Monday, June 12, 2017

कितने अपने थे वे आँगन


Intro-इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।




सुबह की पहली किरण के साथ आँगन के उस अमरूद पेड़ पर चिड़ियों का चहचहाना। दादाजी का आँगन के चबूतरे पर बैठे खाँसते रहना। दादी का सुबह-सुबह नहाकर आँगन में बैठकर रामायण बाँचना। बच्चों की पूरी टीम का आँगन में धमाचौकड़ी मचाना। समय-समय पर महरियों का घर की बहुओं के साथ हाथ नचा-नचाकर लड़ना। जाड़े की दोपहरी में घर के कामों से छुट्टी पाकर पूरे घर का आँगन की गुनगुनी धूप में बैठकर गप्पे मारना। सच कितना अपना लगता था वो आँगन।

बहुत  कुछ जुड़ा है आँगन की यादों से। वो आँगन जो जगह के अभाव में सिमटता चला जा रहा है।जब भी अपने गाँव जाती हूँ और वो बड़ा सा आँगनदेखती हूँ जो अब छोटे-छोटे हिस्सों में बँटता हुआ लगभग खत्म हो चुका है,जिसके चारों ओर से मकान बने हुए थे, तो बचपन की बहुत सारी मीठी-मीठी यादें भी ताजा हो जाती हैं।घर के आधे से ज्यादा काम तो अकेले आँगन में ही होता था। कितना सुहावना लगता था जब माँ आँगन के एक कोने में बैठकर चावल चुन रही होती और जाने कहाँ से दो चिड़ियाँ के बच्चे आकर उन फेंके हुए दानों को खाने लगती। माँ भी खुश हो जाती थीं उन चिड़ियों को देखकर। हम सभी भाई-बहनों ने भी तो इसी आँगन के चारों तरफ के दालानों को पकड़-पकड़कर चलना सीखा था। पकड़म-पकड़ाई खेलना हो या लँगड़ी टाँग। कबड्डी खेलना हो या ऊँच-नीच का पापड़ा। हर खेल के लिए सबसे अच्छी जगह ये आँगन ही था।
इसी आँगन में चलना सीखा,इसी आँगन में खेलकर बड़ी हुई, इसी आँगन में पति के साथ अग्नि के सात फेरे लिए और इसी आँगन की देहरी से विदा हुई। परन्तु जब महानगर के इस छोटे से मकान में आई तो यहाँ आँगन नाम की कोई चीज नहीं है। अब बहुत याद आता है वो आँगन और समझ में आता है उसकी महत्ता।
कुछ दशक पहले तक जब घर बनाए जाते थे तो हर चीज के साथ घर में आँगन की भी जगह छोड़ी जाती थी।वास्तुशास्त्र के हिसाब से घर को बीचोंबीच आँगन की जगह छोड़ी जाती थी। ऐसा माना जाता था कि घर के बीचों-बीच वास्तुदेवता विश्राम करते हैं और उन्हें खुली जगह बहुत पसंद है। उनकी खुशी से ही घर में सुख-शान्ति बनी रहती है।सुपरिचित वास्तुशास्त्री और ज्योतिषाचार्य पूनम वेदी का कहना है कि घर के आँगन में वास्तुदेवता की छाती होती है। यह पूरे घर का हृदयस्थल माना जाता है। जिस तरह हम अपने दिल में सबको जगह देते हैं और घर के सब लोग एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उसी तरह आँगन भी घर के हर व्यक्ति को एक दूसरे से जोड़े रखने का काम करता है।
आज हमारे आँगन की तरह हमारे दिलों में भी दूसरे व्यक्तियों के लिए जगह खत्म होती चली जा रही है
वास्तुदेवता की उपस्थिति बहस का विषय हो सकती है, लेकिन हर घर में तुलसी के बिरवे के साथ सजता हुआ आँगन कितना उपयोगी होता है,यह हम बचपन से ही देखते आ रहे हैं।
जब हमारे दादाजी का देहांत हुआ था तो इसी तुलसी के बिरवे के पास आँगन में उनके पार्थिव शरीर की रखा गया था। पूरे गाँव के लोग आए थे तब हमारे आँगन में।
जब भी हमारे घर में कोई मन-मुटाव होता, घर के सभी लोग इसी आँगन में आकर लड़ाई-झगड़े करते। एक-दूसरे को भला-बुरा कहते। लेकिन अपनी-अपनी भड़ास निकालने के बाद एक दूसरे का चेहरा देखते हुए कब उनका गुस्सा शान्त हो जाता पता भी नहीं चलता। फिर माँ और चाची मिलकर चाय और पकौड़े से सबको शान्त करतीं थीं। कुछ ही देर बाद सभी हल्के मन से अपने-अपने काम में लग जाते।
परंतु समय हमेशा ऐसा नहीं रहा। पहले आँगन में दीवारें खिंची। फिर धीरे-धीरे आँगन नाम की चीज हीं खत्म होती चली गईं।आज तो माहौल ऐसा हो गया है कि एक ही परिवार में आदमी एक दूसरे से कई दिनों तक नहीं मिल पाते। समय की कमी के साथ इसका एक कारण आँगन का न होना भी है। जरा सी बात पर यदि कुछ मन-मुटाव हो जाता है तो एक-दूसरे से मिलकर हम उसे दूर नहीं करते बल्कि अपने-अपने घरों में बैठे कुढ़ते रहते हैं और मन-मुटाव बढ़ता चला जाता है।
जब काफी दिनों तक माहौल सुधरता नहीं है और बात बिगड़ती चली जाती है तो बहुत याद आता है वह आँगन।
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-प्रीतिमा वत्स

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