Thursday, July 16, 2009

अंबुवासी का मेला


कामाख्या मंदिर के अंबुवासी मेले के बारे में संडे नईदुनिया के मैग्जीन में पढ़ा तो अपने बचपन के बीते दिन की याद ताजा हो गई। नीलाचल पर्वत की वो सुन्दरता मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। रंग बिरंगे जंगली फूलों से भरा वह पहाड़ और पहाड़ों के बीच चक्कर खाती हुई घूम-घूमकर उपर चढती बस। गहरे हरे रंग का वह सरोवर जो मानों ऐसा लगता था जैसे पत्थर के बड़े से कटोरे में हरे रंग का पानी रखा हो। गर्भगृह का वह मोटा-मोटा पत्थर का खंभा, जिसमें बड़ी मुश्किल से एक-एक आदमी पार होते हैं। मंदिर के अंदर का माहौल ऐसा था मानों सभी माता की भक्ति में लीन हो जाना चाहते हों। मन्नत पूरा होने पर लोग वहाँ तरह-तरह की घंटियाँ भी चढ़ावे में चढ़ाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि साल में एक बार माँ कामाख्या रजस्वला होती है। इसी तिथि को वहाँ के लोग अंबुवासी के मेले के रूप में मनाते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीया चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनी नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाखया महापीठ को सर्वश्रेष्ठ और जाग्रत माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में मां की योनी की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।


एक मान्यता यह भी है कि रतिपति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं भस्म हुए थे। कामदेव ने अपना पूर्वरूप भी यहीं प्राप्त किया इसलिए इस क्षेत्र का नाम कामरूप पड़ा। इस बात का उल्लेख कल्कि पुराण में है। इस संदर्भ में कुमारसंभवम् का यह श्लोक वर्णित हैः

पिनाकिना भग्नमनोरथाः सती,
निनिन्द रूपं हृदयेन् पार्वती,
प्रियेषु सौभाग्यफलाहि चारुता।।

अर्थः- अपनी नजरो के सामने शिव के कोप से भस्म होते कामदेव को देखकर पार्वती जी ने अपने रूप की हृदय से निन्दा की।
क्योंकि सुन्दरता वही सार्थक होती है, जो अपने पति को आकर्षित कर सकती हो।

साधु और तांत्रिक मंदिर के आसपास की वीरान जगहों और कंदराओं में साधना में लीन रहते हैं। उस दौरान चार दिनों के लिए मंदिर का पट बंद रहता है और चार दिन बाद पट खुलने पर पूजा-अर्चना के बाद ही श्रद्धालु लौटते हैं।
हिन्दु समाज में रजोवृति के जौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान शुभ कार्य नहीं होता है इसलिए इन चार दिनों के दौरान असम में भी कोई शुभ कार्य नहीं होता है। विधवाएं, साधुसंत आदि अग्नि को नहीं छूते हैं और आग में पका भोजन नहीं करते हैं। पट खुलने के बाद श्रद्धालु मां पर चढ़ाए गए लाल कपड़े के टुकड़े का अंश मात्र भी मिल से अपने आप को धन्य मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये कपड़े का टुकड़ा मिल जाने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।
वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है और साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह पहाड़ ब्रह्मपुत्र नही से बिल्कुल सटा है। सामने ब्रह्मपुत्र के बीच में स्थित छोटी सी पहाड़ी पर शिव का उमानंद मंदिर है। यह माना जाता है कि वहां विराजमान शिव ही कामाख्या माता के भैरव हैं, इसलिए कामाख्या आने वाले भक्त उमानंद मंदिर भी जरूर जाते हैं। पूरा मंदिर बड़े-बड़े पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। भूकंप प्रभावित क्षेत्र होने के कारण मंदिर का गर्भगृह बाहरी सतह से करीव दस फुट नीच चला गया है, जहां तक जाने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं।
कामाख्या मंदिर में लगने वाला यह मेला वहाँ की कृषि से भी जुड़ा हुआ है। माता के ऋतुवती होने के बाद ही वहां के लोग कृषिकार्य का प्रारंभ करते हैं।

-प्रीतिमा वत्स

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