किसानों के लिये कुछ समय ऐसा होता है जब कोई उत्पादन नहीं होता है, मतलब खेती के लिये उस समय कोई काम नहीं होता। रोजी रोटी की तलाश में तब वो दूर परदेश जाते हैं। परदेश गये इन पतियों के वियोग को महिलाएं अपने गीतों में व्यक्त करती हैं। पति वियोग में गाये इन गीतों को बिरहा कहा जाता है।
आज भी कभी-कभार सुनने को मिल जाते हैं बिरहा के गीत । लेकिन अब मौका किसी संगीत समारोह का होता है या स्टेज शो। गानेवाले होते हैं कोई सधे हुए कंठ।
रंगमहल में सोचै प्यारी धनिया
बिरहा सतावै दिर-राती बिरहनियां
गौना करये छेला देहरी बैसाये गेल
अपने जे गेल परदेश परदेशिया।।
रंग महल में सोचै प्यारी धनिया..........।
सावन सुहावन लागती
पिया बिनु कुछ नहीं भावती
निस विरह सतावती
बतला दे प्यारे पियू कहाँ।।
सावन सुहावन लागती.........।।
सरीस मास ऋतु फागुन मास
नहीं रे शरद नहीं घाम
किनका संग हम होली खेलब
नहीं रे मोहनी यही ठाम।।
सरीस मास ऋतु फागुन मास..........।।
-प्रीतिमा वत्स
ऐसी दुनिया से साकाश्त्कार करवाती है जो हम जैसे के लिए लगभग खो चुकी है
ReplyDeleteमुझे वाराणसी जिले के निवासी प्रसिद्ध बिरहा गायक नसुड़ी के गाँव का नाम और लोकेशन पता करना है यदि किसी को पता हो तो बताने की कृपा करेँ और यदि किसी के पास स्व0 नसुड़ी के गाये बिरहोँ के आडियो कैसेट सुरक्षित होँ तो बतायेँ मेरा फोन 09559908060 ईमेल ps50236@gmail.com
ReplyDelete'बिरहा' शब्द का अर्थ मैं गुगल पे ढूँढ़ रहा तभी आपकी ये रचना पढने को मिली और मै इस शब्द का अर्थ बेहतर तरिके से समझा। धन्यवाद।
ReplyDeleteभविष्य में भी आपसे जुड़ा रहूँ इसलिए आपके ब्लाॅग को मैंने फाॅलो कर लिया।