Tuesday, June 14, 2011
Thursday, April 21, 2011
हर जगह मिलते हैं बलेसर के गीत Baleser's songs are available in everywhere

लोकगीतों का हर देश और क्षेत्र में अपनी लंबी परंपरा होती है। जिन भावों में तनिक भी बनावटीपन नहीं, उन्हीं का प्रकाश हमें इन गीतों में मिलता है। लोकगीतों की परंपरा को जीवित रखने के लिए हमें यूरोप से अभी बहुत कुछ सीखना है। यूरोपीय देशों ने अपने लोकगीतों को नष्ट होने से बचाया है। हमारे यहां यह हमेशा से उपेक्षित रहा है। कलाओं के लिए बनी ढेरों अकादमियों का रवैया भी इससे जुड़े कलाकारों के लिए हतोत्साहन का रहा है। सही अर्थों में जो लोक कलाकार या लोक गायक हैं उनकी अब भी उपेक्षा हो रही है। ऐसे ही एक कलाकार हैं भोजपुरी के लोकगायक बालेश्वर जिन्हें भोजपूरिया लोग बलेसरा कहते हैं।
बिहार के गोपालगंज, सिवान, छपरा होते पटना जाने वाली किसी भी वस में बैठिए आप को बालेश्वर के गीत बजते मिलेंगे। लोग इन बसों में बैठते ही बालेश्वर के गीत बजाने की फरमाइश करते हैं। पूरे भोजपूरी क्षेत्र का यही हाल है। इन क्षेत्रों में बालेश्वर के गानों को सुनने के लिए 20-25 हजार की भीड़ आसानी से जमा हो जाती है। बालेश्वर आजमगढ़ के घोसी के बदनापुरा के रहनेवाले हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश पर्व में भाग लेने बालेश्वर दिल्ली आए थे। तब उनसे यह बातचीत हुई । उसके कुछ अंशः
आपने गाना कब शुरु किया?जवाबः यही कोई छह-सात साल की उम्र में। भैंस चराने के लिए गांव से अपने मित्रों के साथ जाया करता था भैंस पर चढ़कर ही मैं खुले आसमान को निहारते हुए गाया करता था। पूरा गाना तो याद नहीं रहता था इसलिए लोकगीतों के दो-तीन लाइनें ही गुनगुनाता था।
लोक गायक के रूप में आपने कब से गाना शुरु किया?जवाबः 1960 तक तो मैं इधर-उधर भटकता रहा। कोी गाने का मौका नहीं देता था। कबसे पहले मुझे झारखंड राय ने चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं में गाने का मौका दिया। विधायक बनने के बाद लखनऊ सचिवालय में उन्होंने नौकरी भी दिला दी। इसके बाद से ही रेडियो और टीवी पर गाने का मौका मिला है।
आपके गीतों का कोई रिकार्ड भी निकला है?जवाबः सबसे पहले मेरा रिकार्ड 1970 में निकला। उसमें वही हमार बलिया बीचो बलमु भुलाइल सजनी, निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के और भागलपूर के पावर पानी, झारा के कठोर। गोरिया छपरा वाली......, जैसे गीत थे। सच पूछिए तो इस रिकार्ड के आने के बाद जितनी मुझे खुशी हुई इतनी शायद ही कभी हुई हो। इसके बाद कई और रिकार्ड निकले जिसमें कजरवा ए धनिया बड़ा निक लागे, अचरा में टांगे लू रुमाल ए धनि सांवर गोरिया और बड़ा दगाबाज रे बनारस का पंडा मुख्य है।
लोकगीत गाने के पीछे क्या प्रेरणा रही?जवाबः भोजपूरी का प्रचार करना मेरा मुख्य उद्देश्य है। मैं चाहता हूं कि देश के कोने-कोने में लोग भोजपूरी संस्कृति को जाने । डिस्को की दौड़ में भारतीय. लोकसंगीत का प्रचार करना और इसका स्तर ऊंचा उठाना भी मैं चाहता हूं।
आप किस लोक कलाकार से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?जवाबः भिखारी ठाकुर और मुकुंदी भांड़ ने मुझे काफी प्रभावित किया। भिखारी ठाकुर ने भोजपूरी लोक संगीत को काफी आगे बढ़ाया । उन्होंने बिदेशिया की भी धुन दी। समाज की कुरीतियों के खिलाफ अंतिम दम तक समाज से लड़े। आरा, छपरा के मजदूर बड़ी संख्या में असम की चाय बगानों और कलकत्ता की जूट मिलों में काम करने जाते हैं। कम वेतन और मलेरिया से पीड़ित होकर या तो वे पीले होकर लौटते या फिर लौटते ही नहीं थे। इस पर भिखारी ठाकुर ने पुरब पुरब बड़ दिन से सुन तानि। पुरब के पनिया खराब रे बिदेसिया गाया। भिखारी ठाकुर की प्रेरणा से ही मैं भी अपनी ताकत भर कुरीतियों से लड़ने की कोशिश कर रहा हूं। दुख यह है कि संगीत नाटक कला जैसे संस्थानों ने इस महान कलाकार की उपेक्षा की। जहां छोटी-छोटी संस्थाओं को संगीत नाटक अकादेमी हजारों रुपए अनुदान देती है वहीं इस लोक कलाकार के नाम से बनी संस्था को कोई पूछने वाला नहीं है। भोजपूरी लोक संगीत के विकास के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है। उसके विकास के लिए खुद कलाकार को ही भागदौड़ करनी पड़ती रही है।
भोजपूरी में आप क्या-क्या गाते हैं?जवाबः बिरहा, लाचारी , सोहर, सोरठी, कहरवा, झूमर, कजरी, होली, कचरी, चैता........... सभी कुछ गाते हैं।
कहां-कहां कार्यक्रम ज्यादा होते हैं?
जवाब आजमगढ़ का रहने वाला हुं और लखनऊ में काम करता हुं। लेकिन लखनऊ में लोक कलाकारों को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना पटना, धनबाद, बोकारो झरिया और कलकत्ता में मिलता है। वे कहते हैं दुनिया वाले हमके कहले बिहारी मितवा।
आजकल भोजपुरी में कौन-कौन से लोकगायक प्रमुख हैं?जवाबः हीरा लाल यादव चैती के प्रमुख गायक हैं। गुल्लू यादव, रामदेव, बेचन राम तथा बबुनंदन का धोबिया नाच प्रसिद्ध है। इनके अलावा आरा के मुन्ना और बलिया के नथुनी सिंह भी प्रमुख लोकगायक है।
आप गीत खुद लिखते हैं या किसी और से लिखा कर गाते हैं?जवाबः मैं कोई गाना किसी दूसरे का लिखा हुआ नहीं गाता। जो भी गाना गाता हूं उसे काफी चिंतन-मनन के बाद तैयार करता हूं। उसे लिखता नहीं बल्कि धुन में बदल देता हूं। लिखित रूप से कोई भी गाना मेरे पास सुरक्षित नहीं है जो है वह सब रिकार्ड में ही है।
क्या भारत महोत्सव के लिए आपको आमंत्रित किया गया था?जवाबः भारत महोत्सव के लिए मुझे किसी ने भी आमंत्रित नहीं किया उ सब बड़ लोग के बात है बाबू हमनी के के पूछि। भोजपुरी के किसी भी लोक कलाकार को उसमें नहीं बुलाया गया सुनते हैं कोई पुपुल जयकर हैं, बनारस रही भी हैं। लेकिन पता नहीं कैसे भोजपुरी को इन लोगों ने भुला दिया। भोजपूरी कलाकारों को ऐसी जगहों पर ले जाए बिना भारतीय संसंकृति की संपूर्ण झांकी दिखाने का दावा झूठा ही होगा।
कुछ दिन पहले अफवाह उड़ी थी कि आपकी हत्या कर दी गई?जवाबः हां ऐसी कोशिश कुछ लोगों ने की थी। वे मेरी लोकप्रियता से नाखुश थे। मेरे गाने के कार्यक्रमों में 15-20 हजार की बीड़ से ये लोग काफी परेशान थे। एक कार्यक्रम के दौरान इन भाड़े के लोगों ने मारपीट करना शुरू कर दी। भगदड़ मच गई। कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। इसके बाद इन लोगों ने ही प्रचार शुरू किया कि मेरी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों के बाद जब मैंने फिर से कार्यक्रम देना शुरू किया तब जाकर लोगों को बात समझ में आई।
जनसत्ता के एक बहुत पुराने अंक (30-7-86) में छपा यह वार्ता मुझे मेरी छोटी सी लाईब्रेरी से मिली है। यह आलेख लोकगायक बालेश्वर से सुभाषचंद्र पांडे जी की बातचीत का अंश है।
प्रस्तुति-प्रीतिमा वत्स
बिहार के गोपालगंज, सिवान, छपरा होते पटना जाने वाली किसी भी वस में बैठिए आप को बालेश्वर के गीत बजते मिलेंगे। लोग इन बसों में बैठते ही बालेश्वर के गीत बजाने की फरमाइश करते हैं। पूरे भोजपूरी क्षेत्र का यही हाल है। इन क्षेत्रों में बालेश्वर के गानों को सुनने के लिए 20-25 हजार की भीड़ आसानी से जमा हो जाती है। बालेश्वर आजमगढ़ के घोसी के बदनापुरा के रहनेवाले हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश पर्व में भाग लेने बालेश्वर दिल्ली आए थे। तब उनसे यह बातचीत हुई । उसके कुछ अंशः
आपने गाना कब शुरु किया?जवाबः यही कोई छह-सात साल की उम्र में। भैंस चराने के लिए गांव से अपने मित्रों के साथ जाया करता था भैंस पर चढ़कर ही मैं खुले आसमान को निहारते हुए गाया करता था। पूरा गाना तो याद नहीं रहता था इसलिए लोकगीतों के दो-तीन लाइनें ही गुनगुनाता था।
लोक गायक के रूप में आपने कब से गाना शुरु किया?जवाबः 1960 तक तो मैं इधर-उधर भटकता रहा। कोी गाने का मौका नहीं देता था। कबसे पहले मुझे झारखंड राय ने चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं में गाने का मौका दिया। विधायक बनने के बाद लखनऊ सचिवालय में उन्होंने नौकरी भी दिला दी। इसके बाद से ही रेडियो और टीवी पर गाने का मौका मिला है।
आपके गीतों का कोई रिकार्ड भी निकला है?जवाबः सबसे पहले मेरा रिकार्ड 1970 में निकला। उसमें वही हमार बलिया बीचो बलमु भुलाइल सजनी, निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के और भागलपूर के पावर पानी, झारा के कठोर। गोरिया छपरा वाली......, जैसे गीत थे। सच पूछिए तो इस रिकार्ड के आने के बाद जितनी मुझे खुशी हुई इतनी शायद ही कभी हुई हो। इसके बाद कई और रिकार्ड निकले जिसमें कजरवा ए धनिया बड़ा निक लागे, अचरा में टांगे लू रुमाल ए धनि सांवर गोरिया और बड़ा दगाबाज रे बनारस का पंडा मुख्य है।
लोकगीत गाने के पीछे क्या प्रेरणा रही?जवाबः भोजपूरी का प्रचार करना मेरा मुख्य उद्देश्य है। मैं चाहता हूं कि देश के कोने-कोने में लोग भोजपूरी संस्कृति को जाने । डिस्को की दौड़ में भारतीय. लोकसंगीत का प्रचार करना और इसका स्तर ऊंचा उठाना भी मैं चाहता हूं।
आप किस लोक कलाकार से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?जवाबः भिखारी ठाकुर और मुकुंदी भांड़ ने मुझे काफी प्रभावित किया। भिखारी ठाकुर ने भोजपूरी लोक संगीत को काफी आगे बढ़ाया । उन्होंने बिदेशिया की भी धुन दी। समाज की कुरीतियों के खिलाफ अंतिम दम तक समाज से लड़े। आरा, छपरा के मजदूर बड़ी संख्या में असम की चाय बगानों और कलकत्ता की जूट मिलों में काम करने जाते हैं। कम वेतन और मलेरिया से पीड़ित होकर या तो वे पीले होकर लौटते या फिर लौटते ही नहीं थे। इस पर भिखारी ठाकुर ने पुरब पुरब बड़ दिन से सुन तानि। पुरब के पनिया खराब रे बिदेसिया गाया। भिखारी ठाकुर की प्रेरणा से ही मैं भी अपनी ताकत भर कुरीतियों से लड़ने की कोशिश कर रहा हूं। दुख यह है कि संगीत नाटक कला जैसे संस्थानों ने इस महान कलाकार की उपेक्षा की। जहां छोटी-छोटी संस्थाओं को संगीत नाटक अकादेमी हजारों रुपए अनुदान देती है वहीं इस लोक कलाकार के नाम से बनी संस्था को कोई पूछने वाला नहीं है। भोजपूरी लोक संगीत के विकास के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है। उसके विकास के लिए खुद कलाकार को ही भागदौड़ करनी पड़ती रही है।
भोजपूरी में आप क्या-क्या गाते हैं?जवाबः बिरहा, लाचारी , सोहर, सोरठी, कहरवा, झूमर, कजरी, होली, कचरी, चैता........... सभी कुछ गाते हैं।
कहां-कहां कार्यक्रम ज्यादा होते हैं?
जवाब आजमगढ़ का रहने वाला हुं और लखनऊ में काम करता हुं। लेकिन लखनऊ में लोक कलाकारों को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना पटना, धनबाद, बोकारो झरिया और कलकत्ता में मिलता है। वे कहते हैं दुनिया वाले हमके कहले बिहारी मितवा।
आजकल भोजपुरी में कौन-कौन से लोकगायक प्रमुख हैं?जवाबः हीरा लाल यादव चैती के प्रमुख गायक हैं। गुल्लू यादव, रामदेव, बेचन राम तथा बबुनंदन का धोबिया नाच प्रसिद्ध है। इनके अलावा आरा के मुन्ना और बलिया के नथुनी सिंह भी प्रमुख लोकगायक है।
आप गीत खुद लिखते हैं या किसी और से लिखा कर गाते हैं?जवाबः मैं कोई गाना किसी दूसरे का लिखा हुआ नहीं गाता। जो भी गाना गाता हूं उसे काफी चिंतन-मनन के बाद तैयार करता हूं। उसे लिखता नहीं बल्कि धुन में बदल देता हूं। लिखित रूप से कोई भी गाना मेरे पास सुरक्षित नहीं है जो है वह सब रिकार्ड में ही है।
क्या भारत महोत्सव के लिए आपको आमंत्रित किया गया था?जवाबः भारत महोत्सव के लिए मुझे किसी ने भी आमंत्रित नहीं किया उ सब बड़ लोग के बात है बाबू हमनी के के पूछि। भोजपुरी के किसी भी लोक कलाकार को उसमें नहीं बुलाया गया सुनते हैं कोई पुपुल जयकर हैं, बनारस रही भी हैं। लेकिन पता नहीं कैसे भोजपुरी को इन लोगों ने भुला दिया। भोजपूरी कलाकारों को ऐसी जगहों पर ले जाए बिना भारतीय संसंकृति की संपूर्ण झांकी दिखाने का दावा झूठा ही होगा।
कुछ दिन पहले अफवाह उड़ी थी कि आपकी हत्या कर दी गई?जवाबः हां ऐसी कोशिश कुछ लोगों ने की थी। वे मेरी लोकप्रियता से नाखुश थे। मेरे गाने के कार्यक्रमों में 15-20 हजार की बीड़ से ये लोग काफी परेशान थे। एक कार्यक्रम के दौरान इन भाड़े के लोगों ने मारपीट करना शुरू कर दी। भगदड़ मच गई। कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। इसके बाद इन लोगों ने ही प्रचार शुरू किया कि मेरी हत्या कर दी गई। कुछ दिनों के बाद जब मैंने फिर से कार्यक्रम देना शुरू किया तब जाकर लोगों को बात समझ में आई।
जनसत्ता के एक बहुत पुराने अंक (30-7-86) में छपा यह वार्ता मुझे मेरी छोटी सी लाईब्रेरी से मिली है। यह आलेख लोकगायक बालेश्वर से सुभाषचंद्र पांडे जी की बातचीत का अंश है।
प्रस्तुति-प्रीतिमा वत्स
Friday, January 28, 2011
भक्ति गायन की एक परंपरा भगताय BHAGTAYE, tradition of worship song
कभी उनका भी जमाना था। गांव के हर उत्सव, गमी-खुशी में इनकी तूती बोलती थी। जिस समारोह में इनका जत्था न पहुंचा हो, वह समारोह फीका-फीका सा लगता था। लेकिन अब उनकी जिंदगी फीकी-फीकी लगती है।भगतिया, यानी भगताय या भक्ति के गीत गाने वाले। इसे नारदी-भजन भी कहा जाता है। कभी गांव में विवाह उत्सव , जन्मोत्सव , नामकरण संस्कार या कि श्राद्घ कर्म भगतियों के बिना पूरा नहीं होता था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर याद रखी जाने वाली गायन की यह परंपरा बिहार और झारखंड के सीमा पर के कुछ गांवों में अपने मौलिक और प्राथमिक रूप में मौजूद है। पाश्चात्य संगीत के ताने-बाने का इस परंपरा पर कोई असर नहीं पड़ सका है, तो इसके पीछे लोक की वही उष्मा और संस्कार है, जहां कैसे गाएं या कि कैसे बजाएं कि जगह ‘ऐसे गाएं और ऐसे बजाएं’ की प्रथा है।
झारखंड के गोड्ïडा जिले के एक भगतिया कंचन मंडल नारद जी को संसार का पहला भगतिया मानते है - ‘लोकगायन की इस शैली की शुरूआत नारद जी ने प्रभु की स्तुति से की थी। :-
केशव कल्प कथारंभ-मामनु केषम।
दीनमनुनाथम-कुरुभवसागर पारम्ï॥
भगताय में गाये जाने वाले मैथिली, हिन्दी, ब्रजभाषा, अवधि मिश्रित भक्ति गीत सरल और निश्छल मिलते हैं। इनका कोई स्पष्ट व्याकरण नहीं है। वस्तुत: भगतियों का संगीत शास्त्रीय और लोकसंगीत के बीच की कड़ी है। यह जनसमूह का संगीत है ,जो संस्कार के सैलाब में सराबोर किसी भी व्यक्ति के कंठ से अनायास ही फूट पड़ती है। इसकी सरलता लोगों के अंतर्मन को गहरे छूती है। इनकी गायकी मुख्य रूप से कृष्ण की लीलाओं के गिर्द घूमती है।
पेशे से शिक्षक कंचन मंडल अपने दल के मूलगैन हैं। उनसे इस परंपरा पर कुछ विस्तार से बात होती है तो वे बताते हैं- ‘भगतियों द्वारा गाये जाने वाले पद उनके अपने होते हैं परन्तु ये मुख्य रूप से पीलू, काफी विलावल, भैरवी, भूप, भूपाली और सारंग आदि रागों पर आधारित लगते हैं। उसी तरह भगतिया संगीत का स्वरूप भी बिल्कुल उनका अपना होते हुए शास्त्रीय तालों- कहरवा, रूपक और झपताल के निकट माना जाता है।’
भगतियों के समूह को ‘दल’ कहा जाता है। दल का प्रधान ‘मूलगैन’ कहलाता है। भगतियों के दल का प्रमुख वाद्य यंत्र मृदंग होता है और प्राय: कोई मृदंगिया ही दल का मूलगैन होता। मूलगैन का मुख्य शार्गिद एक नर्तक होता है, जिसे ‘नटुआ’ कहते हैं। गायन पद की शुरुआत करने वाला ‘अगुआ’ कहलाता है और उसके पीछे गाने वाले ‘पक्षक’ कहलाते हैं। साधारणत: इनके गायन के दो रूप हैं। प्रथम अंग में ये बिलंबित स्वर में गाते है अर्थात अगुआ पहले गाता है और पक्षक उसी का अनुकरण करते है। दूसरे अंग द्रुत है। जहां गायन की गति किसी बेगवान घोड़े की तरह हो जाती है। स्वरों का यह गतिशील करिश्मा कुछ मिनटों तक ही चलता है और फिर इसकी समाप्ति एक झटके के साथ हो जाती है। गायन और वादन के बीच सामंजस्य बनाकर नटुआ कभी राधा , कभी मीरा ,कभी जोगन, कभी दही बेचने वाली आदि के रूप बनाकर नाचता रहता है।
मनोरंजक संसाधनों की बहुतायत तथा व्यक्ति के बदलते पसंद के चलते हाल के वर्षों में भले ही इस गायकी का स्वर कुछ फीका पड़ गया लगता है, लेकिन भगताय गाने वाले हर हाल में रहेंगे, क्योंकि गायन की यह परंपरा एक विश्वास पर टिकी है।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, January 27, 2011
अंगिका लोकगीतों में शिवभक्ति Shovbhagti in Angika lokgeet.

भोलाबाबा साजल हे बारात
औघड़दानी साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
बसहा बईल केर पालकी बनावल
भूत-प्रेत संग साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
जब बरियात दुआरी बिच पहुंचल
सखी सब देखनक हे जाई,
दस पांच सखी मिली आरती उतार गेली
नाग छोड़ल फुफ हे कार,
के भोला बाबा साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
मड़वा तोड़ब-लगहर फोड़ब
मेटी देब चारो मुख के दीप,
भोला बाबा साजल हे बारात
खिड़की के ओटे-ओटे गउरी विनती करै
सुनु शिव हमरो रे बचन।
तनि एक हे शिव भेष बदल करूँ।
देखत, नारीयर के लोग।
भोलाबाब साजल रे बारात
मड़वा जोड़ब, लगहर बइसाइब,
नेसी देब चारो मुख के दीप।
भोला बाब साजल रे बारात,
घर स बहार भेली मातु सुनयना
दुलहा देख गेली मातु सुनयना
देखी क नयना रे जुड़ाय
के भोला बाब साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।...............................
अर्थ- अंगिका के इस गीत में भोलेबाबा के बाराती गमन की बात की गई है। बसहा बैल की पालकी पर शिव भस्म भभूति लगाकर बैठे हैं। बारातियों के रूप में भूत-प्रेत सब आगे-पीछे नाचते चले जा रहे है। जैसे ही बाराती दरवाजे पर लगती है, सखियां आरती उतारने के लिए सज संवर कर आती हैं। लेकिन नाग की फुंफकार सुनकर और शिव का ऐसा भयानक रूप देखकर दौड़कर भाग जाती है। शिव जी की योजना है कि जैसे ही मंडप पर पहुंचुंगा, पूरे मंडप को तहस-नहस कर सबको डरा दूंगा और चारमुख वाला दीप भी बुझा दूंगा। लेकिन पार्वती मां की विनती को सुनकर शिव अपना रूप बदल कर आते हैं और देखते हैं कि वहां तो मृत्युलोक के प्राणी सजे-संवरे शादी के उत्सव में घूम रहे हैं। यह देखकर शिव अपना इरादा बदल देते हैं और शांत मुद्रा में आ जाते हैं। मंडप को क्षत-विक्षत करने का विचार छोड़ देते हैं। चारमुख वाला दीपक जगमगा उठता है।
घर से जब माता सुनयना बाहर आती हैं तो अपने दामाद के शांत और सौम्य रूप के देखकर भावविभोर हो जाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स
औघड़दानी साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
बसहा बईल केर पालकी बनावल
भूत-प्रेत संग साजल रे बारात
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
जब बरियात दुआरी बिच पहुंचल
सखी सब देखनक हे जाई,
दस पांच सखी मिली आरती उतार गेली
नाग छोड़ल फुफ हे कार,
के भोला बाबा साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।
मड़वा तोड़ब-लगहर फोड़ब
मेटी देब चारो मुख के दीप,
भोला बाबा साजल हे बारात
खिड़की के ओटे-ओटे गउरी विनती करै
सुनु शिव हमरो रे बचन।
तनि एक हे शिव भेष बदल करूँ।
देखत, नारीयर के लोग।
भोलाबाब साजल रे बारात
मड़वा जोड़ब, लगहर बइसाइब,
नेसी देब चारो मुख के दीप।
भोला बाब साजल रे बारात,
घर स बहार भेली मातु सुनयना
दुलहा देख गेली मातु सुनयना
देखी क नयना रे जुड़ाय
के भोला बाब साजल रे बारात,
के हर-हर बम-बम साजल रे बारात।...............................
अर्थ- अंगिका के इस गीत में भोलेबाबा के बाराती गमन की बात की गई है। बसहा बैल की पालकी पर शिव भस्म भभूति लगाकर बैठे हैं। बारातियों के रूप में भूत-प्रेत सब आगे-पीछे नाचते चले जा रहे है। जैसे ही बाराती दरवाजे पर लगती है, सखियां आरती उतारने के लिए सज संवर कर आती हैं। लेकिन नाग की फुंफकार सुनकर और शिव का ऐसा भयानक रूप देखकर दौड़कर भाग जाती है। शिव जी की योजना है कि जैसे ही मंडप पर पहुंचुंगा, पूरे मंडप को तहस-नहस कर सबको डरा दूंगा और चारमुख वाला दीप भी बुझा दूंगा। लेकिन पार्वती मां की विनती को सुनकर शिव अपना रूप बदल कर आते हैं और देखते हैं कि वहां तो मृत्युलोक के प्राणी सजे-संवरे शादी के उत्सव में घूम रहे हैं। यह देखकर शिव अपना इरादा बदल देते हैं और शांत मुद्रा में आ जाते हैं। मंडप को क्षत-विक्षत करने का विचार छोड़ देते हैं। चारमुख वाला दीपक जगमगा उठता है।
घर से जब माता सुनयना बाहर आती हैं तो अपने दामाद के शांत और सौम्य रूप के देखकर भावविभोर हो जाती हैं।
-प्रीतिमा वत्स
Thursday, December 23, 2010
अंगिका के देवी गीत
अंग जनपद (वर्तमान भागलपूर) की भाषा अंगिका लोक भजन और लोक गीतों से बहुत ही समृद्ध भाषा है। इन लोक गीतों में देवी के विभिन्न रूपों और श्रृंगारों की चर्चा होती रही है।
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी, हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै,हे कमल कर वीणा।
आजू करबै देवी स विवाह, हे कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खल-खल हांसै, हे कमल कर वीणा।
आजू करबै असुर संहार, हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन, हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल, हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन, हे कमल कर वीणा।
जोगिनी धावै चारो ओर, हे कमल कर वीणा।
शोणित पीबिये मैया खल-खल हांसे, हे कमल कर वीणा।
शोणित पीबिये मैया जिहवा निकालै, हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार, हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार, हे कमल कर वीणा।
अर्थ- इस देवी गीत में मां भगवती के पांच बहन होने की बात कही गई है। जो पांचो ही कुमारी देवियां हैं जो इस जगत में आदि शक्ति के नाम से पूजी जाती हैं। देवी के सुन्दर और सौम्य रूप को देखकर महिषासुर नामक दानव उनपर आशक्त हो जाता है। वह अपने वाहन महिष(भैसा) पर चढ़कर दौड़ता हुआ आ रहा है। वह यह कहता है कि आज मैं देवी से विवाह जरूर करूंगा। इधर देवी सिह पर सवार हो महिषासुर की नादानी पर खूब हंसती हैं। उन्हें पता है कि उसे उसकी मौत इस तरफ खींचकर ला रही है।मां एक हाथ में खड्ग और दूसरे हाथ में खप्पड़ लेकर तैयार हैं। खप्पड़ से भर-भरकर असुरों का रक्त वह पीती जा रही हैं। योगिनीयां उनके चारोओर नृत्य कर रही हैं। रक्त पीने के बाद वह अपनी जीभ निकालकर हंसती हैं, और कहती हैं कि आज मैं असुरों का संहार और अपने भक्तों का उद्धार कर दूंगी।
-प्रीतिमा वत्स
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी, हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै,हे कमल कर वीणा।
आजू करबै देवी स विवाह, हे कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खल-खल हांसै, हे कमल कर वीणा।
आजू करबै असुर संहार, हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन, हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल, हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन, हे कमल कर वीणा।
जोगिनी धावै चारो ओर, हे कमल कर वीणा।
शोणित पीबिये मैया खल-खल हांसे, हे कमल कर वीणा।
शोणित पीबिये मैया जिहवा निकालै, हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार, हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार, हे कमल कर वीणा।
अर्थ- इस देवी गीत में मां भगवती के पांच बहन होने की बात कही गई है। जो पांचो ही कुमारी देवियां हैं जो इस जगत में आदि शक्ति के नाम से पूजी जाती हैं। देवी के सुन्दर और सौम्य रूप को देखकर महिषासुर नामक दानव उनपर आशक्त हो जाता है। वह अपने वाहन महिष(भैसा) पर चढ़कर दौड़ता हुआ आ रहा है। वह यह कहता है कि आज मैं देवी से विवाह जरूर करूंगा। इधर देवी सिह पर सवार हो महिषासुर की नादानी पर खूब हंसती हैं। उन्हें पता है कि उसे उसकी मौत इस तरफ खींचकर ला रही है।मां एक हाथ में खड्ग और दूसरे हाथ में खप्पड़ लेकर तैयार हैं। खप्पड़ से भर-भरकर असुरों का रक्त वह पीती जा रही हैं। योगिनीयां उनके चारोओर नृत्य कर रही हैं। रक्त पीने के बाद वह अपनी जीभ निकालकर हंसती हैं, और कहती हैं कि आज मैं असुरों का संहार और अपने भक्तों का उद्धार कर दूंगी।
-प्रीतिमा वत्स
Tuesday, October 5, 2010
आज भी पूजा जाता है कुँआ
कुंए से जितना पानी खींचा जाता है उसकी पानी की झिरें उतनी ही अधिक फूटती जाती हैं तथा उसका जलस्तर बढ़ता जाता है। साथ हीं कुंए का पानी पीने के लिए नदी,तालाब, बावड़ी आदि के पानी से अधिक स्वच्छ, शीतल व स्वास्थ्यप्रद होता है। कुंआ तालाब, बावड़ी आदि से बहुत ही कम लागत और छोटी जगह में बनाया जा सकता है। शायद इसलिए छोटा जलाशय होते हुए भी कुंआ पूजनीय है।हर प्रथा के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व होता है। जल समस्त प्राणी जगत के लिए अत्यंत आवश्यक है इसके बिना जीबन की क्लपना भी नहीं की जा सकती है। शायद इसलिए कुंआ पूजन की प्रथा भी सदियों से चली आ रही है। शादी हो,मुंडन हो, उपनयन संस्कार हो या जन्म उत्सव । हर जगह पूजा जाता है कुंआ। आधुनिकता की दौड़ में भले ही पीछे छूटते जा रहे हैं हमारे पुराने जीवनोपयोगी साधन। परन्तु परम्पराएं यूं ही शून्य से नहीं उपजी थीं। उसके पीछे तमाम प्रमाण और अच्छाईयां भी छिपी होती थी।
जन्म उत्सव के समय कुंआ पूजन का महत्व कुछ ज्यादा हीं बताया जाता है। प्रसव के बाद प्रसूता को पवित्र करने के लिए कुंआ पूजन कराया जाता है। बिहार तथा झारखण्ड के कुछ इलाकों में यह प्रसव के 12वें दिन कराया जाता है। कहीं 21वें दिन तो कुछ समाज में यह 40वें दिन भी कराया जाता है। बुंदेलखण्ड में यह प्रथा बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है। यह रिवाज तीन चरणों में पूरा होता है। पहले नहान में नीम की पत्तियों के साथ उबले हुए पानी से मां तथा शिशु दोनों के नहलाया जाता है। तब वह अपने सौर घर से आंगन तथा अन्य कमरों में कदम रख सकती है। दूसरे चरण में वह सूर्य भगवान के दर्शन करती है तथा रसोई घर की पूजा कर रसोई का कार्य संभालती है। तीसरी और अंतिम पूजा कुंआ की होती है। इसमें जच्चा हल्दी, चावल रोली आदि से कुंए का पाट पूजती हैं, तथा अपने अन्दर भी कुंए जैसी तमाम विशेषताओं की कामना करती हैं। इसके बाद दो गागर पानी भरकर अपने सिर पर रखकर वापस घर तक आती हैं। जिसके बाद वह पूरी तरह से स्वस्थ और पवित्र मानी जाती हैं। तथा घर के हर कामों में हाथ बंटा सकती हैं।
इन रीति रिवाजों के पीछे भी बड़ा ही मनोवैज्ञानिक कारण होता है। यदि रीति रिवाजों के बन्धन में बांधकर जच्चा-बच्चा को किसी कमरे में न रख दिया जाए ते वह संयुक्त परिवार के भरे-पूरे माहौल में एक दिन भी आराम नहीं कर पाएगी।
शायद इसीलिए यह प्रथा सदियों से चली आ रही है और करीब-करीब पूरे भारत में आदर के साथ इसका पालन भी किया जाता है।
-प्रीतिमा वत्स
(फोटोग्राफ- नेट से साभार)
Friday, August 27, 2010
बुंदेली लोकगीतों में कुंआ पूजन

1.
ऊपर बादर घर्रायें हो,
नीचे गोरी धन पनिया खों निकरी।
जाय जो कइओ उन राजा ससुर सों,
अंगना में कुइया खुदाय हो,
तुमारी बहू पनिया खों निकरीं।
जाय जो कइऔ उन राजा जेठा सों,
अंगना में पाटें जराय हो,
तुमारी बहू पनिया खों निकरी।
जाय जो कइऔ उन वारे देउर सों,
रेशम लेजें भूराय हों
तुमारी बहू पनिया खों निकरी।
अरे ओ जाय जो कइऔ उन राजा ननदोउ सों,
मुतिखन कुड़ारी गढ़ाये हों,
तुमारी सारज पनिया खों निकरीं।
जाय जो कहियो उन राजा पिया सों,
सोने के घड़ा बनवायें हों,
तुमारी धनी पनिया खों निकरीं।
अर्थ- इस गीत में गोरी पानी भरने के लिए कुंए पर जा रही है, आसमान में बादल गरज रहे हैं। वह अपने परिवार के सभी लोगों से विनती करती है कि क्यूं न घर में हीं कुंआ खुदवा दिया जाए जिससे कि वह आराम से पानी भर सके। ससुर जी से कहती है वह कुंआ खुदवा दें, जेठ से कहती है कि वह आंगन में पाट लगवा दें। देवर से कहती है कि वह रेशम की डोरी ला दे।ननदोई से कहती है कि मोती की कुड़री गढ़ा दें। पति से कहती है कि वह मेरे लि सोने की कलश बनवा दें ।
2.
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
कौन की बेटी कौन की बहुरिया
कौन की नारि कहाई तीं।
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
जनक की बेटी दसरथ की बहुरिया
राम की नारि कहाई तीं।
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
अर्थ- जल भरने के लिए जानकी जी आई थीं। वे सवके मन को बहुत भा गईं थी। वह किनकी बेटी किनकी बहू व किनकी पत्नी थीं। वे राजा जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधु और श्रीराम की पत्नी थीं।
-प्रीतिमा वत्स
ऊपर बादर घर्रायें हो,
नीचे गोरी धन पनिया खों निकरी।
जाय जो कइओ उन राजा ससुर सों,
अंगना में कुइया खुदाय हो,
तुमारी बहू पनिया खों निकरीं।
जाय जो कइऔ उन राजा जेठा सों,
अंगना में पाटें जराय हो,
तुमारी बहू पनिया खों निकरी।
जाय जो कइऔ उन वारे देउर सों,
रेशम लेजें भूराय हों
तुमारी बहू पनिया खों निकरी।
अरे ओ जाय जो कइऔ उन राजा ननदोउ सों,
मुतिखन कुड़ारी गढ़ाये हों,
तुमारी सारज पनिया खों निकरीं।
जाय जो कहियो उन राजा पिया सों,
सोने के घड़ा बनवायें हों,
तुमारी धनी पनिया खों निकरीं।
अर्थ- इस गीत में गोरी पानी भरने के लिए कुंए पर जा रही है, आसमान में बादल गरज रहे हैं। वह अपने परिवार के सभी लोगों से विनती करती है कि क्यूं न घर में हीं कुंआ खुदवा दिया जाए जिससे कि वह आराम से पानी भर सके। ससुर जी से कहती है वह कुंआ खुदवा दें, जेठ से कहती है कि वह आंगन में पाट लगवा दें। देवर से कहती है कि वह रेशम की डोरी ला दे।ननदोई से कहती है कि मोती की कुड़री गढ़ा दें। पति से कहती है कि वह मेरे लि सोने की कलश बनवा दें ।
2.
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
कौन की बेटी कौन की बहुरिया
कौन की नारि कहाई तीं।
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
जनक की बेटी दसरथ की बहुरिया
राम की नारि कहाई तीं।
जल भरन जानकी आई तीं,
आई तीं मन भाई तीं।
अर्थ- जल भरने के लिए जानकी जी आई थीं। वे सवके मन को बहुत भा गईं थी। वह किनकी बेटी किनकी बहू व किनकी पत्नी थीं। वे राजा जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधु और श्रीराम की पत्नी थीं।
-प्रीतिमा वत्स
(फोटोग्राप्स मैंने नेट से लिया है)
Subscribe to:
Posts (Atom)
बनसत्तो माई : साग, जंगल और लोक की एक पुरानी स्मृति
संथाल परगना का लोक केवल संतालों का लोक नहीं है। यहां जितने जंगल हैं , उतनी ही बोलियां हैं। जितनी नदियां हैं , उतनी ही स्मृतियां। संतालों के ...
-
पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था,...
-
उचित समय पर वर नहीं मिल रहा हो, तो लड़की का विवाह फूलों के गुच्छे को वर के स्थान पर रखकर कर दिया जाता है। गुजरात तथा झारखंड के कुछ हिस्सों म...
-
झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जात...




