Sunday, June 30, 2019

जट-जटिन लोकनाट्यः प्यार का मोहक अंदाज


बिहार की समृद्ध संस्कृति के पीछे जो इतिहास है उसमें लोक गीतों और लोक गाथाओं का बहुत हीं महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कभी सामा-चकेबा के गीत, कभी करमा देव की पूजा तो कभी ग्राम्य देवी के विभिन्न रूपों की पूजा लोक जीवन का हिस्सा है। गीत-नृत्य के इसी फेहरिस्त में जट-जटिन का लोक नृत्य भी है जो कि वहाँ के आँचलिक हिस्सों में काफी प्रचलित है। किंवदन्ती है कि जट-जटिन लोकनाट्य का श्री गणेश बिहार के समस्तीपुर जिले के शाहपुर पटोरी नामक गाँव से हुआ है। चौदहवीं सदी में हरियाणा के जाट समुदाय के कुछ लोग यहाँ आकर बस गए थे। जोर-जोर से गाना और नाचना उनके स्वाभाव में था। वे लोग जो गीत गाते थे उसे यहाँ के मूल निवासी जाट-जाटिन  के गीत कहते थे और उनकी नकल भी उतारते थे। धीरे-धीरे यह बिहार के समाज में घुलता चला गया। इसी का अपभ्रंश है जट-जटिन लोकनाट्य।लेकिन अब यह लोकनाट्य पूर्ण रूप से बिहार के रंग में रंग चुका है। इसमें दो पक्ष के बीच गीतों द्वारा संवादों का आदान-प्रदान होता है। एक पक्ष जट की तरफ से बोलता है और दूसरा पक्ष जटिन की तरफ से। दोनों तरफ महिलाएँ हीं होती हैं और अपने मधुर संवाद से ऐसा समां बाँधती हैं कि सुनने और देखने वाले आज की आधुनिकता के दौर में भी जहाँ मनोरंजन के साधनों की भरमार है, उन तमाम संसाधनों को नकार कर खिंचे चले आते हैं। इस लघु प्रहसन में पुरूषों का कोई दखल नहीं होता है। जो पक्ष जट की तरफ से होते हैं वे अपने माथे पर मोटा सा साफा या पगड़ी और तन पर बंडी पहन लेती हैं। जटिन के पक्षवाले फूलों से अपने आप को सुसज्जित करती हैं। शेष महिलाएँ जरूरत के हिसाब से अपने आप को सजा लेती हैं और जट-जटिन के परिवार वाले बन जाते हैं। दोनों दल आमने सामने खड़े होकर गीतों के माध्यम से उत्तर-प्रतिउत्तर देते हैं तथा नृत्य और अभिनय करते हैं। ये महिलाएँ खुद हीं कलाकार भी होती हैं और दर्शक भी। स्वाभाविक तौर पर इन्हें किसी मंच की आवश्यकता भी नहीं होती है। हाल के कुछ दिनों में इसका मंच पर भी प्रदर्शन होने लगा है लेकिन लोक की उष्मा वहाँ भी बनी हुई है।

जट-जटिन की कथा वस्तु अत्यंत लघु होती है। यह अक्सर पति-पत्नी के बीच का संवाद होता है, या प्रेमी और प्रेमिका के ब्याह और प्यार की बातें होती हैं तो कभी जटिन के फरमाईशों को जट कैसे पूरा करता है उस प्रसंग पर गीत और मान-मनौवल का दौर चलता है। कभी-कभी बेटी के मायके बुलाए जाने, उसके भाई के आगमन और सावन-भादो की बढ़ती नदी में यात्रा के जोखिमों का सजीव वर्णन होता है।
वस्तुतः यह एक ऐसा आँचलिक लोक नाट्य है जिसे बिना किसी विशेष तैयारी के स्त्री समाज सामुदायिक उत्सव के रूप में मनाता है। इसमें दामपत्य जीवन का वह मार्मिक पक्ष उभरता है जो न पौराणिक कथाओं में वर्णित है और न परम्परागत प्रेमाख्यानों में।
जट-जटिन के प्रेम और उसके परिणय सुत्र में बंध जाने और उसके बाद के जीवन को लेकर एक लोक गाथा इस प्रकार से है-
हम तो लाया आजन-बाजन और तुम करो बियाह।
साँवर गेरूली होय जयतई जट के बियाह।।
लेकिन जटिन पक्ष कहती है कि -
नै लेबै आजन-बाजन नै करबै बियाह।
साँवर गेरूली मोर गउरी रहि जइतई कुमारी।।
अत्यधिक मान-मनौवल के साथ दोनों का पाणि-ग्रहण हो जाता है।  जटिन- जट के घर आ जाती है। रास्ते भर दोनों पक्ष के लोग उनके स्वागत के गीत गाते रहते हैं। जट अपने घर आने पर जटिन को अपने परिवार के साथ नम्रता के साथ पेश आने की सलाह देता है।
लबिक.. चलिहे गे जटिन, लबिक.. चलिहे गे।
जैसे काँच करचिया, वैसे लबिक.. चलिहे गे।।
लेकिन जटिन उसे नहीं मानती है। और कहती है मैं तो अपने माता-पिता की इतनी दुलारी हूँ। कभी किसी का आदेश नहीं माना है तो तुम्हारी बात किस तरह से मानूँ।
नहिये लबबो रे जटा, नहिये लबबो रे।
हम त बाबा के दुलारी धिया नहिये लबबो रे।।
इसी तरह के बात-विवाद चलता रहता है। प्रेम से भरे इस माहौल में जटिन अपने जट से कभी उसकी कमाई के बारे में पूछती है तो कभी खुद के लिए आभूषण बनवाने को कहती है। हाथी दाँत वाले कंघी भी उसे खूब भाते हैं। रूठने मनाने की क्रिया में एक बार जट जटिन में लड़ाई हो जाती है और वह रूठ कर मायके जाने लगती है, जट नहीं चाहता है कि जटिन मायके जाए वह उसे बहुत मनाने की कोशिश करता है लेकिन जटिन नहीं मानती है और मायके चली जाती है। जट-जटिन की विरह वेदना से ग्रसित होकर कहता है-
तोरे बिनु अँगना में दुभिया जनमल गे जटिन।
सेजिया पे मकड़ा के जाली भई गेल गे जटिन, तोरे रे बिनु।।
जट जटिन के वियोग में परेशान हो जाता है और उसे मनाने के लिए ससुराल जाता है। काफी मान मनौवल के बाद जटिन वापस जट के घर पर आ जाती है।
गीत-नृत्य पर आधारित इस कथा का प्रसंग चाहे जो भी हो, अंत हमेशा सुखान्त होता है। आज भी बिहार के आँचलिक हिस्सों में शरद ऋतु में खासकर कार्तिक के महीने में महिलाएँ देर रात तक जागकर गीत-नृत्य करती हैं।
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-प्रीतिमा वत्स



 यह लेख आधुनिक साहित्य के अप्रैल-जून अंक में प्रकाशित है।

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