चूटोनाथ के पूजन-दर्शन का कार्य यूँ तो बारहों महीने चलता रहता है। पर वैशाख के महीने में उनकी विशेष पूजा की जाती है जिसे स्थानीय लोग चड़क पूजा कहते हैं।
दुमका (संताल परगना) से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर चूटो पहाड़ियों के बीच झारखंड का एक महत्वपूर्ण धार्मिक तथा ऐतिहासिक स्थल स्थित है जहाँ लोक-आस्था के प्रतीक बाबा चूटोनाथ का मंदिर है। बाबा चूटोनाथ भगवान् भोले शंकर के प्रतिरूप माने जाते हैं और इनकी मान्यता बैद्यनाथधाम और बासुकीनाथ जैसे प्रमुख एवं प्रसिद्ध शैव-स्थल के रूप में है।
ऐसी लोक-मान्यता है कि बाबा चूटोनाथ अपने भक्तों की हर प्रकार के अनिष्ट से रक्षा करते हैं और उनके दरबार में माँगी गयी हर प्रकार की मनौतियाँ पूरी होती हैं। हरे-भरे वृक्षों से बीच चूटो पहाड़ की तलहटी में चूटो बाबा के मंदिर के निकट ही पहाड़ी बाबा का पूजा-स्थल स्थित है जिनकी मान्यता चूटो बाबा के कर्ता के रूप में है, अर्थात बाबा चूटोनाथ से माँगी गयी मनौतियाँ पहाड़ी बाबा पूरी करते हैं। मनौतियाँ पूरी होने पर लोग पहाड़ी बाबा को पाठा(बकरा),मुर्गा आदि की बलि चढ़ाते हैं और मदिरा भी अर्पित करते हैं क्योंकि ये वनदेव के रूप में पूजित हैं। यहाँ पर चढ़ाई जानेवाली बलि को किसी बलिवेदी में नहीं लगाया जाता है, सीधे कटार से वार किया जाता है। यह भी विडम्बना है कि एक ही बार में सर धड़ से अलग हो जाता है और बलि के लिए प्रयुक्त कटार पर रक्त का नामोंनिशान नहीं रहता है। पहाड़ी पर स्थित चूटोनाथ के मंदिर में किसी तरह की बलि नहीं चढ़ती। वहाँ फूल-बेलपत्र और जल से बाबा का पूजन- अर्चन होता है।
चूटोनाथ में झारखंड और बिहार के अतिरिक्त पश्चिम बंगाल के श्रद्धालु भक्त और दर्शनार्थी भी सालोंभर आते रहते हैं। हालाँकि बाबा चूटोनाथ की मान्यता वनदेव या जंगली देवता के रूप में है, किन्तु इनके प्रति आदिवासी और गैर-आदिवासी सभी लोगों की आस्था समान रूप से है। संताल परगना के घटवाल जाति के लोगों में इनके प्रति विशेष श्रद्धा है और वे लोग इन्हें अपने इष्टदेव के रूप में पूजते हैं। उनकी ऐसी मान्यता है कि चूटोनाथ बाबा हर प्रकार के रोग, व्याधि और संकट से रक्षा करते हैं। बाबा चूटोनाथ के दूत स्वरूप पूजित पहाड़ी बाबा के पुजारी जहाँ चूटोनाथ के परम घटवाल भक्त फक्कू राय के वंशज हैं, बाबा चूटोनाथ के पुजारी ब्राह्मण कुल के होते हैं।
चूटोनाथ की आस-पास की पहाड़ियों में पाँच गुफाएँ हैं जहाँ देवी की पूजा होती है। निकट के झंझरा पहाड़ी की गुफा में स्थित देवी का मान्यता बड़ी देवी के रूप में है। किंवदन्ती है कि झंझरा पहाड़ी मे स्थित बड़ी देवी को पुराने समय में नर-बलि भी दी जाती थी।
बाबा चूटोनाथ के भक्तों की सूची बड़ी लंबी है, जिनमें मखना साधु, पहाड़ी बाबा और महानन्दों साधु के नाम श्रद्धापूर्वक लिये जाते हैं। इनमें मखना साधु का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है। मखना बाबा चूटोनाथ के अनन्य भक्त थे। वे प्रतिदिन बाबा चूटोनाथ के शिवलिंग को निकट के सरोवर में ले जाकर स्नान कराते थे। उन दिनों चूटोनाथ की आस-पास की पहाड़ियों में घने जंगल थे। मखना बाबा को पेड़-पौधे, जंगल और वन्य जीवों से अत्यंत लगाव था। कहते हैं कि उन्होंने एक बाघ पाल रखा था जो सदैव उनके साथ रहता था। प्रत्येक पूर्णिमा की रात्रि में वे बाबा चूटोनाथ के पूजन के बाद पत्तल के 52 दोने मंदिर के सामने लगाते थे । दोना लगाने के बाद वे एक खास तरह की आवाज लगाते थे और इसे सुनते ही निकट के जंगल से आकर मोर, खरगोश, तीतर, जंगली बिल्ली, चूहा सरीखे पशु-पक्षी मखना बाबा के साथ भोग खाते थे। मखना बाबा ने चूटोनाथ मंदिर के पास अनेक वृक्ष लगाये थे जिनमें से कई आज भी उनकी याद दिलाते हैं। मखना बाबा की मृत्यु होने पर उन्हें चूटोनाथ मंदिर के समक्ष दफनाकर उनकी समाधि बना दी गयी है।
चूटोनाथ के पूजन-दर्शन का कार्य साल के बारहों महीने चलता रहता है। पर वैशाख के महीने में उनकी विशेष पूजा की जाती है जिसे स्थानीय लोग चड़क पूजा कहते हैं। बाबा चूटोनाथ की चड़क पूजा के पूर्व निकट के गाँव दीघी के काली मंदिर में देव-रूप में पूजित शिलाखंड बनेसर (अर्थात वन के ईश्वर बनेश्वर) की आस पास के सभी गांवों में समारोह पूर्वक प्रदक्षिणा करायी जाती है और फिर उन्हें चूटोनाथ मंदिर परिसर में लाया जाता है।
बनेसर देव के यहाँ पहुँचते ही चड़क पूजा की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है जो कि रात भर चलता रहता है। चूटोनाथ शिवलिंग का दर्शन कर भगतिया लोग लकड़ी के एक खम्भे जिसे ढोल शिवा कहते हैं, पर उल्टा लटककर झूलते हैं और नीचे आग जलती रहती है। इसके बाद भक्तगण कँटीली झाड़ियों पर नंगे बदन लोटकर लफरा काँटा की रस्म पूरी करते हैं। फिर रोमांचक फूल खेला होता है जिसमें हजारों भक्त नंगे पाँव जलते हुए आंगारों पर नृत्य करते हैं । जिन लकड़ी के लट्ठों के जलने से बने अंगारों पर यह नृत्य होता है उसे भक्त द्वारा चूटोनाथ के मंदिर से हथेली पर लायी अग्नि से प्रज्वलित किया जाता है। यह शिव स्वरूप चूटोबाबा का ही चमत्कार है कि रातभर इस हठयोगपूर्ण पूजा-साधना में लीन रहने के बावजूद कोई भी भक्त आहत नहीं होता है। भक्तों के लिए बाबा चूटोनाथ एक जागृत देव हैं, जिनके दर से कोई भी निराश नहीं लौटता है।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, April 9, 2009
Monday, April 6, 2009
सोहराय पर्व का आरंभ कैसे हुआ ?
लोक जीवन में हर पर्व, हर उत्सव,हर पहलू के पीछे कुछ न कुछ किंवदन्तियां जरूर होती हैं। सोहराय पर्व को मनाने के पीछे भी एक बहुत ही रोचक कथा है- लोक मान्यता हैं,ठाकरान(आदिदेवी) की हंसली हड्डी (गले की हड्डी) के मैल से बने हांस-हांसिल (हंस-हंसिनी) पक्षियों ने विशाल जल-राशि पर तैरते हुए बिरना (खस घास) के झाड़ में अपना घोंसला बनाया था जहां हांसिल (हंसिनी) ने दो अंडे दिए थे, जिनसे दो मानव शिशु उत्पन्न हुए थे। तब, ठाकुर जिउ (सृष्टिकर्ता) को चिंता हुई कि उन दोनों मानव -शिशुओं के आहार की व्यवस्था की जाए।
उस समय स्वर्गपुरी में आइनी-बाइनी कपिला गाएं थीं। ठाकुर जिउ ने मारांग बुरू (महादेव) को अपने पास बुलाकर कहा कि उन गौओं को पृथ्वी पर ले जाएं। मारांग बुरू स्वर्ग पुरी में ही रहते थे, परंतु वे पृथ्वी पर तोड़े सुताम (काल्पनिक तंतु) के सहारे आसानी से आ-जा सकते थे।
ठाकुर जिउ के आदेशानुसार, मारांग बुरू बहुत अनुनय-विनय करके नर-मादा आइनी-बाइनी कपिला गौओं को पृथ्वी पर ले आए और उन्हें जंगल में रखा। साथ ही, पृथ्वी पर मारांग बुरू ने मड़ुआ,सावां आदि कुछ मोटे अनाजों के बीज जहां-तहां छींट दिए। कालक्रम में प्रथम मानव -दंपत्ति, पिलचू हाड़ाम-पिलचू बूढ़ी तथा कपिला गौओं की वंश-वृद्धि हो गई। मानव-संतानें बाकुक नाहेल (हाथों से चलाने वाले हल) से जमीन जोतकर अनाज उपजाना सीख चुकी थीं। उस पर मारांग बुरू ने उनलोगों से कहा, अपने हाथों से कबतक हल जोतते रहोगे ? जाओ, जंगल से नर-मादा कपिला गौओं को ले आओ। उनमें से नर-गौओं(बैलों) से हल चलाया करना और मादा-गौओं(गायों) के दूध खाया-पीया करना।
तब, वे मानव उन गौओं की खोज में जंगल को गए। वहां उन्हें वे गौएं झुंड में एक ही जगह इकट्ठी मिल गईं। अतः मानव गौओं को जंगल से हांककर अपने यहां ले आए। गायों के आने की खुशी में लोगों ने उन पशुओं के सींगों में तेल-सिंदूर लगाकर उनका स्वागत किया गया, उनका परिछन किया गया और उन्हें गोहाल (मवेशी-घर) में रखा,दूसरे दिन उन मवेशियों को गोहाल से निकालकर चरने के लिए, चरवाहों के साथ, बाहर भेज दिया गया और गोहालों को साफ-सुथरा करके पूजा की गई। सांझ हो जाने पर वे सभी मवेशी गोहालों में अपनी-अपनी जगह पर आ गए। तब, धूप-दीपों के साथ उन मवेशियों का परिछन किया गया। साथ ही, गीत-नाद के साथ उस दिन रात्रि-जागरण किया गया। फिर, तीसरे दिन, बैलों को अपने-अपने दरवाजे पर निकालकर, उन्हें सजा-धजाकर गली में गाड़े गए खूंटों में बांधकर हड़काए जाते हुए खेल-कूद किया जाता रहा। चौथे दिन घर-घर से कुछ-कुछ अनाज मांगकर सहभोज किया गया और पांचवें दिन बेझा तुंग (लक्ष्य-वेध) करके गोधन-पर्व की समाप्ति की गई।कहते हैं, सोहराय पर्व का आरंभ उसी दिन से हुआ है। उस पर्व का पहला दिन गोट पूजा का दूसरा दिन गोहाल पूजा का तीसरा दिन खुण्टाउ (बैल खूंटने) का, चौथा दिन जाले का और पांचवां दिन बेझा तुंग का दिन कहलाता है। तब से यह पर्व हर साल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। संताल परगना में यह पर्व मकर-संक्रांति के ठीक पहले मनाया जाता है जबकि दक्षिण बिहार,उड़ीसा आदि में दीपावली के अवसर पर मनाया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
Wednesday, March 18, 2009
क्या आपने चैती सुना है ?
चैती एक खास तरह का गीत है जिसे चैत के महीने में गाया जाता है। इन गीतों में मुख्य रूप से भगवान राम का स्मरण किया जाता है। झारखंड के गोड्डा जिले में रहनेवाले कंचन महतो का कहना है, चैत के महीने में तो सिर्फ राम के लिए ही चित्त चंचल होता है। उनके सुर आज भी चैत की रातों सजाते हैं।
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
ऐसो सुन्दर ललनमा के देखी
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा।।
घुंघराली काली-काली लुटरिया
शोभित कमल नयनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामाअखिया सुफल भई,अखिया सुफल भई।।
इस चैती गीत में रामचंद्र जी की सुन्दरता का वर्णन किया गया है। उनकी घुंघराली काली लटें, उनके सुंदर नयन जो कमल की तरह खिले हुए लगते हैं। जिन्हे देखकर आंखे सफल हो गई।
बाजत आनंद बधैया हो रामा।
ऐलै चैत का महीनवा हो रामा
बाजत आनंद बधैया हो रामा।
राजा दशरथ के चार पुत्र भई
श्याम घोर छवि छैया हो रामा।
बाजत आनंद बधैया हो रामा।।
इन गीतो में भगवान रामचंद्र जी के जन्म उत्सव का वर्णन किया गया है।
-प्रीतिमा वत्स
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
ऐसो सुन्दर ललनमा के देखी
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामा।।
घुंघराली काली-काली लुटरिया
शोभित कमल नयनमा हो रामा
अखिया सुफल भई, अखिया सुफल भई।
लखी रे लखी बारै ललनमा हो रामाअखिया सुफल भई,अखिया सुफल भई।।
इस चैती गीत में रामचंद्र जी की सुन्दरता का वर्णन किया गया है। उनकी घुंघराली काली लटें, उनके सुंदर नयन जो कमल की तरह खिले हुए लगते हैं। जिन्हे देखकर आंखे सफल हो गई।
बाजत आनंद बधैया हो रामा।
ऐलै चैत का महीनवा हो रामा
बाजत आनंद बधैया हो रामा।
राजा दशरथ के चार पुत्र भई
श्याम घोर छवि छैया हो रामा।
बाजत आनंद बधैया हो रामा।।
इन गीतो में भगवान रामचंद्र जी के जन्म उत्सव का वर्णन किया गया है।
-प्रीतिमा वत्स
Saturday, March 14, 2009
देवगुड़ी में धरतीपूजा

जिस दिन देवगुड़ी में हल चलाया जाता है उस दिन पूरे गांव में हल चलाने की मनाही होती है, तथा दूसरे दिन से धान की बोआई शुरु हो जाती है।
छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाकों में चैत के महीने में धरती माँ की पूजा बड़े ही धूमधाम से की जाती है।इस पर्व को यहाँ माटी तिहार के नाम से जाना जाता है।
पर्व के दिन सुबह-सवेरे नहा-धोकर पुजारी देव गुड़ी(देव मंदिर) में जा पहुँचता है। पुजारी दिनभर का उपवास रखता है। गाँवभर के सभी पुरुष अपने हाथों में सिंयाड़ी के पत्ते के दोने में धान भरकर देवगुड़ी में जमा होते हैं। फिर वे अपने-अपने दोने देवी माँ के चरणों में अर्पित कर देते हैं। देवगुड़ी के पास हीं एक लम्बा-चौड़ा गड्ढा खोदा जाता है, लेकिन इस गड्ढे की मिट्टी निकाली नहीं जाती है। कुछ आदमी हल लेकर इस गड्ढे की गुड़ाई करते हैं। इस हल में बैलों की जगह आदमी जुते रहते हैं। इस रस्म के बाद उस गड्ढे में ढेर सारा पानी डालकर छोड़ दिया जाता है। तब पुजारी इनमें धान बोता है।धान बोये जाने के बाद सभी लोग इकट्ठे होकर देवी माँ,धान और पुजारी की पूजा करते हैं।पूजा के बाद सबलोग मंदिर में ही बना हुआ खाना खाते हैं। खाना खाने के बाद पुनः सब उस गड्ढे के पास इकट्ठे हो जाते हैं, और एक-दूसरे को कीचड़ में घसीट-घसीटकर खूब खेलते हैं। एक दूसरे के ऊपर कीचड़ लगाते हैं और अपने-अपने घर आ जाते हैं।
दूसरे दिन पुजारी के घर पर खाना-पीना होता है, तथा रात्रिजागरण भी किया जाता है।

यद्यपि यह पर्व काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन इस पर्व में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है।
माटी तिहार का पर्व यूँ तो छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाके में मनाया जाता है लेकिन पर्व मनाने के तरीकों में थोड़ी बहुत भिन्नता पाई जाती है। कहीं-कहीं पर डाही जलाने (बुरी नजर से बचाने) की प्रथा भी है।
-प्रीतिमा वत्स
Saturday, March 7, 2009
फुलवा जैसनी सुकुमार

बिहार और झारखंड (प्राचीन अंगजनपद) के कुछ हिस्सों में आज भी होरी (होली पर गाया जानेवाला गीत) अपने पुराने अंदाज और ठाट से गाया जाता है। शिवरात्रि के दिन से आरंभ होकर होलिका दहन के दिन तक रोज रात में गाया जाता है। दिनभर के कामों से निवृत होकर जब लोग रात को करीव दस बजे होरी गाने बैठते हैं तो मानों नयी स्फुर्ति से भर जाते हैं। पुरुषों की भीड़ में कोई एक पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर भी नाचता है। और पूरा गांव होली के रंग में आधी रात तक डूबा रहता है।
होली के कुछ गीत-
1.
गोरिया पातरी हे गोरिया पातरी
गोरिया पातरी----------------।
जैसे लचके अंगुरिया के डार, गोरिया पातरी,
होरी हो-------होरी हो-----------।
पनवा जैसनी हे गोरिया पातरी छितरी
फुलवा जैसनी सुकुमार,
सोनवा जैसनी हे गोरिया देखैम् सुन्दरी
बिजुरी छिटकावै बतीसो दाँत
होरी हो--------होरी हो---------।
गोरिया पातरी हे, गोरिया पातरी।।
अर्थ- इस होरी में गोरी (नारी) के दैहिक सुन्दरता का वर्णन है। गोरी बहुत नाजुक और पतली है। जैसे अंगुर की बेल लचकती है वैसे ही गोरी का कमर लचकता है।
गोरी पान के जैसे पतली और फूल से भी सुकुमार है। सोने के जैसी सुन्दर है। बत्तीसो दांत तो मानों बिजली की तरह चमकते हैं।

2.
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग--------------------।
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग-------------------।
होरी हो----होरी हो---------।
किनका के हाथ कनक पिचकारी,
किनका हाथ अबीर झोली, राधा संग,
हो राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग------------------.
कृष्णा के हाथ कनक पिचकारी,
राधा रानी हाथ अबीर झोली
राधा संग-------------------।
राधा संग श्याम खेले होली,
राधा संग----------------------।
अर्थ- इस होरी में राधा और श्याम के द्वारा खेले गये होली का वर्णन है।
राधा के संग श्याम होली खेल रहे हैं। कृष्ण के हाथों में सोने की पिचकारी है
और राधा के हाथों में अबीर की झोली है।
दोनों एक दूसरे में मस्त हैं और होली खेल रहे हैं।
3.
बिकन चले, बिकन चले तीनों प्राणी है दानी बिकन चले।
कौनी घर में राजा बिक गये, किनका घर में रानी,
किनका घर में रोहित बिक गये।
बिक गए तीनों प्राणी हो दानी बिकन चले।
होली हो----------होली हो--------------।
डोम घर में राजा बिक गए, मालिनी घर में रानी,
डोम घर में रोहित बिक गए।
बिक गए तीनों प्राणी हो दानी बिकन चले।
होली हो---------होली हो-------------।
अर्थ- इस होरी में राजा हरिश्चन्द्र के सपरिवार बिकने की बड़ी मार्मिक कथा है।
किस घर में राजा बिक गए और किस घर में रानी, कौन से घर में राजकुमार रोहित बिक गए।
आज तो पूरा परिवार हीं बिकने को निकल पड़ा है।
डोम के घर में राजा बिक गए, मालिन के घर में रानी सैव्या बिक गईं।
डोम के घर में ही राजकुमार रोहित बिक गए।
के आज तो तीनों प्राणी ही बिक गए।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, March 5, 2009
संताली लोक समाज में शराब की कथा
संताली लोक समाज में शराब के निर्माण को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा है। कल्पनाओं पर आधारित होते हुए भी यह बहुत हीं मनोरंजक और शिक्षाप्रद है।
पुराने जमाने की बात है। एक बार एक आदमी एक पीपल के पेड़ के नीचे शराब बनाने बैठा। उसके लिए उसने चूल्हा सुलगाया। उस पर महुए की हांड़ी चढ़ाई और आंच देने लगा। परंतु, बहुत देर तक आंच देते रहने पर भी एक बूंद भी शराव नहीं निकली। उससे हैरान हो वह एक ओझा (तांत्रिक) के पास गया और उससे बोला, बाबा, मैंने अमुक पेड़ के नीचे शराब चुलाने के लिए चूल्हा जलाया है, परंतु लाख कोशिश करने पर भी एक बूंद भी शराब नहीं निकाल पा रहा हूं। कृपा करके मुझे बताएं कि मैं क्या करूं जिससे शराब निकाल सकूं।
उस ओझा बाबा ने उसे बताया, तुम जिस पेड़ के नीचे शराब चुवा रहे हो उसी पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंक दो। फिर, देखोगे कि इतनी आधिक शराब चूने लगेगी कि तुम्हें शराब रखने की जगह तक नहीं मिलेगी।
इस पर वह आदमी झटपट उस पेड़ के पास लौट आया और उसे काटकर चूल्हे में झोंकने लगा।
उस पेड़ की शरण में चार जीव रहा करते थे- एक मैना, एक तोता, एक बाघ और एक सूअर। चारों दिन-भर तो इधर-उधर रहा करते, परंतु सांझ होते ही उस पेड़ की शरण में आ जाया करते और वहीं रात गुजारा करते थे।
उस दिन भी सांझ होते-न-होते वे चारों एक-एककर वहां आने लगे।
सबसे पहले मैना आई। उसने देखा कि पेड़ काट डाला गया है और चूल्हे में उसे झोंका जा रहा है। यह देखकर उस मैने को बहुत दुख हुआ। अपने शरणस्थल उस पेड़ को जलते हुए देख वह भी उस चूल्हे में कूद पड़ी। उससे कुछ शराब चू निकली।
उसके बाद तोता उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है तो वह भी उसमें कूदकर जल-मर गया। शराब कुछ अधिक चू निकली।
उसके बाद बाघ उस पेड़ के पास आया और देखा कि उस पेड़ को काट डाला गया है और चूल्हे में झोंका जा रहा है। इस पर उस बाघ को भी बहुत दुख हुआ और वह भी उसी चूल्हे में कूदकर जल-मर गया। शराब अधिक चू निकली।
अंत में सूअर उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है । इस पर वह भी बहुत दुखी हुआ और उसने भी उसी चूल्हे में कूदकर अपनी जान दे डाली। शराब बहुत अधिक चू निकला।
वह आदमी बहुत खुश हुआ। उसने ओझा को बधाई दी।
कहा जाता है कि उसी दिन से शराब में मैने, तोते, बाघ और सूअर के खूनों का असर व्याप गया है। इसीलिए जब शराब का पहला दोना ढलता है तब पीनेवाला मैने की तरह मीठी-मीठी बातें करने लगता है, वाह भई, शराब तो खूब बनी है, किसने इतनी अच्छी शराव बनाई है। इत्यादि। उसके बाद दूसरा दोना पीते-पीते वह तोते की तरह बातुनी हो जाता है, तीसरे दोने में वह मानो बाघ बन जाता है, बाघ की तरह ही गरजना दहाड़ना और दंभ मारना शुरू कर देता है। वह बात-वात में बिगड़ जाया करता है और समझने लगता है कि दुनिया में उससे बढ़कर कोई नहीं है। और, अंत में वह सूअर-जैसा बन जाता है। उसे न तो अपने तन-मन की सुध रहती है और न भले-बुरे का ज्ञान। वह जहां तहां गिरा पड़ा रहता है।
यही कारण है कि संताल लोगों के पुरखों में आज-कल की तरह बेहिसाव शराब पीने का चलन नहीं था।
-प्रीतिमा वत्स
पुराने जमाने की बात है। एक बार एक आदमी एक पीपल के पेड़ के नीचे शराब बनाने बैठा। उसके लिए उसने चूल्हा सुलगाया। उस पर महुए की हांड़ी चढ़ाई और आंच देने लगा। परंतु, बहुत देर तक आंच देते रहने पर भी एक बूंद भी शराव नहीं निकली। उससे हैरान हो वह एक ओझा (तांत्रिक) के पास गया और उससे बोला, बाबा, मैंने अमुक पेड़ के नीचे शराब चुलाने के लिए चूल्हा जलाया है, परंतु लाख कोशिश करने पर भी एक बूंद भी शराब नहीं निकाल पा रहा हूं। कृपा करके मुझे बताएं कि मैं क्या करूं जिससे शराब निकाल सकूं।
उस ओझा बाबा ने उसे बताया, तुम जिस पेड़ के नीचे शराब चुवा रहे हो उसी पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंक दो। फिर, देखोगे कि इतनी आधिक शराब चूने लगेगी कि तुम्हें शराब रखने की जगह तक नहीं मिलेगी।
इस पर वह आदमी झटपट उस पेड़ के पास लौट आया और उसे काटकर चूल्हे में झोंकने लगा।
उस पेड़ की शरण में चार जीव रहा करते थे- एक मैना, एक तोता, एक बाघ और एक सूअर। चारों दिन-भर तो इधर-उधर रहा करते, परंतु सांझ होते ही उस पेड़ की शरण में आ जाया करते और वहीं रात गुजारा करते थे।
उस दिन भी सांझ होते-न-होते वे चारों एक-एककर वहां आने लगे।
सबसे पहले मैना आई। उसने देखा कि पेड़ काट डाला गया है और चूल्हे में उसे झोंका जा रहा है। यह देखकर उस मैने को बहुत दुख हुआ। अपने शरणस्थल उस पेड़ को जलते हुए देख वह भी उस चूल्हे में कूद पड़ी। उससे कुछ शराब चू निकली।
उसके बाद तोता उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है तो वह भी उसमें कूदकर जल-मर गया। शराब कुछ अधिक चू निकली।
उसके बाद बाघ उस पेड़ के पास आया और देखा कि उस पेड़ को काट डाला गया है और चूल्हे में झोंका जा रहा है। इस पर उस बाघ को भी बहुत दुख हुआ और वह भी उसी चूल्हे में कूदकर जल-मर गया। शराब अधिक चू निकली।
अंत में सूअर उस पेड़ के पास आया। उसने भी देखा कि पेड़ को काटकर चूल्हे में झोंका जा रहा है । इस पर वह भी बहुत दुखी हुआ और उसने भी उसी चूल्हे में कूदकर अपनी जान दे डाली। शराब बहुत अधिक चू निकला।
वह आदमी बहुत खुश हुआ। उसने ओझा को बधाई दी।
कहा जाता है कि उसी दिन से शराब में मैने, तोते, बाघ और सूअर के खूनों का असर व्याप गया है। इसीलिए जब शराब का पहला दोना ढलता है तब पीनेवाला मैने की तरह मीठी-मीठी बातें करने लगता है, वाह भई, शराब तो खूब बनी है, किसने इतनी अच्छी शराव बनाई है। इत्यादि। उसके बाद दूसरा दोना पीते-पीते वह तोते की तरह बातुनी हो जाता है, तीसरे दोने में वह मानो बाघ बन जाता है, बाघ की तरह ही गरजना दहाड़ना और दंभ मारना शुरू कर देता है। वह बात-वात में बिगड़ जाया करता है और समझने लगता है कि दुनिया में उससे बढ़कर कोई नहीं है। और, अंत में वह सूअर-जैसा बन जाता है। उसे न तो अपने तन-मन की सुध रहती है और न भले-बुरे का ज्ञान। वह जहां तहां गिरा पड़ा रहता है।
यही कारण है कि संताल लोगों के पुरखों में आज-कल की तरह बेहिसाव शराब पीने का चलन नहीं था।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, February 12, 2009
बिरहा
किसानों के लिये कुछ समय ऐसा होता है जब कोई उत्पादन नहीं होता है, मतलब खेती के लिये उस समय कोई काम नहीं होता। रोजी रोटी की तलाश में तब वो दूर परदेश जाते हैं। परदेश गये इन पतियों के वियोग को महिलाएं अपने गीतों में व्यक्त करती हैं। पति वियोग में गाये इन गीतों को बिरहा कहा जाता है।
आज भी कभी-कभार सुनने को मिल जाते हैं बिरहा के गीत । लेकिन अब मौका किसी संगीत समारोह का होता है या स्टेज शो। गानेवाले होते हैं कोई सधे हुए कंठ।
रंगमहल में सोचै प्यारी धनिया
बिरहा सतावै दिर-राती बिरहनियां
गौना करये छेला देहरी बैसाये गेल
अपने जे गेल परदेश परदेशिया।।
रंग महल में सोचै प्यारी धनिया..........।
सावन सुहावन लागती
पिया बिनु कुछ नहीं भावती
निस विरह सतावती
बतला दे प्यारे पियू कहाँ।।
सावन सुहावन लागती.........।।
सरीस मास ऋतु फागुन मास
नहीं रे शरद नहीं घाम
किनका संग हम होली खेलब
नहीं रे मोहनी यही ठाम।।
सरीस मास ऋतु फागुन मास..........।।
-प्रीतिमा वत्स
आज भी कभी-कभार सुनने को मिल जाते हैं बिरहा के गीत । लेकिन अब मौका किसी संगीत समारोह का होता है या स्टेज शो। गानेवाले होते हैं कोई सधे हुए कंठ।
रंगमहल में सोचै प्यारी धनिया
बिरहा सतावै दिर-राती बिरहनियां
गौना करये छेला देहरी बैसाये गेल
अपने जे गेल परदेश परदेशिया।।
रंग महल में सोचै प्यारी धनिया..........।
सावन सुहावन लागती
पिया बिनु कुछ नहीं भावती
निस विरह सतावती
बतला दे प्यारे पियू कहाँ।।
सावन सुहावन लागती.........।।
सरीस मास ऋतु फागुन मास
नहीं रे शरद नहीं घाम
किनका संग हम होली खेलब
नहीं रे मोहनी यही ठाम।।
सरीस मास ऋतु फागुन मास..........।।
-प्रीतिमा वत्स
Sunday, February 8, 2009
अंगिका के फेकड़े
बिहार के अंगजनपद में(वर्तमान भागलपुर तथा उसके आस -पास के इलाकों में) अंगिका भाषा बोली जाती है। यह भाषा जितनी मधुर है उतनी ही समृद्ध भी। मुहावरे और लोकोक्तियाँ तो इस भाषा की जान हैं जैसे। इन लोकोक्तियों को अंगिकाभाषी फेकड़ा कहते हैं। बहुत बड़ी-बड़ी बातो को इन लोकोक्तियों के जरिए बड़े कम शब्दों में आसानी से कह दी जाती है।
मांय करै कुटौना पिसौना
बेटा के नाम दुर्गादास।
माँ घर-घर जाकर नौकरानी का काम करती है अथवा कठिन परिश्रम करती है और बेटे के नखरे तो कहे नहीं जाते।
नोन् तेलो रोस
भंसिया हाथॉ जस।
नमक तेल की सही मात्रा से ही खाने में स्वाद आता है। और यह स्वाद ही खाना बनाने वाले(भंसिया) को तारीफ दिलाता है। अर्थात उनके हाथों में यश देता है।
घरँ भूँजी भाँग नाय्
डेढ़ी पर नाच।
घर में खाने के लाले पड़े हों और दिखावे का आलम ऐसा कि दरवाजे पर नाच-गाना करवा रहे हैं।
मिलै मियाँ क् माँड़ नाय
खोजै मियाँ ताड़ी।
मनुष्य को सीधा-सादा जीवन गुजारना मुश्किल हो,भोजन भी कठिनाई से मिलता हो,
फिर भी चाह हमेशा विलासिता के वस्तुओं की ही रहती है।
-प्रीतिमा वत्स
मांय करै कुटौना पिसौना
बेटा के नाम दुर्गादास।
माँ घर-घर जाकर नौकरानी का काम करती है अथवा कठिन परिश्रम करती है और बेटे के नखरे तो कहे नहीं जाते।
नोन् तेलो रोस
भंसिया हाथॉ जस।
नमक तेल की सही मात्रा से ही खाने में स्वाद आता है। और यह स्वाद ही खाना बनाने वाले(भंसिया) को तारीफ दिलाता है। अर्थात उनके हाथों में यश देता है।
घरँ भूँजी भाँग नाय्
डेढ़ी पर नाच।
घर में खाने के लाले पड़े हों और दिखावे का आलम ऐसा कि दरवाजे पर नाच-गाना करवा रहे हैं।
मिलै मियाँ क् माँड़ नाय
खोजै मियाँ ताड़ी।
मनुष्य को सीधा-सादा जीवन गुजारना मुश्किल हो,भोजन भी कठिनाई से मिलता हो,
फिर भी चाह हमेशा विलासिता के वस्तुओं की ही रहती है।
-प्रीतिमा वत्स
Friday, January 30, 2009
चटख रंगों और लय का अद्भुत मेल है छऊ नृत्य

छऊ नृत्य में कंठ-संगीत गौण होता है और वाद्य-संगीत का प्रधानता होती है। चटख रंग के कपड़े पहनना तथा मुखौटा धारण करना इस नृत्य के लिए आवश्यक होता है।
छऊ नृत्य नाटिका पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के पडोसी राज्यों में आज भी अपने पारंपरिक रूप में देखने को मिलती है। इन राज्यों में यह नृत्य वार्षिक सूर्य पूजा के अवसर पर की जाती है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और मिदनापुर जिलों के कुछ क्षेत्रों में इस नृत्य में रामायण की पूरी कथा पर होती है, जबकि अन्य जगहों पर रामायण और महाभारत तथा पुराणों में वर्णित अलग-अलग घटनाओं को आधार बनाकर यह नृत्य किया जाता है।
पश्चिम बंगाल में नृत्य खुले मैदान में किया जाता है। इसके लिए लगभग 20 फुट चौड़ा एक घेरा बना लिया जाता है, जिसके साथ नर्तकों के आने और जाने के लिए कम से कम पांच फुट का एक गलियारा जरूर बनाया जाता है। जिस घेरे में नृत्य होता है, वह गोलाकार होता है। सभी बजनिए अपने-अपने बाजों के साथ एक तरफ बैठ जाते हैं। प्रत्येक दल के साथ उसके अपने पांज या छह बजनिए होते हैं। घेरे में किसी प्रकार की सजावट नहीं की जाती और कोई ऐसी चीज भी नहीं होती जो इस नृत्य के लिए अनिवार्य समझी जाती हो।

दर्शक खुली जमीन पर गोलाकार बैठ जाते हैं, लेकिन महिला दर्शकों के बैठने के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। उनके बैठने के लिए लकड़ी के तख्तों से छह या सात फुट ऊंजा अस्थाई मंच बनाया जाता है। मंच, आदमी के कद से थोड़ा ऊंचा होता है। जगह की कमी हैने पर पुरुष दर्शक उसके नीचे भी खड़े हो जाते हैं। यह नृत्य देर रात से शुरु होकर सुबह तक चलता है।
इस नृत्य के वस्त्रों की कुछ विशेषताएं हैं, जो इस क्षेत्र अथवा बंगाल के किसी अन्य भाग में प्रचलित दूसरे प्रकार के कलात्मक प्रदर्शनों के वस्त्रों में अकसर नहीं पाई जातीं। प्रत्येक मुख्य पात्र अत्यंत साधारण किस्म का रंगीन पायजामा पहनता है। देवता पात्रों और राक्षस पात्रों के पायजामों के रंग अलग-अलग होते हैं । देवताओं के पायजामे गहरे हरे और गहरे पीले रंग के और राक्षसों के गहरे लाल और गहरे काले रंग के होते हैं । इन अलग-अलग रंगों के अलावा कपड़े पर लगभग छह-छह इंच की दूरी पर धारियां भी लगी होती हैं। शिव जैसे कुछ पात्र पायजामे के बदले बाघचर्म के प्रतीक-स्वरूप धोती या लुंगी पहनते हैं। गणेश पायजामे के साथ-साथ बंगाली शौली में एक वस्त्र खंड भी धारण करते हैं। स्त्री पात्र बंगाली शैली में साड़ी या स्त्रियों के वस्त्र पहनते हैं, लेकिन स्त्रियां बहुत कम ही होती हैं। काली का अभिनय अकसर किया जाता है, जो भयंकर दिखने के लिए विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करती है।
देवता और राक्षस नाटकों का अभिनय करने वाले नर्तक अपने ऊपरी अंगों में अलंकृत वस्त्र पहनते हैं। सभी पात्र महीन या साधारण मखमल से बनी एक कशीदाकारी की हुई मिरजई पहनते हैं। सभी पात्रों के लिए या चाहे वे देवता हों या मानव हों या पशु, अपने चेहरे पर उपयुक्त मुखौटा लगाना जरूरी होता है। बंगाल में मुखौटे, पुरुलिया जिले के सिर्फ एक गांव में बनाए जाते हैं जो बागभुंडी क्षेत्र में स्थित है। मुखौटे का निर्माण झरने के तल से प्राप्त मिट्टी, रद्दी कागज के टुकड़े, कपड़े के टुकड़े या चिथड़े आटे से बने गोंद, छोटी छेनी, स्थानीय बाजार से खरीदा गया सजावट के सामानों से किया जाता है।
छऊ नृत्य के संगीत में कंठ-संगीत गौण होता है और वाद्य-संगीत की प्रधानता होती है। लेकिन, नृत्य के प्रत्येक विषय की शुरुआत एक छोटे गीत से की जाती है, जिसे उस विषय का प्रदर्शन करने के क्रम में कभी-कभी दुहराया जाता है, खास-तौर पर तब जब शहनाई या वंशी न बज रही हो। प्रत्येक पात्र का परिचय एक छोटे गीत से दिया जाता है जो अगले विषय के प्रारंभ होने तक चलता रहता है। इसके बाद कोई दूसरा पात्र घेरे में आता है और उसका परिचय देने वाला गीत शुरु हो जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
Friday, January 16, 2009
Wednesday, January 14, 2009
लोक देवी-देवताओं की पूजा

भारतवर्ष के करीब हर राज्य में लोक देवी-देवताओं का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। हर खुशी के अवसर पर जैसे- शादी-ब्याह, जनेउ, मुंडन आदि में सबसे पहले इन देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। बिहार तथा झारखंड में इस अवसर पर जो गीत गाये जाते हैं उन्हें मनान गीत कहते हैं। किसी भी लोक देवी-देवता की पूजा के पहले मनान गीत गाकर उन्हें खुश किया जाता है।
कौन काती कतरव बॉस क् बीट हे कओन काती साजब में कामी
कि ओही रे मंडप घर हे ।
सोने काती कतरव बॉस बीट हे रूपे काती साजब में कामी
कि ओही रे मंडप घर हे।
ओही कामी बिनबो में डाला डूली हे भरबो में ओड़हुल फूल
कि ओही रे मंडप घर हे।
ओही फूल पुजवो में जदवावीर देव हे जिनि मोरा पुराओल आस
कि ओही रे मंडप घर हे।
पुजु पुजु तिरिया सम्पूर्ण भए हे हम तोहर पुरायेव आस
कि ओही रे मंडप घर हे।
अर्थ:
किस तरह से बाँस काटकर मंडप सजाया जायेगा ?
किस प्रकार कुलदेवताओं के पूजन के लिए उचित सामग्री तैयार की जाएगी ?
सोने के हँसुआ से बाँस के टुकड़े काटे जायेंगे और चाँदी के अलंकरण से मंडप का द्वार सजेगा जहाँ कुलदेवताओं की पूजा होगी।
उसी बाँस से पूजन की डलिया तैयार की जायेगी और उसमें जवा कुसुम का फूल भरकर पूजन की सामग्री तैयार की जायेगी।
इसी प्रकार जदवावीर देवता की पूजा होगी जिन्होंने मेरी मनोकामना पूरी की है।
देवता कहते हैं- हे रमणी. पूजन करो। हम तुम्हारी सभी मनोकामनाओं को पूरा करेंगे।
हर इलाके के अलग-अलग कुल देवता होते हैं। बंदी देव, शैलू गोसांई, बंदी, सोखा, गोरेया, जदवावीर, परमेसरी, काली महामाया तथा हनुमानजी आदि कुलदेवताओं के अलग-अलग नाम हैं। जिनके घर में जो देवता हैं, उनका नाम लेकर यह गीत गाया जाता है। किसी-किसी घर में पाँच या उससे भी अधिक कुलदेवता होते हैं।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, January 8, 2009
झारखंड की लोक कथा
झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जाते हैं।
एक गांव में एक समृद्ध व्यक्ति के पास धातु के बने हुए कुछ बर्तन थे। गांव के लोग शादी आदि के अवसरों पर यह बर्तन उससे मांग लिया करते थे। एक बार एक आदमी ने ये बर्तन मांगे। वापस करते समय उसने कुछ छोटे बर्तन बढ़ाकर दिए। समृद्ध व्यक्ति ने पूछा कि बर्तन कैसे बढ़ गए। उसने कहा कि मांगकर ले जाने वाले बर्तन में से कुछ गर्भ से थे। उनके छोटे बच्चे हुए हैं। समृद्ध व्यक्ति व्यक्ति को छोटे बर्तनों का लोभ हो गया। उसने बर्तन देने वाले आदमी को ऐसे देखा जैसे उसे कहानी पर विश्वास हो गया हो और उसने बर्तन रख लिए। कुछ दिन बाद वही व्यक्ति फिर से बर्तन मांगने आया। समृद्ध-व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए बर्तन दे दिए। काफी समय तक बर्तन वापस नहीं आए। बर्तनों के स्वामी ने इसका कारण पूछा। मांगने वाले ने कहा कि वह बर्तन नहीं दे सकता, क्योंकि उनकी मृत्यु हो गई है। परंतु बर्तन कैसे मर सकते हैं समृद्ध व्यक्ति ने पूछा। क्यूं ? उत्तर मिला, यदि बर्तन बच्चे दे सकते हैं तो वे मर भी सकते हैं।
अब उस समृद्ध व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह हाथ मलता ही रह गया।
-प्रीतिमा वत्स
एक गांव में एक समृद्ध व्यक्ति के पास धातु के बने हुए कुछ बर्तन थे। गांव के लोग शादी आदि के अवसरों पर यह बर्तन उससे मांग लिया करते थे। एक बार एक आदमी ने ये बर्तन मांगे। वापस करते समय उसने कुछ छोटे बर्तन बढ़ाकर दिए। समृद्ध व्यक्ति ने पूछा कि बर्तन कैसे बढ़ गए। उसने कहा कि मांगकर ले जाने वाले बर्तन में से कुछ गर्भ से थे। उनके छोटे बच्चे हुए हैं। समृद्ध व्यक्ति व्यक्ति को छोटे बर्तनों का लोभ हो गया। उसने बर्तन देने वाले आदमी को ऐसे देखा जैसे उसे कहानी पर विश्वास हो गया हो और उसने बर्तन रख लिए। कुछ दिन बाद वही व्यक्ति फिर से बर्तन मांगने आया। समृद्ध-व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए बर्तन दे दिए। काफी समय तक बर्तन वापस नहीं आए। बर्तनों के स्वामी ने इसका कारण पूछा। मांगने वाले ने कहा कि वह बर्तन नहीं दे सकता, क्योंकि उनकी मृत्यु हो गई है। परंतु बर्तन कैसे मर सकते हैं समृद्ध व्यक्ति ने पूछा। क्यूं ? उत्तर मिला, यदि बर्तन बच्चे दे सकते हैं तो वे मर भी सकते हैं।
अब उस समृद्ध व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह हाथ मलता ही रह गया।
-प्रीतिमा वत्स
Tuesday, December 30, 2008
आज भी मायके आती हैं टुसु
टुसु का जन्म कब हुआ, कब उसकी शादी हुई, कब ससुराल गई। शायद किसी को भी इसका ठीक-ठीक पता नहीं है लेकिन सदियों से झारखंड,बिहार और बंगाल के कुछ हिस्सों में हर साल एक महीने के लिए टुसु के ससुराल से मायके आने की बात कही जाती है। तथा इसे एक बहुत ही मनोरंजक लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है।
अगहन की समाप्ति के साथ ही घरों में लड़कियाँ अरवा चावल (कच्चे चावल) के आटे और गोबर के गोल-गोल पिण्ड बनाती हैं। तथा घर के एक आले में मिट्टी के बर्तन में इसकी स्थापना कर दी जाती है। ये ही टुसु हैं, इनमें काजल और सिन्दूर लगाया जाता है तथा अनेक तरह से इनकी वन्दना की जाती है। प्रत्येक संध्या को दीप,धूप, अगरबत्ती के द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है तथा लड़कियाँ इसके सामने बैठकर विविध गीत गाती है।
वास्तव में टुसु एक कन्या का नाम है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, उसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। टुसु के गीतों में भी इसका बहुत अच्छा वर्णन मिलता है। विसर्जन से एक दिन पहले विदाई के कारुणिक गीत गाये जाते हैं। ये टुसु के प्रति उनके स्नेह और आदर के द्योतक हैं -
तीस दिनों तक टुसु तुम्हें रखा
तीस दिनों तक तुम्हारी संध्या वंदना की।
अब मैं और कितने दिनों तुम्हें रख पाऊंगी।
इतने दिनों तक टुसु थी, तो घर भरा-भरा था,
आज टुसु चली जायेगी, तो घर सूना-सूना हो जाएगा।
मकर संक्रान्ति के एक पहले-रात्रि जागरण किया जाता है। यह दिन बांउडी के नाम से विख्यात है। रात्रि को आठ प्रकार के अनाज मिट्टी की कड़ाही में डालकर उसे आग पर भूनते हैं। इस भूने हुए अनाज को भूँजा कहा जाता है। यह टुसु को भोग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि टुसु को भूँजा बहुत पसंद है। तथा रातभर गीत गाकर जागकर समय बिताया जाता है। सूर्योदय के पूर्व ही विसर्जन के लिए जाया जाता है। इस पर्व का अंतिम दिन मकर-संक्रांति का दिन होता है। चूंकि यह पर्व पूस में मनाया जाता है इसलिए कई इलाको में इस पर्व को पौष पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
अगहन की समाप्ति के साथ ही घरों में लड़कियाँ अरवा चावल (कच्चे चावल) के आटे और गोबर के गोल-गोल पिण्ड बनाती हैं। तथा घर के एक आले में मिट्टी के बर्तन में इसकी स्थापना कर दी जाती है। ये ही टुसु हैं, इनमें काजल और सिन्दूर लगाया जाता है तथा अनेक तरह से इनकी वन्दना की जाती है। प्रत्येक संध्या को दीप,धूप, अगरबत्ती के द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है तथा लड़कियाँ इसके सामने बैठकर विविध गीत गाती है।
वास्तव में टुसु एक कन्या का नाम है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, उसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। टुसु के गीतों में भी इसका बहुत अच्छा वर्णन मिलता है। विसर्जन से एक दिन पहले विदाई के कारुणिक गीत गाये जाते हैं। ये टुसु के प्रति उनके स्नेह और आदर के द्योतक हैं -
तीस दिनों तक टुसु तुम्हें रखा
तीस दिनों तक तुम्हारी संध्या वंदना की।
अब मैं और कितने दिनों तुम्हें रख पाऊंगी।
इतने दिनों तक टुसु थी, तो घर भरा-भरा था,
आज टुसु चली जायेगी, तो घर सूना-सूना हो जाएगा।
मकर संक्रान्ति के एक पहले-रात्रि जागरण किया जाता है। यह दिन बांउडी के नाम से विख्यात है। रात्रि को आठ प्रकार के अनाज मिट्टी की कड़ाही में डालकर उसे आग पर भूनते हैं। इस भूने हुए अनाज को भूँजा कहा जाता है। यह टुसु को भोग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि टुसु को भूँजा बहुत पसंद है। तथा रातभर गीत गाकर जागकर समय बिताया जाता है। सूर्योदय के पूर्व ही विसर्जन के लिए जाया जाता है। इस पर्व का अंतिम दिन मकर-संक्रांति का दिन होता है। चूंकि यह पर्व पूस में मनाया जाता है इसलिए कई इलाको में इस पर्व को पौष पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
Tuesday, December 23, 2008
उपनयन संस्कार गीत
पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था, सो मैं यहां पर इन गीतों का अनुवाद करने की कोशिश कर रही हूँ-
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......
धरती पर खड़े होकर बालक(जिसका जनेऊ हो रहा है।) जनेऊ माँग रहे है।
इस पृथ्वी के मालिक कौन है जो इन्हें जनेऊ पहनाएंगे।
इस पृथ्वी के मालिक तो सूर्य भगवान हैं,
और वह(सूर्यभगवान) उठकर बोले-
हम हीं इस पृथ्वी के मालिक हैं,इन बालकों को जनेऊ धारण करवाएंगे।
इन्हें सम्पूर्ण ब्राह्मण होने का आशिर्वाद देंगे।
2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।
राजा दशरथ के चारो पुत्र उपनयन मंडप पर विराजमान हैं
वे मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
मुंज की डोरी,मृग की छाला कहां शोभायमान है,
साथ हीं पीले रंग का जनेऊ कहां सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हाथ में मूंज की डोरी, कमर में मृग की छाला।
शरीर पर पीले रंग का जनेऊ, मंडप पर सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं
-प्रीतिमा वत्स
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......
धरती पर खड़े होकर बालक(जिसका जनेऊ हो रहा है।) जनेऊ माँग रहे है।
इस पृथ्वी के मालिक कौन है जो इन्हें जनेऊ पहनाएंगे।
इस पृथ्वी के मालिक तो सूर्य भगवान हैं,
और वह(सूर्यभगवान) उठकर बोले-
हम हीं इस पृथ्वी के मालिक हैं,इन बालकों को जनेऊ धारण करवाएंगे।
इन्हें सम्पूर्ण ब्राह्मण होने का आशिर्वाद देंगे।
2
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।
राजा दशरथ के चारो पुत्र उपनयन मंडप पर विराजमान हैं
वे मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
मुंज की डोरी,मृग की छाला कहां शोभायमान है,
साथ हीं पीले रंग का जनेऊ कहां सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हाथ में मूंज की डोरी, कमर में मृग की छाला।
शरीर पर पीले रंग का जनेऊ, मंडप पर सुशोभित हो रहा है।
राजा दशरथ के चारों पुत्र उपनयन मंडप की शोभा बढ़ा रहे हैं
-प्रीतिमा वत्स
Monday, December 15, 2008
यज्ञोपवीत अथवा उपनयन संस्कार

बालक जब किशोरावस्था में प्रवेश करने लगता है तो उसे जनेऊ के माध्यम से संस्कारित किया जाता है। इसे यज्ञोपवीत तथा उपनयन संस्कार भी कहा जाता है। यह प्रथा ज्यादातर बिहार तथा झारखंड के ब्राह्मण तथा राजपूत जातियों में प्रचलित है। इस मौके पर महिलाएँ लोकगीत भी गाती हैं।
1
पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..........
केयो छेको पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायतो हे.........
पृथ्वी के मालिक हे सूरुज देव छिक, हुनी उठी बोलै हे
हम छिक पृथ्वी के मालिक जनौवा पहिरायब हे..........
पृथ्वी पर खड़ा भेलो जे वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे......
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दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे.....
कहां शोभे मुंज के डोरी, कहां शोभे मृग के छाला
कहां शोभे पियरी जनौवा , मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे........
हाथ शोभे मुंज के डोरी, कमर मृग छाला
देह शोभे पियरी जनौवा, मंडप पर शोभे
दशरथ के चारो ललनवा मण्डप पर शोभे।
-प्रीतिमा वत्स
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