Sunday, September 13, 2009

कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल

दशहरा के आते ही झूम उठता है हमारा गांव। देवी मां के मंडप पर तरह-तरह के लोक गीत गाए जाते हैं, वह सारे गीत मुझे इतने अच्छे लगते हैं कि मन ही नहीं होता कि वहां से उठकर कहीं इधर-उधर जाया जाए। वैसे तो झारखंड के गांवों में भी देवी के फिल्मी गातों को बजाने की शुरुआत काफी पहले से हो चुकी है। पर मुझे लगता है मेरे ससुराल (मोतिया,झारखंड) का वह एक ऐसा मंडप है जहां मुहल्ले भर के पुरुष और महिलाएं इकट्ठे होकर खुद हीं दुर्गा मां की पूजा करते हैं और गीत-भजन वगैरह गाते हैं। आज भी वहां केले के पेड़ से मां की आकृति बनाई जाती है और तांत्रिक विधि से मां की पूजा होती है।

1.
कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल
कौनी दिन परिचार,
हे देवी कौनी दिन परिचार हे।
पड़िबा दिन देवी जनम तोहार भेल,
दुतिया लेल परिचार
हे देवी, दुतिया लेल परिचार हे।
तिरतिया दिन देवी तीनों लोक तारल,
चौठी चरण पखार हे देवी चौठी चरण पखार हे।
पंचमी खष्टी देवी नाग नचावली,
सप्तमी करल उद्धार हे देवी सप्तमी करल उद्धार हे।
अष्टमी दिन देवी आठो भुजा धरलिनी,
नौमी नाक श्रृंगार हे देवी, नौमी नाक श्रृंगार हे।
दशमी दिन देवी दसो भुजा धरलिनी,
आरो यल बिदाई हे देवी आरो लियल विदाई हे।
आपहु हंसे देवी लोगों को हंसाए, हंसे जगत-संसार हे देवी, हंसे जगत-संसार हे।

इस गीत में मां के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। लोक में नवरात्रों के नौ दिन में मां के अलग अलग रूप होते हैं। जन्म से लेकर दसो भुजा धारण करने की पूरी व्याख्या है इस गीत में।
2
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
महिषा चढ़ल असुरा गरजल आवै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै देवी स् विवाह है कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पांचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, है कमल कर वीणा।
सिंह चढ़ली देवी खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
एक हीं हाथ मैया खड्ग लियलिन हे कमल कर वीणा।
हे दोसर हाथ मुंडमाल हे कमल कर वीणा।
भरी-भरी खप्पड़ मैया शोणित पियथिन हे कमल कर वीणा।
आजु करबै असुर संहार हे कमल कर वीणा।
शोणित पिबिये मैया खलखल हांसै हे कमल कर वीणा।
आजु करबै भगता के उद्धार हे कमल कर वीणा।
पांच बहिनी मैया पाचो कुमारी हे कमल कर वीणा।
पांचो ही आदि भवानी, हे कमल कर वीणा।
इस गीत में देवी मां के पांच कुवांरी बहन होने की बात कही गई है। महिषासुर वध करके किस प्रकार मां उसका रक्त पीतीं हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं इसकी भी व्याख्या है इस प्यारे से गीत में।

-प्रीतिमा वत्स

3 comments:

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  2. बहुत ही उम्दा कविता। इस लाजवाब कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई..........

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  3. इस पारंपरिक देवी गीत को पढ़कर मन हर्षित हुआ ।

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