Friday, January 6, 2012

प्रकृति और लोक के बीच आदिवासी Tribal, between nature and folk.



सभ्यता की पहली सीढ़ी के रूप में जंगल का महत्व सभ्य समाज में मनुष्य के लिए जहां अब सिर्फ सामान्य ज्ञान का एक प्रश्न बनकर रह गया है, वहीं झारखंड के आदिवासी समाज के लिए वन पर निर्भरता निम्न अनुपात में अब भी चली आ रही है। ये जंगल, ये परंपरागत भूमि उनके लिए पूर्वजों की समाधि, वंश-गोत्र का मूल स्थल तथा उनकी धार्मिक पद्धति के अंतर्गत आवश्यक अन्य पवित्र कृत्यों के रूप में महत्वपूर्ण सांकेतिक तथा भावनात्मक अर्थ रखती है। यही कारण है कि भूमि और रक्त उनके लिए समानार्थी हैं। जैसा कि झारखंड के डमरू क्षेत्र में एक शिक्षक का काम कर रहे सांतल मुर्मू का कहना है- मेरी जमीन मेरी रीढ़ है, मेरा असली पहचान है। मेरे आस-पास फैला हुआ ये जंगल मेरी सांसे हैं, यहां हमारे पशु आराम से चारा खा सकते हैं। हमारे देवी-देवता शान्ति से निवास करते हैं। लेकिन पता नहीं आज कल ये आधुनिकता की कैसी हवा चली है कि हमारे जमीन ही हमसे छूटते जा रहे हैं, हमारे जंगल बिना कारण उजाड़े जा रहे हैं, हमारे भाई-बंधू महानगरों में बंधुआ मजदूरी करने के लिए भाग रहे हैं। आदिवासी का वन के साथ ही सुदीर्घकालीन साहचर्य ने उसे मानसिक स्तर पर बड़ी गहराई से प्रभावित किया है। जीवन के अंतिम लक्ष्य, शान्ति की तलाश में वह जंगल की ही ओर जाता है। आदिवासी समाज के दुश्मन इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं। उन्हें यदि कहीं से भगाना हो, तो उनसे जंगल छीन लीजिए।
आदिवासियों के लिए अगर वन उसकी शांति है, तो कृषि उसकी सांस है। तभी तो जीवन हर लय और संगीत में उनके गीत और स्तुति भी प्रकृति से ही जुड़े होते हैं।
हे स्वर्ग के परमेश्वर
पृथ्वी की धरती माता
दूध से उगनेवाले
दही से डूबने वाले
चारों कोने, दसों दिशाएं
उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम
झिलमिल धरती
झुका हुआ आसमान
चटाई सी बिछी हुई
कटोरे से ढंका हुआ।
गाछ-वृक्ष, पशु-पक्षी
वन-पहाड़,नदी-मैदान
तुम्हारी ही सृष्टि
तुम्हारी ही उत्पत्ति
तुम्हीं से टिका, तुम्हीं से रक्षित है।
आदिवासियों के पूजा-अर्चना, धर्म-संस्कार आदि में भी जंगल और प्रकृति की ही प्रधानता रहती है। ज्यादातर इनके देवी देवता पेड़ों की झुरमुटों,गांव की सरहदों,मवेशियों के रहने की जगह आदि पर निवास करते हैं। इन देवी देवताओं के पूजा-अर्चना का भी अंदाज कम निराला नहीं है।
शिकार की देवी चणडी,
पहाड़ का पहाड़ी देवता
तुम्हारे साथ रहनेवाले,
तुम्हारे साथ विराजनेवाले,
एक पीढ़े में बैठनेवाले,
एक चटाई में विराजनेवाले,
सभी देवताओं की,
सभी देवियों को
हम आमंत्रित करते हैं।
हम न्योता देते हैं।
हमारी पूजा स्वीकार करो।
आदिवासी अपनी कर्मठता, श्रमशीलता, ईमानदारी आदि गुणों के लिए प्रसिद्ध रही है। जिस तरह संताल परगना की छाती पर फैले कठोर ग्रेनाइट पत्थरों वाली हिमालय से भी पुरानी प्रागैतिहासिक राजमहल पर्वतमाला की ऊंचाईयों से मोती झरना का प्रवाहित होना एक सत्य है, उसी तरह यहां के त्रासद-खुरदरे-संघर्षमय-श्रमशक्ति संताल आदिवासियों के जीवन की गहराइयों से लोक-गीतों और लोक संगीत की निर्झरिणी का बहना यहाँ का दूसरा सत्य है। अपूर्व प्राकृतिक सम्पदा के बीच निवास करनेवाले संतालों को गीत-संगीत विरासत में मिले हैं। तभी तो इनके बीच यह कहावत प्रचलित है कि रोड़ाक गी राड़ाक, ताड़ामाक् गी हिलावाक्। अर्थात् हमारी वाणी ही संगीत है और हमारी चाल ही नृत्य है।
ऊंचे पहाड़ की चोटी से
उड़ गया देखो-
सुन्दर पंखों वाले मोर का जोड़ा।
लगता है ऐसा कि
ये मोर पक्षी का जोड़ा नहीं
लहराती साड़ियां हैं
दो युवतियों की।
हमारे इतिहास में जो भी सुन्दर तेजस्वी तत्व हैं वे लोक में कहीं न कहीं सुरक्षित हैं। हमारी कृषि, अर्थशास्त्र, ज्ञान, साहित्य,कला के नाना स्वरूप, भाषाओं और शब्दों के भंडार, जीवन के आनन्दमय पर्वोत्सव, नृत्य-संगीत,कथा-वार्ता में सभी कुछ भारतीय लोक में ओतप्रोत है। लोक की गंगा युग-युग से बह रही हैं। उसमें भूत, भविष्य और वर्तमान सभी कुछ संचित रहते हैं। लोक की धात्री सर्वभूत माता पृथ्वी और लोक का व्यक्त रूप मानव में ही हमारे नवीन जीवन का अध्यात्म-शास्त्र है। इस दृष्टि से यदि इन आदिवासी लोकगीतों की मीमांसा की जाए तो वे बिल्कुल खरे उतरते हैं।
तुम्हारी ही सृष्टि
तुमाहारी ही उत्पत्ति,
वन-पहाड़, नदी-मैदान
पशु-पक्षी, जीन-जन्तु
तमु ही से रक्षित हैं
तुम ही से जीवित हैं।

-प्रीतिमा वत्स

Friday, September 30, 2011

पांच बहिनी मैया ( Devi Maa ka geet)

यह एक अंगिका लोक गीत है। जो नवरात्र के अवसर पर अक्सर ही बिहार तथा झारखंड इलाके में गाया जाता है
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै देवी स् विवाह है कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, है कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
शोणित पिबिये मैया खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार हे कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पाचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
इस गीत में देवी मां के पांच कुवांरी बहन होने की बात कही गई है। महिषासुर वध करके किस प्रकार मां उसका रक्त पीतीं हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं इसकी भी विस्तृत व्याख्या है इस गीत में।
-प्रीतिमा वत्स
फोटोग्राफ नेट से साभार

Thursday, July 14, 2011

अकेली मोहे जान-जान के



चांद मारे ला किरणियां के वाण
अकेली मोहे जान-जान के।।
चांद मारे ला किरणियां के वाण,
अकेली मोहे जान-जान के।।
सावन-भादो के उमड़ल नदिया,
ठेहुना से ऊपर समेट लेल सड़िया
पियवा के ले चल जलपान,
अकेली मोहे जान-जान के,
चांद मारे ला ...............।
अबहि तो हमरी बाली उमरिया,
रहिया में करे छेड़खान,
अकेली मोहे जान-जान के,
बतिया ना माने हाय राम,
अकेली मोहे जान-जान के।
चांद मारे ला किरणिया के वाण,
अकेली मोहे जान-जान के।
अर्थ- चांद की किरणे भी गोरी को अकेली जानकर अपने वाण चलाने से नहीं चूकती हैं। सावन भादो की उमड़ती नदी में घुटने तक साड़ी समेटकर गोरी अपने पिया के लिए जलपान लेकर जा रही है, और चांद की किरणें हैं कि गोरी को अकेली जानकर उससे बार-बार छेड़ रही है। चाहे गोरी कितनी भी सफाई दे ले।

Thursday, April 21, 2011

हर जगह मिलते हैं बलेसर के गीत Baleser's songs are available in everywhere



लोकगीतों का हर देश और क्षेत्र में अपनी लंबी परंपरा होती है। जिन भावों में तनिक भी बनावटीपन नहीं, उन्हीं का प्रकाश हमें इन गीतों में मिलता है। लोकगीतों की परंपरा को जीवित रखने के लिए हमें यूरोप से अभी बहुत कुछ सीखना है। यूरोपीय देशों ने अपने लोकगीतों को नष्ट होने से बचाया है। हमारे यहां यह हमेशा से उपेक्षित रहा है। कलाओं के लिए बनी ढेरों अकादमियों का रवैया भी इससे जुड़े कलाकारों के लिए हतोत्साहन का रहा है। सही अर्थों में जो लोक कलाकार या लोक गायक हैं उनकी अब भी उपेक्षा हो रही है। ऐसे ही एक कलाकार हैं भोजपुरी के लोकगायक बालेश्वर जिन्हें भोजपूरिया लोग बलेसरा कहते हैं।
बिहार के गोपालगंज, सिवान, छपरा होते पटना जाने वाली किसी भी वस में बैठिए आप को बालेश्वर के गीत बजते मिलेंगे। लोग इन बसों में बैठते ही बालेश्वर के गीत बजाने की फरमाइश करते हैं। पूरे भोजपूरी क्षेत्र का यही हाल है। इन क्षेत्रों में बालेश्वर के गानों को सुनने के लिए 20-25 हजार की भीड़ आसानी से जमा हो जाती है। बालेश्वर आजमगढ़ के घोसी के बदनापुरा के रहनेवाले हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश पर्व में भाग लेने बालेश्वर दिल्ली आए थे। तब उनसे यह बातचीत हुई । उसके कुछ अंशः
आपने गाना कब शुरु किया?जवाबः यही कोई छह-सात साल की उम्र में। भैंस चराने के लिए गांव से अपने मित्रों के साथ जाया करता था भैंस पर चढ़कर ही मैं खुले आसमान को निहारते हुए गाया करता था। पूरा गाना तो याद नहीं रहता था इसलिए लोकगीतों के दो-तीन लाइनें ही गुनगुनाता था।
लोक गायक के रूप में आपने कब से गाना शुरु किया?जवाबः 1960 तक तो मैं इधर-उधर भटकता रहा। कोी गाने का मौका नहीं देता था। कबसे पहले मुझे झारखंड राय ने चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं में गाने का मौका दिया। विधायक बनने के बाद लखनऊ सचिवालय में उन्होंने नौकरी भी दिला दी। इसके बाद से ही रेडियो और टीवी पर गाने का मौका मिला है।
आपके गीतों का कोई रिकार्ड भी निकला है?जवाबः सबसे पहले मेरा रिकार्ड 1970 में निकला। उसमें वही हमार बलिया बीचो बलमु भुलाइल सजनी, निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के और भागलपूर के पावर पानी, झारा के कठोर। गोरिया छपरा वाली......, जैसे गीत थे। सच पूछिए तो इस रिकार्ड के आने के बाद जितनी मुझे खुशी हुई इतनी शायद ही कभी हुई हो। इसके बाद कई और रिकार्ड निकले जिसमें कजरवा ए धनिया बड़ा निक लागे, अचरा में टांगे लू रुमाल ए धनि सांवर गोरिया और बड़ा दगाबाज रे बनारस का पंडा मुख्य है।
लोकगीत गाने के पीछे क्या प्रेरणा रही?जवाबः भोजपूरी का प्रचार करना मेरा मुख्य उद्देश्य है। मैं चाहता हूं कि देश के कोने-कोने में लोग भोजपूरी संस्कृति को जाने । डिस्को की दौड़ में भारतीय. लोकसंगीत का प्रचार करना और इसका स्तर ऊंचा उठाना भी मैं चाहता हूं।
आप किस लोक कलाकार से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?जवाबः भिखारी ठाकुर और मुकुंदी भांड़ ने मुझे काफी प्रभावित किया। भिखारी ठाकुर ने भोजपूरी लोक संगीत को काफी आगे बढ़ाया । उन्होंने बिदेशिया की भी धुन दी। समाज की कुरीतियों के खिलाफ अंतिम दम तक समाज से लड़े। आरा, छपरा के मजदूर बड़ी संख्या में असम की चाय बगानों और कलकत्ता की जूट मिलों में काम करने जाते हैं। कम वेतन और मलेरिया से पीड़ित होकर या तो वे पीले होकर लौटते या फिर लौटते ही नहीं थे। इस पर भिखारी ठाकुर ने पुरब पुरब बड़ दिन से सुन तानि। पुरब के पनिया खराब रे बिदेसिया गाया। भिखारी ठाकुर की प्रेरणा से ही मैं भी अपनी ताकत भर कुरीतियों से लड़ने की कोशिश कर रहा हूं। दुख यह है कि संगीत नाटक कला जैसे संस्थानों ने इस महान कलाकार की उपेक्षा की। जहां छोटी-छोटी संस्थाओं को संगीत नाटक अकादेमी हजारों रुपए अनुदान देती है वहीं इस लोक कलाकार के नाम से बनी संस्था को कोई पूछने वाला नहीं है। भोजपूरी लोक संगीत के विकास के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है। उसके विकास के लिए खुद कलाकार को ही भागदौड़ करनी पड़ती रही है।
भोजपूरी में आप क्या-क्या गाते हैं?जवाबः बिरहा, लाचारी , सोहर, सोरठी, कहरवा, झूमर, कजरी, होली, कचरी, चैता........... सभी कुछ गाते हैं।
कहां-कहां कार्यक्रम ज्यादा होते हैं?
जवाब आजमगढ़ का रहने वाला हुं और लखनऊ में काम करता हुं। लेकिन लखनऊ में लोक कलाकारों को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना पटना, धनबाद, बोकारो झरिया और कलकत्ता में मिलता है। वे कहते हैं दुनिया वाले हमके कहले बिहारी मितवा।
आजकल भोजपुरी में कौन-कौन से लोकगायक प्रमुख हैं?जवाबः हीरा लाल यादव चैती के प्रमुख गायक हैं। गुल्लू यादव, रामदेव, बेचन राम तथा बबुनंदन का धोबिया नाच प्रसिद्ध है। इनके अलावा आरा के मुन्ना और बलिया के नथुनी सिंह भी प्रमुख लोकगायक है।
आप गीत खुद लिखते हैं या किसी और से लिखा कर गाते हैं?जवाबः मैं कोई गाना किसी दूसरे का लिखा हुआ नहीं गाता। जो भी गाना गाता हूं उसे काफी चिंतन-मनन के बाद तैयार करता हूं। उसे लिखता नहीं बल्कि धुन में बदल देता हूं। लिखित रूप से कोई भी गाना मेरे पास सुरक्षित नहीं है जो है वह सब रिकार्ड में ही है।
क्या भारत महोत्सव के लिए आपको आमंत्रित किया गया था?जवाबः भारत महोत्सव के लिए मुझे किसी ने भी आमंत्रित नहीं किया उ सब बड़ लोग के बात है बाबू हमनी के के पूछि। भोजपुरी के किसी भी लोक कलाकार को उसमें नहीं बुलाया गया सुनते हैं कोई पुपुल जयकर हैं, बनारस रही भी हैं। लेकिन पता नहीं कैसे भोजपुरी को इन लोगों ने भुला दिया। भोजपूरी कलाकारों को ऐसी जगहों पर ले जाए बिना भारतीय संसंकृति की संपूर्ण झांकी दिखाने का दावा झूठा ही होगा।
कुछ दिन पहले अफवाह उड़ी थी कि आपकी हत्या कर दी गई?जवाबः हां ऐसी कोशिश कुछ लोगों ने की थी। वे मेरी लोकप्रियता से नाखुश थे। मेरे गाने के कार्यक्रमों में 15-20 हजार की बीड़ से ये लोग काफी परेशान थे। एक कार्यक्रम के दौरान इन भाड़े के लोगों ने मारपीट करना शुरू कर दी। भगदड़ मच गई। कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। इसके बाद इन लोगों ने ही प्रचार शुरू किया कि मेरी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों के बाद जब मैंने फिर से कार्यक्रम देना शुरू किया तब जाकर लोगों को बात समझ में आई।
जनसत्ता के एक बहुत पुराने अंक (30-7-86) में छपा यह वार्ता मुझे मेरी छोटी सी लाईब्रेरी से मिली है। यह आलेख लोकगायक बालेश्वर से सुभाषचंद्र पांडे जी की बातचीत का अंश है।
प्रस्तुति-प्रीतिमा वत्स

Friday, January 28, 2011

भक्ति गायन की एक परंपरा भगताय BHAGTAYE, tradition of worship song

कभी उनका भी जमाना था। गांव के हर उत्सव, गमी-खुशी में इनकी तूती बोलती थी। जिस समारोह में इनका जत्था न पहुंचा हो, वह समारोह फीका-फीका सा लगता था। लेकिन अब उनकी जिंदगी फीकी-फीकी लगती है।
भगतिया, यानी भगताय या भक्ति के गीत गाने वाले। इसे नारदी-भजन भी कहा जाता है। कभी गांव में विवाह उत्सव , जन्मोत्सव , नामकरण संस्कार या कि श्राद्घ कर्म भगतियों के बिना पूरा नहीं होता था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर याद रखी जाने वाली गायन की यह परंपरा बिहार और झारखंड के सीमा पर के कुछ गांवों में अपने मौलिक और प्राथमिक रूप में मौजूद है। पाश्चात्य संगीत के ताने-बाने का इस परंपरा पर कोई असर नहीं पड़ सका है, तो इसके पीछे लोक की वही उष्मा और संस्कार है, जहां कैसे गाएं या कि कैसे बजाएं कि जगह ‘ऐसे गाएं और ऐसे बजाएं’ की प्रथा है।
झारखंड के गोड्ïडा जिले के एक भगतिया कंचन मंडल नारद जी को संसार का पहला भगतिया मानते है - ‘लोकगायन की इस शैली की शुरूआत नारद जी ने प्रभु की स्तुति से की थी। :-
केशव कल्प कथारंभ-मामनु केषम।
दीनमनुनाथम-कुरुभवसागर पारम्ï॥
भगताय में गाये जाने वाले मैथिली, हिन्दी, ब्रजभाषा, अवधि मिश्रित भक्ति गीत सरल और निश्छल मिलते हैं। इनका कोई स्पष्ट व्याकरण नहीं है। वस्तुत: भगतियों का संगीत शास्त्रीय और लोकसंगीत के बीच की कड़ी है। यह जनसमूह का संगीत है ,जो संस्कार के सैलाब में सराबोर किसी भी व्यक्ति के कंठ से अनायास ही फूट पड़ती है। इसकी सरलता लोगों के अंतर्मन को गहरे छूती है। इनकी गायकी मुख्य रूप से कृष्ण की लीलाओं के गिर्द घूमती है।
पेशे से शिक्षक कंचन मंडल अपने दल के मूलगैन हैं। उनसे इस परंपरा पर कुछ विस्तार से बात होती है तो वे बताते हैं- ‘भगतियों द्वारा गाये जाने वाले पद उनके अपने होते हैं परन्तु ये मुख्य रूप से पीलू, काफी विलावल, भैरवी, भूप, भूपाली और सारंग आदि रागों पर आधारित लगते हैं। उसी तरह भगतिया संगीत का स्वरूप भी बिल्कुल उनका अपना होते हुए शास्त्रीय तालों- कहरवा, रूपक और झपताल के निकट माना जाता है।’
भगतियों के समूह को ‘दल’ कहा जाता है। दल का प्रधान ‘मूलगैन’ कहलाता है। भगतियों के दल का प्रमुख वाद्य यंत्र मृदंग होता है और प्राय: कोई मृदंगिया ही दल का मूलगैन होता। मूलगैन का मुख्य शार्गिद एक नर्तक होता है, जिसे ‘नटुआ’ कहते हैं। गायन पद की शुरुआत करने वाला ‘अगुआ’ कहलाता है और उसके पीछे गाने वाले ‘पक्षक’ कहलाते हैं। साधारणत: इनके गायन के दो रूप हैं। प्रथम अंग में ये बिलंबित स्वर में गाते है अर्थात अगुआ पहले गाता है और पक्षक उसी का अनुकरण करते है। दूसरे अंग द्रुत है। जहां गायन की गति किसी बेगवान घोड़े की तरह हो जाती है। स्वरों का यह गतिशील करिश्मा कुछ मिनटों तक ही चलता है और फिर इसकी समाप्ति एक झटके के साथ हो जाती है। गायन और वादन के बीच सामंजस्य बनाकर नटुआ कभी राधा , कभी मीरा ,कभी जोगन, कभी दही बेचने वाली आदि के रूप बनाकर नाचता रहता है।
मनोरंजक संसाधनों की बहुतायत तथा व्यक्ति के बदलते पसंद के चलते हाल के वर्षों में भले ही इस गायकी का स्वर कुछ फीका पड़ गया लगता है, लेकिन भगताय गाने वाले हर हाल में रहेंगे, क्योंकि गायन की यह परंपरा एक विश्वास पर टिकी है।
-प्रीतिमा वत्स

Thursday, January 27, 2011

अंगिका लोकगीतों में शिवभक्ति Shovbhagti in Angika lokgeet.


भोलाबाबा साजल हे बारात
औघड़दानी साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
बसहा बईल केर पालकी बनावल
भूत-प्रेत संग साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
जब बरियात दुआरी बिच पहुंचल
सखी सब देखनक हे जाई,
दस पांच सखी मिली आरती उतार गेली
नाग छोड़ल फुफ हे कार,
के भोला बाबा साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
मड़वा तोड़ब-लगहर फोड़ब
मेटी देब चारो मुख के दीप,
भोला बाबा साजल हे बारात
खिड़की के ओटे-ओटे गउरी विनती करै
सुनु शिव हमरो रे बचन।
तनि एक हे शिव भेष बदल करूँ।
देखत, नारीयर के लोग।
भोलाबाब साजल रे बारात
मड़वा जोड़ब, लगहर बइसाइब,
नेसी देब चारो मुख के दीप।
भोला बाब साजल रे बारात,
घर स बहार भेली मातु सुनयना
दुलहा देख गेली मातु सुनयना
देखी क नयना रे जुड़ाय
के भोला बाब साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
...............................
अर्थ- अंगिका के इस गीत में भोलेबाबा के बाराती गमन की बात की गई है। बसहा बैल की पालकी पर शिव भस्म भभूति लगाकर बैठे हैं। बारातियों के रूप में भूत-प्रेत सब आगे-पीछे नाचते चले जा रहे है। जैसे ही बाराती दरवाजे पर लगती है, सखियां आरती उतारने के लिए सज संवर कर आती हैं। लेकिन नाग की फुंफकार सुनकर और शिव का ऐसा भयानक रूप देखकर दौड़कर भाग जाती है। शिव जी की योजना है कि जैसे ही मंडप पर पहुंचुंगा, पूरे मंडप को तहस-नहस कर सबको डरा दूंगा और चारमुख वाला दीप भी बुझा दूंगा। लेकिन पार्वती मां की विनती को सुनकर शिव अपना रूप बदल कर आते हैं और देखते हैं कि वहां तो मृत्युलोक के प्राणी सजे-संवरे शादी के उत्सव में घूम रहे हैं। यह देखकर शिव अपना इरादा बदल देते हैं और शांत मुद्रा में आ जाते हैं। मंडप को क्षत-विक्षत करने का विचार छोड़ देते हैं। चारमुख वाला दीपक जगमगा उठता है।
घर से जब माता सुनयना बाहर आती हैं तो अपने दामाद के शांत और सौम्य रूप के देखकर भावविभोर हो जाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स

बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति

संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...