मेरे ससुराल के आंगन में हनुमान जी का एक छोटा सा, अत्यंत प्रिय मंदिर है। इस देवालय के अस्तित्व में आने की कथा बड़ी ही रोचक और कौतुकपूर्ण है।
जब मैं इस घर में वधू बनकर आई थी, तब मेरी पूज्या सासु मां ने इस मंदिर के निर्माण का वृत्तांत सुनाया था। मेरे ससुर जी जमालपुर महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और सासु मां निकट के ग्राम में प्रधानाध्यापिका थीं। घर पर दादी की छत्रछाया में बच्चों का संसार पलता था।
घटना तब की है जब घर के नवनिर्माण का कार्य चल रहा था। देव और उनकी अनुजा ज्योति किरण (जो अब डॉक्टर ज्योति किरण हैं और कानपुर के महाविद्यालय में प्राध्यापिका हैं) उस समय बहुत छोटे थे। विद्यालय से लौटकर दोनों बाल मन बड़ी तन्मयता से राजमिस्त्री को काम करते देखा करते थे। कारीगरों को देख उनके भीतर भी सृजन की अभिलाषा जागी। दोनों भाई-बहन ने परस्पर मंत्रणा की और एक नन्हे निर्माण की नींव पड़ गई।
खेल-खेल में ही दोनों ने थोडा-थोडा सीमेंट, मसाला, ईंट और छड के टुकड़े एकत्र करना प्रारंभ कर दिया। देखते ही देखते उनकी मेहनत से एक तीन मंजिला मंदिर आकार लेने लगा। मां ने यह सब देखा, पर विशेष ध्यान नहीं दिया; उन्हें लगा कि बाल सुलभ क्रीड़ा है, बच्चे स्वयं ही इसे बाद में विसर्जित कर देंगे।
किंतु जब बाबूजी अवकाश में घर आए, तो उन दोनों नन्हे वास्तुकारों का कौशल देखकर वे मुग्ध हो गए। उन्होंने स्वयं मिस्त्री से कहकर उस मंदिर का गुंबद बनवाया और प्रभु की एक सुंदर मूर्ति भी ले आए। घर के समस्त बालकों ने मिलकर उत्साह पूर्वक मूर्ति की स्थापना की। मां और बाबूजी ने स्नेहवश कहा था— "तुम बच्चों ने इसे बनाया है, अतः सेवा और अर्चना का उत्तरदायित्व भी तुम्हारा ही होगा।"
देव और ज्योति के साथ मोहल्ले के अन्य बालक भी बड़े उत्साह से विद्यालय जाने से पूर्व वहां पूजा करते थे। वह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, अपितु बच्चों के उल्लास का भी माध्यम था।
ग्रीष्मकालीन अवकाश हो, दुर्गा पूजा हो या कोई पारिवारिक उत्सव, जब पूरा कुनबा एकत्र होता, तो वहां एक अनुपम दृश्य होता था। मित्तू, डिक्कू, चिंटू, मीनू, बिट्टू, पीयूष, आयुष, वर्षा, पूजा, नन्हें और पड़ोस के रिंकू, पप्पू, रवि, राजेश, मुकेश, राकेश, मिटुश, पिंटू, लालबाबू जैसे अनगिनत बच्चे जुट जाते। इस आयोजन में घर के सहायक पूरन जी के बच्चे फुलेंदर, कविता और मधुसूदन भी अभिन्न अंग होते थे।
सबको एकत्र कर देव एक गोष्ठी करते, जिसमें पूजन की योजना बनती। बच्चे अपनी माताओं से धन मांगकर लाते और देव को सौंपते। यदि धनराशि कम पड़ती, तो दादी से एक बड़ी राशि की वसूली की जाती। बच्चों के प्रिय 'लाल चाचा' (देव) के आदेश का सब निष्ठा से पालन करते। पूजन सामग्री की सूची बनती और प्रचुर मात्रा में मिष्ठान एवं बताशे मंगवाए जाते।
भक्ति और हर्ष के साथ पूजन संपन्न होता। पूजा के पश्चात लाल चाचा का यह निर्देश रहता कि सबको प्रसाद अल्प मात्रा में ही देना है। शेष संपूर्ण प्रसाद देव और उनकी वानर सेना बड़े चाव से मिलकर समाप्त करती थी। यह महोत्सव लगभग सप्ताह भर चलता और घर का प्रत्येक सदस्य इसमें आनंदपूर्वक सम्मिलित होता। मां ने श्रद्धावश इन हनुमान जी का नाम ही 'बाल हनुमान' रख दिया था।
आज भी जब हम छुट्टियों में घर जाते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह मंदिर और उसके समीप खड़ा विशाल मौलिश्री का वृक्ष हमारी प्रतीक्षा में पलकें बिछाए बैठे हैं। वे हमारे संपूर्ण परिवार पर शुभाशीष की वर्षा करते हैं। रामनवमी के अवसर पर वहां अत्यंत प्रेम से पूजन होता है। हमारी अनुपस्थिति में भी पड़ोस के परिजन बड़े स्नेह से मंदिर का श्रृंगार और पूजा करते हैं.
हमारे बाल बजरंग बली की जय हो!

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