Saturday, December 19, 2009

धर्म और आस्था का प्रतीक गौरी नृत्य

राजस्थान के आदिवासियों की विभिन्न आंचलिक लोक नृत्यों की श्रृंखला में गौरी नृत्य का विशेष स्थान है। इस नृत्य में मनोरंजन के साथ-साथ धार्मिक परंपरा का विशेष रूप से समावेश किया गया है। अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए किया जानेवाला यह नृत्य राजस्थान और गुजरात में बसे भीलों में काफी प्रचलित हैं। वैसे भीलों के साथ-साथ गिरासिया और गमेटी जनजाति के लोगों में भी यह नृत्य बहुत लोकप्रिय है।
गौरी नृत्य वास्तव में लोक नृत्य-नाटिका है। जिसमें 15-20 से लेकर 30-40 पात्रों का समूह अपना किरदार अदा करता है। गौरी नृत्य की पृष्ठभूमि और कथानक किसी न किसी रूप में लोक कथाओं और घटनाओं पर आधारित होती है। इस नृत्य में औरतें भाग नहीं लेतीं। पुरुष ही स्त्रियों की भूमिका निभाते हैं। ग्रामवासियों का समूह ढोल, मजीरा,डमरू, कांसे की थाली जैसे साजों की धुनों पर थिरकता हुआ जैसे ही गांव में प्रवेश करता है तो समूह का जोरदार स्वागत किया जाता है। धूप-अगरबत्ती से मां गौरी की अर्चना की जाती है तथा इसके साथ ही नृत्य की शुरुआत होती है।
आदिवासी समाज में आज भी यह मान्यता है कि यदि कुल देवी नाराज हो जाएं तो समाज को घोर संकट का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि आज भी ये इस सम्भावित विपदा से छुटकारा पाने के लिए गांव के लोगों से चन्दा इकट्ठा करते हैं तथा गौरी पूजा के लिए भक्तों को आमंत्रित करते हैं। इन भक्तों को स्थानिय भाषा में भोपा भी कहते हैं। गौरी नृत्य सावन और भादो मास के प्रथम पक्ष में ही आयोजित किया जाता है। आयोजन तक लोग खेती-बाड़ी के काम से मुक्त हो जाते हैं। खुशहाल खेतों को देखकर आदिवासियों का मन प्रफुल्लित हो उठता है और वे पूरे उत्साह से नृत्य में शामिल होते हैं। यह नृत्य सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किए जाते हैं सवसे पहले गौरी के निशान की स्थापना होती है। उस स्थान में त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया जाता है। मां की स्तुति गायन के साथ समूह का एक वृद्ध भक्त अन्य कलाकारों के साथ वृत्ताकार परिधि में उनके विपरीत दिशा में घूमता हुआ नृत्य करता है। इसे बुढिया के नाम से पुकारा जाता है। इन सभी कलाकारों में यह वृद्ध कलाकार मुखौटा लगाकर घुंघरु बांधकर सब लोगों से अलग दिखता है। लोग नृत्य करते हुए झूमने लगते हैं। यहां के लोगों का विश्वास है कि नृत्य के दौरान देवी किसी एक भोपे के शरीर में प्रविष्ट होती है। उसका शरीर कांपने लगता है तथा थोड़ी देर के लिए उसकी शक्ल बड़ी अजीब सी हो जाती है। अर्धमूर्छित अवस्था में भोपा झूमने लगता है और मुँह से तरह-तरह की आवाजें निकालता है। इसके बाद बुढ़िया जिसे मुख्य भावधारी भी कहते हैं, उस गांव की समस्याओं के बारे में बात करता है। उसके निवारण का उपाय सुझाता है। कुछ देर बाद यह नृत्य अपना धार्मिक और पौराणिक जामा त्यागकर मनोंरंजन का रूप ले लेता है। हंसी और उल्लास से सारा वातावरण तरो-ताजा हो जाता है। तरह-तरह के मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गौरी नृत्य के ही दौरान अनेक नाटिकाओं का मंचन किया जाता है। नृत्य में पात्रों को मूलतः चार भागों में बांटते हैं। कुछ देव पात्र तो कुछ मानव पात्र होते हैं। ये सब पात्र अपनी भूमिकाएं बड़ी मेहनत से निभाते हैं। नृत्य के पश्चात समाज के वृद्ध गण कलाकारों को कुछ पुरस्कार भी देते हैं।
और इस तरह हँसी खुशी के माहौल में नृत्य उत्सव का समापन होता है।
-प्रीतिमा वत्स

5 comments:

  1. ये नृत्य इस मामले में भी महत्वपूर्ण हैं कि इन में गाँव की समस्याओं पर बात की जाती है। इस से लोगों को महत्वपूर्ण लोगों की अकर्मण्यता को चीन्हने और सार्वजनिक करने का अवसर मिलता है। उन का मजाक भी उड़ाया जा सकता है। माता और भैरव संम्वाद के बहाने बहुत कुछ कहा जा सकता है। लोककलाकार और नाटक के लोग चाहें तो इस फार्म का उपयोग जन समस्याओं को सार्वजनिक करने के लिए कर सकते हैं।

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  2. मातृसत्तात्मक अतीत के स्मृति शेष हैं, ये परम्पराएं।
    सामूहिक जीवन की अभिव्यक्तियों की थाति।

    शुक्रिया।

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  3. lok rang ko logon tak pauchane ka acha pryaas

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  4. Reaily Goood but I like little a bit.

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