Sunday, December 2, 2007

लोक धर्म ही है लोक का चेहरा

आधुनिक परिवेश में यदि हम मोटे तौर पर एक नजर डालें तो ऐसा लगता है कि आज का युग विज्ञान का युग हो गया है। और इस वैज्ञानिक युग में हर चीज को प्रमाण की कसौटी पर खरा उतरना पडता है। लेकिन यदि हम आम जनजीवन में झांके तो पता चलता है कि बदलते माहौल में लोक नहीं बदला है। यह अपनी मजबूत जड़ों के साथ जुडा हुआ है। यह बात अलग है कि परिस्थिति और माहौल के अनुसार कुछ लोक देवी-देवताओं की छवि मद्धिम पड़ जाती है तो कई नए लोक देवी-देवता सामने आ जाते हैं। 33 हजार करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता लोक की हीं है। अब एक साथ इतने सारे देवी देवताओं का समान रूप से माना जाना तो संभव नहीं है। इसलिए इन देवी-देवताओं की महत्ता समय और परिस्थिति के अनुसार कम और ज्यादा होती रहती है।
-प्रीतिमा वत्स

1 comment:

  1. iske aur vistaar mein jaeingi toh achachca hoga..........
    ye popular culture ka mamla hai......

    ReplyDelete

कितने अपने थे वे आँगन

इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हु...