Tuesday, November 17, 2015

सूर्य को नमस्कार


चारों तरफ ढोल -बाजों का आवाजें हैं। लाउडस्पीकर पर भोजपूरी भाषा में शारदा सिन्हा की आवाज में कहीं पर,
ले ले अइहो हो भइया गेहूँ के मोटरिया..., आ गइले हो उजे छठ के बरतिया।
अबके बरस में महंगा भइले गेहुँआ......., छोड़ी दही गे बहिना छठ के बरतिया।।
तो कहीं पर-
पान सुपाड़ी,परसाद लेने खाड़ छईं, उगहो सुरुज देव अरग के बेर। हो अरग के बेर।।
जैसे गीतों से वातावरण गुंजायमान हो रहा है। हर गली से झुंड में सजे हुए नर-नारी तथा उछलते कूदते बच्चे किसी जलाशय की तरफ चले जा रहे हैं। समवेत स्वर में लोकप्रिय भक्ति संगीत गाते हुए लोगों के छोटेछोटे समूह प्रत्येक घर से निकलते हैं और नदी तट तक पहुँचतेपहुँचते ये जुलूस एक विशाल जनसमूह का रूप ले लेते हैं। जी हाँ ............यह छठ पूजा का उत्सव है। जो बिहार,झारखंड,उत्तरप्रदेश तथा उससे सटे हुए कुछ इलाकों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हाल के कुछ वर्षों में इस पर्व की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। लोक पर्व से यह अब एक महापर्व हो चला है।
कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथी को छठ का पर्व मनाया जाता है। बिहार, झारखंड ,नेपाल की तराई तथा उत्तप्रदेश में यह पर्व सदियों से मनाया जाता रहा है। सूर्य भगवान को समर्पित यह व्रत स्त्रियाँ अपने पति व बच्चों की सलामती तथा स्वास्थ्य की कामना से करती हैं। कुछ इलाके में इस व्रत को पुरूष भी करते हैं । इस व्रत को करने का विधान भी बड़ा रोचक है। प्रौढ़ विवाहित स्त्रियाँ ही सभी तैयारियाँ करती हैं। एक ओर आयु में कम स्त्रियाँ व बच्चे घर के अन्य कार्यों का सम्भालती हैं, दूसरी ओर प्रौढ़ स्त्रियाँ उन वस्तुओं की भलीभाँति सफ़ाई-धुलाई करती हैं, जिनका प्रयोग पूजा, प्रसाद में होता है। सभी वस्तुओं की चाहे वह रसोई का चूल्हा हो, करछुल हो, पकाने में प्रयोग आने वाली पकड़ हो या भूनने का पात्र-सबकी पूरी तरह से सफ़ाई की जाती है। नये पीसे हुए चावलों की लेई बनाई जाती है। सूखा मेवा व नारियल के टुकड़ों को स्वाद बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है। इनको आटे में मिला कर लड्डू बनाए जाते हैं। पारम्परिक व्यंजन 'ठेकुआगेहूँ के मड़े हुए आटे को विभिन्न आकारों में काटकर बनाया जाता है। इसके लिए काष्ठ के साँचों का भी प्रयोग किया जाता है। तत्पश्चात इसे गाढ़े भूरे रंग का होने तक तला जाता है। इस प्रसाद को बनाने के लिए गृहस्थ प्रौढ़ महिला कुछ नियमों का पालन करती है। जैसे- वह पका हुआ खाना नहीं खाती तथा सिले हुए वस्त्र नहीं पहनतीं। रसोई में जाने से पहले प्रत्येक व्यक्ति का स्नान करना आवश्यक होता है।
यह व्रत चार दिन का होता है। पहले दिन व्रती सेंधा नमक में बना लौकी और चावल खाते हैं। शायद इसलिए इस दिन का नाम ही लौकी भात रख दिया गया है। दूसरे दिन डूबते सूर्य को अर्ध्य देकर खीर,पूड़ी,केला और गुड़ का भोग लगाकर वही एक बार रात को खाते हैं। इस दिन का नाम खड़ना है। तीसरे दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत होकर व्रती एक दिन-रात का निर्जल व्रत रखते है। संध्या के समय किसी नदी या सरोवर के पास जाकर अस्त होनेवाले सूर्य की विधिवत पूजा करते हैं कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है।  सूप में नारियल, सेब, नारंगी आदि मौसमी फलों के साथ विभिन्न प्रकार के पकवान सूर्य भगवान को चढ़ाए जाते हैं। जलाशय के किनारे गन्ने,केले तथा अदरक के पौधे से गेट सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद व्रर्ती अपने-अपने घर चले आते हैं। तथा रातभर जागकर हर पहर उठ-उठकर सूर्य की अराधना करते हैं। सूर्योदय होने पर स्नान करके सूर्य भगवान को नियम पूर्वक अर्ध्य प्रदान करते हैं और ब्राह्मणों को दान देते हैं,सुहागनों की मांग भरकर उन्हे आंचल में प्रसाद देते हैं, तब पारण करते हैं। कहीं- कहीं हवण का भी विधान है।

    छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्‍य इस परंपरा में है। छठ पर्व के पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है। छठ पर्व के पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है।
एक लोक मान्यता के अनुसार छठ के व्रत के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोक की माने तो कहा तो यह भी जाता है कि सूर्यदेव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। 
परंपरओं और मान्यताओं के साथ-साथ छठपर्व अत्यन्त रंगबिरंगा उत्सव है, जिसमें श्रद्धालुओं को नये वस्त्र धारण करना आवश्यक होता है। घर व नदी के तट पर संगीत के सुर भक्ति व लोकभाषा से महक उठते हैं।  लाखों लोग गंगा के तट पर मीलों लम्बी कतारों में बैठे रहते हैं।कई बार तो देखा गया है कि बचपन की बिछड़ी सहेलियां इस पवित्र गंगातट पर प्रौढ़ावस्था में मिल जाती हैं। कभी-कभी लड़के,लड़कियों की शादियां इस भीड़ में तय हो जाती हैं। पर्व से उत्पन्न यह आपसी मेलजोल अनूठा ही प्रतीत होता है।
स्थान बदलने से लोक कथाएं बदल जाती हैं, कुछ बेसिक नियमों में फेर बदल हो जाता है, लेकिन इस पर्व के मूल में जो बात है, श्रद्धा है, उसमें लेशमात्र भी कमी नहीं आती। सदियों से चलते आ रहे ये लोक उत्सव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वतः हस्तांतरित होती रहती है, और निर्बाध गति से चलती आ रही है।

 -प्रीतिमा वत्स
 फोटोग्राप्स - नेट से साभार

2 comments:

  1. अच्छी जानकारी । इस अनूठे की पर्व की शुभकामनायें

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  2. बहुत सुंदर आलेख। आपने विस्तार से बताया। पौराणिक मान्यता के साथ साथ इसके वैज्ञानिक आधार की भी विवेचना की। अच्छा लगा इसके पूरे अनुष्ठान पर पढ़कर। खासकर शारदाजी की आवाज तो मानों इस उत्सव के साथ जुड़ गई हो। कोई कलाकार कैसे एक उत्सव पर्व का प्रतीक बन जाता है। .यह महसूस होता है।

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