी महारथियों के कपड़ों का रंग बहुत कुछ उनके व्यक्तित्व से मेल खाता हुआ ही बताया गया है। दुनिया के सभी मजहबों का अपना एक प्रतीक रंग है। हिंदू धर्म का प्रतीक रंग भगवा है तो ईसाई मजहब का सफेद और इस्लाम का हरा। वहीं जैन धर्म मानने वाले दो खेमे अपना अलग-अलग रंग पीला और सफेद रंगों को अपना प्रतीक रंग मानते हैं। और तो और धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादियों के लिए यह रंग उतना ही प्रिय और पवित्र माना जाता है, जितना विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए अपना-अपना रंग।
चिकित्सा शास्त्र खासकर प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में भी विभिन्न रंगों की बोतलों में पानी भरकर धूप में कुछ देर रखकर पीने से, अलग-अलग रंग की मिट्टी तक से बीमारियों की चिकित्सा बताई गई है।
जो लोग फलित ज्योतिष शास्त्र में आस्था रखते हैं, वे जानते हैं कि उनके जीवन में रंगों की कितनी अहम भूमिका है। हफ्ते के कौन से दिन किस रंग के कपड़े पहनने से लाभ या हानि होने की संभावना है। अपनी राशि और जन्म तिथि के मूलांक के हिसाब से कौन सा रंग शुभ और अनुकूल है या कौन सा रंग अशुभ या विघ्नकारक है, इसका एहसास उन्हें हमेशा रहता है। ग्रह-नक्षत्रों के विभिन्न रंगों के साथ संबंधों को लेकर दो राय भले ही हो सकती है, लेकिन सड़कों पर चलने वाले स्वचालित वाहनों के रंगों के बारे में हमें कतई भ्रम नहीं रखना चाहिए। विशेषज्ञों के अध्ययन से अब यह साबित हो गया है कि कुछ खास रंगों के वाहनों में दुर्घटना की आशंका ज्यादा रहती है, जबकि कुछ दूसरे खास रंग निरापद माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सड़क पर सुरक्षा की दृष्टि से नीला या पीला रंग सबसे अच्छा माना जाता है और सलेटी सबसे खराब। दुनिया की सबसे महंगी कारें बनानेवाली ,एक अमेरिकी कंपनी द्वारा पिछले दिनों कराए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि सफेद, चमकदार पीले और नारंगी रंग की कारें ज्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि ये रंग आसानी से नजर आ जाते हैं और दुर्घटना की आशंका कम हो जाती है। इसके विपरीत गहरा रंग आसानी से दूसरे वाहन-चालकों को नहीं दिखाई देता है। इसलिए इस रंग के कारण दुर्घटनाग्रस्त होती रहती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि रंगों का पूरा माया संसार अपने चारों तरफ फैला पड़ा है। और आप चाहकर भी इससे नहीं बच सकते। आपको सिर्फ य़ह ही तय करना है कि कब कौन सा रंग आपके व्यक्तित्व, आपके मिजाज, आपकी जीवनशैली और पसंद के ज्यादा अनुकूल है या कौन सा रंग आपको शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा निरापद लगता है। इसलिए अच्छी तरह सोच-समझकर अपने मनपसंद रंग का चयन कीजिए और उस रंग में अपने को रंग लीजिए। वैसे मौसम भी तो रंगों का ही है।
-प्रीतिमा वत्स

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...